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इस राज्य में 2 करोड़ की लागत से बनेगा मंकी पार्क, क्या इससे हल होगी बंदरों की समस्या?

कर्नाटक में दो करोड़ की लागत से चामुंडी हिल्स पर मंकी पार्क बनाया जाना है.

नीरज नैयर 4 years ago

देश के कई शहरों में बंदरों की बढ़ती संख्या मुश्किल बन गई है. मुश्किल इस लिहाज से कि सिकुड़ते वन क्षेत्र की वजह से बंदर खाने के लिए शहरों का रुख कर रहे हैं. ऐसे में उनका मनुष्यों के साथ संघर्ष बढ़ रहा है. भूख की वजह से कभी-कभी वो हिंसक हो जाते हैं और लोगों को काट लेते हैं. नतीजतन बंदरों के खिलाफ क्रूरता में भी तेजी आती है. इस समस्या को दूर करने के लिए कर्नाटक में ‘मंकी पार्क’ की योजना पर काम चल रहा है.

क्या है सरकार का तर्क?
कई सरकारी एजेंसियां इस प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं और इसे दो करोड़ की लागत से चामुंडी हिल्स पर बनाया जाना है. इस पार्क में बंदरों के खाने-पीने और चिकित्सीय देखभाल की भी व्यवस्था होगी. सरकार का मानना है कि जब बंदरों को पार्क में भरपूर खाना मिलेगा तो वो शहरों का रुख नहीं करेंगे और मनुष्यों के साथ उनका संघर्ष नहीं होगा. वैसे, मंकी पार्क का कांसेप्ट नया नहीं है. बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक में ऐसी बातें हो चुकी हैं.  

यहां भी हुईं थीं घोषणाएं
कुछ साल पहले गाजियाबाद में हिंडन नदी के किनारे पार्क बनाने की बात कही गई थी. इसके लिए नगर निगम ने जमीन तलाशना भी शुरू कर दिया था. लेकिन अब इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है. इसी तरह, पिछले साल बिहार के वन पर्यावरण मंत्री नीरज कुमार सिंह ने भी मंकी पार्क बनाने की घोषणा की थी, मगर वो भी कागजों तक ही सीमित रह गई. इतना ही नहीं, कर्नाटक के शिवमोगा जिले में भी मंकी पार्क बनाने का प्रस्ताव था, पर काम आगे नहीं बढ़ा. अब चामुंडी हिल्स पर पार्क निर्माण की कोशिश की जा रही है. 

वन विभाग देगा जमीन
कर्नाटक के विधायक एसए रामदास का कहना है कि इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य बंदरों को फूड, शेल्टर और मेडिकल केयर उपलब्ध कराना है. इसे मैसूर सिटी कारपोरेशन (MCC) के वेटनरी और एनीमल हसबेंडरी सेक्शन द्वारा तैयार किया जाएगा. रामदास के मुताबिक, चूंकि जमीन वन विभाग उपलब्ध करा रहा है, इसलिए प्रोजेक्ट पर अमल में कोई दिक्कत नहीं आएगी. लोगों को पार्क में जाकर बंदरों को खाना खिलाने के भी अनुमति होगी.

केवल इसी सूरत में होगा सफल
कर्नाटक में बंदरों द्वारा लोगों को काटने और बदले में बंदरों के खिलाफ क्रूरता के मामले आये दिन सामने आते रहते हैं. ऐसे में क्या यह प्रोजेक्ट मनुष्य और बंदर दोनों के लिए फायदेमंद होगा, क्या इससे बंदरों की बढ़ती समस्या से निपटा जा सकेगा? इस सवाल के जवाब में मध्य प्रदेश वन विभाग के रिटायर्ड IFS अधिकारी सुहास कुमार ने कहा, ‘सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि पार्क खुला होगा या फिर इसे ज़ू की तरह निर्मित किया जाएगा. क्योंकि अगर ये ओपन पार्क होगा, तो फिर बंदरों को रोककर रखना लगभग नामुमकिन है, फिर भले ही उनके लिए रसदार फलों के कितने भी पेड़ क्यों न लगे हों. इसकी वजह ये है कि जो बंदर सालों से मनुष्यों के आसपास रह रहे हैं, उनके जैसा खाना खा रहे हैं, उनका पुन: ऐसे माहौल में ढलना, जिससे वो सालों पहले बाहर निकल आए हैं, मुश्किल है’.   

‘नसबंदी पर फोकस ज़रूरी’
सुहास कुमार के मुताबिक, अगर पार्क ज़ू स्टाइल में बनाया जाता है, केवल तभी बंदरों को वहां रोका जा सकता है, क्योंकि उनके पास भाग निकलने का कोई रास्ता नहीं होगा. उनका यह भी कहना है कि बंदरों की समस्या से निपटने का एकमात्र कारगर तरीका है, उनकी जनसंख्या को सीमित करना और ये तभी संभव है कि जब नसबंदी के लिए व्यापक स्तर पर अभियान चलाया जाए. कुमार ने आगे कहा, ‘नसबंदी खर्चीला तरीका ज़रूर है, लेकिन इससे बंदरों की संख्या को नियंत्रित किया जा सकता है’.    
 


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