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नेपाल में युवा क्रांति और पहली महिला प्रधानमंत्री: एक नए युग की शुरुआत

युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों ने नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री को सत्ता में पहुंचाया, राजनीति को पुनर्परिभाषित किया और भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया की परीक्षा ली.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

नेपाल ने एक बार फिर अपने पड़ोसियों और दुनिया को चौंका दिया है. जो शुरुआत भ्रष्टाचार के खिलाफ बिखरे हुए सड़क प्रदर्शनों और अचानक लगाए गए सोशल मीडिया ब्लैकआउट से हुई थी, वह देश की पहली महिला प्रधानमंत्री की नियुक्ति तक जा पहुँची और यह परिणाम न तो किसी महल की साजिश का था, न ही किसी पार्टी के गुप्त सौदेबाज़ी का, बल्कि यह युवाओं के नेतृत्व वाले जनांदोलन की ताक़त से आया. यह क्षण केवल एक समाचार शीर्षक नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया में एक नए राजनीतिक व्याकरण के आगमन का संकेत है, जहाँ पीढ़ियों की अधीरता जड़ जमाए सत्ता ढाँचों से टकराती है और यथास्थिति को उलट देती है.

हाल के प्रदर्शनों ने काठमांडू और उससे आगे के क्षेत्रों को हिला दिया. ये पहले की राजनीतिक आंदोलनों जैसे नहीं थे, जो आमतौर पर पार्टी कार्यकर्ताओं या राजशाही समर्थकों द्वारा चलाए जाते थे. इस बार सड़कों पर दिखने वाले चेहरे अधिकांशतः युवा थे. कॉलेज छात्र, पहली बार वोट देने वाले नागरिक, और वह जनरेशन-Z जिसे 2006 में राजशाही के उन्मूलन के बाद जन्म मिला, वे प्लेकार्ड, हैशटैग और पारंपरिकता से परे एक नई भाषा के साथ सार्वजनिक चौकों में उमड़ पड़े. उनके माँगें किसी वैचारिक क्रांति की नहीं थीं, बल्कि गरिमा, पारदर्शिता और अवसर की थीं.

यही जन आंदोलन वर्तमान प्रधानमंत्री के इस्तीफे का कारण बना. उनकी जगह, जनमत के दबाव में संसद ने एक महिला नेता को पदोन्नत किया, जिनका उदय भले ही राजनीतिक रूप से बातचीत का परिणाम हो, लेकिन उनके पास युवा वैधता की मुहर है. वह केवल लिंग आधारित मील का पत्थर नहीं हैं, बल्कि नेपाल के अतीत की पितृसत्तात्मक सत्ता से प्रतीकात्मक रूप से एक विद्रोह का भी प्रतिनिधित्व करती हैं.

क्यों यह क्षण महत्वपूर्ण है

नेपाल ने करिश्माई राजा देखे हैं, माओवादी क्रांतिकारी और सुधारवादी लोकतंत्रवादी भी. लेकिन इसने अब तक ऐसा प्रधानमंत्री नहीं देखा था जिसे एक स्पष्ट पीढ़ीय बदलाव के दबाव में चुना गया हो, और जो एक लंबे समय से प्रतीक्षित नारीवादी प्रगति का भी प्रतीक हो. ज़ाहिर है, उनका कार्यकाल गठबंधन की राजनीति, गुटबाज़ी, और संस्थागत गतिरोध जैसी समस्याओं से अछूता नहीं रहेगा. लेकिन उनका सत्ता में पहुँचना ही यह दर्शाता है कि नेपाल का लोकतांत्रिक प्रयोग, जिसे अक्सर नाज़ुक बताया जाता है, नई सामाजिक ऊर्जा के जवाब में खुद को फिर से गढ़ सकता है.

यह घटनाक्रम नेपाल की राजनीतिक संस्थाओं की स्थिरता को लेकर भी प्रश्न उठाता है. क्या सड़क प्रदर्शन से विवश की गई संसद अपनी विश्वसनीयता फिर से हासिल कर सकती है? क्या युवा सक्रियता एक स्थायी राजनीतिक भागीदारी में बदलेगी, या केवल उत्तेजना के क्षणिक जोश में ही सिमट कर रह जाएगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या नई प्रधानमंत्री अपने प्रतीकात्मक जनादेश को शासन की कठोर वास्तविकताओं महंगाई पर नियंत्रण, रोजगार सृजन और भारत-चीन के बीच फंसे एक स्थलरुद्ध राष्ट्र की भू-राजनीतिक चुनौतियों से संतुलित कर सकेंगी?

भारत की भागीदारी

भारत के लिए नेपाल में एक महिला प्रधानमंत्री का उदय एक अवसर भी है और एक चुनौती भी.

अवसर इसलिए क्योंकि नई दिल्ली ने हमेशा अपने पड़ोस में समावेशी लोकतंत्र का समर्थन करने की बात कही है, और यह बदलाव भारत को सशक्तिकरण और सुधार की एक नई कहानी से जोड़ने का मौका देता है. नेपाल की एक नई पीढ़ी, जो पुराने भारत-विरोधी नारों से कम जुड़ी है, भारत के साथ व्यावहारिक सहयोग के लिए तैयार हो सकती है बशर्ते भारत उनकी आकांक्षाओं का सम्मान करे.

चुनौती इस बात में है कि अति-हस्तक्षेप से बचा जाए. ऐतिहासिक रूप से, नेपाल की राजनीति में भारत की दखल ने कई बार प्रतिक्रिया और राष्ट्रवादी रोष को जन्म दिया है. अब जब एक युवा आबादी आत्मविश्वास से भरपूर है, भारतीय संरक्षकता की कोई भी झलक उलटी पड़ सकती है. नई दिल्ली के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता होगा रणनीतिक संयम दिखाना.

शांतिपूर्वक संवाद करना, पारस्परिक रूप से लाभकारी परियोजनाओं जैसे सीमा-पार बुनियादी ढांचे और ऊर्जा सहयोग को समर्थन देना, और काठमांडू की घरेलू राजनीति में हस्तक्षेप से बचना.

चीन का प्रभाव

हालांकि, भारत चीन की छाया को नजरअंदाज़ नहीं कर सकता. बीते वर्षों में, बीजिंग ने नेपाल के साथ गहरे संबंध बनाए हैं, बुनियादी ढाँचे में निवेश कर, और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के ज़रिए काठमांडू को अपने पाले में लाने की कोशिश की है. भले ही नेपाली युवा स्वाभाविक रूप से चीन समर्थक न हों, लेकिन रोज़गार, निवेश और कनेक्टिविटी की उनकी भूख चीन की चेकबुक कूटनीति के लिए उर्वर भूमि तैयार करती है. भारत को यह समझना होगा कि नैतिक पूंजी, सांस्कृतिक-सांझा विरासत, धर्म और लोगों के बीच संबंध, ये सब महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आर्थिक वास्तविकताओं की जगह नहीं ले सकते.

इसलिए, भारत-नेपाल संबंधों का भविष्य संवेदनशीलता और ठोस प्रयासों का संतुलन होना चाहिए.

संवेदनशीलता, नेपाल की संप्रभु पसंदों को स्वीकार करने में और उसे उपग्रह राज्य की तरह न समझने में.

ठोस प्रयास, जिनमें विद्युत व्यापार का विस्तार, पर्यटन पुनरुद्धार, सीमा प्रबंधन का सरलीकरण और नेपाली युवाओं के लिए शैक्षिक अवसर शामिल हैं. इन दोनों को जोड़कर नई दिल्ली एक स्थायी सद्भाव बना सकती है.

आगे की राह

नेपाल की नई महिला प्रधानमंत्री के सामने एक कठिन कार्य है. उन्हें जमी-जमाई सत्ता को यह भरोसा दिलाना होगा कि उनका नेतृत्व कोई खतरा नहीं है, और साथ ही अधीर युवाओं को यह विश्वास भी देना होगा कि वे वही बदलाव हैं जिसकी माँग की गई थी. उनकी सफलता या विफलता यह तय करेगी कि यह घटना केवल इतिहास का एक फुटनोट बनेगी या दक्षिण एशिया की राजनीति में एक निर्णायक मोड़.

भारत के लिए संदेश स्पष्ट है: नेपाल अब वह पुराना, राजमहल-प्रेरित, आज्ञाकारी देश नहीं रहा. यह एक बेचैन लोकतंत्र है जहाँ युवा रातोंरात सत्ता-संरचना को उलट सकते हैं. ऐसे नेपाल से जुड़ाव में लचीलापन और संवेदनशीलता दोनों चाहिए. अगर नई दिल्ली इस अवसर का लाभ उठा सके, तो वह न केवल अपनी उत्तरी सीमा को सुरक्षित रखेगी बल्कि एक ऐसे पड़ोसी की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के साथ खड़ी होगी, जिसने अपनी राह खुद चुनकर दुनिया को चौंका दिया है.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

सिद्धार्थ अरोड़ा, अतिथि लेखक

सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए (मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट) हैं, जो वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व विदेश नीति में गहरी रुचि रखते हैं.

 


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