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क्या भारत की व्यावहारिक विदेश नीति लगातार परिणाम देती रहेगी?

लेखक सिद्धार्थ अरोड़ा के अनुसार घरेलू विकास और वैश्विक भागीदारी के बीच संतुलन साधने का खाका तलाश रहे उभरते राष्ट्रों के लिए भारत एक प्रेरणादायक मॉडल प्रस्तुत करता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

आज की भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील दुनिया में, जहाँ राष्ट्र विचारधारा, प्रतिस्पर्धी शक्ति गुटों और निरंतर वैश्विक दिखावे से बंटे हुए हैं, वहां भारत की विदेश नीति एक शांत अपवाद के रूप में उभरती है. जब कई देश प्रभाव बढ़ाने के लिए हस्तक्षेप, सैन्य गठबंधनों या वैचारिक प्रचार का सहारा लेते हैं, भारत ने प्रायः एक भिन्न मार्ग चुना है.

भारत की विदेश नीति को सबसे अच्छी तरह से गैर-विचारधारात्मक, व्यावहारिक और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों पर आधारित बताया जा सकता है. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, रणनीतिक स्वायत्तता और गैर-हस्तक्षेप के सिद्धांतों में निहित यह दृष्टिकोण भारत को वैश्विक मंच पर एक विशिष्ट उपस्थिति प्रदान करता है: सम्मानित, संतुलित और लगातार प्रभावशाली होती हुई.
इस मार्ग को और भी दिलचस्प बनाता है इसकी निरंतरता, चाहे वामपंथी, मध्यमार्गी या दक्षिणपंथी सरकारें सत्ता में रही हों, भारत की मूल विदेश नीति दशकों से स्थिर बनी रही है, इससे दो प्रमुख प्रश्न उठते हैं: भारत ने यह दृष्टिकोण क्यों अपनाया? और अन्य प्रमुख शक्तियाँ इसे क्यों नहीं अपना सकतीं?

इसका उत्तर भारत के विशिष्ट ऐतिहासिक अनुभव में आंशिक रूप से निहित है. सदियों की औपनिवेशिक सत्ता से उभरने के बाद भारत में विदेशी हस्तक्षेप के प्रति गहरी अस्वीकृति थी. यह अस्वीकृति केवल भावनात्मक नहीं थी; यह रणनीतिक थी. जब भारत ने 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की, तब उसके सामने भारी विकासात्मक चुनौतियाँ थीं. इसके पहले नेताओं, विशेष रूप से जवाहरलाल नेहरू ने समझा कि देश शीत युद्ध की शक्ति राजनीति में उलझने का जोखिम नहीं उठा सकता.

इसके बजाय, भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का नेतृत्व किया और अमेरिकी या सोवियत गुटों में से किसी के साथ खड़ा होने से इनकार किया. यह अस्थिरता नहीं थी, बल्कि स्वायत्तता की रक्षा करने की रणनीति थी.

भारत की विदेश नीति, इसलिए, दूसरों पर प्रभुत्व जमाने की इच्छा से नहीं, बल्कि स्वयं की रक्षा की आवश्यकता से विकसित हुई. यह मौलिक सोच देश की तत्काल प्राथमिकताओं से भी पुष्ट हुई: राष्ट्र निर्माण, गरीबी उन्मूलन, और अत्यधिक विविध समाज में एकता की स्थापना। सैन्य दुस्साहस या वैचारिक टकराव इन लक्ष्यों के अनुकूल नहीं थे.

भौगोलिक स्थिति ने भी सहायता की, उत्तर में हिमालय और दक्षिण में हिंद महासागर के साथ भारत को प्राकृतिक रक्षात्मक सीमाएँ प्राप्त थीं. इसकी तात्कालिक चिंताएँ क्षेत्रीय थीं, वैश्विक नहीं, रूस की विशाल सीमाओं या अमेरिका की वैश्विक सैन्य उपस्थिति के विपरीत, भारत को अपने पड़ोस से बहुत दूर शक्ति का प्रदर्शन करने की कोई बाध्यता नहीं थी.

समय के साथ, जैसे-जैसे भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ी और उसका वैश्विक कद बढ़ा, उसकी मूल विदेश नीति की धारणाएँ बरकरार रहीं. यह निरंतरता विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि भारत की घरेलू राजनीति जीवंत और कभी-कभी विभाजनकारी रही है. चाहे कांग्रेस पार्टी सत्ता में रही हो या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), भारतीय सरकारों ने देश की गैर-हस्तक्षेपकारी और हित-आधारित कूटनीतिक स्थिति को प्रायः बनाए रखा है.

इसका कुछ श्रेय भारत की संस्थागत संरचना को जाता है. विदेश मंत्रालय (MEA) में कैरियर डिप्लोमैट्स और विदेश सेवा अधिकारियों की नियुक्ति होती है, जो राजनीतिक दिखावे की बजाय रणनीतिक निरंतरता को प्राथमिकता देते हैं. भारत में विदेश नीति से जुड़ी बहसें शायद ही कभी चुनावी चक्रों पर हावी होती हैं, जिससे नीति निर्धारकों को अल्पकालिक लोकलुभावनता की बजाय दीर्घकालिक योजना पर ध्यान केंद्रित करने की गुंजाइश मिलती है.

भले ही भारत की शैली बदल गई हो, नरम स्वभाव वाले नेहरूवादी आदर्शवाद से लेकर आज की अधिक आत्मविश्वासी रणनीतिक मुखरता तक, मगर इसकी मूल भावना उल्लेखनीय रूप से स्थिर बनी रही है. भारत साझेदारियाँ चाहता है, पर निर्भरता नहीं; संप्रभुता का सम्मान करता है, और उलझाऊ सैन्य प्रतिबद्धताओं से परहेज करता है. इसके गठबंधन अक्सर व्यावहारिक, लेन-देन आधारित और सावधानीपूर्वक संतुलित होते हैं.

तो फिर अन्य प्रमुख शक्तियों ने ऐसा मॉडल क्यों नहीं अपनाया?
एक कारण यह है कि वे ऐसा कर ही नहीं सकते, संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने आरंभ से ही अपनी विदेश नीति को स्वतंत्रता, लोकतंत्र और पूंजीवाद फैलाने के माध्यम के रूप में देखा है. इसकी पहचान वैश्विक नैतिक नेतृत्व की धारणा से जुड़ी हुई है. इसी प्रकार, शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन की विदेश नीति राष्ट्रवाद और सभ्यतागत गर्व में निहित है. चीन स्वयं को एक प्रभुत्वशाली शक्ति के रूप में अपने ऐतिहासिक स्थान को पुनः प्राप्त करते हुए देखता है. वहीं रूस एक आक्रामक रुख अपनाता है ताकि वह अपने निकटवर्ती क्षेत्रों में प्रभाव फिर से स्थापित कर सके और जो वह पश्चिमी दखल मानता है उसका मुकाबला कर सके.

इन तीनों ही मामलों में, विदेश नीति केवल राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, यह किसी ऐतिहासिक मिशन या वैचारिक दृष्टिकोण को पूरा करने का भी माध्यम है. इससे पीछे हटना उनके लिए एक अस्तित्वगत समझौते के समान होगा.

इसके अलावा, ये शक्तियाँ वैश्विक गठबंधन प्रणालियों में बँधी हुई हैं, जो निरंतर सक्रियता की मांग करती हैं. अमेरिका NATO से अलग नहीं हो सकता बिना अपनी विश्वसनीयता को खतरे में डाले. चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव उसकी वैश्विक रणनीति का केन्द्रीय हिस्सा है. रूस के सैन्य हस्तक्षेप उसकी शक्ति दलाल की पहचान से जुड़े हुए हैं.

इसके विपरीत, भारत एक दुर्लभ विलासिता का आनंद लेता है: रणनीतिक संयम, वह बाध्यकारी सैन्य गठबंधनों से बँधा नहीं है. उसकी कूटनीति मुद्दा-आधारित है, न कि विचारधारा-आधारित, इसने भारत को अमेरिका, रूस, ईरान, फ्रांस और यहाँ तक कि चीन के साथ भी मजबूत संबंध बनाए रखने की अनुमति दी है, यद्यपि समय-समय पर तनाव बना रहा है.
यह रणनीतिक संयम ठोस लाभ भी देता है. यह भारत को आर्थिक वृद्धि, तकनीकी नवाचार, जलवायु नेतृत्व और क्षेत्रीय स्थिरता जैसी तात्कालिक प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित करने की अनुमति देता है. यह भारत को वैश्विक संघर्षों में एक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में भी स्थापित करता है. उदाहरण के लिए, रूस-यूक्रेन युद्ध पर उसका संतुलित रुख उसे मॉस्को और वाशिंगटन दोनों से संवाद करने की स्थिति में रखता है, जबकि वह अपने मूल हितों की रक्षा करता है.

परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होने वाले क्षेत्रों में संतुलन बिठाने की भारत की क्षमता शायद उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत है। क्वाड की सदस्यता होने के बावजूद वह BRICS या शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में भाग ले सकता है। वह अमेरिका के साथ सैन्य अभ्यास कर सकता है, और साथ ही रूस से तेल आयात भी कर सकता है। इस प्रकार का संतुलन साधने के लिए सावधानीपूर्वक संतुलन और स्वतंत्र सोच के प्रति गहन प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है.

जब दुनिया विचारधारात्मक अभियानों और हस्तक्षेपवादी अतिरेक से थक रही है, तब भारत के मॉडल की पुनर्व्याख्या एक निष्क्रिय नहीं, बल्कि एक विवेकपूर्ण दृष्टिकोण के रूप में की जा रही है. व्यापार, प्रौद्योगिकी, जलवायु वार्ताओं और बहुपक्षीय मंचों में भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा इस बात का प्रमाण है कि एक राष्ट्र बिना जबरदस्ती के भी प्रभाव हासिल कर सकता है.

जो उभरती शक्तियाँ घरेलू विकास और वैश्विक भागीदारी के बीच संतुलन साधने वाला रोडमैप तलाश रही हैं, उनके लिए भारत एक प्रेरक खाका प्रस्तुत करता है. यह दर्शाता है कि विदेश नीति प्रभावी होने के लिए मुखर होने की आवश्यकता नहीं है, और सैद्धांतिक होने के लिए विचारधारात्मक होने की भी नहीं. आने वाले वर्षों में, जब भू-राजनीतिक तनाव और गहराएंगे और महाशक्तियाँ अपनी स्थिति का पुनर्मूल्यांकन करेंगी, तब भारत का रणनीतिक संयम उसकी सबसे बड़ी शक्ति के रूप में उभर सकता है, एक शांत शक्ति, जिसकी प्रभावशीलता दीर्घकालिक हो.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)
 

सिद्धार्थ अरोड़ा, अतिथि लेखक
(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए (मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट) हैं, जो वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश नीति में गहरी रुचि है.)


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