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भारत के डेरिवेटिव्स बाजार में लॉटरी जैसा खेल क्यों? सुधार की आवश्यकता

भारत का डेरिवेटिव्स बाजार अपनी मूल भूमिका जोखिम प्रबंधन और कीमत खोज से भटककर अब एक सट्टा मंच बन गया है, जहां रिटेल निवेशक भारी नुकसान झेल रहे हैं और कुछ संस्थागत खिलाड़ी मुनाफा कमा रहे हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

भारत का डेरिवेटिव्स बाजार, जो कभी हेजिंग और प्राइस डिस्कवरी के लिए था, अब एक सट्टा बाज़ार बन गया है, जहां हेराफेरी आम बात हो गई है. इसका ताजा उदाहरण जुलाई 2025 में SEBI द्वारा Jane Street के खिलाफ की गई कार्रवाई है, जिसमें इसने सेंसेक्स ऑप्शन से कुछ ही मिनटों में 6,500% उछाल के साथ ₹4,844 करोड़ का मुनाफा कमाया. भरोसे को बहाल करने के लिए, यह जरूरी है कि साप्ताहिक एक्सपायरी को समाप्त किया जाए, रियल-टाइम रिस्क कंट्रोल लागू हो, और 'वन एक्सचेंज, वन एक्सपायरी' नीति को अपनाया जाए.

भारत का डेरिवेटिव्स बाजार एक अपवाद प्रतीत होता है. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) दुनिया का सबसे बड़ा डेरिवेटिव्स एक्सचेंज बन चुका है, जहां दैनिक टर्नओवर ₹35 ट्रिलियन तक पहुंच गया है और सालाना कॉन्ट्रैक्ट्स 100 मिलियन के आंकड़े को पार कर चुके हैं. लेकिन यह संख्या एक भ्रम है. NSE की ऑप्शन्स वॉल्यूम का 90% हिस्सा साप्ताहिक एक्सपायरी से आता है, जबकि अमेरिका में यह मासिक होता है.

इसके साथ ही, रिटेल ट्रेडर्स, जो कि सोशल मीडिया फिनफ्लुएंसर्स से आकर्षित होते हैं, F\&O को “जल्दी अमीर बनने” का तरीका समझते हैं, निवेश नहीं. SEBI के आंकड़ों के अनुसार, FY22 से FY24 के बीच 93% रिटेल ट्रेडर्स को घाटा हुआ, जिसकी कुल राशि ₹1.8 लाख करोड़ थी. फिर भी, 75% लोग ट्रेडिंग जारी रखते हैं और औसतन ₹1.5 से ₹2 लाख तक का नुकसान झेलते हैं. वहीं, संस्थागत निवेशक एल्गोरिदम और हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग (HFT) के जरिए मुनाफा कमाते हैं, जो NSE के वॉल्यूम का 50% पैदा करते हैं और क्षणिक लिक्विडिटी बनाते हैं.

SEBI के एक आदेश ने Jane Street द्वारा Nifty/Bank Nifty कॉन्ट्रैक्ट्स में की गई हेराफेरी को उजागर किया. BSE के सेंसेक्स डेरिवेटिव्स, जिनमें लगभग शून्य ओपन इंटरेस्ट है, भी उतने ही असुरक्षित हैं लेकिन वहां कोई ठोस नियामकीय समाधान नहीं है. महीने में आठ एक्सपायरीज से अस्थिरता और हेराफेरी को बढ़ावा मिल रहा है. भारत को अब एक सिंगल मंथली एक्सपायरी की ओर बढ़ना चाहिए. 'वन एक्सचेंज, वन एक्सपायरी' नीति को अपनाने से अर्बिट्राज के दुरुपयोग पर रोक लगेगी और बाज़ार को स्थिरता मिलेगी.

बाजार की दक्षता पर सवाल

भारत का F&O (फ्यूचर्स और ऑप्शंस) बाजार (जो अब वैश्विक एक्सचेंज-ट्रेडेड डेरिवेटिव्स का लगभग आधा हिस्सा बन गया है) का नोशनल टर्नओवर FY18 में ₹1,650 ट्रिलियन से बढ़कर FY24 में ₹80,000 ट्रिलियन हो गया है. यह वृद्धि मुख्यतः इंडेक्स ऑप्शंस के कारण हुई है. हालांकि यह स्केल एक मजबूत सिस्टम का संकेत देता है, लेकिन अधिकांश गतिविधि केवल दो-तीन इंडेक्स तक सीमित है. इससे न तो प्राइस डिस्कवरी होती है और न ही असली हेजिंग.

बाकी इंडेक्स में ट्रेडिंग नगण्य है और छोटे एवं मिडकैप स्टॉक्स में निवेश करने वाले बड़े निवेशकों के पास कोई कारगर हेजिंग विकल्प नहीं है. F\&O मार्केट अब कैश मार्केट से काफी हद तक कट चुका है. प्राइस डिस्कवरी कमजोर है, लिक्विडिटी सतही है और सट्टेबाजी बेलगाम हो चुकी है, जिसका कारण नियामकीय निगरानी की कमी और अनुपयुक्त उत्पादों की बाढ़ है. Jane Street का मामला तो बस उन कमजोरियों को उजागर करता है जिन्हें लंबे समय से अनदेखा किया जा रहा था.

प्राइस डिस्कवरी फेल हो चुकी है: अब डेरिवेटिव्स तय करते हैं कैश मार्केट के दाम

परिपक्व बाजारों में कैश इक्विटी प्राइस डिस्कवरी को संचालित करती है. लेकिन भारत में डेरिवेटिव्स का वॉल्यूम कैश ट्रेडिंग से 5 से 15 गुना अधिक है (Reuters, अप्रैल 2024). Futures Industry Association (FIA) के अनुसार, भारत में डेरिवेटिव्स का नोशनल ट्रेडिंग वॉल्यूम कैश मार्केट से 50–60:1 है, जबकि अमेरिका में यह अनुपात लगभग बराबर या उससे भी कम है.

इस असंतुलन ने बाजार संकेतकों को बिगाड़ दिया है. उदाहरण के लिए, अडानी ग्रुप की 2023 की गिरावट के दौरान, स्टॉक की कीमतों में 50% की गिरावट के बावजूद डेरिवेटिव्स में ओपन इंटरेस्ट बना रहा, जिससे संकेत मिला कि यह गिरावट वास्तविक नहीं बल्कि सिंथेटिक ट्रेड्स के कारण थी.

F&O का बढ़ता वॉल्यूम अब कैश मार्केट से पूरी तरह कट चुका है. प्राइस डिस्कवरी कमजोर है, लिक्विडिटी नकली है और वास्तविक हेजिंग दुर्लभ. SEBI की लचर निगरानी, इंडेक्स कंस्ट्रक्शन की उदासीनता और प्रोडक्ट अप्रूवल की ढिलाई के कारण यह हालात बने हैं. केवल कुछ उत्पादों में अत्यधिक सट्टा गतिविधि हो रही है, जबकि उपयोगी कॉन्ट्रैक्ट्स उपेक्षित रह गए हैं.

Bank NIFTY इंडेक्स के साथ 'वन एक्सचेंज, वन एक्सपायरी' नियम को लागू करने से अधिक सुव्यवस्थित और अनुशासित ट्रेडिंग माहौल बन सकता है. यह इंडेक्स एक संगठित सेक्टर का प्रतिनिधित्व करता है जो आर्थिक मूल्यों से मेल खाता है, जिससे सट्टा गतिविधियों को सीमित करने में मदद मिल सकती है.

टैक्सेशन: दोधारी तलवार

भारत में लेनदेन आधारित टैक्स, विशेष रूप से सिक्योरिटीज़ ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) पर काफी निर्भरता है. यह 2004 में टैक्स चोरी रोकने और सुनिश्चित राजस्व के लिए लागू किया गया था. भारत में STT लगभग हर ट्रेड पर लगता है.

दुनिया के अन्य बाजारों में STT की दर और प्रभाव काफी भिन्न होते हैं. भारत में यह 0.025% से 0.1% के बीच है, जो इक्विटी, म्यूचुअल फंड और डेरिवेटिव्स पर लागू होता है. FY25 में STT से ₹53,296 करोड़ का संग्रह हुआ, जो FY24 से 55% अधिक है और प्रत्यक्ष कर संग्रहण का लगभग 2.5% है. इसके मुकाबले अमेरिका में यह नगण्य है, और UK में 0.5% स्टैम्प ड्यूटी लगती है, जिससे प्रत्यक्ष करों में 1–2% योगदान होता है.

 

देश/क्षेत्र                            STT दर                    किन पर लागू होता है                  प्रत्यक्ष कर संग्रह में योगदान 

भारत                              0.025–0.1%              इक्विटी, म्यूचुअल फंड, F&O                     2.5% 

अमेरिका                          नगण्य ($0.0042/rt)    सिक्योरिटीज फ्यूचर्स                                <0.1% 

यूनाइटेड किंगडम              0.5%                           शेयर खरीद                                         1–2% 

 

सोर्स : IMF elibrary, UK stamp tax statistics FY24, UK Government एवं वित्त मंत्रालय भारत सरकार FY25

बाजार निवेशकों के लिए हो, जुआरियों के लिए नहीं

भारत का डेरिवेटिव्स बाजार अब नियामकीय विफलता का केस स्टडी बन गया है. रिटेल ट्रेडर्स ने ₹1.8 लाख करोड़ से अधिक का नुकसान केवल बाजार की अस्थिरता के कारण नहीं बल्कि एक त्रुटिपूर्ण सिस्टम के कारण उठाया है, जो अत्यधिक सट्टा गतिविधियों को बढ़ावा देता है.

SEBI को अब फैसला करना होगा: निवेशकों की रक्षा करनी है या कसीनो को जारी रहने देना है.

हाल ही में की गई पहलें, जैसे कि एक्सपायरी का मानकीकरण, कॉन्ट्रैक्ट साइज बढ़ाना और हेराफेरी पर कार्रवाई, स्वागत योग्य हैं लेकिन नाकाफी हैं.

संरचनात्मक सुधार अब अत्यंत आवश्यक हैं:

- ‘वन एक्सचेंज, वन एक्सपायरी’ नीति लागू की जाए

- एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग पर नियंत्रण हो

- पोजिशन्स की रियल-टाइम निगरानी हो

- लीवरेज ट्रेड्स के लिए सख्त उपयुक्तता जांच हो

- STT घटाई जाए

- अनुचित कॉन्ट्रैक्ट्स की बाढ़ पर रोक लगे

आज का F&O बाजार कुछ गिने-चुने लोगों को अमीर बना रहा है जबकि करोड़ों निवेशकों को बर्बादी की ओर ले जा रहा है. यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो अगली घोटाले की गूंज और भी बड़ी और महंगी होगी.

अब वक्त है ‘मात्रा’ से ‘गुणवत्ता’ की ओर बढ़ने का यानी कम ट्रेड, लेकिन निवेशकों, बाजार और अर्थव्यवस्था के लिए अधिक मूल्य हो.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

डॉ. राजीव कुमार व अभिषेक झा- अतिथि लेखक

(डॉ. राजीव कुमार नई दिल्ली आधारित नीति थिंक टैंक पहल इंडिया फाउंडेशन के चेयरमैन और अभिषेक झा फैलो हैं. )

 


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