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जब दुनिया वॉशिंगटन को वित्तपोषित करना बंद कर दे

सिद्धार्थ अरोड़ा लिखते हैं कि अमेरिकी ट्रेजरी का भविष्य किसी एक झटके से तय नहीं होगा, बल्कि वित्तीय विश्वसनीयता, पूर्वानुमेय व्यापार संबंधों और आपसी निर्भरता के हथियारीकरण में संयम जैसे संचयी संकेतों से तय होगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 7 months ago

युद्धोत्तर काल के अधिकांश समय तक, अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड केवल ऋण साधन नहीं थे. वे तरल, पूर्वानुमेय और राजनीतिक रूप से तटस्थ वैश्विक वित्तीय प्रणाली की रीढ़ थे. केंद्रीय बैंकों ने इन्हें अमेरिकी नीतियों के प्रति स्नेह के कारण नहीं, बल्कि इसलिए संचित किया क्योंकि कोई अन्य परिसंपत्ति सुरक्षा, पैमाना और भरोसा एक साथ इस तरह प्रदान नहीं कर पाती थी.

उस प्रभुत्व का पतन नहीं हुआ है. लेकिन वह चुपचाप विकसित हो रहा है, और इसके निहितार्थ बॉन्ड बाज़ारों से कहीं आगे तक जाते हैं.

हालिया आंकड़े अमेरिकी ट्रेजरी की किसी नाटकीय वैश्विक बिकवाली के विचार का समर्थन नहीं करते. पूर्ण रूप से देखें तो विदेशी होल्डिंग्स रिकॉर्ड के करीब बनी हुई हैं. जापान मांग को सहारा देता बना हुआ है. यूरोप ने अमेरिकी ऋण से बाहर निकलने का कोई समन्वित प्रयास नहीं दिखाया है. डॉलर मजबूत बना हुआ है.

फिर भी, अधिक संकेतक मात्रा नहीं, बल्कि दिशा है. पिछले एक दशक में अमेरिकी सार्वजनिक ऋण में विदेशी स्वामित्व का हिस्सा लगातार घटा है. चीन की ट्रेज़री होल्डिंग्स 2008 के वित्तीय संकट के समय देखे गए स्तरों तक गिर गई हैं. कई उभरती अर्थव्यवस्थाएँ, अपने कुल भंडार बढ़ने के बावजूद, सीमांत भंडार को ट्रेज़री से दूर विविधीकृत करने का विकल्प चुन रही हैं. यह विद्रोह नहीं है. यह जोखिम प्रबंधन है.

जब व्यापार नीति पोर्टफोलियो रणनीति से मिलती है
इस बदलाव का समय संयोगवश नहीं है. हाल के वर्षों में, अमेरिकी व्यापार नीति में लगातार एक दमनकारी धार आई है. शुल्क सौदेबाज़ी के औज़ार बन गए हैं. प्रतिबंधों का दायरा बढ़ा है. डॉलर-आधारित वित्तीय अवसंरचना तक पहुँच को अब खुले तौर पर रणनीतिक दबाव के रूप में चर्चा में लाया जा रहा है.

वॉशिंगटन के दृष्टिकोण से, यह आर्थिक राज्यकौशल है. एशिया, मध्य पूर्व और ग्लोबल साउथ के कुछ हिस्सों में रिज़र्व प्रबंधकों के नज़रिये से, यह उस निर्णय में एक नया चर जोड़ देता है जो कभी पूरी तरह वित्तीय हुआ करता था. ट्रेजरी सुरक्षित बनी हुई हैं. लेकिन अब वे राजनीतिक रूप से निष्क्रिय नहीं लगतीं.

केंद्रीय बैंक दशकों में सोचते हैं. जब व्यापार तक पहुँच, आपूर्ति शृंखलाएँ या भुगतान प्रणालियाँ अमेरिकी नीति प्राथमिकताओं के साथ संरेखण पर निर्भर दिखाई देने लगती हैं, तो डिफॉल्ट के विरुद्ध नहीं, बल्कि निर्भरता के विरुद्ध, विविधीकरण एक तर्कसंगत हेज बन जाता है.

अमेरिका की वित्तीय स्थिति एक अक्सर-अनकहे अनुमान पर टिकी है: कि वैश्विक मांग प्रबंधनीय ब्याज दरों पर अमेरिकी ऋण की बड़ी मात्रा को अवशोषित करती रहेगी. इसी अनुमान ने वॉशिंगटन को बिना तत्काल दंड के लगातार घाटे चलाने की अनुमति दी है. यदि विदेशी रुचि संरचनात्मक रूप से कमजोर होती है, भले ही खुले तौर पर बिकवाली न हो, तो समायोजन का बोझ भीतर की ओर खिसक जाता है.

खरीदारों को आकर्षित करने के लिए उच्च यील्ड की आवश्यकता होगी. ऋण-सेवा लागत बढ़ेगी. पहले से सीमित वित्तीय लचीलापन और सिमटेगा. समय के साथ, घरेलू पूंजी उत्पादक निवेश की बजाय सरकारी काग़ज़ों में सिमट जाएगी. इनमें से किसी के लिए संकट की आवश्यकता नहीं है. यह धीरे-धीरे घटित होता है, और फिर राजनीतिक रूप से टालना असंभव हो जाता है.

वॉशिंगटन से परे वैश्विक परिणाम
इसके निहितार्थ अमेरिकी सीमाओं से कहीं आगे तक जाते हैं. ट्रेज़री यील्ड वैश्विक वित्त को एंकर करती हैं. वे उभरते बाज़ारों के उधार, कॉर्पोरेट ऋण मूल्य निर्धारण और दुनिया भर में मॉर्गेज दरों के लिए आधार तय करती हैं.

संरचनात्मक रूप से ऊँचा अमेरिकी यील्ड परिवेश वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों को कड़ा करता है, विशेष रूप से उन देशों के लिए जिन्होंने सस्ते डॉलर के दौर में भारी उधार लिया था. विडंबना यह है कि इससे वही विविधीकरण तेज़ हो सकता है, जिससे वॉशिंगटन डरता है, क्योंकि रिज़र्व प्रबंधक अमेरिकी वित्तीय और राजनीतिक चक्रों के प्रति कम उजागर परिसंपत्तियों की तलाश करते हैं.

यह किसी नाटकीय डी-डॉलराइजेशन की प्रक्रिया नहीं है. बल्कि यह निर्भरता के धीरे-धीरे हो रहे पुनर्संतुलन का संकेत है.

इन बदलावों के बावजूद, डॉलर के आसन्न पतन की भविष्यवाणियाँ बढ़ा-चढ़ाकर कही गई प्रतीत होती हैं. अमेरिकी ट्रेज़री बाज़ार की गहराई, पारदर्शिता और संस्थागत विश्वसनीयता के बराबर कोई विकल्प नहीं है.

यूरोप के पास एकीकृत वित्तीय प्राधिकरण नहीं है. चीन के पास पूंजी की स्वतंत्रता नहीं है. सोने में यील्ड नहीं है. डिजिटल परिसंपत्तियों में स्थिरता नहीं है. व्यवहार में, डॉलर अनिवार्य बना रहता है, इसलिए नहीं कि वह दोषरहित है, बल्कि इसलिए कि उसके प्रतिस्पर्धी अपूर्ण हैं. फिर भी, डिफॉल्ट से बना प्रभुत्व, भरोसे से बने प्रभुत्व से कमजोर होता है.

संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए वास्तविक जोखिम यह नहीं है कि देश कल ट्रेज़री बेच दें. जोखिम यह है कि वॉशिंगटन यह मान ले कि मांग स्थायी है. जब उधारी सस्ती होती है, तो अनुशासन क्षीण होता है. जब बाजार बंदी प्रतीत होते हैं, तो नीतिगत विकल्प कठोर हो जाते हैं. व्यापारिक दबाव लागू करना तब आसान हो जाता है जब वित्तीय परिणाम दूर लगते हैं.

लेकिन भरोसा, एक बार पतला पड़ जाए, तो स्वतः वापस नहीं आता. उसकी कीमत बदल जाती है.

अब भी उपलब्ध एक विकल्प
अमेरिकी ट्रेजरी का भविष्य किसी एक झटके से तय नहीं होगा, बल्कि संचयी संकेतों से तय होगा: वित्तीय विश्वसनीयता, पूर्वानुमेय व्यापार संबंध और आपसी निर्भरता के हथियारीकरण में संयम.

अमेरिका को दुनिया से अपने ऋण से प्रेम करने की आवश्यकता नहीं है. उसे दुनिया का यह भरोसा चाहिए कि वॉशिंगटन को वित्तपोषित करना किसी दिन उनके विरुद्ध इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. यह भरोसा कभी स्वतः मिलता था. अब, इसे सचेत रूप से संरक्षित करना होगा.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और आवश्यक नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करें.)

सिद्धार्थ अरोड़ा, अतिथि लेखक

(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए (मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट) हैं, जो वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व विदेश नीति में गहरी रुचि रखते हैं.)


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