होम / एक्सपर्ट ओपिनियन / संविधान के प्रति RSS के दृष्टिकोण को समझना है जरूरी

संविधान के प्रति RSS के दृष्टिकोण को समझना है जरूरी

भारत विरोधी ताकतों ने अपने समय में यह मिथ्याप्रचार जमकर किया है कि आरएसएस संविधान विरोधी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

  • लोकेन्द्र सिंह  

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का प्रभावशाली सांस्कृतिक संगठन है. उसके विचार एवं गतिविधियों से समाज का मानस बनता और बदलता है. इसलिए अक्सर विभिन्न विषयों को लेकर चर्चा चलती है कि उन विषयों पर संघ का विचार क्या है? कई बार ऐसा भी होता है कि भारतीयता विरोधी और विदेशी विचार से अनुप्राणित समूह भी राष्ट्रीय प्रतीक और संघ के संदर्भ में मिथ्याप्रचार कर देते हैं. दोनों ही कारणों से बौद्धिक जगत से लेकर आम समाज में भी संघ के दृष्टिकोण को जानने की उत्सुकता रहती है. 

जानना चाहते हैं संघ के विचार
भारतीय संविधान भी ऐसा ही विषय है, जिस पर संघ के विचार सब जानना चाहते हैं. दरअसल, भारत विरोधी ताकतों ने अपने समय में यह मिथ्याप्रचार जमकर किया है कि आरएसएस संविधान विरोधी है. वह वर्तमान संविधान को खत्म करके नया संविधान लागू करना चाहता है. मजेदार बात यह है कि गोएबल्स की अवधारणा में विश्वास रखने वाले गिरोहों ने इस तरह के झूठ की बाकायदा एक पुस्तिका भी तैयार करा ली, जिस पर वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का चित्र एवं नाम प्रकाशित किया गया और लिखा गया था- नया भारतीय संविधान. संघ की ओर से इस दुष्प्रचार के विरुद्ध पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी गई, उसके बाद से यह मिथ्याप्रचार काफी हद तक रुक गया. अनेक प्रकार के दूसरे भ्रम खड़े करने के प्रयास भी संघ विरोधी एवं भारत विरोधी ताकतों की ओर से किए गए हैं, लेकिन बिना पैर के झूठ संघ की प्रामाणिक एवं देशभक्त छवि के कारण समाज में टिकते ही नहीं हैं.

राष्ट्रभक्ति का पर्याय है संघ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अब तक की यात्रा देखकर यह कहने में कोई संकोच नहीं कि यह संगठन राष्ट्रभक्ति का पर्याय है. अपने राष्ट्र और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति संघ की पूर्ण निष्ठा एवं सम्मान है. संविधान के संदर्भ में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष पदाधिकारी अनेक बार सद्भावना प्रकट कर चुके हैं. वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने तो 19 जनवरी, 2020 को बरेली के रुहेलखंड विश्वविद्यालय में ‘भविष्य का भारत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण’ विषय पर अपने व्याख्यान में स्पष्ट कहा है- संघ का कोई एजेंडा नहीं है, वह भारत के संविधान को मानता है. हम शक्ति का कोई दूसरा केंद्र नहीं चाहते. संविधान के अलावा कोई शक्ति केंद्र होगा, तो हम उसका विरोध करेंगे. यानी संघ न केवल संविधान में पूर्ण विश्वास करता है अपितु उसके मुकाबले अन्य किसी व्यवस्था के खड़ा होने का विरोधी है. इससे अधिक स्पष्ट और मत क्या हो सकता है? 

संविधान के पालन का आग्रह
इसी तरह वर्ष 2018 में 17 से 19 सितंबर तक इसी शीर्षक से आयोजित व्याख्यानमाला में उन्होंने कहा कि हमारे प्रजातांत्रिक देश में, हमने एक संविधान को स्वीकार किया है. वह संविधान हमारे लोगों ने तैयार किया है. हमारा संविधान, हमारे देश की चेतना है. इसलिए उस संविधान के अनुशासन का पालन करना, यह सबका कर्तव्य है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसको पहले से मानता है. संघ के इतिहास में यह पहली व्याख्यानमाला थी, जिसमें सभी प्रकार की विचारधाराओं के प्रमुख लोगों को आमंत्रित किया गया था और उनके समक्ष संघ के सर्वोच्च अधिकारी ने अपना दृष्टिकोण रखा था. सरसंघचालक डॉ. भागवत न केवल यह बता रहे हैं कि संविधान के अनुशासन का पालन संघ पहले से करता आया है अपितु वे अन्य से भी आग्रह कर रहे हैं कि संविधान का पालन करना सभी अपना कर्तव्य समझें. नागरिक अपने संविधान के मर्म को जानें, इसके लिए सरसंघचालक आग्रह करते हैं कि हमें अपने बच्चों को जीवन के प्रारंभिक चरण में ही संविधान पढ़ाना चाहिए. (हिन्दी मासिक पत्रिका -विवेक के साथ साक्षात्कार– 9 अक्टूबर, 2020)

संविधान की प्रस्तावना सुनाई
संविधान के प्रति नागरिक बोध बढ़े इसके लिए सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का आग्रह इतना अधिक है कि दिल्ली में आयोजित व्याख्यानमाला ‘भविष्य का भारत’ में दूसरे दिन अपने उद्बोधन के दौरान वे संविधान की प्रस्तावना को पूरा पढ़कर सुनाते हैं और फिर उस पर चर्चा करते हैं. बहरहाल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिस विचार को लेकर 1925 से अब तक चला है, वही विचार संविधान के केंद्र में है- राष्ट्रीय एकात्मता। समाज में बंधुत्व, राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की भावना बढ़े, यही संविधान की उद्देशिका में है और यही संघ का उद्घोष है. यह बात हम सब भी जानते हैं और संघ भी मानता है कि भारत की संस्कृति हम सबको जोड़ती है. इसलिए संघ भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की समाज में स्थापना के प्रयत्न करता है. भारतीय मूल्यों का अनुपालन जितना अधिक बढ़ेगा, संविधान का उद्देश्य उतना ही अधिक पूर्णता की ओर बढ़ेगा. 

देश को जोड़ती है संस्कृति 
इस संदर्भ में 9 जून, 2016 को नागपुर में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग तृतीय वर्ष के समापन समारोह में डॉ. मोहन भागवत के संबोधन की इस बात को याद रखना चाहिए- इस देश की संस्कृति हम सब को जोड़ती है, यह प्राकृतिक सत्य है. हमारे संविधान में भी इस भावनात्मक एकता पर बल दिया गया है. हमारी मानसिकता इन्हीं मूल्यों से ओतप्रोत है. सरसंघचालक डॉ. भागवत यह भी याद दिलाते हैं कि हमने केवल राजनीतिक एवं आर्थिक समता प्राप्त करने के लिए संविधान का निर्माण नहीं किया. अपितु हमने 26 जनवरी, 1949 को अपने संविधान को इसलिए स्वयं को आत्मार्पित किया ताकि समाज में राजनीतिक और आर्थिक समता के साथ सामाजिक समता भी आए. इसलिए हमें संविधान के पूर्ण लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए. इस हेतु संविधान निर्माता डॉ. बाबासाहब अंबेडकर की चेतावनी का स्मरण कराते हुए 5 अक्टूबर, 2022 को विजयादशमी के उत्सव में सरसंघचालक डॉ. भागवत ने कहा है- संविधान के कारण राजनीतिक तथा आर्थिक समता का पथ प्रशस्त हो गया, परन्तु सामाजिक समता को लाये बिना वास्तविक एवं टिकाऊ परिवर्तन नहीं आयेगा, ऐसी चेतावनी पूज्य डॉ. बाबासाहब अंबेडकर जी ने हम सबको दी थी.

नागपुर में कही थी ये बात
हमारा लक्ष्य क्या है, हम उस ओर कैसे आगे बढ़ सकते हैं, देश की नीतियां क्या होनी चाहिए? इन सब बातों को लेकर स्पष्टता प्राप्त करने के लिए भी सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संविधान के आश्रय में जाने का सुझाव देते हैं. नागपुर में होने वाले विजयादशमी के उत्सव में 3 अक्टूबर, 2014 को अपने संबोधन में उन्होंने कहा है ऐसी नीतियां चलाकर, देश के जिस स्वरूप के निर्माण की आकांक्षा अपने संविधान ने दिग्दर्शित की है, उस ओर देश को बढ़ाने का काम करना होगा. अक्सर शासन-प्रशासन के किसी निर्णय या समाज में घटने वाली किसी घटना पर हम उतावलेपन में अपनी प्रतिक्रिया देते हैं. कई बार ऐसा होता है कि उस प्रतिक्रिया से सामाजिक ताने-बाने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. विरोध या आक्रोश व्यक्त करते समय राष्ट्रीय एकात्मता, पंथ, प्रांत, भाषा आदि विविधताओं का सम्मान बना रहे इसके लिए वे आग्रह करते हैं कि प्रतिक्रिया संविधान की मर्यादा के दायरे में रहे. 

‘अराजकता का व्याकरण’
इसके साथ ही 25 अक्टूबर, 2020 को विजयादशमी के अपने संबोधन में सरसंघचालक डॉ. भागवत ने संविधान का खोल ओढ़नेवाले सियारों से भी सावधान किया है. वे कहते हैं- दुर्भाग्य से अपने देश में इन बातों (राष्ट्रीय एकात्मता, पंथ, प्रांत, जाति, भाषा आदि विविधताओं) पर प्रामाणिक निष्ठा न रखने वाले अथवा इन मूल्यों का विरोध करने वाले लोग भी, अपने आप को प्रजातंत्र, संविधान, कानून, पंथनिरपेक्षता आदि मूल्यों के सबसे बड़े रखवाले बताकर, समाज को भ्रमित करने का कार्य करते चले आ रहे हैं. 25 नवम्बर, 1949 के संविधान सभा में दिये अपने भाषण में श्रद्धेय डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने उनके ऐसे तरीकों को ‘अराजकता का व्याकरण’ कहा था. ऐसे छद्मवेषी उपद्रव करने वालों को पहचानना एवं उनके षड्यंत्रों को नाकाम करना तथा भ्रमवश उनका साथ देने से बचना समाज को सीखना पड़ेगा. 

लोकतंत्र का विरोधी कौन है?
संविधान को बचाने के लिए समाज में यह जागरुकता आवश्यक है कि वास्तव में संविधान एवं लोकतंत्र का विरोधी कौन है? वे कौन से समूह हैं, जो भारत के विचार में आस्था न रखकर देश के बाहर से प्रेरणा पाते हैं? स्मरण रखें, जिनकी जड़ें भारत में हैं और जो भारतीय संस्कृति से ही प्रेरणा पाते हैं, वे भारत के सभी राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति स्वाभाविक ही पूर्ण निष्ठा एवं श्रद्धा रखते हैं.


टैग्स
सम्बंधित खबरें

भारत की सबसे युवा पीढ़ी के प्रति हमारी सामाजिक जिम्मेदारी

पहली नौकरी के विरोधाभास से लेकर AI साक्षरता और लोकतांत्रिक असहमति की सेहत तक, Gen Z को भारत के भविष्य में भागीदार के रूप में देखने का तर्क, न कि एक ऐसी समस्या के रूप में जिसे संभालने की जरूरत है

20 hours ago

बुढ़ापे की रफ्तार धीमी करने का विज्ञान

बेहतर नींद और पर्याप्त पानी से लेकर संतुलित आहार और नियमित व्यायाम तक, जीवनशैली की नौ आदतें सूजन (इन्फ्लेमेशन) को कम कर सकती हैं, बुढ़ापे की रफ्तार धीमी कर सकती हैं और बीमारियों के खतरे को घटा सकती हैं.

1 week ago

अगला केरल मॉडल: गरिमा के साथ बढ़ती उम्र

डॉ. प्रो. सुधा चंद्रशेखर के अनुसार, जैसे-जैसे केरल भारत के सबसे अधिक दीर्घायु समाजों में से एक बनता गया, वैसे-वैसे यह उन शुरुआती राज्यों में भी शामिल हो गया, जिन्हें उस सवाल का सामना करना पड़ा जिसका सामना आने वाले वर्षों में कई अन्य राज्यों को भी करना होगा: जब हर 5 में से 1 व्यक्ति की उम्र 60 वर्ष से अधिक हो, तो ऐसा समाज कैसा होना चाहिए?

1 week ago

एक सरल जीवन की गरिमा

लेखक बृज बख्शी के अनुसार, इतिहास और हमारे आसपास की दुनिया हमें बताती है कि समाज कुछ चुनिंदा प्रसिद्ध लोगों के सहारे नहीं, बल्कि उन लाखों साधारण लोगों के कारण टिके रहते हैं, जो अपने दायित्वों को निरंतरता और समर्पण के साथ निभाते हैं.

1 week ago

क्रिस्टोफर नोलन की ‘द ओडिसी’: क्यों हीरो की यात्रा आज भी बेहतरीन नेतृत्व को परिभाषित करती है

क्रिस्टोफर नोलन की ‘द ओडिसी’ का रूपांतरण जोसेफ कैंपबेल की ‘हीरो जर्नी’ और नेतृत्व, दृढ़ता व व्यक्तिगत बदलाव पर इसके स्थायी सबक को फिर से देखने का अवसर देता है.

1 week ago


बड़ी खबरें

चश्मों की बढ़ती मांग से Lenskart के मुनाफे में 270% का उछाल, पहली तिमाही में ₹222 करोड़ कमाए

कंपनी का शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर करीब 270% बढ़कर ₹222 करोड़ पहुंच गया, जबकि रेवेन्यू 43.3% बढ़कर ₹2,714 करोड़ से ज्यादा रहा.

2 hours ago

सस्ते 5G फोन हुए महंगे, ₹9,000 से कम वाले स्मार्टफोन की बिक्री 74% गिरी

स्मार्टफोन के मेमोरी और दूसरे कंपोनेंट्स महंगे होने से कंपनियों के लिए बजट फोन बनाना मुश्किल होता जा रहा है. वहीं, महंगे 5G फोन की कीमत बढ़ने के बीच कंपनियों ने पुराने 4G मॉडल को फिर से बाजार में उतारना शुरू कर दिया है.

2 hours ago

लगातार दो दिन की गिरावट के बाद आज कैसी रहेगी बाजार की चाल? TCS समेत इन शेयरों पर नजर

बुधवार को सेंसेक्स 188 अंक टूटकर बंद हुआ, जबकि निफ्टी भी गिरावट के साथ 24,435 के स्तर पर बंद हुआ. पश्चिम एशिया में तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और कमजोर वैश्विक संकेतों के बीच निवेशकों की धारणा प्रभावित रही.

3 hours ago

बैंक ऑफ अमेरिका का जियो क्रेडिट पर बड़ा दांव, ₹18,268 करोड़ में खरीदेगा 49.9% हिस्सेदारी

इस निवेश से जियो क्रेडिट को अपने लेंडिंग कारोबार और विभिन्न क्रेडिट प्रोडक्ट्स के विस्तार के लिए लंबी अवधि की पूंजी मिलेगी.

2 hours ago

जुलाई में फिर बढ़ी महंगाई की मार, 4.45% पर पहुंची खुदरा महंगाई; खाने-पीने की चीजों ने बिगाड़ा बजट

लगातार दूसरे महीने RBI के 4% लक्ष्य से ऊपर रही खुदरा महंगाई. जुलाई में खाद्य महंगाई 5.52% पर पहुंची, जबकि ट्रांसपोर्ट, कपड़े-जूते और पर्सनल केयर से जुड़े खर्चों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई.

19 hours ago