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हिमालय से उभरती जल शक्ति: अफगानिस्तान-पाकिस्तान जल विवाद में भारत की भूमिका

जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पिघलने और अनिश्चित मानसून जैसी चुनौतियाँ बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे नदियों पर नियंत्रण और साझाकरण का प्रश्न और जटिल होता जा रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 11 months ago

पानी हमेशा से दक्षिण एशिया की सबसे कम आंकी गई शक्ति का स्रोत रहा है. लेकिन जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन तेज हो रहा है और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा गहराती जा रही है, हिमालय की नदियाँ, जो लगभग दो अरब लोगों को जीवन देती हैं, रणनीतिक दबाव के उपकरण के रूप में उभर रही हैं. इस उभरते हुए संघर्ष का नवीनतम मंच कश्मीर या सिंधु मैदानों में नहीं, बल्कि उससे भी पश्चिम में, अफगानिस्तान में है, जहाँ भारत की बढ़ती जल अवसंरचना की भूमिका चुपचाप पाकिस्तान के साथ शक्ति संतुलन को बदल रही है.

भौगोलिक दबदबे की कहानी

इस संघर्ष का स्रोत भौगोलिक स्थिति में निहित है. सिंधु नदी प्रणाली, जो पाकिस्तान की कृषि और अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है, हिमालय से निकलती है और भारत-नियंत्रित क्षेत्र से होकर पाकिस्तान में प्रवेश करती है. यह ऊपरी स्थिति भारत को स्वाभाविक रूप से लाभ देती है, जिसे 1960 की सिंधु जल संधि (IWT) ने आंशिक रूप से सीमित किया है, लेकिन समाप्त नहीं किया.

दशकों तक इस व्यवस्था ने पानी को व्यापक शत्रुताओं से बचाए रखा. लेकिन जैसे-जैसे भारत ने जम्मू-कश्मीर में अपने जलविद्युत परियोजनाओं का विस्तार किया और पाकिस्तान की सिंधु पर निर्भरता बढ़ी, पानी धीरे-धीरे साझा संसाधन से एक संभावित दबाव हथियार में बदल गया. नई दिल्ली “नल बंद” नहीं कर सकती, जैसा कि कुछ लोग दावा करते हैं, लेकिन वह प्रवाह को नियंत्रित करने, रिलीज के समय तय करने या हाइड्रोलॉजिकल डेटा रोकने जैसे सूक्ष्म दबाव तंत्रों का उपयोग कर सकती है.

अफगानिस्तान: जल राजनीति का नया मोर्चा

आज की जटिलता इसलिए बढ़ी है क्योंकि भारत अफगानिस्तान के जल विकास में सक्रिय भूमिका निभा रहा है. दो प्रमुख परियोजनाएँ उल्लेखनीय हैं. पहली है सलमा बांध (अब अफगानिस्तान-भारत मैत्री बांध) जो हेरात प्रांत की हरी नदी पर है, यह भारत द्वारा वित्तपोषित और निर्मित 300 मिलियन डॉलर की परियोजना है जो हजारों अफगान परिवारों को सिंचाई और बिजली प्रदान करती है. दूसरी परियोजना काबुल के पास शाहतूत बांध है, जिसे राजधानी क्षेत्र को पीने का पानी और सिंचाई सुविधा देने के लिए डिजाइन किया गया है.

आधिकारिक रूप से ये परियोजनाएँ भारत की विकास कूटनीति का हिस्सा हैं. लेकिन भू-राजनीतिक दृष्टि से, ये भारत की उपस्थिति को पाकिस्तान की जल प्रणाली के पश्चिमी किनारे तक विस्तारित करती हैं. अफगानिस्तान में उत्पन्न होने वाली कई नदियाँ, जैसे काबुल नदी और उसकी सहायक नदियाँ, अंततः पाकिस्तान की सिंधु बेसिन में मिलती हैं. इस प्रकार, भारत द्वारा समर्थित किसी भी ऊपरी बांध या मोड़ परियोजना का इस्लामाबाद के लिए एक निहित रणनीतिक संदेश होता है.

इस्लामाबाद की बढ़ती बेचैनी

पाकिस्तान के लिए यह स्थिति बेहद अस्थिर करने वाली है. उसकी सिंचित कृषि का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सिंधु प्रणाली पर निर्भर है, और प्रवाह में किसी भी प्रकार की कमी या देरी सीधे खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करती है. इस्लामाबाद पहले ही काबुल पर नए बांध बनाने की योजना का आरोप लगा चुका है, जो सीमा-पार जल प्रवाह को “काट” या कम कर सकते हैं. चूँकि इनमें से कुछ पहलों में भारतीय एजेंसियाँ भागीदार हैं, यह द्विपक्षीय भारत-पाकिस्तान जल विवाद को एक त्रिकोणीय जल प्रतिद्वंद्विता में बदल देता है.

वास्तव में, अफगानिस्तान के साथ भारत की साझेदारी उसे पाकिस्तान के जल-स्पेक्ट्रम के दोनों सिरों को प्रभावित करने की क्षमता देती है, पूर्वी हिमालयी जलस्रोत और पश्चिमी अफगान सहायक नदियाँ. भले ही यह प्रभाव केवल तकनीकी सहयोग या परामर्श भूमिकाओं के माध्यम से ही हो, “घेराबंदी” की यह धारणा वास्तविक रणनीतिक परिणाम पैदा करती है.

जलवायु दबाव: खतरे को बढ़ाने वाला कारक

जल का रणनीतिक मूल्य इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि इसकी उपलब्धता घट रही है. हिमालय वैश्विक औसत से तेजी से गर्म हो रहा है, जिससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं और मानसून चक्र अस्थिर हो रहे हैं. मौसमी चरम, जैसे भयानक बाढ़ और सूखा, पहले से ही दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव डाल रहे हैं. जैसे-जैसे जल संकट गहराता है, हर ऊपरी बांध एक नया भू-राजनीतिक विवाद बन सकता है.

इसके अलावा, क्षेत्रीय जल-साझाकरण की मौजूदा व्यवस्था इस नई वास्तविकता से निपटने के लिए तैयार नहीं है. सिंधु जल संधि ने युद्धों का सामना किया है, लेकिन अब यह उन चुनौतियों से जूझ रही है जिनके लिए इसे बनाया ही नहीं गया था जैसे भूजल की कमी, तलछट, जलवायु परिवर्तनजनित अस्थिरता, और अफगानिस्तान जैसे तीसरे पक्ष के देश जो इसके दायरे से बाहर हैं. अगर सहयोग के नए ढाँचे नहीं बने, तो अविश्वास और बढ़ेगा.

रणनीतिक जल कूटनीति या जल युद्ध का जोखिम?

अफगान जल परियोजनाओं में भारत के निवेश में अवसर और जोखिम दोनों हैं. एक ओर, ये नई दिल्ली की विकासशील छवि को मजबूत करते हैं और काबुल को इस्लामाबाद के राजनीतिक-आर्थिक प्रभाव से कुछ हद तक आजादी देते हैं. दूसरी ओर, यह जोखिम भी है कि नदियाँ भू-राजनीतिक संकेतों के उपकरण बन जाएँ.

यदि जल कूटनीति पारदर्शी संवाद और डेटा साझाकरण के माध्यम से की जाए तो यह विश्वास और पारस्परिक निर्भरता को बढ़ा सकती है. लेकिन यदि इसे प्रतिस्पर्धी बांध निर्माण या गुप्त एजेंडे के साथ चलाया गया, तो यह “जल युद्ध” की स्थिति भी पैदा कर सकती है.

पुरानी प्रतिद्वंद्विता का नया मोर्चा

दक्षिण एशिया की जल राजनीति हमेशा इसकी शक्ति राजनीति का प्रतिबिंब रही है. जो कभी भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों के अधिकारों का द्विपक्षीय विवाद था, वह अब अफगानिस्तान को शामिल करते हुए एक क्षेत्रीय समीकरण में बदल गया है, एक ऐसा देश जो ऊपरी सहायक नदियों पर नियंत्रण रखता है और जहाँ भारत एक प्रमुख भागीदार है. यह त्रिकोणीय गतिशीलता टरबाइन, जलाशयों और मौसमी प्रवाह के माध्यम से हिमालय में प्रभाव के विस्तार को परिभाषित करती है 

एक ऐसे युग में जब जलवायु और सुरक्षा गहराई से एक-दूसरे से जुड़ चुके हैं, पानी शायद रणनीतिक दूरदर्शिता का अंतिम मापदंड साबित होगा. भारत के लिए चुनौती यह है कि उसकी अफगानिस्तान में “हाइड्रोलिक डिप्लोमेसी” क्षेत्रीय स्थिरता को मज़बूत करे, न कि प्रतिद्वंद्विता का नया मोर्चा खोले.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

सिद्धार्थ अरोड़ा, अतिथि लेखक

(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए (मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट) हैं, जो वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व विदेश नीति में गहरी रुचि रखते हैं.)

 


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