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दो राजा, पर कोई राज्य नहीं: कर्नाटक का आत्म-विनाश का तमाशा

जब सिद्धारमैया और शिवकुमार सिंहासन के लिए लड़ते हैं, तब 6.5 करोड़ कन्नडिगा गड्ढों, महंगाई और टूटे वादों में डूबने के लिए छोड़ दिए जाते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 5 months ago

विजय प्रसाद

आज कर्नाटक एक अजीब और अस्थिर मोड़ पर खड़ा है. एक ऐसा राज्य जिसे कभी भारत की तकनीकी क्रांति का इंजन और निवेश का चुंबक कहा जाता था, अब खुद को शीर्ष स्तर पर जारी अंतहीन राजनीतिक खींचतान में फंसा हुआ पाता है. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच की शक्ति संघर्ष अब फुसफुसाहट भरी गपशप से परे निकल चुका है. यह सार्वजनिक तौर पर फैल चुका है, प्रशासन में घुस चुका है, शासन को प्रभावित कर चुका है और सबसे दुखद साधारण कन्नडिगा के रोजमर्रा के जीवन में प्रवेश कर चुका है. एक स्थिर सरकार, जिसके पास आरामदायक बहुमत था, आज महत्वाकांक्षा, असुरक्षा और दो प्रतिस्पर्धी ताकत केंद्रों की दैनिक रियलिटी शो बन गई है. कर्नाटक अब एक निर्णायक नेतृत्व द्वारा संचालित नहीं होता, बल्कि दो लड़ाकू खेमों द्वारा, जो लगातार पीछे मुड़कर देखते हैं, वफादारियों की गणना करते हैं और दिल्ली को संदेश भेजते हैं. शासन हाशिये पर चला गया है.

अविवादित नंबर वन बनाम बेचैन डिप्टी

कर्नाटक में कांग्रेस के पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर, सिद्धारमैया अविवादित नंबर वन बने हुए हैं. यह सिर्फ उनकी कुर्सी नहीं है; यह प्रशासनिक मशीनरी, नौकरशाही और राजनीतिक प्रतिष्ठान के बड़े हिस्से पर उनकी मजबूत पकड़ है. यहां तक कि पार्टी के भीतर उनके आलोचक भी निजी तौर पर स्वीकारते हैं कि असली शक्ति की बागडोर सिर्फ उनके हाथ में है.

इसके विपरीत, उपमुख्यमंत्री एक जन नेता हैं, जिनके पास जबर्दस्त संगठनात्मक क्षमता है, लेकिन वे अपने मौजूदा पद से स्पष्ट रूप से असंतुष्ट और बेचैन दिखते हैं. दोहरी शक्ति व्यवस्था को संतुलन के फार्मूले के रूप में बेचा गया था; इसने केवल स्थायी तनाव दिया है. मुख्यमंत्री शासन करते हैं, डिप्टी लामबंदी करते हैं, पर दोनों वर्तमान जिम्मेदारियाँ साझा करने के बजाय भविष्य की लड़ाई के लिए तैयार होने में अधिक व्यस्त दिखते हैं. विडंबना यह है: एक पार्टी जिसने स्थिरता का वादा कर सत्ता जीती, उसने खुद को ही युद्धरत सरकार दे दी.

“अगर वह गया, कांग्रेस गई”

कांग्रेस के उच्च स्तरों में भी एक बढ़ता हुआ विश्वास है कि सिद्धारमैया को हटाना पार्टी का दक्षिण में आखिरी मजबूत गढ़ खोना होगा. कर्नाटक कांग्रेस के लिए सिर्फ एक और राज्य नहीं है; यह दक्षिण में उसकी अंतिम किलेबंदी है और राजनीतिक तथा वित्तीय रूप से उसकी सबसे मूल्यवान संपत्ति है. निजी बातचीतों और सार्वजनिक समीकरणों में, कर्नाटक को अब कांग्रेस की लाइफलाइन कहा जाने लगा है. हाईकमान के लिए संदेश साफ़ है: सिद्धारमैया को अस्थिर करो और कर्नाटक को अस्थिर करो; कर्नाटक को अस्थिर करो और पार्टी के राष्ट्रीय पतन को तेज करो. यही कारण है कि सीएम और उनके डिप्टी के बीच हर टकराव दिल्ली में झटके भेजता है.

जेल की दीवारों के अंदर सत्ता का खेल

हाल के समय की सबसे चौंकाने वाली घटनाओं में से एक थी डीके शिवकुमार की परप्पना अग्राहारा सेंट्रल जेल में दो कांग्रेस विधायकों के साथ कथित दो घंटे की मुलाकात. यह सिर्फ असामान्य नहीं था; यह प्रतीकात्मक रूप से विषाक्त था. एक उपमुख्यमंत्री द्वारा जेल के अंदर राजनीतिक बातचीत करना गिरते नैतिक मानकों और पार्टी अनुशासन के टूटने का भयावह संकेत देता है. बताया जाता है कि यह हाईकमान को भी पसंद नहीं आया. जब सत्ता के खेल जेल की दहलीज पार कर जाएं, तो गुटबाजी आंतरिक नहीं रहती यह सुशासन और छवि का गंभीर संकट बन जाती है.

मौन (और कम-मौन) अभियान

तब से राजनीतिक तापमान और बढ़ गया है. शिवकुमार विधायकों से लगातार मिल रहे हैं, एक-एक करके, बंद कमरे में रणनीति बैठकों में, चुपचाप आश्वासन देकर कुछ भी संयोग पर नहीं छोड़ते. वहीं दूसरी ओर, उनके खेमे के विधायक हफ्तों से दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं. वे घूमने या आध्यात्मिक यात्रा पर नहीं आए हैं; वे गणित मिलाने और लॉबिंग करने आए हैं.

हर दिल्ली यात्रा नई अटकलें पैदा करती है: क्या नेतृत्व परिवर्तन आसन्न है? क्या हाईकमान पानी का तापमान नाप रहा है? या यह सिर्फ अधिक शक्ति हासिल करने की दबाव रणनीति है? सिद्धारमैया का खेमा़ शांत आत्मविश्वास के साथ देखता है, मानकर चलता है कि संख्या अभी भी उनके पक्ष में है. लेकिन राजनीति में संख्या तब तक ठोस रहती है, जब तक रहती है.

हताशा की राजनीति

उपमुख्यमंत्री के चारों ओर अब एक स्पष्ट हताशा की हवा दिखाई देती है. एक नेता, जो अपने आक्रामक और बेखौफ अंदाज के लिए जाना जाता है, खुद को उसी सरकार में सीमित पाता है जिसे स्थापित करने में उसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. पदों ने वास्तविक अधिकार नहीं दिए; मंत्रालयों ने पूरी ताकत नहीं दी. तनाव स्पष्ट है, शारीरिक भाषा में, सार्वजनिक बयानों में, और तेजी से ऐसे तैयार किए गए सोशल मीडिया पोस्टों में, जो कई दर्शकों के लिए संदेश होते हैं. यह हाईकमान के लिए संदेश है? मुख्यमंत्री के लिए? या अपनी ही टीम को यह भरोसा दिलाने के लिए कि लड़ाई खत्म नहीं हुई? आज के कर्नाटक में, हर ट्वीट को एक राजनयिक संदेश की तरह पढ़ा जाता है.

दो नेता, एक सरकार, शून्य शासन

जब शीर्ष नेतृत्व इन संघर्षों में उलझा हुआ है, राज्य भारी कीमत चुका रहा है. कर्नाटक महंगाई और बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है. दूध, सब्जियाँ, ईंधन, बिजली, सब महंगा है, लेकिन संकट को स्वीकार कर उसे सुधारने के लिए कोई संयुक्त राजनीतिक नेतृत्व नहीं है.

विकास पीछे चला गया है. नया एफडीआई घटा है, नए औद्योगिक प्रस्ताव सूख गए हैं, और सबसे चिंताजनक कई कंपनियाँ शांति और स्थिरता देने वाले पड़ोसी राज्यों की ओर चुपचाप अपना संचालन स्थानांतरित कर रही हैं. निवेशक ऊँचे करों से नहीं डरते, अनिश्चितता से डरते हैं. और कर्नाटक की सबसे बड़ी “निर्यात वस्तु” अभी यही अनिश्चितता है.

शहरी और ग्रामीण कर्नाटक में घूमकर देखें, कहानी टूटी सड़कों और अधूरे वादों में लिखी दिखती है. हर जगह गड्ढे हैं. अधोसंरचना परियोजनाएँ कागज़ पर अधिक हैं, जमीन पर कम. शिलान्यास धूमधाम से होता है; फॉलो-थ्रू शायद ही कभी. “फंड की कमी” वह सुविधाजनक बहाना बन गया है, जो गहरे शासन पक्षाघात को छुपाता है. पिछले ढाई वर्षों में कोई भी बड़ा नया प्रोजेक्ट गंभीरता और गति से शुरू नहीं हुआ. जो राज्य कभी निष्पादन पर गर्व करता था, वह अब अंतहीन समीक्षाओं, पुनर्समीक्षाओं, समितियों और उप-समितियों में डूबा है, जो मेहनत का नहीं, बल्कि राजनीतिक गतिरोध का लक्षण है.

किसान फिर सड़क पर

इस बहाव का सबसे स्पष्ट प्रमाण है कर्नाटक के किसानों की बढ़ती पीड़ा. आंदोलन फिर उभर आए हैं. मुआवज़ा, फसल नुकसान, सिंचाई और खरीद जैसे मुद्दे सड़ते जा रहे हैं. ग्रामीण अर्थव्यवस्था पहले ही पस्त है, लेकिन उसे केवल छिटपुट ध्यान मिलता है, स्थायी नीति नहीं. जब दो शीर्ष नेता अपनी शक्ति नापने में लगे हों, तो किसान एक बाद की सोच बन जाते हैं. यही आज की कठोर सच्चाई है.

सोशल मीडिया नया युद्धक्षेत्र बन चुका है. सोच-समझकर लिखे गए ट्वीट, सांकेतिक पोस्ट और भरे हुए बयान अब हाईकमान के लिए अप्रत्यक्ष तीर माने जाते हैं. पर्यवेक्षक एक ही सवाल पूछते हैं: असल में कौन बोल रहा है, सिद्धारमैया, जो अपनी अनिवार्यता दिखा रहे हैं, या शिवकुमार, जो अपनी अधीरता जता रहे हैं? किसी भी परिपक्व सरकार में मतभेद बंद कमरों में सुलझते हैं. कर्नाटक में वे सार्वजनिक तमाशा हैं, जो शासन को थिएटर बना देते हैं.

एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड और दिल्ली की दुविधा

पचास दिनों से भी कम समय में, सिद्धारमैया कर्नाटक के इतिहास में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड तोड़ने वाले हैं, दिग्गज देवराज उर्स को पीछे छोड़ते हुए. यह छोटी बात नहीं है; यह एक विशाल राजनीतिक उपलब्धि है. दिल्ली को डर यह है: क्या हाईकमान इतिहास बनने देगा? या एक शक्तिशाली क्षेत्रीय नेता के उभार के डर से अंतिम समय में बदलाव करेगा? इस निर्णय के केंद्र में राहुल गांधी हैं.

मिलियन-डॉलर सवाल: राहुल किसे चुनेंगे?

कांग्रेस के पास समितियों और पर्यवेक्षकों की कमी नहीं है. उसकी कमी है निर्णायक नेतृत्व की. कर्नाटक उस अनिर्णय की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है. हाईकमान की चुप्पी ने दोनों खेमों को दांव बढ़ाने का अवसर दिया है. क्या राहुल गांधी अंततः एक पक्ष चुनेंगे, सिद्धारमैया या शिवकुमार? या वे दोनों को एक-दूसरे के खिलाफ संतुलित करते रहेंगे? इतिहास दिखाता है कि ऐसा संतुलन शायद ही कभी पार्टी या राज्य के लिए अच्छा होता है. देरी भी एक निर्णय है और अक्सर गलत.

जब 8 दिसंबर को कर्नाटक विधानसभा का शीतकालीन सत्र शुरू होगा, रोमांच चरम पर होगा. क्या सरकार उसी मुख्यमंत्री के साथ सदन में प्रवेश करेगी? या हम एक और नाटकीय आधी रात की शपथ ग्रहण देखेंगे? हर विधायक, नौकरशाह और निवेशक देख रहा है इसलिए नहीं कि नेतृत्व परिवर्तन से स्थिति सुधरेगी, बल्कि इसलिए कि अनिश्चितता असहनीय हो चुकी है.

जनादेश से मेलोड्रामा तक

कांग्रेस ने 2023 में स्पष्ट जनादेश जीता था. वह जनादेश शासन का था, न कि अंतहीन आंतरिक युद्ध का. आज सरकार एक खराब लिखे गए सीरियल जैसी लगती है, जिसमें दो नायक स्पॉटलाइट के लिए लड़ते हैं, जबकि दर्शक कर्नाटक की जनता वादा की गई “कहानी” का इंतजार करती रहती है. व्यंग्य अपने आप लिख जाता है: दो शक्ति केंद्र, दो वॉर रूम, दो वफादारों की फौज पर राज्य पूरी तरह ठप.

बीजेपी के लिए यह केवल कांग्रेस की पारिवारिक लड़ाई नहीं रह गई. यह एक पूर्ण शासन संकट है, जिसका सीधा असर 6.5 करोड़ कन्नडिगाओं पर पड़ रहा है. राज्य को बदलती वफादारियों, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और नेतृत्व की असुरक्षा से नहीं चलाया जा सकता. कर्नाटक को स्थिरता चाहिए, न कि सस्पेंस. हर गड्ढा, हर रुकी परियोजना, हर आंदोलनकारी किसान, हर बाहर जाता निवेशक याद दिलाता है: यह निजी लड़ाई नहीं यह सार्वजनिक आपदा है.

कर्नाटक को सबसे पहले चाहिए स्पष्टता, या तो कांग्रेस हाईकमान सिद्धारमैया का सीधा और स्पष्ट समर्थन करे और समानांतर शक्ति केंद्रों को बंद करे, या फिर साहसिक निर्णय लेकर नेतृत्व बदले और स्थिर विकल्प दे. आधे-अधूरे कदम इस संकट को और गहरा करेंगे. इतिहास उन पर दया नहीं करता जो देरी को कूटनीति समझ बैठते हैं.

एक सिंहासन जिस पर लड़ाई, एक राज्य जिसे भुला दिया गया

सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच की रस्साकशी अब महज आंतरिक कांग्रेस मामला नहीं रही. यह अब कर्नाटक के पूरे शासन तंत्र को परिभाषित करती है. जब दो नेता अपनी शक्ति मापते हैं, तब खोए अवसरों, टूटते ढांचों और बिखरे वादों के रूप में राज्य कीमत चुकाता है.

अब असली सवाल यह नहीं है कि सिंहासन कौन जीतेगा. असली सवाल यह है कि इससे पहले कर्नाटक और कितना खोएगा, जब तक कोई फैसला नहीं लेता. इस महत्वाकांक्षा की लड़ाई में सबसे बड़ा नुकसान किसी राजनीतिक करियर का नहीं है, सबसे बड़ा नुकसान है कर्नाटक की गति. और गति, एक बार खो जाए, तो किसी कुर्सी से कहीं कठिन लौटती है.

विजय प्रसाद, अतिथि लेखक
(लेखक बीजेपी कर्नाटक के प्रवक्ता और रिसर्च टीम के प्रमुख हैं, जिन्हें आंतरिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पर गहरी समझ है.)

 


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