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ट्रंप का टैरिफ तूफान वैश्विक अराजकता की निशानी है, भारत की विदेश नीति की विफलता नहीं

डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक व्यापार नीतियों, विशेषकर टैरिफ वृद्धि और निवेश दबाव, ने वैश्विक स्तर पर आर्थिक अस्थिरता पैदा की है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

डोनाल्ड ट्रंप की व्हाइट हाउस में वापसी ने वैश्विक व्यापार युद्ध को फिर से भड़का दिया है. उनके टैरिफ कदम, निवेश संबंधी अल्टीमेटम और "अमेरिका फर्स्ट" रीशोरिंग एजेंडे ने विश्व बाजारों को हिला दिया है और ये बदलाव सकारात्मक नहीं हैं. कोरिया से जापान, फ्रांस से भारत तक, देश निर्यात, मुद्राओं और आपूर्ति शृंखलाओं पर पड़ रहे झटकों को संभालने की कोशिश कर रहे हैं.

फिर भी भारत में, घरेलू विपक्ष इन वैश्विक घटनाओं को प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की विफलता के प्रमाण के रूप में देखता है कि भारत "मित्र खो रहा है" या वैश्विक कूटनीति में "अलग-थलग" पड़ गया है. यह आरोप राजनीतिक रूप से सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन विश्लेषणात्मक रूप से यह आलसी सोच है. यह उथल-पुथल वैश्विक है, स्थानीय नहीं.

ट्रंप की आर्थिक राष्ट्रवाद की वैश्विक कीमत

ट्रंप का नवीनतम टैरिफ पैकेज सभी आयातों पर 20%, चीन पर 60% और सहयोगियों पर चयनित शुल्क ने एशिया को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है. दक्षिण कोरिया के निर्यात आदेश गिर गए हैं क्योंकि उसके इलेक्ट्रॉनिक्स और जहाज निर्माण क्षेत्र अमेरिकी बाजारों तक पहुंच खो रहे हैं. जापान की ऑटो कंपनियां, जो पहले से ही महामारी के बाद की लागतों से जूझ रही हैं, अब दोहरी चुनौती का सामना कर रही हैं.

सितंबर में ही वियतनाम के फुटवियर निर्यात में लगभग 30% की गिरावट आई. ताइवान के सेमीकंडक्टर आपूर्तिकर्ता अपने ऑर्डर पुनः नियोजित कर रहे हैं क्योंकि अमेरिकी कंपनियां उच्च आयात लागत वहन करने में हिचक रही हैं. यूरोप भी दबाव में है, फ्रांसीसी निर्माता इन टैरिफ झटकों को एक “महत्वपूर्ण वैश्विक उथल-पुथल” कह रहे हैं, जो पहले से ही नाजुक अर्थव्यवस्था को और कठिनाई में डाल रहा है.

संक्षेप में, ट्रंप का संरक्षणवाद अमेरिका को मजबूत नहीं कर रहा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को खंडित कर रहा है. यहां तक कि जो देश फिलहाल टैरिफ से बचे हैं, वे भी "निवेश कूटनीति" के दबाव में हैं, उन्हें बाजार तक पहुंच के बदले कारखानों को अमेरिका में स्थानांतरित करने को कहा जा रहा है.

भारत का संतुलन: दबाव और विवेक के बीच

भारत भी अछूता नहीं रहा. इस्पात, एल्युमिनियम और फार्मास्युटिकल्स पर वॉशिंगटन की नवीनीकृत टैरिफ धमकी ने निर्यातकों को झटका दिया है. रूसी ऊर्जा आयात पर रोक और अमेरिकी रणनीतिक प्राथमिकताओं के साथ अधिक निकटता से जुड़ने का दबाव एक अतिरिक्त बाधा बन गया है. ऐसे में विपक्ष द्वारा यह कहना कि भारत "अलग-थलग" पड़ गया है या "संबंधों का कुप्रबंधन" कर रहा है, मुद्दे से भटकाने वाली बात है. जब एक महाशक्ति व्यापार और निवेश को हथियार बना देती है, तो करीबी सहयोगी भी रक्षात्मक मुद्रा में आ जाते हैं. जापान और कोरिया, अमेरिका के सबसे पुराने भागीदार, अपने राष्ट्रीय उद्योगों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. फिर भारत द्वारा पूर्व और पश्चिम के बीच संतुलन साधने के प्रयास को विफलता क्यों माना जाए.

वास्तव में, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड के ज़रिए गहरे संबंध, यूरोपीय संघ के साथ व्यापार वार्ताओं का पुनः आरंभ, और खाड़ी व अफ्रीका के साथ ऊर्जा साझेदारियों का विस्तार  ये सब drift नहीं, बल्कि व्यवहारिक विविधीकरण को दर्शाते हैं. भारत की विदेश नीति की चुनौती आज “पक्ष चुनने” की नहीं है, बल्कि एक ऐसे वैश्विक तंत्र में जीवित रहने की है, जहां सहयोग की जगह अब दबाव ने ले ली है.

जब मित्र आपस में भिड़ते हैं: केनेडी और डी गॉल से सबक

यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका के सहयोगी उसके प्रभुत्व से असहज हुए हैं. 1960 के दशक की शुरुआत में, फ्रांसीसी राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल का जॉन एफ. केनेडी से NATO नियंत्रण और अमेरिकी आर्थिक वर्चस्व को लेकर तीखा टकराव हुआ. डी गॉल ने वॉशिंगटन की संरक्षकता को फ्रांसीसी संप्रभुता का अपमान माना, और 1966 में NATO की एकीकृत संरचना से फ्रांस को बाहर निकाल लिया.

केनेडी की टीम ने उन पर पश्चिमी एकता को कमजोर करने का आरोप लगाया. पेरिस ने वॉशिंगटन पर साम्राज्यवादी घमंड का आरोप लगाया. लेकिन पीछे मुड़कर देखने पर डी गॉल की मुखरता ने यूरोप की रणनीतिक स्वायत्तता को सुरक्षित रखा और एक संतुलित ट्रांस-अटलांटिक साझेदारी की नींव रखी.

सीधी बात है. किसी अत्याचारी सहयोगी का विरोध करना कूटनीतिक विफलता नहीं है. वास्तव में, यह उच्चतम स्तर की कूटनीति हो सकती है. भारत आज एक ऐसे ही मोड़ पर है. मित्रता और स्वतंत्रता, सहयोग और सतर्कता के बीच संतुलन बनाना कमजोरी नहीं है, यह यथार्थवाद है.

आलोचना करें, पर संदर्भ के साथ

किसी भी लोकतंत्र में सरकार की विदेश नीति की आलोचना जायज़ है. लेकिन संदर्भहीन आलोचना विदेश नीति को घरेलू ड्रामा में बदल सकती है.

हां, अमेरिका के साथ भारत का व्यापार अधिशेष कम हुआ है. हां, डेटा फ्लो और क्लीन-टेक सब्सिडी पर बातचीत में मतभेद हैं. लेकिन ये सब एक अशांत वैश्विक व्यवस्था के लक्षण हैं – जिसे अमेरिकी वापसी, यूरोपीय संरक्षणवाद और एशियाई अधिशेषों ने परिभाषित किया है न कि भारतीय कुप्रबंधन के संकेत.

एक ऐसी दुनिया में, जहां करीबी सहयोगी भी अपनी सफलता के लिए दंडित किए जाते हैं, आत्मनिर्भरता अलगाववाद नहीं है – यह अस्तित्व की शर्त है.

निर्णय

डोनाल्ड ट्रंप का आर्थिक राष्ट्रवाद बहुत कम लोगों के लिए फायदे का सौदा रहा है. कोरिया, जापान, फ्रांस और भारत सभी यह सीख रहे हैं कि दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्था सबसे अप्रत्याशित भी हो सकती है. भारत के विपक्ष द्वारा इस वैश्विक अव्यवस्था को “विदेश नीति की विफलता” कहना मौसम को जलवायु समझने जैसा भ्रम है.

मोदी की कूटनीति में खामियां हो सकती हैं, हर सरकार में होती हैं लेकिन जो तूफान वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोर रहा है, वह उनकी बनाई हुई नहीं है.

जैसा कि चार्ल्स डी गॉल ने एक बार अपने अमेरिकी समकक्षों को याद दिलाया था, गठबंधन सम्मान पर टिके होते हैं, आज्ञापालन पर नहीं. यही सिद्धांत आज भी लागू होता है. भारत का कार्य है, मजबूती से खड़ा रहना, व्यापक रूप से व्यापार करना, और दबाव को साझेदारी समझने से इनकार करना. यह कमजोरी नहीं है, यह संप्रभुता है.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

सिद्धार्थ अरोड़ा, अतिथि लेखक

(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए (मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट) हैं, जो वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व विदेश नीति में गहरी रुचि रखते हैं.)

 

 

 


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