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अमेरिकी टैरिफ वृद्धि से मछुआरिन महिलाओं की आजीविका पर संकट

डोनल्ड ट्रंप द्वारा भारत से समुद्री खाद्य निर्यात पर 50 प्रतिशत टैरिफ नीति का सीधा असर भारत की मछुआरिन महिलाओं पर पड़ा है, यह बेरोजगारी, कम आय और खाद्य असुरक्षा में तब्दील हो रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

भारत के 7,000 किलोमीटर लंबे समुद्री तट से जुड़ा ‘मत्स्य पालन’ और ‘जलीय कृषि’ क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो न केवल खाद्य सुरक्षा और विदेशी व्यापार को बढ़ावा देता है, बल्कि करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका का आधार भी है. हाल ही में अमेरिका द्वारा भारतीय समुद्री उत्पादों पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के बाद यह मामला सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रह गया है. इन नीतिगत बदलावों के पीछे छिपी है उन लाखों लोगों की वास्तविकता विशेषकर मछुआरिन महिलाओं की, जिनकी मेहनत, आय और आत्मनिर्भरता अब सीधे संकट में है.

संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत के समुद्री खाद्य निर्यात का एक-तिहाई से अधिक हिस्सा खरीदता है, जिसका मूल्य वित्तीय वर्ष 2023-24 में लगभग ₹60,524 करोड़ (या 7.38 अरब अमेरिकी डॉलर) था. इन निर्यातों में फ्रोजन झींगे, झींगा, केकड़ा और लॉबस्टर प्रमुख हैं, जिनमें झींगा अकेले ही अमेरिका को होने वाले कुल निर्यात का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा है. इस महीने के अंत तक टैरिफ को दोगुना (लगभग 59.73 प्रतिशत) करने की योजना से इस उद्योग को बहुत बड़ा झटका लग सकता है. हालांकि पहले दौर की टैरिफ वृद्धि को अमेरिकी खरीदारों के साथ कीमतों और मुनाफे को दोबारा तय कर समायोजित कर लिया गया था, लेकिन अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ पूरे क्षेत्र पर जबरदस्त दबाव डालेगा, जिससे लगभग ₹24,000 करोड़ का नुकसान हो सकता है. इस स्थिति को और बदतर बना रहा है इक्वाडोर, इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे देशों से मिलने वाली कड़ी प्रतिस्पर्धा, जिन्हें केवल लगभग 20 प्रतिशत का टैरिफ देना पड़ता है.

एक दशक पहले, समुद्री मत्स्य पालन भारत के कृषि उत्पादन में सबसे कम योगदान देने वाले क्षेत्रों में से एक था, जो अब बढ़कर कुल 4.4 प्रतिशत तक पहुँच गया है- जो इसे चीनी, दालों और कुछ मसालों से भी अधिक मूल्यवान बनाता है. इस तीव्र वृद्धि ने विशेष रूप से आंध्र प्रदेश, ओडिशा और केरल के तटीय गांवों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूती दी है. इस क्षेत्र के आर्थिक मूल्य में आई वृद्धि का एक बड़ा कारण महिलाओं की भागीदारी है - एक तथ्य जिसे अक्सर मुख्यधारा की चर्चाओं में अनदेखा कर दिया जाता है. भारत के कुल 28 करोड़ मत्स्यजीवियों में से लगभग 12 करोड़ महिलाएँ हैं, जो कार्यबल का 44 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करती हैं.

महिलाएँ कटाई के बाद की प्रक्रिया में प्रमुख भूमिका निभाती हैं: मछली विपणन में लगी 86 प्रतिशत, मछली सुखाने और प्रसंस्करण में 90 प्रतिशत, और झींगा छीलने के कार्य में 95 प्रतिशत महिलाएँ हैं (CMFRI, 2016). चूँकि झींगा छीलने और प्रसंस्करण के काम में भारी बहुमत महिलाएँ हैं, इसलिए टैरिफ का प्रभाव सीधा उन तक पहुँचेगा. घटती बाजार माँग और गिरती कीमतें बेरोजगारी में बदल जाएँगी, जिससे उन महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और सशक्तिकरण पर असर पड़ेगा, जो घरेलू जिम्मेदारियों के साथ-साथ यह काम करती हैं. इसलिए, जब व्यापार नीति की चर्चाएँ केवल मैक्रोइकोनॉमिक संकेतकों तक सीमित रहती हैं, तब इस टैरिफ के प्रभाव की असली कहानी उन महिलाओं से जुड़ी है, जो इस क्षेत्र को बनाए रखने के लिए लगातार मेहनत करती हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में अमेरिका की घोषणा के बाद किसानों और मछुआरों की सुरक्षा के प्रति दोबारा प्रतिबद्धता जताई, लेकिन भारत की नीतियों को आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए केवल निर्यात तक सीमित नहीं रहना चाहिए. घरेलू ज़रूरतों पर ध्यान देना इस क्षेत्र में कुछ हद तक लचीलापन और टिकाऊ आजीविका सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है. भारत में प्रति व्यक्ति समुद्री खाद्य की खपत 2005 और 2021 के बीच लगभग 81 प्रतिशत बढ़ी है, जो बदलती खाद्य प्राथमिकताओं को दर्शाती है. इस अवधि में घरेलू मांग दोगुनी होकर लगभग 1.2 करोड़ टन हो गई है.

यह बढ़ती हुई मांग भारत के लिए मत्स्य पालन क्षेत्र को भीतर से मज़बूत करने का एक बड़ा अवसर प्रस्तुत करती है. हालांकि यह मानना ज़रूरी है कि घरेलू खपत मुख्य रूप से ताजे, निम्न और मध्यम मूल्य वाले उत्पादों तक सीमित है, जो उच्च-मूल्य वाले समुद्री खाद्य निर्यात में आई गिरावट की भरपाई नहीं कर सकती. फिर भी, यह आंतरिक आपूर्ति शृंखलाओं को मज़बूत करने के नए और विविध रास्ते प्रदान कर सकती है और धीरे-धीरे इस क्षेत्र को बाहरी झटकों के प्रभाव से मुक्त कर सकती है. इस दिशा में एक आशाजनक रणनीति तेलंगाना से आती है.
ब्लू रिवॉल्यूशन और प्रधानमंत्री संपदा योजना (PMMSY) जैसी पहलों के कार्यान्वयन के माध्यम से तेलंगाना ने मोबाइल फिश रिटेल यूनिट्स की शुरुआत की है, जो मिनी कार्गो वाहनों के रूप में हैं और ठंडा भंडारण व पकाने की सुविधाओं से युक्त हैं. इन्हें स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को भारी सब्सिडी पर आवंटित किया गया है. यदि इस मॉडल को व्यापक रूप से लागू किया जाए, तो यह मछुआरिन महिलाओं को मूल्य शृंखला में गहराई से जोड़ने, उनकी आय के स्रोतों में विविधता लाने और निर्यात में व्यवधान से उत्पन्न झटकों से बचाव का एक मापनीय तरीका बन सकता है.

एकल बाजार और सीमित उत्पादों पर भारत की अत्यधिक निर्भरता ने इस क्षेत्र को गंभीर जोखिम में डाल दिया था. वित्तीय वर्ष 2017-18 से 2024-25 के बीच, चीन भारत के समुद्री खाद्य उत्पादों का दूसरा सबसे बड़ा बाज़ार बनकर उभरा है, जहां आयात लगभग दस गुना बढ़ा है. फिर भी, NABARD (2022) के अनुसार, भारत का कुल 'सीफूड बास्केट' कुछ ही उत्पादों तक सीमित है और केवल एक-तिहाई ही निर्यात होता है. कम टैरिफ-संवेदनशील बाज़ारों में विस्तार, उत्पाद विविधता और नवाचार के ज़रिए मूल्य शृंखला को मज़बूत करना आवश्यक होगा.

उदाहरण के लिए, 24 जुलाई 2025 को हस्ताक्षरित नई भारत–यूके व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (CETA) इस परिदृश्य को बदलने की संभावना रखता है. वर्तमान में भारत यूके को लगभग 16,082 टन समुद्री खाद्य निर्यात करता है (जिसमें से 77 प्रतिशत मूल्य फ्रोज़न झींगा का है), जो उनके कुल बाजार का 2.25 प्रतिशत है, जिसका मूल्य 104 मिलियन अमेरिकी डॉलर है. CETA लागू होने से भारतीय समुद्री खाद्य टैरिफ लाइनों के 99 प्रतिशत पर शून्य शुल्क की अनुमति मिलेगी (पूर्व में 8.9 प्रतिशत), जिससे आने वाले वर्षों में यूके को निर्यात में 70 प्रतिशत की संभावित वृद्धि संभव है और भारत को वियतनाम, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे आपूर्तिकर्ताओं पर प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी.

भारत का मत्स्य पालन क्षेत्र आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा और महिला सशक्तिकरण के संगम का प्रतीक है. हालांकि अमेरिका द्वारा प्रस्तावित टैरिफ वृद्धि इस पारिस्थितिकी तंत्र की कमजोरियों को उजागर करती है, विशेष रूप से उन मछुआरिन महिलाओं के लिए जो इसकी रीढ़ हैं, फिर भी इन प्रभावों को बहुआयामी रणनीति से कम किया जा सकता है, मापनीय मॉडलों के जरिए घरेलू मांग का जवाब देकर, मूल्य शृंखलाओं को मजबूत कर जो मछुआरिन महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण सुनिश्चित करें, और निर्यात बाज़ारों में विविधता लाकर. केवल तभी भारत न केवल अपने समुद्री खाद्य व्यापार की रक्षा कर पाएगा, बल्कि उन लाखों ज़िंदगियों की भी जो इससे जुड़ी हुई हैं.

व्यापार की लहरें बदल सकती हैं, लेकिन इन समुदायों की रक्षा करने का संकल्प स्थिर रहना चाहिए.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं और यह जरूरी नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को भी प्रतिबिंबित करते हों.)
शांभवी सूरी
अतिथि लेखिका
लेखिका चेज एडवाइजर्स में एक सार्वजनिक नीति और वकालत पेशेवर हैं, जो लिंग और समावेशन पर केंद्रित कार्य कर रही हैं.


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