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2026 की अर्थव्यवस्था में MSME की असली भूमिका: नीति से परे जमीनी सच्चाई

MSME को टिकाऊ समर्थन, प्रक्रियागत सरलता, समय पर भुगतान, क्लस्टर विकास और लागत प्रतिस्पर्धा जैसी नीतियों की आवश्यकता है ताकि ये न केवल जीवित रहें, बल्कि फल-फूल कर वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भी सफल हो सकें.

गौरव भगत 8 months ago

वर्ष 2026 में भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दहलीज पर खड़ा है. दलाल स्ट्रीट के सूचकांक रिकॉर्ड ऊंचाइयों को छू रहे हैं और विदेशी निवेश की बाढ़ आई हुई है, लेकिन अगर आप दिल्ली के वातानुकूलित गलियारों से निकलकर कानपुर की चमड़ा मिलों, लुधियाना के होजरी क्लस्टर्स, मुरादाबाद के पीतल उद्योग या कोयंबटूर की इंजीनियरिंग इकाइयों में कदम रखें, तो कहानी का एक दूसरा पहलू सामने आता है.

MSME (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) को अक्सर भारतीय अर्थव्यवस्था की 'रीढ़' कहा जाता है, जो देश के GDP में लगभग 30% और निर्यात में 45% का योगदान देते हैं. लेकिन 2025 की जमीनी हकीकत नीतिगत दावों और वास्तविक चुनौतियों के बीच एक कशमकश की कहानी है.

डिजिटलीकरण: सशक्तिकरण या नया डिजिटल डिवाइड?

2025 तक भारत का डिजिटल ढांचा दुनिया के लिए एक मिसाल बन चुका है. ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) ने छोटे व्यापारियों को ई-कॉमर्स दिग्गजों से लड़ने का एक हथियार तो दिया है, लेकिन एक कड़वी सच्चाई भी सामने आई है. छोटे उद्यमों के लिए 'डिजिटल अनुपालन' की लागत बढ़ गई है.

एक सूक्ष्म उद्यमी, जो पहले केवल अपने उत्पाद की गुणवत्ता पर ध्यान देता था, अब जीएसटी फाइलिंग, ई-इनवॉइसिंग, डेटा सुरक्षा और एल्गोरिदम-आधारित मार्केटिंग के चक्रव्यूह में फंसा है. पॉलिसी कहती है 'व्यापार सुगमता', लेकिन जमीन पर एक छोटा वर्कशॉप चलाने वाला मालिक आज भी एक महंगे सीए और आईटी सलाहकार के बिना अपना अस्तित्व नहीं बचा पा रहा है. डिजिटल गैप कम होने के बजाय, अब 'तकनीकी साक्षरता' के आधार पर एक नई खाई बन गई है.

'ग्रीन इकॉनमी' और अनुपालन का बोझ

2025 में ही जलवायु परिवर्तन की नीतियां केवल कागजों तक सीमित नहीं हैं. वैश्विक स्तर पर 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' जैसे कड़े नियम लागू हो चुके हैं. भारत के MSME, जो बड़े पैमाने पर यूरोप और अमेरिका को निर्यात करते हैं, अब एक अजीब दबाव में हैं.

बड़े कॉरपोरेट्स के पास 'नेट ज़ीरो' लक्ष्य हासिल करने के लिए बजट है, लेकिन एक छोटी स्टील या टेक्सटाइल यूनिट के लिए पर्यावरण-अनुकूल मशीनरी में निवेश करना लगभग नामुमकिन है. ज़मीनी सच्चाई यह है कि बिना सरकारी वित्तीय मदद के, 'ग्रीन ट्रांजिशन' कई छोटे उद्योगों के लिए ताला लगने का कारण बन सकता है.

क्रेडिट गैप: आज भी ऊंट के मुंह में जीरा

क्रेडिट क्रांति के बावजूद, 2026 में भी ऋण की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती होगी. बैंकों के पास तरलता (Liquidity) है, लेकिन जोखिम लेने की क्षमता आज भी कम है. हकीकत: एक छोटा उद्यमी आज भी 'कोलेटरल' (गारंटी) के बिना बैंक से कर्ज लेने की कल्पना नहीं कर पाता.
सच्चाई: जबकि नीतियां 59 मिनट में लोन देने का वादा करती हैं, ज़मीनी स्तर पर कागजी कार्यवाही और बैंकों के चक्कर काटने का सिलसिला खत्म नहीं हुआ है. परिणाम स्वरूप, आज भी करोड़ों छोटे उद्यमी अनौपचारिक स्रोतों (साहूकारों) से 24% से 36% के भारी ब्याज पर पैसा उठाने को मजबूर हैं.

'K-शेप्ड' रिकवरी और मार्जिन का संकट

2026 की अर्थव्यवस्था का सबसे चिंताजनक पहलू इसकी 'असंतुलित रिकवरी' हो सकता है. जहां बड़े कॉरपोरेट घराने रिकॉर्ड मुनाफा कमा रहे हैं, वहीं उनकी सप्लाई चेन में सबसे नीचे खड़ा MSME वेंडर अपने मार्जिन के लिए संघर्ष कर रहा है. कच्चे माल (कपास, लोहा, ईंधन) की कीमतों पर नियंत्रण बड़े खिलाड़ियों का है, जबकि बिक्री की कीमत भी मार्केट लीडर्स तय करते हैं. इस 'दोहरे दबाव' के बीच छोटा उद्योग केवल एक 'जॉब वर्क' यूनिट बनकर रह गया है, जिसकी अपनी कोई ब्रांड वैल्यू या मूल्य निर्धारण शक्ति नहीं है.

स्किल गैप और भविष्य की मशीनें

एआई (AI) और ऑटोमेशन ने 2025 में ही दस्तक दे दी है. और 2026 में ये और ज्यादा हमारे बीच मौजूद होगा. MSME भारत में कृषि के बाद सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता है. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हमारे पास 'डिग्रियां' तो हैं, लेकिन 'कौशल' नहीं. एक तरफ उद्योग जगत कहता है कि उन्हें कुशल कामगार नहीं मिल रहे, दूसरी तरफ लाखों युवा बेरोजगार हैं. छोटे उद्योगों के पास अपने पुराने कर्मचारियों को 'री-स्किल' (Re-skill) करने के लिए न तो समय है और न ही पैसा.

सिर्फ 'रीढ़' कहना काफी नहीं

2026 में भारत की अर्थव्यवस्था तभी सुरक्षित है, जब उसके MSME सुरक्षित हैं. केवल "सब्सिडी" देना कोई स्थायी समाधान नहीं है; असली जरूरत 'प्रक्रियात्मक सरलता' की है. अगर हम चाहते हैं कि 2026 के बाद का भारत सच में आत्मनिर्भर बने, तो हमें:

1. देरी से भुगतान: इस कैंसर का इलाज करना होगा, जो छोटे उद्योगों की कार्यशील पूंजी को खा जाता है.
2. क्लस्टर विकास: छोटे गांवों और कस्बों में आधुनिक बुनियादी ढांचा पहुंचाना होगा.
3. लागत में कमी: बिजली और लॉजिस्टिक्स की लागत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना होगा.
4. अगर हम MSME को सिर्फ 'बचाए रखने' की बात करेंगे, तो हम कभी वैश्विक खिलाड़ी नहीं बन पाएंगे. उन्हें 'फलने-फूलने' के लिए नीतियों को वातानुकूलित कमरों से निकलकर धूल भरी गलियों के कारखानों की आवाज़ सुननी होगी.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं और आवश्यक नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

अतिथि लेखक- गौरव भगत, संस्थापक, गौरव भगत अकादमी व कंसोर्टियम गिफ्ट्स


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