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शॉर्ट सेलर संकट: क्यों भारत को देर होने से पहले करनी चाहिए कार्रवाई?

विदेशी शॉर्ट-सेलरों के भ्रामक हमलों से बचाव के लिए भारत को तुरंत कड़े नियम बनाना जरूरी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

9 जुलाई, 2025 को एक और भारतीय कॉर्पोरेट दिग्गज पर हमला हुआ, न किसी प्रतिस्पर्धी ने, न किसी नियामक या खोजी पत्रकार ने, बल्कि एक विदेशी शॉर्ट-सेलर ने जो "सक्रिय अनुसंधान" की आड़ में छिपा हुआ था. अमेरिका-स्थित संगठन, जिसकी एक विवादास्पद पृष्ठभूमि रही है, उस वाइसरॉय रिसर्च ने एक सनसनीखेज रिपोर्ट प्रकाशित की जिसका शीर्षक था “वेदांता – सीमित संसाधन”. इसमें आरोप लगाया गया कि वेदांता रिसोर्सेज लिमिटेड, जो वेदांता लिमिटेड की मूल कंपनी है, ने अपनी ऋण सेवाओं को पूरा करने के लिए अपनी सहायक कंपनियों से धन निकालकर अपनी वित्तीय स्थिति को कमजोर किया है, लेकिन इस रिपोर्ट के पीछे का उद्देश्य न तो ईमानदार आलोचना था और न ही निवेशकों को जागरूक करना. यह केवल हेरफेर की एक चाल थी.

यह पहली बार नहीं है जब भारत को निशाना बनाया गया है. पिछले वर्ष ही, हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी समूह पर अपनी संदिग्ध रिपोर्ट के जरिए भारी बाजार उथल-पुथल मचाई थी. दोनों मामलों में रिपोर्टें बिना संबंधित कंपनियों से कोई पूर्व संवाद किए, उन्हें जवाब देने का कोई अवसर दिए बिना, और भारतीय नियामक मानदंडों का पालन किए बिना जारी की गईं.

शॉर्ट सेलिंग एक छिपे हुए इरादे के साथ
इन तथाकथित अनुसंधान संस्थाओं द्वारा अपनाया गया एक सरल लेकिन खतरनाक फॉर्मूला है: किसी स्टॉक में शॉर्ट पोजिशन लें, उस पर एक हानिकारक रिपोर्ट प्रकाशित करें, उसे मीडिया और सोशल नेटवर्क के ज़रिए फैलाएं, और जब स्टॉक ध्वस्त हो जाए तो मुनाफा कमाएं. रिपोर्ट आंशिक रूप से सच हो सकती है, बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ा कर पेश की गई हो सकती है, या पूरी तरह से भ्रामक भी हो सकती है, लेकिन उद्देश्य एक ही रहता है घबराहट से लाभ उठाना. खुदरा निवेशक, संस्थागत फंड, और एलआईसी जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान नुकसान उठाते हैं, जबकि शॉर्ट-सेलर जश्न मनाता है.

वाइसरॉय रिसर्च का ऐसा रिकॉर्ड रहा है. दक्षिण अफ्रीका में, उसे कैपिटेक बैंक के खिलाफ एक झूठी और हानिकारक रिपोर्ट प्रकाशित करने पर R50 मिलियन का जुर्माना लगाया गया था, जिससे स्टॉक में तेज गिरावट आई. उन पर जानबूझकर झूठे बयान प्रकाशित करने, डेटा की पुष्टि न करने और विरोधाभासी साक्ष्यों की अनदेखी करने का आरोप लगा. अमेरिका में, मेडिकल प्रॉपर्टीज ट्रस्ट ने उन पर “शॉर्ट-एंड-डिसटॉर्ट” योजना का आरोप लगाया. यूनाइटेड किंगडम में, सांसदों ने इस समूह के भू-राजनीतिक संबंधों पर सवाल उठाए.

सेबी गैप: एक विनियामक खामी
भारत में, सेबी यह अनिवार्य करता है कि कोई भी व्यक्ति या कंपनी जो अनुसंधान रिपोर्ट प्रकाशित करती है, उसे रिसर्च एनालिस्ट के रूप में पंजीकृत होना चाहिए. यह नियम इस बात से अप्रभावित रहता है कि रिपोर्ट सकारात्मक है या नकारात्मक, यह ढांचा खुदरा निवेशकों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है और यह सुनिश्चित करता है कि केवल योग्य और जवाबदेह व्यक्ति ही बाजारों को प्रभावित करें.

लेकिन क्या होता है जब कोई विदेशी संस्था, जो भारतीय अधिकार क्षेत्र के बाहर कार्य कर रही हो, एक ऐसा नुकसानदायक रिपोर्ट प्रकाशित करती है जो भारतीय पूंजी बाजारों में उथल-पुथल मचा देती है? वर्तमान में, सेबी के पास ऐसी कंपनियों पर कोई वास्तविक समय का नियंत्रण या निगरानी नहीं है. यही वह खाली स्थान है जिसका फायदा वाइसरॉय जैसी संस्थाएं उठाती हैं. ये रिपोर्ट पंजीकृत विश्लेषकों द्वारा जारी नहीं की जाती हैं, न ही ये भारतीय कानून के प्रति जवाबदेह होती हैं. फिर भी, ये भारतीय निवेशकों, शेयरों और यहां तक कि राष्ट्रीय आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करती हैं.

वेदांता मामला: निराधार आरोप, स्पष्ट मंशा
वेदांता के खिलाफ रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि कंपनी ने अपनी सहायक कंपनियों से धन की निकासी की, लेकिन वेदांता की वित्तीय विवरणियों की एक साधारण समीक्षा से स्पष्ट होता है कि एक वैध, पूर्णतः प्रकट और कानूनी रूप से अनुमेय तरीके से यह धन लाभांश के रूप में प्राप्त हुआ था.  कंपनी के लेखा परीक्षकों ने किसी भी प्रमुख लेखा विषय या लेखांकन में अनियमितता का संकेत नहीं दिया. ऐसा कोई संकेत नहीं है कि वेदांता ने अपने बहीखाते में हेरफेर किया या वित्तीय जोखिमों को छिपाया.

वास्तव में, वेदांता ने एक तीखा खंडन जारी किया, जिसमें रिपोर्ट को “चयनित गलत जानकारी और निराधार आरोपों का दुर्भावनापूर्ण मिश्रण” बताया गया. कंपनी ने यह भी बताया कि यह रिपोर्ट केवल सार्वजनिक डेटा पर आधारित थी, जिसे संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत किया गया, और दावों की पुष्टि या स्पष्टीकरण के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया. असली मंशा प्रतीत होती है डर फैलाना ताकि खुदरा निवेशक घबराकर अपने शेयर बेच दें, जिससे शॉर्ट-सेलर लाभ कमा सके.

सेबी को क्या कदम उठाने चाहिए
भारत के पूंजी बाजार नियामक को तुरंत और सख्ती से कार्रवाई करनी चाहिए. सेबी को निम्नलिखित उपायों को तुरंत लागू करना चाहिए:
1. सभी अनुसंधान प्रकाशनों के लिए लाइसेंसिंग अनिवार्य करें
कोई भी इकाई भारतीय हो या विदेशी, जो भारतीय सूचीबद्ध कंपनियों को लक्षित करते हुए अनुसंधान प्रकाशित करती है, उसे सेबी में रिसर्च एनालिस्ट के रूप में पंजीकृत होना चाहिए. इसमें सोशल मीडिया, ब्लॉग्स या अंतरराष्ट्रीय वेबसाइटों पर साझा की गई रिपोर्टें भी शामिल हैं.

2. कंपनी से अनिवार्य संवाद
किसी भी नकारात्मक अनुसंधान रिपोर्ट को प्रकाशित करने से पहले उसे संबंधित कंपनी को सहायक प्रमाणों के साथ भेजा जाना चाहिए, ताकि कंपनी को एक निश्चित समय सीमा में प्रतिक्रिया देने का अधिकार मिले. यदि रिपोर्ट से संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो शॉर्ट-सेलर उस रिपोर्ट को लेकर सेबी से संपर्क कर सकता है. सेबी का अनुसंधान विभाग रिपोर्ट की वैधता की समीक्षा करेगा, उसके बाद ही इसे सार्वजनिक किया जा सकेगा.

3. अनुमोदन रहित रिपोर्टों पर प्रतिबंध
सेबी के अनुसंधान विभाग द्वारा अनुमोदित न की गई कोई भी रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से प्रसारित नहीं की जानी चाहिए. यदि ऐसी कोई रिपोर्ट बाजार में घबराहट फैलाती है, तो उसे तुरंत हटाया जाना चाहिए और लेखक की जांच की जानी चाहिए.

4. आपराधिक और वित्तीय दंड
यदि सेबी पाता है कि कोई रिपोर्ट झूठी या भ्रामक थी, तो उस रिसर्च संस्था और उसमें शामिल व्यक्तियों पर आपराधिक दायित्व तय किया जाना चाहिए. रिपोर्ट के आधार पर शॉर्ट पोजीशन से कमाए गए सभी मुनाफे जब्त किए जाने चाहिए, और उस संस्था को भारतीय बाजारों में भागीदारी से स्थायी रूप से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए.

5. खुदरा निवेशकों की सुरक्षा करें
सेबी को खुदरा निवेशकों को विदेशी शॉर्ट सेलर्स द्वारा फैलाए गए डर से बचाने के लिए जागरूकता अभियान चलाने चाहिए. सभी शॉर्ट-सेलर्स और अनुसंधान रिपोर्टों के लिए एक स्पष्ट प्रकटीकरण ढांचा अनिवार्य किया जाना चाहिए, ताकि निवेशक जान सकें कि कोई रिपोर्ट वित्तीय स्वार्थ से प्रेरित है या नहीं.

 प्रदर्शन नहीं, धारणा है नई बाजार हकीकत
आज के अत्यधिक जुड़े हुए विश्व में, धारणा प्रदर्शन से कहीं अधिक तेजी से बाजारों को प्रभावित कर सकती है. जब बॉट्स और एल्गोरिदम माइक्रोसेकंड्स में ट्रेड करते हैं, तो नकारात्मक खबर की एक फुसफुसाहट भी किसी स्टॉक को नीचे गिरा सकती है. ऐसे माहौल में, दुर्भावनापूर्ण शॉर्ट-सेलर अभियानों का स्वरूप केवल भ्रामक ही नहीं, बल्कि अत्यंत खतरनाक भी हो जाता है. ये वित्तीय स्थिरता को कमजोर करने, कॉर्पोरेट इंडिया को नुकसान पहुंचाने, और पूंजी बाजारों में जनता के विश्वास को हिलाने की क्षमता रखते हैं.

वेदांता को क्यों चाहिए जनता का समर्थन
वेदांता भारत की औद्योगिक वृद्धि में एक प्रमुख खिलाड़ी रहा है, जो खनन, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे में निवेश करता है. इसके संचालन हजारों नौकरियों को समर्थन देते हैं और राष्ट्रीय उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. ऐसी कंपनियों को विदेशी-प्रेरित अभियानों के जरिए निशाना बनाना केवल भारतीय आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचाता है.

जब 2023 में अडानी को निशाना बनाया गया था, तो उसका असर केवल निवेशकों पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय मंच पर भारत की साख पर भी पड़ा. विदेशी निवेशकों ने हिचकिचाहट दिखाई. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की कीमतें गिरीं. जिस संस्थान के पास करोड़ों भारतीयों की बचत है, उस एलआईसी को भी नुकसान हुआ. अंततः सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति ने अदाणी समूह को क्लीन चिट दी, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था. अब वही रणनीति वेदांता के खिलाफ अपनाई जा रही है.

भारतीय बाजारों की सुरक्षा का आह्वान
भारत को ऐसे विदेशी सट्टेबाजों का खेल का मैदान नहीं बनने देना चाहिए, जो नियामक खामियों का फायदा उठाना चाहते हैं. सेबी, आरबीआई, वित्त मंत्रालय और यहां तक कि न्यायपालिका को भी मिलकर एक ऐसा सुरक्षित वित्तीय तंत्र बनाना चाहिए, जहां वास्तविक चिंताओं का स्वागत हो लेकिन दुर्भावनापूर्ण हेरफेर को बर्दाश्त न किया जाए.

अब समय आ गया है कि एक स्पष्ट सीमा रेखा खींची जाए. अनुसंधान जिम्मेदार होना चाहिए. आलोचना साक्ष्य के साथ होनी चाहिए. मंशाएं स्पष्ट होनी चाहिए और हेरफेर को दंडित किया जाना चाहिए.

निष्कर्ष
वेदांता के खिलाफ शॉर्ट-सेलर की रिपोर्ट पारदर्शिता, नैतिकता या शेयरधारक सक्रियता के बारे में नहीं है. यह लाभ के बारे में है, ऐसा लाभ जो मूल्य निर्माण से नहीं, बल्कि मूल्य नष्ट करके कमाया गया है. यह विश्लेषण के रूप में प्रस्तुत डर फैलाने की रणनीति है.

भारत को अब कार्रवाई करनी होगी. इसके पूंजी बाजारों की विश्वसनीयता, इसके निवेशकों की सुरक्षा और इसकी आर्थिक वृद्धि का भविष्य इसी पर निर्भर करता है. दुनिया को बताएं, भारत निवेश का स्वागत करता है, शोषण का नहीं.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं और आवश्यक नहीं कि ये प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

विनोद के बंसल, गेस्ट लेखक

(विनोद के बंसल एक अनुभवी चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, जिनके पास वित्तीय बाजारों में 35 वर्षों से अधिक का अनुभव है. दिल्ली स्थित बंसल वैश्विक वित्तीय प्रवृत्तियों और निवेश रणनीतियों की गहरी समझ रखते हैं, जिससे वह वित्तीय क्षेत्र में एक विश्वसनीय आवाज माने जाते हैं. उनसे संपर्क किया जा सकता है: vinodkbansal@gmail.com)


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