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मालदीव की वापसी: हिंद महासागर में भारत की रणनीतिक जीत

मालदीव का भारत की ओर लौटना केवल एक द्विपक्षीय संबंधों की कहानी नहीं है, बल्कि यह हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की स्थायी प्रासंगिकता, रणनीतिक धैर्य और विश्वास आधारित कूटनीति की सफलता का प्रतीक है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

भू-राजनीति में कुछ चीजें द्वीप कूटनीति की तरह इतनी तेजी से और चुपचाप नहीं बदलतीं. दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की मालदीव यात्रा एक सामान्य पड़ोसी संपर्क पहल जैसी लग सकती है, लेकिन हाथ मिलाने और संयुक्त बयानों के पीछे माले के नेतृत्व द्वारा लिया गया एक नाटकीय यू-टर्न और भारत की हिंद महासागर कूटनीति के लिए एक समय पर मिला जीत छिपी हुई है.

यह यात्रा केवल एक अशांत वर्ष के बाद संबंधों को बचाने के बारे में नहीं थी. यह एक चुपचाप लेकिन गहरे बदलाव को दर्शाती है कि अब मालदीव इस क्षेत्र में अपनी भूमिका को कैसे देखता है और, इससे भी महत्वपूर्ण बात, वह भारत को कैसे देखता है. भारत के लिए यह कूटनीतिक पुनर्स्थापन केवल प्रतीकात्मक नहीं है, यह इंडो-पैसिफिक को एक संकेत है.

'इंडिया आउट' से 'इंडिया फर्स्ट' तक
सिर्फ एक साल पहले, संबंध टूटने की कगार पर थे. राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जु का चुनाव अभियान भारतीय सैन्य कर्मियों को मालदीव से निकालने की राष्ट्रवादी मांगों पर आधारित था. उनका नारा "इंडिया आउट" घरेलू चिंताओं के साथ गूंजता था, लेकिन नई दिल्ली में खतरे की घंटी बजा दी थी.
पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद, मुइज़्ज़ु ने समझौते रद्द करने, परियोजनाओं में देरी करने और पारंपरिक सहयोगियों की तुलना में चीन और तुर्की की यात्राओं को प्राथमिकता देने के कदम उठाए.

भारत ने इसके जवाब में रणनीतिक धैर्य अपनाया. उसने सैनिकों की वापसी के अनुरोधों का बिना किसी राजनीतिक या आर्थिक प्रतिशोध के पालन किया. मानवीय सहायता के रास्ते खुले रखे, चिकित्सा और शिक्षा वीजा में सहयोग जारी रखा, और इंतजार किया.

अब वह धैर्य रंग लाया है.

जब इस महीने मुइज्जु ने मोदी के लिए रेड कार्पेट बिछाया, तो वह सिर्फ एक स्वागत का संकेत नहीं था, बल्कि यह भारत की स्थायी प्रासंगिकता की स्वीकृति थी. ऐसा प्रतीत होता है कि मालदीव ने वह समझ लिया है जो दशकों का इतिहास बताता है: कि भारत सिर्फ एक पड़ोसी नहीं, बल्कि एक जीवनरेखा है.

परिवर्तन क्यों हुआ?
इस पुनर्संतुलन को तीन शक्तियाँ समझाती हैं.

पहली, आर्थिक वास्तविकता- मालदीव बुनियादी ढांचे के लिए चीन की ओर झुक सकता है, लेकिन इसकी रोजमर्रा की जरूरतें खाद्य आपूर्ति और स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर पर्यटन और आवश्यक सेवाओं तक भारत से गहराई से जुड़ी हुई हैं. केवल 2023 में ही 3,00,000 से अधिक भारतीय पर्यटक मालदीव आए, और भारतीय-निर्मित बुनियादी ढांचा, विशेष रूप से माले और हुलहुमाले में, मालदीव के शहरी विकास का आधार है.

दूसरी, घरेलू यथार्थवाद- जबकि "इंडिया आउट" चुनाव प्रचार के दौरान कारगर रहा, शासन करना उतना आसान नहीं रहा. जब ईंधन की कमी, वीज़ा में अड़चनें और परियोजनाओं में देरी जैसी वास्तविकताएँ सामने आईं, तो जनमत बदलने लगा. जैसे-जैसे महंगाई और आपूर्ति निर्भरता स्पष्ट होती गई, नई दिल्ली को अलग-थलग करने की राजनीतिक लागत भी सामने आने लगी.

तीसरी, चीन की सतर्कता- बीजिंग भले ही एक उत्साही वित्तपोषक बना रहे, लेकिन उसके जुड़ाव कर्ज, अपारदर्शिता और सीमित स्थानीय भागीदारी के साथ आते हैं. इसके विपरीत भारत कम ब्याज दर पर ऋण रेखाएँ, सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाले कार्य और तेज डिलीवरी प्रदान करता है. एक नाजुक द्वीप अर्थव्यवस्था में, यह मायने रखता है.

मोदी का संदेश: लेन-देन नहीं, विश्वास
यह यात्रा बड़ी घोषणाओं से भरी नहीं थी, लेकिन यही इसे महत्वपूर्ण बनाता है. यह लेन-देन से अधिक विश्वास, और अल्पकालिक दिखावे से अधिक दीर्घकालिक समन्वय की पुनर्पुष्टि थी.

मोदी ने विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया, समुद्री सुरक्षा सहयोग को मजबूत किया, और भारत की "पड़ोसी पहले" प्रतिबद्धता को जारी रखने का संकल्प लिया. स्वर गर्मजोशी भरा था, दृश्य विनम्र थे, और उद्देश्य स्पष्ट था: भारत माले की रणनीतिक गणना में फिर से शामिल है और लंबे समय तक रहेगा.

यह जुड़ाव भारत की SAGAR (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) दृष्टि का भी एक क्रियान्वयन है. मालदीव, जो हिंद महासागर में प्रमुख समुद्री मार्गों के बीच स्थित है, भारत की समुद्री रणनीति के लिए केंद्रीय है, खासकर क्षेत्र में चीन की बढ़ती नौसैनिक दिलचस्पी के मद्देनजर.

भारत की ओर माले का यह झुकाव एक उदाहरण भी प्रस्तुत करता है: भारत अनुरूपता की मांग नहीं करता, वह विश्वास पैदा करता है. वह निष्ठा लागू नहीं करता, वह संप्रभुता को सशक्त करता है.

द्विपक्षीय संबंधों से आगे: एक इंडो-पैसिफिक मोड़

इस कूटनीतिक पुनर्स्थापन के प्रभाव द्वीपसमूह से कहीं आगे तक जाते हैं. इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के बीच, हर द्वीप का महत्व है. और मालदीव, जो भौगोलिक रूप से छोटा है लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, प्रभाव का एक केंद्रीय बिंदु है.

प्रतीकात्मकता स्पष्ट है: जैसे-जैसे चीनी नौसेना की मौजूदगी जिबूती और ग्वादर में बढ़ रही है, और सोलोमन द्वीप जैसे द्वीप देश बीजिंग की ओर झुक रहे हैं, माले में भारत द्वारा विश्वास की चुपचाप पुनःप्राप्ति एक वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करती है आश्रय नहीं, साझेदारी का.

यह भारत के व्यापक हिंद महासागर नेटवर्क श्रीलंका से लेकर मॉरीशस और सेशेल्स तक को भी स्थिर करने में मदद करता है. बिखरे हुए गठबंधनों और अप्रत्याशित रणनीतिक झुकावों के युग में, संबंधों में निरंतरता भारत की सबसे बड़ी विदेश नीति संपत्ति के रूप में उभर रही है.

निष्कर्ष: छोटा द्वीप, बड़ा संकेत
कई लोगों के लिए मालदीव क्षेत्रीय रणनीति में एक फुटनोट जैसा लग सकता है. लेकिन भू-राजनीति में अक्सर स्थान आकार से बड़ा होता है. भारत की ओर मालदीव का यह रुख केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है, यह रणनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है.

मोदी का माले क्षण दिखाता है कि एक अशांत पड़ोस में भी, धैर्य, साझेदारी और निकटता जीत दिला सकती है. हिंद महासागर केवल भारत का पिछवाड़ा नहीं है, यह तेजी से उसका परीक्षण क्षेत्र बनता जा रहा है. और मालदीव, जो कभी दूर जा रहा था, अब वापस लौट रहा है.

अतिथि लेखक-सिद्धार्थ अरोड़ा
(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए (मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट) हैं, जो वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं. उन्हें अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विदेश नीति में गहरी रुचि है.)

(डिस्क्लेमर : यह लेख केवल सूचना के उद्देश्य से है और किसी भी फंड या वित्तीय उत्पाद में निवेश की सिफारिश नहीं है. लेखक, विनोद के. बंसल, SEBI पंजीकृत निवेश सलाहकार नहीं हैं. पाठकों को किसी भी निवेश निर्णय से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श लेने की सलाह दी जाती है.)


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