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भारत की विकास रणनीति पर पुनर्विचार: क्यों चीन के मॉडल की नकल जनसांख्यिकीय लाभांश को गंवा सकती है

अब इस भ्रम को तोड़ने का समय आ गया है. चीन का उदाहरण सिर्फ एक बार की घटना थी, जो उस समय की भू-राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम थी और इसे दोहराया नहीं जा सकता. भविष्य सेवाओं में है, वे विस्तार योग्य, टिकाऊ और कौशल-आधारित हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

ग्रेट वॉल की छाया में एक दैत्य जाग उठा. पचास साल पहले, जब रिचर्ड निक्सन और हेनरी किसिंजर ने चीन का दरवाज़ा खोला, तो उन्होंने अनजाने में या शायद चतुराई से एक विनिर्माण शक्ति को मुक्त कर दिया जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बदल दिया.

एक पिछड़े कृषि समाज से चीन दुनिया की फैक्ट्री बन गया, जो खिलौनों से लेकर तकनीकी उपकरणों तक सब कुछ बनाता है. आज उसका जीडीपी अमेरिका के लगभग दो-तिहाई के बराबर है, एक चौंकाने वाली छलांग जिसने विकासशील देशों को चकित कर दिया. “अगर चीन कर सकता है,” दिल्ली से डकार तक बोर्डरूम में फुसफुसाहट होती है, “तो हम क्यों नहीं?”

विनिर्माण आधारित विकास का मोहक गीत नौकरियों, निर्यात और समृद्धि का वादा करता है. लेकिन एक पल रुकिए, प्रचार को हटाइए और दरारें देखिए: चीन को आसमान पर पहुंचाने वाला कोई एकल दौड़ नहीं था, बल्कि एक रिले रेस थी जिसमें अमेरिका ने प्रौद्योगिकी, प्रबंधन ज्ञान और खुली बाजार पहुंच का बैटन सौंपा.

आज की विभाजित दुनिया में उसे दोहराना? यह ऐसा है जैसे लेगो से रोमन साम्राज्य को फिर से बनाना, सिद्धांत में आकर्षक और व्यवहार में विनाशकारी.

चीन का उदय स्वाभाविक नहीं था; यह इंजीनियर किया गया था. 1972 के बाद, जब निक्सन की नीतियों ने शीत युद्ध की बर्फ पिघलाई, अमेरिकी कंपनियां पूंजी और विशेषज्ञता लेकर वहां उमड़ पड़ीं. इसे मार्शल प्लान के सीक्वल की तरह समझिए, जिसने यूरोप को फिर से बनाया या जापान के पुनर्निर्माण काल के सुधारों की तरह जिसने उसकी अर्थव्यवस्था को गति दी.

अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने तकनीकी खाके सौंपे, कार्यबल को प्रशिक्षित किया और अपने उपभोक्ता बाजारों के द्वार खोले. चीन के सस्ते श्रम ने बाकी काम किया, पश्चिम में मूल्यह्रास भेजा और ट्रिलियन डॉलर के भंडार जमा किए.

लेकिन अब वैश्विक परिदृश्य बदल चुका है. व्यापार युद्ध जारी हैं, आपूर्ति श्रृंखलाएं भू-राजनीति के बोझ तले बिखर रही हैं और अमेरिका अब उदार सहयोगी नहीं बल्कि सतर्क प्रतिद्वंद्वी बन चुका है, जो टैरिफ और तकनीकी प्रतिबंध लगा रहा है.

भारत जैसे देर से आने वालों के लिए, “मेक इन इंडिया” के चमत्कार का सपना इस हकीकत को नजरअंदाज करता है: किसी महाशक्ति के सहयोग के बिना, विनिर्माण दलदल में फंस जाता है. जलवायु नियम, स्वचालन द्वारा नौकरियों का खत्म होना और बढ़ती मजदूरी इसे रॉकेट नहीं बल्कि अवशेष जैसा बना देती हैं.

पिछले आधे शतक में मूल्य संवर्धन बड़े पैमाने पर सेवाओं की ओर स्थानांतरित हो गया है, जबकि उद्योग और कृषि पिछड़ गए हैं. विश्व बैंक के आंकड़े बताते हैं: सेवाओं का वैश्विक जीडीपी में हिस्सा अब 60 प्रतिशत से अधिक है, जो 1970 के दशक में 50 प्रतिशत था, जबकि विनिर्माण का हिस्सा लगभग 16 प्रतिशत पर स्थिर है.

क्यों? क्योंकि सेवाएं तेजी से बढ़ती हैं, एक बार लिखा गया सॉफ्टवेयर कोड अनंत बार बेचा जा सकता है जबकि फैक्ट्रियों को भूमि, श्रम और लॉजिस्टिक्स चाहिए जो विकास को बाधित करते हैं.

इसका प्रमाण उन दिग्गजों में है जो निक्सन के दौर के बाद उभरे: एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न, अल्फाबेट. ये इस्पात मिल या असेंबली लाइन नहीं हैं; ये बिट्स और बाइट्स पर बने सेवा साम्राज्य हैं. एप्पल का बाजार मूल्य अकेले 3 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है, जो भारत के पूरे जीडीपी के बराबर है.

या यह देखिए: गैरेज और हॉस्टल के कमरों में बिल गेट्स (माइक्रोसॉफ्ट, 1975) या जेफ बेजोस (अमेज़न, 1994) जैसे युवाओं ने ऐसी कंपनियां खड़ी कीं जिनकी आमदनी कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं से अधिक है.

माइक्रोसॉफ्ट की सालाना 280 अरब डॉलर की बिक्री भारत के 250 अरब डॉलर के आईटी निर्यात से भी अधिक है. अल्फाबेट 370 अरब डॉलर, मेटा 410 अरब डॉलर और अमेज़न 600 अरब डॉलर—ये सभी कंपनियां 50 साल से कम पुरानी हैं और एक ऐसे देश से आगे निकल गई हैं जो 80 साल से स्वतंत्र है.

और अब, जब एआई में वैश्विक निवेश 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, सेवाएं एक नई छलांग के लिए तैयार हैं, जबकि विनिर्माण रोबोटों की चुनौती से जूझ रहा है.

अब प्रवेश करता है भारत 1.4 अरब आबादी वाला देश जो दोराहे पर खड़ा है. पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन वर्षों से चेतावनी दे रहे हैं: दांव सेवाओं पर लगाइए, फैक्ट्रियों पर नहीं.

उनका सुझाव है कि भारत को अपनी अंग्रेज़ी बोलने वाली युवा आबादी, डिजिटल समझ और सेवा निर्यात क्षमता का उपयोग कर औद्योगिक दौड़ को पार करना चाहिए. लेकिन प्रतिक्रिया तीखी है. सरकारी प्रवक्ता नाराज, मंत्री आक्रामक उन्हें निराशावादी कहकर खारिज कर देते हैं.

क्योंकि पिछले 11 वर्षों से मंत्र यही है विनिर्माण सर्वोपरि. पीएलआई योजनाएं, औद्योगिक पार्क, सब कुछ. फिर भी, आंकड़े मजाक उड़ाते हैं: विनिर्माण का जीडीपी में हिस्सा 2014 में 16.7 प्रतिशत से घटकर 2024 में 15.9 प्रतिशत हो गया. सेवाओं का हिस्सा 51.7 प्रतिशत से बढ़कर 54.5 प्रतिशत हो गया. कृषि 18.2 से 17.9 प्रतिशत पर आ गई, जो परिपक्व अर्थव्यवस्थाओं की स्वाभाविक दिशा है.

समृद्धि ऐसा ही करती है: अमेरिका में सेवाएं 77 प्रतिशत, जर्मनी में 70 प्रतिशत और चीन में भी अब 53 प्रतिशत हैं. यह अर्थशास्त्र का पहला पाठ है समृद्धि खेतों से कंप्यूटर स्क्रीन तक जाती है.

फिर भी भारतीय नीति निर्माता फैक्ट्री के मोह में फंसे हैं, वास्तविकता से आंखें मूंदे हुए. भारतीय कंपनियां उत्पादन के लिए चीन जाती हैं सस्ता, तेज, भरोसेमंद. परिणामस्वरूप, द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक पहुंच गया और भारत भारी घाटे में है.

अगर एक दशक की प्रोत्साहन योजनाएं भी विनिर्माण को नहीं जगा पाईं, तो अब सच का सामना करने का समय है. राजन निराशा नहीं बेच रहे, वे यथार्थवाद सिखा रहे हैं.

सेवाएं कोई सांत्वना पुरस्कार नहीं हैं वे सोने की खान हैं. भारत का आईटी/बीपीएम क्षेत्र, जो 90 के दशक में शून्य से शुरू हुआ, आज लाखों लोगों को रोजगार देता है और विदेशी मुद्रा कमाता है. फिर भी, 250 अरब डॉलर का यह क्षेत्र अमेरिका की एक कंपनी से भी छोटा है.

कल्पना कीजिए, अगर एआई के साथ इसे बढ़ाया जाए चैटबॉट्स, क्लाउड सेवाएं, डेटा एनालिटिक्स तो भारत वैश्विक शक्ति बन सकता है. लेकिन हम अब भी भूतों का पीछा कर रहे हैंफैक्ट्रियों को सब्सिडी दे रहे हैं जबकि वैश्विक मूल्य श्रृंखलाएं वियतनाम और मैक्सिको की ओर जा रही हैं.

असल त्रासदी यह है कि भारत की आत्म-प्रशंसा मानव संकट को छिपा रही है. हम चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं, 3.5 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी के साथ, लेकिन 1.4 अरब लोगों के साथ प्रति व्यक्ति आय केवल 2,500 डॉलर है, जो अफ्रीका के औसत के बराबर है.

संगठित क्षेत्र केवल 8 प्रतिशत लोगों को रोजगार देता है, बाकी 92 प्रतिशत अस्थिर नौकरियों में हैं. असमानता गहरी है: शीर्ष 3 प्रतिशत यूरोपीय स्तर का जीवन जीते हैं, जबकि 95 प्रतिशत अफ्रीका की औसत आय के आधे पर गुजर-बसर करते हैं.

और जनसांख्यिकीय लाभांश? एक भ्रम. 90 प्रतिशत श्रमिकों के पास केवल प्राथमिक शिक्षा स्तर की योग्यता है. शिक्षा में दशकों की कमी ने एक ऐसी पीढ़ी पैदा की है जो ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए तैयार नहीं है. एआई इंतजार नहीं करेगा यह अकुशल लोगों को अप्रासंगिक बना देगा.

अगर “विकसित भारत 2047” 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और विकसित देश का दर्जा सिर्फ नारा नहीं है, तो हमें अब दिशा बदलनी होगी.

ब्लूप्रिंट? शिक्षा, आदेश नहीं. इसे नवोदय विद्यालयों के मॉडल पर बनाइए: प्रति छात्र सालाना ₹1 लाख खर्च करके समग्र शिक्षा. इसे देशभर में बढ़ाइए, तकनीकी उन्नयन के लिए 25 प्रतिशत अतिरिक्त जोड़िए एआई ट्यूटर, डिजिटल लैब, व्यावसायिक कोडिंग. मौजूदा खर्च? जीडीपी का केवल 3 प्रतिशत वैश्विक औसत का आधा. इसे तीन गुना कीजिए, मात्रा नहीं गुणवत्ता पर ध्यान दीजिए.

स्वतंत्रता से पहले हमने आज़ादी का सपना देखा; 1947 के बाद हमने जनसंख्या बढ़ाई लेकिन समृद्धि नहीं, गरीबी को बनाए रखा. अगर अगले 22 साल भी ऐसे ही चले, तो हम 2047 में उत्सव मनाएंगे, लेकिन भूख और बेरोजगारी के साथ.

अब भ्रम तोड़ने का समय है. चीन का रास्ता दोहराया नहीं जा सकता. सेवाएं ही भविष्य हैं, विस्तार योग्य, टिकाऊ, कौशल-आधारित. राजन की सुनिए, एआई का उपयोग कीजिए, और दिमागों में निवेश कीजिए. वरना फैक्ट्रियों से चिपके रहिए और देखिए कैसे लाभांश जनसांख्यिकीय निराशा में बदल जाता है.

यह केवल विकास मॉडल के बीच की लड़ाई नहीं है; यह दृष्टि और भ्रम के बीच का चुनाव है. भारत, जागो या इतिहास के हाशिए पर खो जाओ.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखकों के निजी हैं और यह आवश्यक नहीं कि प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों. यह पाठकों के लिए संपादकीय निष्पक्षता और स्पष्टता सुनिश्चित करता है.)

 

 

सतीश झा, अतिथि लेखक
(सतीश झा निवेशक, सामाजिक उद्यमी, जनसत्ता और दिनमान के पूर्व संपादक हैं, जिन्होंने भारत में ‘वन लैपटॉप पर चाइल्ड’ परियोजना का नेतृत्व किया और अमेरिका के विद्या भारती फाउंडेशन के बोर्ड में शिक्षा नवाचार को आगे बढ़ा रहे हैं.)


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