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स्थान पर मौजूद व्यक्ति: साहस, निर्णय और नेतृत्व का महत्व
लेखक राघव चंद्र के अनुसार प्रभावी फील्ड प्रशासकों के लिए राजनीतिक मार्गदर्शन की कमी शायद ही कभी कोई दुखद मुद्दा बनती है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 months ago
राघव चंद्र
मिलिट्री कमांडर निस्संदेह फ्रंटलाइन पर असाधारण दुविधाओं का सामना करते हैं, विशेषतः जब ऐसी स्थितियों में व्यापक भू-राजनीतिक प्रभाव निहित हो, लेकिन गौर करने योग्य बात यह है कि नागरिक जीवन में भी प्रशासनिक अधिकारी नियमित रूप से कठिन चुनौतियों का सामना करते हैं, जिनका गहरा स्थानीय राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव होता है, भले ही उनका स्तर अंतरराष्ट्रीय न हो.
प्रभावी फील्ड प्रशासकों के लिए राजनीतिक मार्गदर्शन की कमी शायद ही कभी कोई दुखद मुद्दा बनती है. अक्सर वे राजनीतिक निगरानी की अधिकता पर ही अफसोस जताते हैं, जो उनकी त्वरित समाधान देने और मिशनों को तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचाने की क्षमता को सीमित करती है. इस संदर्भ में ‘स्थान पर मौजूद व्यक्ति’ का राजनीतिक और प्रशासनिक विज्ञान में केंद्रीय स्थान है.
जमीनी सच्चाई का सूक्ष्म मूल्यांकन और प्रत्यक्ष अवलोकन के आधार पर सामरिक रणनीति तैयार करने की क्षमता अत्यंत मूल्यवान है. नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री फ्रेडरिक हायेक ने अपने प्रसिद्ध लेख “द यूज ऑफ नॉलेज इन सोसाइटी” में ‘स्थान पर मौजूद व्यक्ति’ की अंतर्दृष्टि की अपूरणीय महत्ता पर प्रकाश डाला है.
विश्वास, जिम्मेदारी और नेतृत्व
तकनीकी रूप से यदि दुश्मन की अनाधिकृत घुसपैठ की स्थिति में राजनीतिक नेतृत्व सैन्य कमांडर से कहे कि जो तुम्हें उचित लगे वही करो, तो यह जिम्मेदारी से पलायन नहीं है. इसे कमांडर की क्षमता में विश्वास के रूप में देखा जाना चाहिए. यह उसके निर्णय की पूर्व स्वीकृति भी है, जो जमीन की वास्तविक स्थिति के आधार पर प्रतिक्रिया की तीव्रता और स्वरूप निर्धारित करेगा.
‘स्थान पर मौजूद व्यक्ति’ को बदलती परिस्थितियों में आवश्यक कदम दृढ़ता से उठाने चाहिए, न कि शीर्ष नेतृत्व की औपचारिक मंजूरी का इंतजार करना चाहिए. इससे नेतृत्व को व्यापक रणनीति बनाने का समय मिलता है. उदाहरणस्वरूप यदि दुश्मन के टैंक LOC के निकट आ जाएं तो संतुलित और संकेतात्मक सैन्य प्रदर्शन से स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है.
इतिहास से मिलते उदाहरण
इतिहास ऐसे अनेक उदाहरण प्रस्तुत करता है जब फील्ड कमांडरों को समय पर निर्देश नहीं मिले. नेपोलियन युद्धों के दौरान कोपेनहेगन की लड़ाई में एडमिरल नेल्सन ने अपने वरिष्ठ के हमले रोकने के संकेत की अनदेखी कर निर्णायक विजय प्राप्त की.
फिल्म “द मैन हू सेव्ड द वर्ल्ड” में कर्नल स्टैनिस्लाव पेट्रोव का उल्लेख है, जिन्होंने परमाणु चेतावनी के बावजूद जवाबी हमला करने से इनकार किया और संभावित विश्व युद्ध टाल दिया. उनकी सूझबूझ ने स्थापित प्रोटोकॉल से ऊपर उठकर सही निर्णय लिया.
अपोलो 11 के चंद्र अवतरण के दौरान अलार्म बजने पर एक तकनीशियन ने तत्काल निर्णय लिया कि यह तकनीकी त्रुटि है, जिससे ऐतिहासिक मिशन सफल हुआ. अपोलो 13 में भी औपचारिक स्वीकृति की प्रतीक्षा किए बिना इंजीनियरों ने समाधान निकालकर अंतरिक्ष यात्रियों की जान बचाई.
साहस और त्वरित निर्णय के आधुनिक उदाहरण
9/11 के दौरान मॉर्गन स्टैनली के सुरक्षा प्रमुख रिक रेस्कॉरला ने आधिकारिक आदेशों की प्रतीक्षा न कर कर्मचारियों को सुरक्षित बाहर निकाला.
भारत में 26/11 मुंबई हमलों के दौरान मेजर संदीप उन्नीकृष्णन ने अपने सैनिकों को बचाते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया. पंजाब में आतंकवाद विरोधी अभियान के दौरान केपीएस गिल और वीरप्पन के खिलाफ अभियान में के विजय कुमार ने निर्णायक और स्वतंत्र निर्णयों से सफलता प्राप्त की.
कारगिल युद्ध में कैप्टन विक्रम बत्रा ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति बनाकर पॉइंट 5140 पर कब्जा किया. 2018 केरल बाढ़ में मछुआरों ने त्वरित निर्णय लेकर हजारों लोगों की जान बचाई.
सिविल प्रशासन में स्थानीय पहल की आवश्यकता
लोक प्रशासन में भी कठिन फील्ड निर्णय अक्सर तब सफल होते हैं जब अधिकारी स्थानीय स्तर पर स्वतंत्र निर्णय लेते हैं. अवैध अतिक्रमण हटाने, सार्वजनिक शांति बनाए रखने और प्रशासनिक सुधार लागू करने में यही दृष्टिकोण प्रभावी सिद्ध हुआ है.
जगमोहन, एमएन बुख, टीएन शेषन, एसआर शंकरन, जेबी डिसूजा, केजे अल्फोंस और किरण बेदी जैसे अधिकारियों ने दिखाया कि व्यक्तिगत पहल प्रशासनिक सफलता की कुंजी है.
यदि भीड़ किसी धार्मिक स्थल पर हमला करने वाली हो तो सक्षम प्रशासक राजनीतिक आदेश की प्रतीक्षा नहीं करेगा, बल्कि कानून और व्यवस्था बनाए रखने हेतु आवश्यक कदम उठाएगा.
राजनीतिक निगरानी और प्रशासनिक स्वायत्तता
1980 के दशक में 20 सूत्री कार्यक्रम के तहत प्रशासनिक अनुशासन की अवधारणा लाई गई थी. उद्देश्य दक्षता बढ़ाना था, किंतु अत्यधिक राजनीतिक हस्तक्षेप ने कई बार प्रशासनिक स्वतंत्रता को प्रभावित किया. पंचायत से संसद तक शिकायतों की सीधी व्यवस्था ने फील्ड अधिकारियों पर अतिरिक्त दबाव डाला.
अत्यधिक राजनीतिक निगरानी ने निष्पक्ष प्रशासनिक निर्णय क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डाला है.
भविष्य की चुनौतियाँ और निष्कर्ष
सरकारों के लिए आवश्यक है कि वे प्रोटोकॉल की समीक्षा करें और फील्ड कमांडरों की त्वरित निर्णय लेने की क्षमता को सुदृढ़ करें. विशेषकर आधुनिक युद्ध और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में गति, चतुराई और स्थान पर निर्णय लेने की क्षमता निर्णायक होगी.
राष्ट्र अपने सैनिकों और लोक सेवकों के योगदान का सम्मान करता है. परंतु बदलते समय में स्थान पर मौजूद व्यक्ति की सूझबूझ और साहस ही संकट की घड़ी में वास्तविक अंतर पैदा करेगा.
अतिथि लेखक - राघव चंद्र
(लेखक भारत सरकार के पूर्व सचिव और आईआईएम कलकत्ता में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस हैं.)
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