होम / एक्सपर्ट ओपिनियन / विदेशी निवेशकों की बेरुखी, व्यापार घाटा और बेरोजगारी बन रहे संकट!
विदेशी निवेशकों की बेरुखी, व्यापार घाटा और बेरोजगारी बन रहे संकट!
मौजूदा दौर में सरकार को निर्यात में बढ़ोत्तरी के मोर्चे पर और भी ऊर्जा लगाने की जरूरत है. प्रति व्यक्ति जीडीपी में सुधार की बहुत जरूरत है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
- अजय शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार
वाणिज्य मंत्रालय ने चालू वित्तवर्ष 2022 की पहली छमाही की अवधि के लिए देश में विदेशी निवेश (FDI) के आंकड़े जारी किए, जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक और चुनौती खड़ी कर दी है. आंकड़ों से स्पष्ट है कि विदेशी निवेश में तेज गिरावट आने से समर्थक पूंजी की उपलब्धता नहीं रही. इस छमाही में एफडीआई 26.9 अरब डॉलर की रही जबकि पिछले वित्तीय वर्ष में कोरोना संकट के बावजूद यह राशि 31.2 अरब डॉलर रही थी. स्पष्ट है कि विदेशी निवेशकों में भारतीय बाजार में रुचि घट रही है. सालाना आधार पर 14 फीसदी की यह गिरावट क्रमिक गिरावट को दर्शाती है. जहां व्यापार घाटा बढ़ रहा हो, वहां यह गिरावट चिंता को बढ़ानी वाली है.
पूंजी प्रवाह में तेज गिरावट
चालू वित्तीय वर्ष में पहली छमाही में व्यापार वृद्धि उत्साहजनक नहीं रही है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में भी गिरावट आई है. इक्विटी में विदेशी पूंजी पिछले साल की पहली छमाही की तुलना में एक-चौथाई कम हुई है. पूंजी प्रवाह में तेज गिरावट इस बात का संकेत है कि मजबूती का अनुमान अनुचित है. वैश्विक वृहद आर्थिक स्थिति हमारे देश के लिए प्रतिकूल हो गई है, जो अपनी आर्थिक स्थिरता के लिए पूंजी के निरंतर प्रवाह पर निर्भर है. वहीं, ब्याज दरों में सख्ती से विकसित देशों में पूंजी की लगातार वापसी हो रही है. उच्च ब्याज दरें, विकसित देशों में मांग कम करेंगी, जिससे भारतीय उत्पादों की निर्यात मांग कम होगी. यही वजह है कि हम लगातार देख रहे हैं कि व्यापार संतुलन नकारात्मक रूप से प्रभावित हो रहा है.
जारी है रुपए की गिरावट
चालू वित्त वर्ष 2022-23 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2.8 प्रतिशत हो गया था. मंत्रालय का मानना है कि पूरे साल के लिए चालू खाते का घाटा तीन फीसदी से अधिक हो सकता है. अर्थ विशेषज्ञों का मानना है कि यह घाटा 3.5 फीसदी हो जाएगा, जो 40 से 50 अरब डॉलर का कुल घाटा दर्शाता है. रुपए की गिरावट लगातार जारी है. चालू खाता बढ़ने से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बना हुआ है, हालांकि पिछले महीने के मुकाबले उसमें बढ़ोत्तरी हुई है. भारतीय रिजर्व बैंक विकल्पों से जूझ रहा है. केंद्रीय सरकार को इस दिशा में सकारात्मक काम करने की जरूरत है, मगर वह बहुत सार्थक नहीं दिखती है. विदेशी निवेश को लाने के लिए कोई बड़ी नीति भी नहीं है. उत्पादक बनने के साथ ही निर्यात-केंद्रित अर्थव्यवस्था बनाना भी उसकी जिम्मेदारी है.
कर्ज को बना रहे सहारा
हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर कदम बढ़ाते जा रहे हैं, मगर इसके लिए कर्ज को सहारा बना रहे हैं. देश के बड़े पूंजी घराने भारी सार्वजनिक कर्ज के सहारे खड़े हैं. वैश्विक मांग में गिरावट हमारे देश के निर्यात पर नकारात्मक असर डाल रही है. निर्यात सालाना आधार पर 16.65 फीसदी घटकर 29.78 अरब डॉलर रह गया, जिससे व्यापार घाटा बढ़कर 26.91 अरब डॉलर हो गया है. आयात छह फीसदी बढ़कर 56.69 अरब डॉलर हो गया. पहली छमाही (अप्रैल-अक्टूबर, 2022) में व्यापार घाटा 173.46 अरब डॉलर हो गया है. वैश्विक अनिश्चितता के नकारात्मक दबाव को भारत में सीमित करने के लिए कई स्तरों पर नीतिगत व्यवस्थाएं करने की आवश्यकता है. सितंबर माह में कोर क्षेत्रों में उत्पादन 7.9 फीसदी रहा, जो उम्मीद को मजबूत करता है मगर इसका कारण त्योहारी मौसम था.
घटते रोजगार के अवसर
अनुउत्पादक आबादी का लगातार बढ़ना और रोजगार के अवसरों का घटना देश की अर्थव्यवस्था के लिए संकट है. ऐसी दशा में विदेशी निवेश में गिरावट से घरेलू उद्योगों और उत्पादन पर अगली तिमाही पर नकारात्मक असर पड़ना लाजिमी है. अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों में भारी वृद्धि ने डॉलर को मजबूत किया है, जिससे रुपया कमजोर हुआ है. दैनिक उपभोग का सामान (एफएमसीजी) बनाने वाली कंपनियां सर्दी के उत्पादों की बढ़ी मांग से उत्साहित हैं. उन्हें उम्मीद है कि सर्दियां बढ़ने के साथ ही मांग गति पकड़ेगी. कंपनियों को फसल अच्छी रहने की उम्मीद और मुद्रास्फीति में नरमी से आगामी तिमाहियों में बिक्री बढ़ने की उम्मीद है. ई-कॉमर्स और तकनीकी व्यापार माध्यमों से उत्पादों की बिक्री अच्छी रहने की उम्मीद है. इसका लाभ यह हुआ कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) फिर भारतीय शेयर बाजारों में लौटने लगे हैं. नवंबर माह के आखिरी सप्ताह तक इन निवेशकों ने शेयर बाजारों में 31,630 करोड़ रुपये डाले हैं.
प्रति व्यक्ति जीडीपी में सुधार जरूरी
मौजूदा दौर में सरकार को निर्यात में बढ़ोत्तरी के मोर्चे पर और भी ऊर्जा लगाने की जरूरत है. प्रति व्यक्ति जीडीपी में सुधार की बहुत जरूरत है क्योंकि जब तक उसमें सुधार नहीं होगा, तब तक उसकी खरीद क्षमता नहीं बढ़ेगी. विकसित भारत बनने के लिए प्रति व्यक्ति जीडीपी को मजबूत करना बेहद जरूरी है. लगातार सात फीसदी की दर से प्रति व्यक्ति जीडीपी रहने पर 2047 में देश में प्रति व्यक्ति जीडीपी 10 हजार डालर सालाना होगी. ब्रिटेन की प्रति व्यक्ति जीडीपी अभी भी 47 हजार डालर प्रति वर्ष से अधिक है, जबकि भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी 2,500 डालर ही है. हमारी आबादी का ब्रिटेन के मुकाबले 20 गुना अधिक होने से हालात खराब हैं. प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में भारत की रैंकिंग 205 देशों में 158 है.
सरकार को ये काम करने होंगे
इन हालात और सरकारी आंकड़ों से स्पष्ट है कि सरकार को आर्थिक हालात और विकास दर को सुधारने के लिए रोजगार पर काम करने की जरूरत है. सरकारी तंत्र में पारदर्शिता और स्पष्टता बेहद जरूरी है. विदेशी पूंजी की जरूरत बहुत होती है, मगर उसके लिए बाजार और उत्पादन दोनों को यकीनी बनाना बेहद जरूरी है. इस मामले में हमें अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी की अर्थव्यवस्था से सीखने की जरूरत है. उन देशों ने सही दिशा में कदम उठाये तो आज जापान दुनिया में उच्चतम गुणवत्ता की उपभोक्ता वस्तुएं बनाने वाले देशों में शुमार है.
टैग्स