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नोबेल ट्रोजन हॉर्स: कैसे वेनेजुएला ने अमेरिकी शासन को दी मात

2025 में नोबेल शांति पुरस्कार वेनेज़ुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना माचाडो को दिया गया, जिससे पूरे लैटिन अमेरिका में विवाद खड़ा हो गया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 10 months ago

राकेश कृष्णन सिम्हा

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के एक चौंकाने वाले मोड़ पर, वेनेज़ुएला की लंबे समय से विपक्षी नेता रही और अमेरिकी हस्तक्षेप की प्रबल समर्थक मारिया कोरीना माचाडो को 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने से लैटिन अमेरिका और अन्य क्षेत्रों में तीव्र आक्रोश फैल गया है. पश्चिम ने उन्हें लोकतंत्र के लिए संघर्ष का प्रतीक बताया है, लेकिन वेनेज़ुएला के भीतर कई लोग इस पुरस्कार को वाशिंगटन द्वारा वर्षों की विफलताओं के बाद शासन परिवर्तन को वैध ठहराने की एक आखिरी कोशिश मानते हैं. वहीं वैश्विक दक्षिण की दृष्टि में यह क्षण पश्चिमी कूटनीति की कोई जीत नहीं, बल्कि मोनरो सिद्धांत के अंत की शुरुआत है.

समय में पीछे: असफल तख्तापलट

वर्तमान राजनीतिक माहौल को समझने के लिए अप्रैल 2002 में वापस चलते हैं, जब एक अमेरिकी समर्थित तख्तापलट ने वेनेज़ुएला के निर्वाचित समाजवादी नेता ह्यूगो शावेज को कुछ समय के लिए हटा दिया था. तब लीक हुए CIA दस्तावेजों के जरिए उजागर हुआ कि यह साजिश व्यापारिक अभिजात वर्ग और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों द्वारा रची गई थी. लेकिन यह सिर्फ 48 घंटों में ही विफल हो गई. लाखों वेनेज़ुएलावासियों ने सड़कों पर उतरकर विरोध किया. क्यूबा की खुफिया सहायता से वफादार सैन्य गुटों ने विदेशी एजेंटों की पहचान कर ली और शावेज को सत्ता में वापस ला दिया.

यह अमेरिका के लिए पहला सबक था: वेनेज़ुएला कोई आसान लक्ष्य नहीं है.

अधिकतम दबाव, न्यूनतम परिणाम

2019 में डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने अपने "अधिकतम दबाव" अभियान को तेज कर दिया. वेनेज़ुएला के तेल उद्योग पर भारी प्रतिबंध लगाए गए, विदेशों में अरबों डॉलर की संपत्ति जब्त की गई और राष्ट्रपति मादुरो और उनके करीबी सहयोगियों पर इनाम घोषित किए गए. लक्ष्य सीधा था: अर्थव्यवस्था को तोड़ना ताकि शासन परिवर्तन हो सके.

लेकिन यह रणनीति अपेक्षित परिणाम नहीं ला पाई. 2013 से 2023 तक वेनेज़ुएला की GDP 75 प्रतिशत से अधिक गिर गई, फिर भी मादुरो सत्ता में बने रहे. खाद्य संप्रभुता कार्यक्रमों ने 70 लाख लोगों को सहारा दिया. रूस, चीन और ईरान के साथ नए गठबंधनों से सैन्य और वित्तीय समर्थन मिला. वेनेज़ुएला को अलग-थलग करने की कोशिश ने उल्टा असर किया और वह एक उभरती बहुध्रुवीय दुनिया की ओर मुड़ गया.

निर्मित मसीहा: मारिया कोरीना माचाडो

अब वेनेज़ुएला की विपक्ष का चेहरा बनीं मारिया कोरीना माचाडो को अमेरिका समर्थित राजनैतिक परियोजना का प्रतीक माना जा रहा है. 2002 के असफल तख्तापलट की मुखर समर्थक और वॉशिंगटन के प्रभावशाली नेताओं जैसे सीनेटर मार्को रुबियो की करीबी मानी जाने वाली माचाडो को उनके पूर्ववर्ती राजद्रोही कृत्यों के कारण 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में भाग लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया था. इसके बाद उन्होंने विपक्ष की ओर से एडमुंडो गोंजालेज को एक वैचारिक और राजनीतिक प्रतिनिधि (छद्म उम्मीदवार) के रूप में प्रस्तुत किया.

बाइडन प्रशासन का 2023 बारबाडोस समझौता, जिसमें "स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों" के बदले कुछ प्रतिबंध हटाने की बात थी, आलोचकों के अनुसार एक ट्रोजन हॉर्स था. माचाडो की विचारधारा के तहत विपक्ष को एकजुट कर अमेरिका ने किसी भी मादुरो जीत को पहले से ही अवैध घोषित करने की नींव रख दी थी, परिणाम चाहे जो भी हो.

28 जुलाई 2024 को वेनेज़ुएला में मतदान हुआ. लीक हुए आंकड़ों में गोंजालेज को 67 प्रतिशत और मादुरो को 31 प्रतिशत वोट बताए गए. लेकिन आधिकारिक चुनाव परिषद, जो मादुरो के प्रति वफादार है, ने मादुरो को 51 प्रतिशत के संकीर्ण अंतर से विजेता घोषित कर दिया. अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने तुरंत इस पर आपत्ति जताई. विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. कम से कम 24 लोग मारे गए और लगभग 2,000 को गिरफ्तार किया गया.

सोशल मीडिया पर गलत सूचना की बाढ़ आ गई, पुराने दंगों के फुटेज को “ताजा” अराजकता के रूप में दिखाया गया. रंग क्रांति की पूरी रणनीति अपनाई गई.

वह तख्तापलट जो हुआ ही नहीं

मादुरो के प्रति व्यापक असंतोष के बावजूद 63 प्रतिशत वेनेज़ुएलावासी उन्हें अवैध मानते थे, कोई जनविद्रोह नहीं हुआ. वेनेज़ुएला की सेना वफादार बनी रही. रूसी-निर्मित S-300 मिसाइल रक्षा प्रणालियों की मौजूदगी ने किसी भी प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप को रोक दिया. ब्राजील और कोलंबिया ने अमेरिकी पाले में जाने के बजाय कूटनीति चुनी. BRICS देशों ने वेनेज़ुएला का साथ दिया, तेल की छूट वाली खरीदारी की और राजनीतिक समर्थन प्रदान किया.

गोंजालेज को अमेरिका द्वारा मान्यता देने का प्रयास विफल हो गया. सैन्य समर्थन और आंतरिक समर्थन के अभाव में वह स्पेन में निर्वासन में चला गया.

नोबेल चाल: एक हथियारबंद पुरस्कार

फिर आया 10 अक्टूबर 2025. एक ऐसा निर्णय जो भू-राजनीतिक पर्यवेक्षकों को बिल्कुल भी आश्चर्यचकित नहीं करता, नोबेल समिति ने माचाडो को शांति पुरस्कार से सम्मानित किया. निर्वासन में पुरस्कार स्वीकार करते हुए, उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को उनके "निर्णायक समर्थन" के लिए धन्यवाद दिया और इस क्षण को "स्वतंत्रता का सबसे बड़ा अवसर" बताया.

लेकिन वेनेज़ुएला के भीतर, यह कदम उलटा पड़ गया. व्यापक रूप से वाशिंगटन द्वारा प्रायोजित एक प्रचार स्टंट के रूप में देखी गई इस जीत ने माचाडो की छवि को और भी अधिक अमेरिकी कठपुतली के रूप में मजबूत किया. बहुतों के लिए यह इस बात की पुष्टि थी जो वे पहले से ही मानते थे: यह पुरस्कार शांति के लिए नहीं, बल्कि राजनीति के लिए था. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा नोबेल समिति के साथ गुप्त लॉबिंग ने यह सुनिश्चित किया कि पुरस्कार माचाडो को मिले, जिससे लैटिन अमेरिका के वे देश और अधिक अलग-थलग महसूस करने लगे जिन्होंने लंबे समय से अमेरिकी हस्तक्षेप का सामना किया है.

प्रतिबंध, पनडुब्बियां और संप्रभुता

2025 में प्रतिबंधों ने वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था को दबाए रखा. मुद्रास्फीति 200 प्रतिशत के पार चली गई. लेकिन वैश्विक परिदृश्य बदल चुका था. भारत ने द्वितीयक प्रतिबंधों की अवहेलना करते हुए तेल आयात बढ़ा दिया. रूस ने वेनेज़ुएला के तट पर पनडुब्बियों की तैनाती की. क्यूबा की खुफिया एजेंसी ने अमेरिकी जासूसों और मादुरो के भीतरघाती सदस्यों की पहचान कर उन्हें समाप्त किया. अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप का खतरा बना रहा, लेकिन लागत बहुत अधिक मानी गई.

मादुरो सत्ता में बने रहे, यद्यपि कई बार घायलों की तरह दबे, फिर भी अडिग रहे. दो दशकों से अधिक समय तक अमेरिका ने हर संभव हथकंडा अपनाया आर्थिक घेराबंदी, तख्तापलट, मीडिया युद्ध, गुप्त तोड़फोड़ और राजनयिक अलगाव, लेकिन बिना जमीनी हस्तक्षेप के कोई जीत हासिल नहीं हो सकी.

इसके विपरीत, इस संघर्ष ने 21वीं सदी की भू-राजनीति का एक महत्वपूर्ण पाठ प्रस्तुत किया. यह साफ हो गया कि जन जागरूकता, वफादार संस्थान और वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को भी परास्त कर सकते हैं.

मोनरो सिद्धांत, जो लंबे समय से लैटिन अमेरिका में अमेरिकी प्रभुत्व की नीति रही है अब जीवन रक्षक प्रणाली पर है.

यह अब स्पष्ट है कि सबसे शक्तिशाली महाशक्ति भी एक संकल्पित जनता को अंतरराष्ट्रीय समर्थन के साथ नहीं हरा सकती. वेनेज़ुएला अब उन देशों की सूची में शामिल हो गया है, वियतनाम, अफगानिस्तान, इराक, जिन्होंने अमेरिकी हस्तक्षेपवाद का विरोध किया.

अब आगे क्या?

क्या ट्रंप 2.0 पहले से भी कड़े कदम उठाएंगे? या फिर BRICS+, गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों और साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों से उत्पन्न हो रहा बहुध्रुवीय आदेश संवाद का एक नया युग लाएगा?

जो भी हो, वेनेज़ुएला की दृढ़ता ने रणभूमि को बदल दिया है. नोबेल शांति पुरस्कार, जो कभी सॉफ्ट पावर की सर्वोच्च उपलब्धि माना जाता था, अब शायद पश्चिम की एक और चूक बन गया है.

दुनिया इसे शांति के उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि एक विफल शासन परिवर्तन गाथा के अंतिम अध्याय के रूप में याद रख सकती है.

(डिस्क्लेमर :  इस लेख में प्रकट किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं और यह जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को भी दर्शाते हों.)

राकेश कृष्णन सिम्हा, अतिथि लेखक व स्तंभकार

(राकेश कृष्णन सिम्हा न्यूजीलैंड-आधारित रक्षा विश्लेषक हैं. उनके लेख प्रमुख थिंक टैंकों द्वारा प्रकाशित किए गए हैं और उन्हें कूटनीति, counter-terrorism (आतंकवाद विरोध), युद्धकला और आर्थिक विकास पर लिखी गई कई पुस्तकों में व्यापक रूप से उद्धृत किया गया है. उनके लेख हिंदुस्तान टाइम्स (नई दिल्ली), फाइनेंशियल एक्सप्रेस (नई दिल्ली), यूएस एयर फोर्स सेंटर फॉर अनकन्वेंशनल वेपन्स स्टडीज (अलाबामा), सेंटर फॉर लैंड वॉरफेयर स्टडीज (नई दिल्ली), और रशिया बियॉन्ड (मॉस्को) सहित कई प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रकाशित हो चुके हैं. वह ट्विटर पर @byrakeshsimha हैंडल से ट्वीट करते हैं.

 

 

 

 

 


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