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नई मध्य एशिया प्रतिस्पर्धा: क्यों भारत चाबहार दशक नहीं खो सकता

लेखिका के अनुसार अगर भारत अगले दस वर्षों में चाबहार को एक राष्ट्रीय मिशन की तरह नहीं अपनाता, तो वह यूरेशियाई भूभाग से कटकर सिर्फ समुद्री शक्ति बनकर रह जाएगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 11 months ago

कई वर्षों तक, मध्य एशिया भारत की रणनीतिक कल्पना में सांस्कृतिक स्मृति और शांत अवसरों का क्षेत्र रहा, एक ऐसा क्षेत्र जो महत्वपूर्ण तो था, लेकिन हमेशा बाद में, वह सुविधा अब समाप्त हो चुकी है. फारस की खाड़ी से लेकर पामीर पर्वतों तक फैला भू-राजनीतिक मानचित्र असाधारण गति से पुनर्संरचित हो रहा है. ईरान नए आत्मविश्वास के साथ क्षेत्रीय कूटनीति में लौट रहा है. तालिबान अपने साझेदारों के लिए अफगान व्यापार मार्गों को फिर से खोल रहा है और रूस तथा चीन यूरेशियाई गलियारे में अपनी रणनीतिक और लॉजिस्टिक प्रभुत्व को एकीकृत कर रहे हैं.

इस नई प्रतिस्पर्धा में भारत के लिए रणनीतिक गुंजाइश नाटकीय रूप से घट गई है. लंबे समय से विलंबित और अनियमित रूप से समर्थित चाबहार अब मध्य एशिया में प्रवेश करने का भारत के पास बचा एकमात्र यथार्थवादी द्वार है. यदि अगले दस वर्ष भारत का “चाबहार दशक” नहीं बने, तो यह क्षेत्र व्यावहारिक रूप से भारत की भौतिक पहुंच से बाहर हो सकता है.

परिवर्तनशील क्षेत्र

भारत को समझने वाली पहली वास्तविकता यह है कि घड़ी पहले ही शुरू हो चुकी है. वर्षों के प्रतिबंधों के बावजूद ईरान अब अलग-थलग नहीं है. उसने सऊदी अरब के साथ संबंधों में सुधार किया है. मॉस्को और बीजिंग के साथ अपने संबंधों को और मजबूत किया है. और उभरते हुए यूरेशियाई लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में खुद को अधिक गहराई से शामिल किया है. अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC), जिसे कभी काल्पनिक माना जाता था, अब रूस और ईरान द्वारा पश्चिम-प्रभुत्व वाले चोकप्वाइंट्स के मुकाबले प्रतिबंध-प्रतिरोधी विकल्प के रूप में क्रियान्वित किया जा रहा है.

उधर, अफ़ग़ानिस्तान अपने बाहरी संबंधों का पुनर्संयोजन कर रहा है. चीनी निवेश के लिए उसका दोबारा खुलना, रूस और ईरान-समर्थित व्यापार गलियारों में उसकी भागीदारी, और CPEC के विस्तार की संभावना ने क्षेत्रीय वाणिज्य के प्रवाह को ऐसी दिशाएँ देना शुरू कर दिया है जो भारत को बाहर रखती हैं.

इसका सम्मिलित प्रभाव सरल है: यदि भारत ईरान में खुद को स्थिर नहीं करता, तो वह यूरेशियाई भूभाग से कटा हुआ एक समुद्री शक्ति बना रहेगा, एक कमजोरी जिसका पाकिस्तान दशकों से लाभ उठाता आया है.

आइनी एयर बेस: एक रणनीतिक क्षति जिसकी पुनरावृत्ति भारत नहीं झेल सकता

ताजिकिस्तान में आइनी एयर बेस पर भारत की उपस्थिति की कहानी को एक रणनीतिक अध्ययन के रूप में देखा जाना चाहिए. कारगिल युद्ध में ऊँचाई वाले इलाकों में भारत की लड़ाकू क्षमताओं की गंभीर सीमाएँ उजागर होने के बाद नई दिल्ली ने आइनी बेस को उन्नत करने में भारी निवेश किया. यह भारत की एकमात्र विदेशी सैन्य सुविधा थी, एक मंच जहाँ वायु दलों को प्रशिक्षित किया जाता था. ऊँचाई वाले युद्ध की तत्परता को परखा जाता था. और अफ़ग़ानिस्तान तथा पश्चिमी चीन से सटे क्षेत्र में भारत की एक छोटी लेकिन सार्थक उपस्थिति बनी रहती थी.

लेकिन नौकरशाही झिझक, रूस द्वारा परिचालन नियंत्रण जताने, और लगातार राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण भारत अपनी पहुंच नवीनीकृत करने का अवसर खो बैठा. आज आइनी हाथ से निकल चुका है. जब चीन निगरानी तंत्र से लेकर दोहरे-उपयोग वाली सुविधाओं तक मध्य एशिया में अपनी सुरक्षा उपस्थिति बढ़ा रहा है, ऐसे समय में भारत की अनुपस्थिति स्पष्ट और महंगी है.

सवाल यह है कि क्या भारत चाबहार को भी उसी राह पर जाने देगा.

क्यों चाबहार भारत का अपरिहार्य रणनीतिक स्तंभ बनना चाहिए

भारत को अब यह धारणा छोड़नी होगी कि चाबहार एक भावनात्मक या प्रतीकात्मक परियोजना है. इसका महत्व संरचनात्मक है. पहला, रूस और चीन मध्य एशियाई लॉजिस्टिक्स पर अपना नियंत्रण सुदृढ़ कर रहे हैं. यदि INSTC मॉस्को–तेहरान–बीजिंग गठजोड़ का नेटवर्क बन जाता है और भारत की सार्थक भागीदारी नहीं होती, तो नई दिल्ली के क्षेत्रीय कनेक्टिविटी ढाँचे से स्थायी रूप से बाहर होने का जोखिम रहेगा.

दूसरा, अफ़ग़ानिस्तान की नई आर्थिक स्थिति उन देशों को प्राथमिकता देती है जो वहाँ सक्रिय रूप से उपस्थित हैं. चीन और पाकिस्तान CPEC के विस्तार को तेजी से काबुल तक ले जा रहे हैं. वहीं, भारत उन अफ़ग़ान व्यापारियों की नई पीढ़ी के लिए एक दूर की याद बनता जा रहा है जो अब अन्य गलियारों से व्यापार कर रहे हैं.

तीसरा, भारत की उत्तरी सैन्य मुद्रा को गहराई की आवश्यकता है. आइनी के खोने से ऊँचाई पर प्रशिक्षण का वह वातावरण समाप्त हो गया जब भारत हिमालय सीमा पर अधिक आक्रामक और कठोर चीन का सामना कर रहा है. हालांकि चाबहार एक सैन्य सुविधा नहीं है, लेकिन यह जिन रणनीतिक गलियारों को खोलता है वे दीर्घकालिक प्रभाव और आकस्मिक योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण हैं.

इसलिए चाबहार केवल मध्य एशिया तक पहुंच का प्रश्न नहीं है, बल्कि इस बात का कि भारत अपनी महाद्वीपीय रणनीति बनाए रख सके.

भारत को क्या करना चाहिए, कभी नहीं, अभी

एक विश्वसनीय चाबहार दशक के लिए अनियमित सहभागिता से अनुशासित रणनीति की ओर बदलाव आवश्यक है.

चाबहार को दशक-भर के राष्ट्रीय मिशन की तरह देखें : भारत प्रतिबंधों की अनिश्चितता को निष्क्रियता का आसान बहाना नहीं बनने दे सकता. चाबहार को औपचारिक सुरक्षा, निरंतर वित्तपोषण और उच्च-स्तरीय राजनीतिक ध्यान की आवश्यकता है.

INSTC को औपचारिक नहीं, वास्तविक माल ढुलाई से संचालित करें : लॉजिस्टिक्स में महत्व भौतिक उपस्थिति से आता है. भारत को विश्वसनीय रूप से वास्तविक ट्रैफिक दिखाना होगा.

मध्य एशिया में सुरक्षा साझेदारियाँ फिर से बनाएं : उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान और कज़ाख़स्तान विविध साझेदारियाँ खोज रहे हैं. भारत को वह निष्क्रियता नहीं दोहरानी चाहिए जिसने आइनी को खो दिया.

झिझक की कीमत

भारत का रणनीतिक परिदृश्य दूसरों द्वारा पुनर्संरचना किया जा रहा है, नई दिल्ली की अपेक्षा से कहीं तेज और उसकी प्रतिक्रिया से कहीं अधिक निर्णायक रूप से, आइनी इसलिए खो गया क्योंकि भारत झिझका. चाबहार इसलिए खो जाएगा यदि भारत सोया रहा. अगले दस वर्ष तय करेंगे कि भारत यूरेशिया का हितधारक बनता है या रूसी, चीनी और पाक-नियंत्रित गलियारों के पीछे अपनी पहुंच सिकुड़ते हुए देखने वाला दर्शक.

चयन स्पष्ट है: उपस्थिति के माध्यम से नेतृत्व करो, या स्वचालित रूप से पीछे हट जाओ. मध्य एशिया के नए महान खेल में अनुपस्थित के लिए कोई सांत्वना पुरस्कार नहीं है.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

सिद्धार्थ अरोड़ा, अतिथि लेखक

(सिद्धार्थ अरोड़ा एक मैकेनिकल इंजीनियर और एमबीए (मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट) हैं, जो वर्तमान में डेलॉइट में एआई/एमएल प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों व विदेश नीति में गहरी रुचि रखते हैं.)

 


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