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भारत का आगामी सीसीयूएस मिशन: क्या आ रहा है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

सीसीयूएस न केवल भारत की नेट-जीरो यात्रा को गति देगा, बल्कि “मेक इन इंडिया” और “ग्रीन ग्रोथ” की दृष्टि को भी मजबूती देगा. यह मिशन भारत के लिए स्वच्छ ऊर्जा युग की ओर एक निर्णायक कदम हो सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

भारत जलवायु परिवर्तन से निपटने के अपने सबसे महत्वाकांक्षी कदमों में से एक उठाने की तैयारी कर रहा है. सरकार जल्द ही कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन और स्टोरेज (CCUS) मिशन शुरू करने जा रही है, जो औद्योगिक उत्सर्जन को कम करने और “नेट-जीरो 2070” लक्ष्य की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है. यह मिशन न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक स्थिरता और वैश्विक जलवायु नेतृत्व में भारत की भूमिका को भी मजबूती देगा.  मिशन का उद्देश्य भारत को वैश्विक कार्बन प्रबंधन पारिस्थितिकी तंत्र में एक प्रमुख खिलाड़ी बनाना है.

ऊर्जा संतुलन और आर्थिक विकास की चुनौती

भारत की ऊर्जा माँग लगातार बढ़ रही है. भले ही नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार तेजी से हो रहा है, फिर भी देश की 60% से अधिक बिजली अब भी कोयले से आती है. साथ ही, भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य तय किया है. ऐसे में सीसीयूएस एक ऐसा माध्यम है जो औद्योगिक वृद्धि को बनाए रखते हुए उत्सर्जन घटाने में मदद करेगा.

नीति आयोग की रूपरेखा और सरकारी समर्थन

मिशन अभी निर्माणाधीन है, लेकिन नीति आयोग के शुरुआती संकेत बताते हैं कि सरकार चुनिंदा तकनीकों को 50% से 100% तक प्रत्यक्ष समर्थन दे सकती है. इसके अलावा, प्रदर्शन परियोजनाओं, प्रौद्योगिकी विकास और CO2 परिवहन एवं भंडारण ढांचे में निवेश भी किया जाएगा. कर प्रोत्साहन, व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण और कार्बन बाजार के एकीकरण जैसे उपायों पर भी विचार चल रहा है.

भारत की ऊर्जा पहेली का लापता टुकड़ा: सीसीयूएस

सीसीयूएस को भारत की डीकार्बोनाइजेशन रणनीति का लापता हिस्सा माना जा सकता है. यह मिशन ग्रीन हाइड्रोजन, नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों और कार्बन क्रेडिट जैसी मौजूदा पहलों का पूरक है. यदि इसे सही ढंग से लागू किया गया, तो यह भारत को औद्योगिक जलवायु नवाचार में अग्रणी बना सकता है.

विकास और स्थिरता का संतुलन

भारत का लक्ष्य 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना है. ऐसे में केवल नवीकरणीय ऊर्जा पर निर्भर रहना संभव नहीं है. सीसीयूएस देश को विकास की गति बनाए रखते हुए उत्सर्जन घटाने का अवसर देगा. इसके साथ ही यह वैश्विक जलवायु वित्त आकर्षित करने और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ मजबूत करने में भी मदद करेगा.

रोजगार, निवेश और नई संभावनाएँ

भारत का औद्योगिक स्तर, नीति समर्थन और भंडारण क्षमता इसे इस क्षेत्र में अग्रणी बना सकते हैं. यदि मिशन को सही तरह से लागू किया गया, तो इससे निजी निवेश, तकनीकी निर्यात और घरेलू रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.

भारत के लिए संभावित लक्ष्य और जरूरतें

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक भारत को अपने अनुमानित 2400 मिलियन टन वार्षिक उत्सर्जन में से कम से कम 30% यानी लगभग 750 मिलियन टन को कैप्चर करना होगा. वुड मैकेंज़ी के अनुमानों के अनुसार, भारत 2050 तक 123 मिलियन टन तक पहुँच सकता है, लेकिन इसके लिए लगभग 4.3 बिलियन डॉलर की सरकारी सहायता की आवश्यकता होगी.

भंडारण क्षमता और निवेश की दिशा

भारत के पास 400–600 गीगाटन तक की भूवैज्ञानिक भंडारण क्षमता है. अब ज़रूरत है कि इस क्षमता को वित्तीय और नीतिगत समर्थन के साथ व्यावहारिक परियोजनाओं में बदला जाए.

साझेदारी और पारिस्थितिकी तंत्र की भूमिका

सीसीयूएस मिशन की सफलता उत्सर्जकों और भंडारण परिसंपत्तियों के स्वामियों के बीच सहयोग पर निर्भर करेगी. तेल-गैस क्षेत्र, खारे जलभृत और बेसाल्टिक संरचनाएँ इस मिशन के संभावित सहयोगी हो सकते हैं. ये साझेदारियाँ साझा बुनियादी ढांचे, हब-क्लस्टर मॉडल और सेवा आधारित व्यावसायिक ढांचे को गति दे सकती हैं.

आगे का रास्ता

जैसे-जैसे भारत का सीसीयूएस मिशन आकार ले रहा है, उद्योग जगत को इसके आधिकारिक लॉन्च, पायलट परियोजनाओं और कैप्चर किए गए उत्सर्जन पर ध्यान देना होगा. यह मिशन भारत के लिए केवल जलवायु समाधान नहीं, बल्कि औद्योगिक भविष्य की नई दिशा भी साबित हो सकता है.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और आवश्यक नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.)

प्रदीप सिंघवी, अतिथि लेखक व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, एनर्जी एंड क्लाइमेट प्रैक्टिस, ग्रांट थॉर्नटन भारत एलएलपी

अमित कुमार, अतिथि लेखक व एनर्जी एंड क्लाइमेट इकोसिस्टम लीडर, ग्रांड थार्नटन भारत एलएलपी 


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