होम / एक्सपर्ट ओपिनियन / भारत की वास्तविक स्वायत्तता: सैन्य शक्ति और तकनीकी बढ़त की आवश्यकता
भारत की वास्तविक स्वायत्तता: सैन्य शक्ति और तकनीकी बढ़त की आवश्यकता
भारत की वास्तविक स्वायत्तता केवल सैन्य शक्ति और आर्थिक आधार से नहीं, बल्कि तकनीकी क्षमताओं और नवाचार पर निर्भर है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 6 months ago
इतिहास ने यह पर्याप्त रूप से दिखाया है कि विदेशी आक्रमण या आक्रमण के विरुद्ध केवल तीन वैध दुर्ग हैं, सैन्य शक्ति, अर्थव्यवस्था और तकनीक, इनमें सैन्य शक्ति सबसे पुरानी है, उसके बाद अर्थव्यवस्था, और हाल ही में तकनीक आई है. रोमन साम्राज्य सैन्य ताकत पर बना था, ब्रिटिश साम्राज्य ने आर्थिक प्रभाव की शक्ति दिखाई, जबकि जापान ने तकनीकी छलांग की ताकत प्रदर्शित की.
संयुक्त राज्य अमेरिका इन तीनों का प्रतीक है, उसके वैज्ञानिक, औद्योगिक और सैन्य ढांचे के संयोजन ने उसे युद्धोत्तर युग में सर्वोच्च स्थान दिया है. यूरोप से सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को आकर्षित कर, और बाद में एशिया से, अमेरिका ने यह सुनिश्चित किया कि तकनीक का प्रसार औद्योगिक और सैन्य दोनों प्रयासों में हो. इस प्रक्रिया से पूंजी का प्रवाह लगातार बना रहा.
अमेरिका की विशिष्टता यह है कि अधिक डॉलर ‘अमेरिकन ड्रीम’ के सपने देखने वालों को आकर्षित करते हैं, जो फिर अपने नवाचारों को युद्ध और शांति दोनों के समय आजमाते हैं, और इससे निवेश की नई लहर पैदा होती है. इस समीकरण को समझने में जर्मनी और सोवियत संघ अभी भी पीछे हैं. सवाल है, भारत कहाँ खड़ा है?
भारत का नया आत्मविश्वास और वैश्विक परिदृश्य में उभरता प्रभाव
हाल ही में भारत ने अपनी सामरिक और आर्थिक मांसपेशियां दिखानी शुरू कर दी हैं, जिससे व्हाइट हाउस में बेचैनी है. ट्रंप हों या कोई और, भारत अब वैश्विक शक्ति केंद्रों को असहज बना रहा है, फर्क बस इतना है कि ट्रंप की प्रतिक्रियाएं अधिक स्पष्ट और मुखर हैं.
कभी प्रॉक्सी युद्धों और गुटनिरपेक्षता का प्रतीक रहा भारत अब उन विषयों में अपनी भूमिका दिखा रहा है, जो अब तक केवल बड़ी शक्तियों का क्षेत्र माना जाता था. इन उथल-पुथल भरे समयों में, अमेरिका के प्रभुत्व का प्रतिरोध केवल दो देशों ने किया है, रूस ने अपनी सैन्य शक्ति से और चीन ने अपनी आर्थिक क्षमता से.
एशियाई टाइगर्स जापान से शुरू होकर सिंगापुर, ताइवान, दक्षिण कोरिया और मलेशिया तक ने पूंजीवाद के सौम्य रूप को अपनाया और तकनीकी दक्षता में निवेश कर ईर्ष्याजनक क्षमता विकसित की. सऊदी अरब ने पेट्रो-डॉलर के बल पर व्यापार और वाणिज्य का केंद्र बनाया, जबकि यूरोप ने युद्धोत्तर पुनर्निर्माण को सावधानीपूर्वक, गैर-सैन्य तरीके से जारी रखा.
भारत की विदेश नीति: ‘किसी भी धुरी से न जुड़ने’ का दावा और वास्तविकता
जब भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि “भारत को किसी भी धुरी (axis) से जुड़ने की आवश्यकता नहीं है,” तो इस बयान को ठोस आधार की जरूरत है. यह ठोस आधार फिर से उन्हीं तीन स्तंभों से आता ह, सैन्य, अर्थव्यवस्था और तकनीक. भारत का सैन्य खर्च लगभग 85 अरब डॉलर (GDP का 2.3%) है, जबकि अमेरिका का 990 अरब डॉलर (3.4%), चीन का 300 अरब डॉलर (1.7%) और रूस का 150 अरब डॉलर (7.1%) है.
पिछले दस वर्षों में भारत का सैन्य खर्च दोगुना हुआ है, और स्वचालन, आधुनिकीकरण तथा स्वदेशीकरण की गति एक सकारात्मक संकेत है.
तकनीकी अनुसंधान और विकास में पिछड़ापन
आरएंडडी खर्च के मामले में तस्वीर कमज़ोर है (GDP के प्रतिशत के रूप में): भारत 0.6%, चीन 2.56%, रूस 0.92% और अमेरिका 3.4%. भारत तुर्की (1.3%), पुर्तगाल (1.7%) और ब्राज़ील (1.2%) जैसे देशों से भी पीछे है. आरएंडडी में सर्वाधिक निवेश करने वाले देश इजरायल (6%), दक्षिण कोरिया (5.2%) और स्वीडन (3.4%) हैं.
आर्थिक ताकत और घरेलू उपभोक्ता शक्ति
भारत की आर्थिक स्थिति का बड़ा आधार उसकी विशाल जनसंख्या है, जो अब अधिक उपभोग और आय के स्तर तक पहुँच रही है. जापान ने पहले अपनी घरेलू ज़रूरतें पूरी कीं, फिर उत्पादों को पश्चिमी बाज़ारों में उतारा, जिससे उसे गुणवत्ता में निपुणता मिली. लेकिन भारत के उत्पादों को ऐसा दोहराव और सुधार का अवसर नहीं मिला.
पूर्णता की खोज हमारी ताकत नहीं रही है, इसलिए भारत अक्सर “सॉफ्ट टारगेट” साबित हुआ है. परिणामस्वरूप, यदि पश्चिमी ब्रांड्स भारत छोड़ दें, जैसे जीएम और फोर्ड या यहां आए ही न हों, जैसे टेस्ला और टिफ़नी, तो वैश्विक संतुलन पर इसका कोई बड़ा असर नहीं पड़ता.
आईकिया और वॉलमार्ट जैसे ब्रांड्स की भारत में चुनौतियाँ इसका प्रमाण हैं.
वास्तविकता या दिखावा?
क्या भारत ने वास्तविक प्रगति से अधिक शोर मचाया है? क्या हम जापान (1980s), दक्षिण कोरिया (1990s) और चीन (2000s) की तरह दीर्घकालिक क्षमता निर्माण में निवेश कर रहे हैं? रूस-यूक्रेन युद्ध यह दिखाता है कि सैन्य खेल समझदारी नहीं है. इसलिए भारत के पास तकनीक और अर्थव्यवस्था दो ही लीवर हैं. अर्थव्यवस्था, यदि जनसंख्या का प्रभाव निकाल दें, तो बहुत आकर्षक नहीं दिखती, क्योंकि प्रति व्यक्ति खपत अभी भी विश्व में सबसे कम है.
भारत की एकमात्र आशा: तकनीक में छलांग
एकमात्र विकल्प तकनीक ही है. एआई, ऑटोमेशन, ग्रीन और वैकल्पिक तकनीकों के उभरते युग में भारत के पास अवसर है, बशर्ते सरकार और निजी क्षेत्र दोनों अनुसंधान और उद्यमशीलता के लिए पूंजी सृजन पर ध्यान केंद्रित करें.
तभी हमें अपनी सामरिक स्वायत्तता के लिए जोर से बोलने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि हमारी उपलब्धियाँ स्वयं बोलेंगी.
(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के हैं और आवश्यक रूप से प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते.)
डॉ. पवन सोनी, अतिथि लेखक
(डॉ. पवन सोनी बेस्टसेलिंग पुस्तकें Design Your Thinking और Design Your Career के लेखक हैं.)
टैग्स