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AI मानकों पर वैश्विक सहमति में भारत को निभानी होगी नेतृत्वकारी भूमिका

भारत के सामने एआई के वैश्विक मानकों को आकार देने का एक ऐतिहासिक अवसर है. यह केवल तकनीकी प्रगति का विषय नहीं है, बल्कि रणनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारी का सवाल भी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 8 months ago

भारत एआई इम्पैक्ट समिट के बीच कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के साझा वैश्विक मानकों पर सहमति बनाने का मुद्दा केंद्र में है. विशेषज्ञों का मानना है कि एआई क्रांति का अगला चरण केवल तेज मॉडल या बड़े कंप्यूट क्लस्टरों से परिभाषित नहीं होगा, बल्कि उन नियमों से तय होगा जो इन तकनीकों को संचालित करेंगे.

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रयोगशालाओं से निकलकर अर्थव्यवस्थाओं के कमांड सेंटर तक पहुंच चुकी है. यह स्वास्थ्य सेवाओं में डायग्नोस्टिक्स, वित्तीय जोखिम मॉडलिंग, रक्षा सिमुलेशन, शिक्षा प्लेटफॉर्म, लॉजिस्टिक्स ऑप्टिमाइजेशन और सार्वजनिक सेवा वितरण को आकार दे रही है. हालांकि, एआई से जुड़ा नियामक ढांचा विभिन्न देशों में बिखरा हुआ है.

अलग-अलग अनुपालन व्यवस्थाएं, सुरक्षा की भिन्न परिभाषाएं, पारदर्शिता संबंधी असमान दायित्व और डेटा सुरक्षा के अलग-अलग मानक एक असंगत वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र बना रहे हैं. इससे नवाचार अनिश्चितता के कारण धीमा पड़ सकता है और सुरक्षा मानकों में नियामकीय खामियों का जोखिम बढ़ सकता है.

भारत के लिए रणनीतिक अनिवार्यता

भारत में एआई का विकास तेज़ी से हो रहा है. स्टार्टअप्स क्षेत्र-विशिष्ट मॉडल विकसित कर रहे हैं और उद्योग एआई को अपने मुख्य परिचालनों में शामिल कर रहे हैं. एआई आधारित मेडिकल सिमुलेशन जैसी इमर्सिव तकनीकें प्रशिक्षण मानकों को नया आयाम दे रही हैं.

इसके बावजूद, भारत की एआई संरचना का बड़ा हिस्सा विदेशी निर्मित चिप्स और निजी वैश्विक क्लाउड अवसंरचना पर निर्भर है. देश में सेमीकंडक्टर निर्माण अभी प्रारंभिक अवस्था में है और बड़े पैमाने पर क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर वैश्विक कंपनियों के नियंत्रण में है. यह निर्भरता दीर्घकालिक तकनीकी संप्रभुता, लागत पूर्वानुमान और भू-राजनीतिक जोखिमों को लेकर चिंताएं उत्पन्न करती है.

केवल अनुपालन नहीं, रणनीतिक स्थिति निर्धारण

वैश्विक एआई मानकों पर सहमति बनाना केवल नियामकीय अनुपालन का विषय नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक स्थिति निर्धारण का प्रश्न है.

एक वैश्विक रूप से समन्वित ढांचा नवाचार और सुरक्षा, पारदर्शिता, डेटा संरक्षण तथा समावेशन के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है. स्टार्टअप्स के लिए अलग-अलग देशों के विरोधाभासी मानकों का पालन करना अक्सर स्वयं नियमन से अधिक जटिल होता है. एक समरूप वैश्विक आधाररेखा भारतीय एआई समाधानों के निर्यात को सुगम बना सकती है.

तीन प्रमुख स्तंभ

1. सुरक्षा और जवाबदेही - उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों, जैसे स्वास्थ्य, वित्त, स्वायत्त प्रणालियां और पूर्वानुमान आधारित शासन में एआई की त्रुटियां वास्तविक प्रभाव डाल सकती हैं. एक साझा वैश्विक सुरक्षा प्रोटोकॉल में जोखिम वर्गीकरण, ऑडिट की अनिवार्यता और स्पष्ट जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए.

2. पारदर्शिता और व्याख्येयता - ब्लैक-बॉक्स मॉडल भरोसे को कमजोर करते हैं. एआई को सार्वजनिक सेवाओं और महत्वपूर्ण उद्योगों में अपनाने के लिए न्यूनतम पारदर्शिता मानक आवश्यक हैं. इसमें मॉडल डॉक्यूमेंटेशन, बायस परीक्षण और प्रभाव आकलन शामिल हो सकते हैं.

3. डेटा संरक्षण और समावेशन- एआई मॉडल उतने ही निष्पक्ष होते हैं जितना उनका प्रशिक्षण डेटा. वैध डेटा प्रोसेसिंग, सूचित सहमति, एन्क्रिप्शन और डेटा अनामीकरण जैसे उपाय अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे. भारत का डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना मॉडल समावेशी एआई नवाचार की मजबूत नींव प्रदान करता है, बशर्ते गोपनीयता सुरक्षा मजबूत हो.

डिजिटल अर्थव्यवस्था को बहुआयामी लाभ

साझा वैश्विक मानकों से भारतीय स्टार्टअप्स को अनुमानित वैश्विक बाजार मिल सकते हैं, निवेशकों का भरोसा बढ़ सकता है और अनुसंधान संस्थानों को सीमापार सहयोग में सुविधा मिल सकती है. स्वास्थ्य प्रशिक्षण, इमर्सिव सिमुलेशन और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन भारतीय समाधानों की विश्वसनीयता बढ़ाएगा.

कंप्यूट संप्रभुता पर भी जोर

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एआई विकास विदेशी चिप्स और निजी क्लाउड पर अत्यधिक निर्भर रहेगा, तो नीतिगत स्तर पर घरेलू सेमीकंडक्टर क्षमता और संप्रभु क्लाउड अवसंरचना को बढ़ावा देना अनिवार्य होगा. मानक और संप्रभुता परस्पर पूरक हैं, विरोधाभासी नहीं.

वैश्विक नेतृत्व का अवसर

एक विशाल डिजिटल लोकतंत्र और सशक्त स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में भारत के पास संतुलित मॉडल प्रस्तुत करने का अवसर है, न तो अत्यधिक नियमन जो नवाचार को बाधित करे, और न ही पूर्ण स्वतंत्रता जो सुरक्षा से समझौता करे.

भारत को बहुपक्षीय मंचों, उद्योग संगठनों और मानक निर्धारण संस्थाओं के साथ मिलकर तकनीकी मानकों पर सहमति विकसित करनी चाहिए. नियामक सैंडबॉक्स को वैश्विक पायलट ढांचों से जोड़ा जा सकता है और घरेलू प्रमाणन निकायों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप मान्यता दी जा सकती है.

भारत एआई इम्पैक्ट समिट केवल तकनीकी आयोजन नहीं, बल्कि नीतिगत मोड़ का अवसर है. प्रश्न यह नहीं कि भारत एआई को बड़े पैमाने पर अपनाएगा या नहीं, वह अवश्य अपनाएगा. असली प्रश्न यह है कि क्या भारत उन नियमों को आकार देगा जो इसके उपयोग को नियंत्रित करेंगे.

तकनीक अक्सर कानूनों से तेज़ गति से विकसित होती है. यदि भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहना है, तो सभी सरकारी विभागों और एजेंसियों को समान गति से आगे बढ़ना होगा.

साझा एआई मानकों पर सहमति प्रगति को रोकने के लिए नहीं, बल्कि उसे स्थिर और विश्वसनीय बनाने के लिए आवश्यक है. नवाचार को जिम्मेदारी और विश्वास के साथ जोड़ना ही भारत की तकनीकी संप्रभुता और वैश्विक नेतृत्व की कुंजी बन सकता है.

अस्वीकरण : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि वे प्रकाशन के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों.

सुमित कौशिक, अतिथि लेखक
(लेखक एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ डिप्लोमेसी एंड इंटरनेशनल अफेयर्स (AIDIA) में विज़िटिंग फेलो – कूटनीति और रणनीति हैं.)

वरा गौर,  अतिथि लेखक
(लेखिका सागा लीगल में पार्टनर हैं.)


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