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भारत और इजराइल : दो शाश्वत सहयोगी

भारत के यहूदियों और इजराइल के साथ संबंध सदियों से चले आ रहे हैं, शरण और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से लेकर 1992 में पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित करने और आज की गहन रणनीतिक साझेदारी तक.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 8 months ago

1930 के दशक के मध्य में, बॉम्बे (मुंबई) स्थित ऑल इंडिया रेडियो के एक छोटे से स्टूडियो में एक सोनाटा का मनमोहक अंश रिकॉर्ड किया गया. इस विशिष्ट भारतीय धुन ने अपने स्पंदित तारों और वायलिन के माध्यम से एक अद्भुत वातावरण रचा. प्रतिभाशाली पारसी संगीतकार और महान संचालक ज़ुबिन मेहता के पिता मेहली मेहता ने वायलिन बजाया, जबकि इतालवी कलाकार एगिडियो वर्गा ने सेलो बजाया. राग शिवरंजिनी पर आधारित यह रचना मूल रूप से यहूदी संगीतकार वाल्टर कॉफमैन द्वारा स्लावोनिक स्ट्रिंग क्वार्टेट के लिए तैयार की गई थी. यह धुन सरल होते हुए भी अत्यंत गहन अर्थ रखती थी. दशकों के दौरान, यह संक्षिप्त धुन लाखों भारतीयों के लिए भोर में सुनाई देने वाली पहली ध्वनि बन गई, क्योंकि यह ऑल इंडिया रेडियो की सिग्नेचर ट्यून बन गई. इस अद्भुत रचना के संगीतकार कॉफ़मैन भारत एक शरणार्थी के रूप में पहुँचे थे, जो यूरोप में नाज़ियों द्वारा फैलाए गए यहूदी-विरोधी उत्पीड़न से बचकर आए थे.

भारत में यहूदी समुदाय को जो स्वागत मिला, वह मानव इतिहास में अद्वितीय है. यहूदियों का पहला समूह यरूशलेम की घेराबंदी के दौरान प्रथम मंदिर के विध्वंस के बाद यहूदिया से भारत के तटों पर पहुँचा. परिणामस्वरूप, कोचीन यहूदी विश्व का सबसे पुराना सतत अस्तित्व में रहने वाला यहूदी समुदाय बन गया. 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, यहूदी उद्यमियों ने भारत में अपनी पहचान स्थापित की, और डेविड ससून तथा उनके परिवार के परोपकारी कार्यों ने बॉम्बे के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हालांकि, 1930 के दशक में, भारत के ब्रिटिश शासकों के भेदभावपूर्ण कानूनों के तहत नाजी जर्मनी में नरसंहार का सामना कर रहे यहूदियों को भारत में प्रवेश देने की कोई राष्ट्रीय नीति नहीं थी. फिर भी बॉम्बे एशिया के प्रमुख बंदरगाह शहरों में से एक था जिसने यहूदी शरणार्थियों को प्रवेश की अनुमति दी. जब होलोकॉस्ट के दौरान विश्व ने यहूदी समुदाय से मुँह मोड़ लिया, तब ब्रिटिश विरोध के बावजूद बॉम्बे में ज्यूइश रिलीफ ऑर्गनाइज़ेशन की स्थापना की गई. बॉम्बे स्थित अख़बार ‘द ज्यूइश ट्रिब्यून’ ने यूरोप में हो रहे उत्पीड़न की रिपोर्टिंग की और भारतीयों से समर्थन की अपील की.

जवाहरलाल नेहरू ने, कांग्रेस पार्टी के विरोध के बावजूद, यूरोपीय यहूदियों का स्वागत करने का फैसला किया. भारत में आए शरणार्थियों में चित्रकार, चिकित्सक, दंत चिकित्सक, अभियंता, फोटोग्राफर, वास्तुकार, कला समीक्षक, संग्राहक और उद्यमी शामिल थे. नेहरू ने भारतीय चिकित्सा परिषद को यहूदियों चिकित्सकों की योग्यता मान्यता देने और उन्हें भारत में काम करने की अनुमति देने के लिए प्रेरित किया. उनके प्रयासों से कई भारतीय महाराजाओं ने भी अपने राज्यों में यहूदी शरणार्थियों की सेवाएँ लीं. उस समय भारत न तो बहुत समृद्ध था और न ही पूरी तरह स्वतंत्र, फिर भी यह दुनिया का पहला देश बन गया जिसने अपने खर्च पर बेघर और राष्ट्रविहीन यहूदी शरणार्थियों को स्वीकार किया. ब्रिटिशों के कड़े नियमों के बावजूद, भारतीयों की करुणा ने डाखाउ और ऑशविट्ज जैसी भयावह परिस्थितियों से हजारों लोगों की जान बचाई.

भारत और इजराइल ने एक-दूसरे से नौ महीने के भीतर 1947 और 1948 में स्वतंत्रता प्राप्त की. भारत ने 17 सितंबर 1950 को आधिकारिक रूप से इज़राइल राज्य को मान्यता दी. इज़राइल के संस्थापक और प्रथम प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन, जो योग का अभ्यास करते थे, महात्मा गांधी से प्रेरित थे और अपने शयनकक्ष में उनका चित्र रखते थे. उन्होंने भारत की मान्यता को संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ के बाद सबसे महत्वपूर्ण माना, लेकिन भारत ने राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए. आने वाले दशकों में, इजराइल के प्रति आधिकारिक विरोध और यहूदी समुदाय के प्रति निरंतर आतिथ्य भारत की विदेश नीति का एक विरोधाभासी तत्व बन गया.

8 अप्रैल 1959 की सुबह, रब्बी डॉ. इज़राइल गोल्डस्टीन ने प्रधानमंत्री नेहरू से भेंट की और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों के मुद्दे को उठाया. नेहरू ने शांत भाव से कहा, “इज़राइल के प्रति सद्भावना की भावना है, और राजनयिक संबंधों की अनुपस्थिति का कोई तार्किक कारण नहीं है.” उन्होंने यह भी भविष्यवाणी की कि एक दिन इज़राइल और अरब राज्यों के बीच शांति समझौता होगा.

15 दिसंबर 1968 को, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कोच्चि के परदेसी सिनेगॉग की 400वीं वर्षगांठ में भाग लिया. उन्होंने भारत की सह-अस्तित्व की परंपरा पर बल देते हुए अपने भाषण का समापन “मज़ल तोव” शब्द के साथ किया.

1967 के छह-दिवसीय युद्ध के दौरान भारत ने गुप्त रूप से इज़राइल को आवश्यक सैन्य उपकरणों के पुर्जे भेजे. 1971 में इज़राइल ने बांग्लादेश को मान्यता देने वाले पहले देशों में स्थान पाया.

1992 में प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने इज़राइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए. 29 जनवरी 1992 को भारत ने इज़राइल में अपना दूतावास खोलने की घोषणा की. 17 मई 1993 को प्रधानमंत्री शिमोन पेरेस नई दिल्ली की आधिकारिक यात्रा पर आए.

4 जुलाई 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इज़राइल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने. 2018 में बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत की यात्रा की.

फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री मोदी अपनी दूसरी इज़राइल यात्रा पर जाने वाले हैं. यह यात्रा रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार, सुरक्षा और नवाचार के क्षेत्रों में गहराते संबंधों को रेखांकित करती है.

प्राचीन काल से लेकर आधुनिक रणनीतिक सहयोग तक, ये दोनों सजीव लोकतंत्र आपसी सम्मान, ऐतिहासिक करुणा और प्रगति की प्रतिबद्धता पर आधारित एक स्थायी गठबंधन का प्रतीक हैं. भारत और इज़राइल, दो प्राचीन सभ्यताएँ, अब शाश्वत सहयोगी हैं.

अतिथि लेखक-भुवन लाल

(लेखक सुभाष बोस, हर दयाल और वल्लभभाई पटेल के जीवनीकार हैं. वे ‘नमस्ते कान्स’ और ‘इंडिया ऑन द वर्ल्ड स्टेज’ के लेखक हैं. उनसे (mailto:writerlall@gmail.com) पर संपर्क किया जा सकता है.
 


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