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त्योहारी हायरिंग 2025: गिग इकोनॉमी का उभार या स्थायी रोजगार की नई दिशा?

त्योहारी सीजन की हायरिंग अब केवल अस्थायी नौकरियों तक सीमित नहीं रही. यह भारत के बदलते श्रम बाजार, डिजिटल विस्तार और गिग इकोनॉमी की गहराई को भी उजागर करती है. आने वाले वर्षों में यही रुझान स्थायी रोजगार नीतियों और कार्यबल संरचना को नई दिशा देगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 10 months ago

त्योहारी सीजन के दौरान भर्तियों में तेजी के बाद सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि इन कर्मचारियों का आगे क्या होता है. आंकड़ों के अनुसार, लगभग 70% त्योहारी कर्मचारी क्विक कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स सेक्टर में गिग वर्कर के रूप में काम करते हैं. इनके अनुबंध आम तौर पर 1 से 3 महीने के लिए होते हैं.

त्योहारी मांग कम होते ही इनमें से अधिकांश अनुबंध समाप्त हो जाते हैं या किसी अन्य सेक्टर में ट्रांसफर हो जाते हैं. हालांकि, सकारात्मक पहलू यह है कि लगभग 25% अस्थायी कर्मचारी प्रदर्शन के आधार पर पूर्णकालिक भूमिकाओं में स्थान पा लेते हैं. ई-कॉमर्स कंपनियां प्रतिभा की पाइपलाइन बनाए रखने के लिए ऐसे कर्मचारियों को लंबे समय तक बनाए रखती हैं. वहीं, अन्य कर्मचारियों के लिए कौशल विकास (upskilling) विभिन्न क्षेत्रों में सालभर अवसर हासिल करने का रास्ता खोलता है.

त्योहारी हायरिंग में 20-25% की बढ़ोतरी, कारण क्या हैं?

2025 में अस्थायी और गिग सेक्टरों में त्योहारी भर्ती में 20-25% की वृद्धि दर्ज की गई है. ई-कॉमर्स, खुदरा, आपूर्ति श्रृंखला और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टरों में यह उछाल सबसे अधिक रहा, जिससे 4.5 लाख से अधिक नौकरियों का अनुमान लगाया जा रहा है.

हालांकि, कुछ उद्योगों में वृद्धि अपेक्षाकृत धीमी रही, जिसका कारण कौशल की कमी, प्रतिभा और नौकरी की जरूरतों के बीच असंगति, और कुछ कंपनियों में सतर्क भर्ती दृष्टिकोण बताया गया है. गिग भूमिकाओं में 25-30% तक की वृद्धि दर्ज हुई है, विशेष रूप से टियर-2 और टियर-3 शहरों में. सितंबर में शुरू हुए शुरुआती त्योहारों और जीएसटी दर में कटौती ने इस प्रवृत्ति को और बल दिया.

टियर-2 और टियर-3 शहरों में भी दिखा हायरिंग का जोश

जहां महानगरों में त्योहारी नौकरियों में 19% वृद्धि देखी गई, वहीं टियर-2 और टियर-3 शहरों में यह वृद्धि 42% तक पहुंची. इंदौर, कोच्चि जैसे केंद्रों में गिग इकोनॉमी में 30-40% का उछाल देखा गया. अर्ध-ग्रामीण और छोटे शहरी इलाकों में भी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने पहुंच बढ़ाई है, जिससे व्हाइट-कॉलर अस्थायी नौकरियों में 21% की वृद्धि दर्ज की गई. कंपनियां अब लागत लाभ और प्रतिभा पूल का लाभ उठाने के लिए छोटे शहरों की ओर रुख कर रही हैं.

गिग इकोनॉमी: क्या स्थायी नौकरियों की जगह ले रही है?

जीएसटी 2.0 के तहत सितंबर 2025 में दरों में कटौती के बाद कंपनियां तेजी से ई-कॉमर्स, खुदरा और ऑटो सेक्टर में अस्थायी भर्ती कर रही हैं. वस्तुओं पर कम करों ने उपभोग को प्रोत्साहित किया है, जिससे गिग इकोनॉमी को बल मिला है.

हालांकि शुरुआती तिमाही में फ्लेक्सी-स्टाफिंग की वृद्धि 6.1% तक धीमी रही थी, लेकिन कर कटौती के बाद इसमें फिर से तेजी आने की उम्मीद है. रिपोर्टें बताती हैं कि कंपनियां चपलता (agility) और परिचालन दक्षता बढ़ाने के लिए अब अनौपचारिक भर्ती की रणनीतियों पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं.

भारतीय रोजगार बाजार को क्या संकेत दे रही है यह प्रवृत्ति?

त्योहारी सीजन की इस बढ़ी हुई हायरिंग ने भारत के रोजगार बाजार में लचीलापन और सतर्क आशावाद दोनों का संदेश दिया है. मुद्रास्फीति और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी यह ट्रेंड उपभोक्ता मांग और घरेलू खर्च में सुधार की ओर इशारा करता है.

विशेष रूप से, महिलाओं की भागीदारी में 23% की वृद्धि और टियर-II/III शहरों की सक्रियता ने श्रम बाजार को नया आकार दिया है. ई-कॉमर्स और खुदरा बिक्री ने सितंबर में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की, जिससे दीवाली व्यापार 2024 की तुलना में 29% ऊपर पहुंच गया.

यह प्रवृत्ति न केवल डिजिटल उपभोक्ताओं की बढ़ती संख्या (93% खरीदार अब ऑनलाइन सक्रिय) को दर्शाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि भारत की अर्थव्यवस्था अब लचीले रोजगार मॉडलों के सहारे स्थायी वृद्धि की ओर अग्रसर है.

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि यह प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

अतिथि लेखिका-सुचिता दत्ता, एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, इंडियन स्टाफिंग फेडरेशन (ISF)


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