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किसानों की आय बढ़ाने के यह हैं पांच तरीके, कृषि उद्योग का भी होगा विकास

इसमें कोई दो राय नहीं कि वैश्विक स्तर पर कृषि उद्योग को इस वक्त कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago

अनीश जैन,

सीईओ, ग्राम उन्नति

भारतीय कृषि एक ऐसे मोड़ पर है कि अगर इसे योजनाबद्ध तरीके से आगे ले जाया जाए, तो इससे न केवल हम अपनी भोजन आवश्यकताओं का ख्याल रख पाएंगे, बल्कि पूरी दुनिया तक खाना पहुंचाने में भी सफल रहेंगे. इसमें कोई दो राय नहीं कि वैश्विक स्तर पर कृषि उद्योग को इस वक्त कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. मगर बढ़ते भू राजनीतिक तनाव, बाधित आपूर्ति श्रृंखला और कमोडिटी की बढ़ती कीमतों ने कृषि उद्योग के सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. लेकिन हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि हर चुनौती एक अवसर लेकर आती है. इसी कड़ी के तहत प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यों से कहा है कि वे कृषि के क्षेत्र में अपने कदम आगे बढ़ाएं.

राज्यों को कृषि उत्पादकता बढ़ाने का निर्देश 

भारतीय कृषि के लिए एक नया मोड़ लेकर आया है. कृषि क्षेत्र देश को अधिक आत्मनिर्भर बनाने, आयात को कम करने, महत्वपूर्ण तकनीकी और नियामक सुधारों के साथ-साथ सरकार के सबसे हालिया बजट में प्राप्त भारी समर्थन के पीछे निर्यात बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है. 

बीज प्रतिस्थापन पर ध्यान केंद्रित करना

राज्यों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उच्च गुणवत्ता और उच्च उपज देने वाले बीजों की किस्मों को किसानों तक समय पर पहुंचाया जाए. वहीं, पिछले आठ वर्षों में केवल सरकार ने उच्च उपज वाली दालों की 300 से अधिक किस्मों की पहचान की है. इसके अलावा रबी की बुवाई मौसम में केंद्र और राज्य सरकारों को उच्च उपज वाले बीजों की उपलब्धता और वितरण सुनिश्चित करने में मुख्य कदम उठाने चाहिए, जो कृषि की उत्पादकता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.

किसानों को सब्सिडी का समय पर वितरण सुनिश्चित करना

किसानों को विभिन्न सब्सिडी प्रदान करने के लिए भारत सरकार और राज्य सरकारों के ज़रिए कई योजनाओं और कार्यक्रमों को क्रियान्वित कर रहा है. इन कार्यक्रमों के माध्यम से वित्तपोषण, कृषि उपकरण, पौध संरक्षण उत्पाद, उर्वरक, पौधे के बीज और उर्वरक जैसे इनपुट के रूप में विभिन्न सब्सिडी प्रदान की जाती है. आमतौर पर किसान अपनी सब्सिडी प्राप्त करने में अत्यधिक देरी का अनुभव करते हैं, जो किसानों और फर्मों को मिलकर आगे बढ़ने में एक बड़ी बाधा बनते हैं. इसका असर किसानों से मिलने वाली उच्च उत्पादकता पर पड़ता है, जो धीरे धीरे नुकसान की ओर बढ़ने लगता है. भारत के किसान देश की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और देश का कृषि विकास समग्र रूप से किसानों की सफलता पर निर्भर करता है.

किसान समूहों का लाभ उठाएं

बरसों से देश भर के ज्यादातर किसानों को किसी न किसी ढांचे के तहत एकत्रित किया गया है. नतीजन आज लगभग हर किसान एक सहकारी समिति, एक किसान उत्पादक कंपनी, एक एसएचजी फेडरेशन या इसी तरह के किसी किसान संघ का सदस्य बना हुआ है. इन संघों का मकसद किसान सदस्यों की आवश्यकताओं को जानना और थोक में प्रौद्योगिकियों और उत्पादों से जुड़ी सेवाएं उपलब्ध करवाना है. हर स्तर पर कीमतों को लेकर बातचीत की जा सकती है. हालांकि सरकार के पास नई प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए सब्सिडी देने के लिए सीमित संसाधन हैं, लेकिन ये छूट सब्सिडी या योजनाओं पर निर्भरता को ऑफसेट करने का कारण साबित हो सकती है.

आधुनिक पोषण तकनीक के उपयोग को प्रोत्साहित करना

बढ़ती आबादी के हिसाब से खाद्य उत्पादन को बनाए रखने के लिए नई और अभिनव तकनीक का उपयोग करने की आवश्यकता होती है ताकि हमारे किसान अधिक भोजन उगाने के लिए मौजूदा कृषि भूमि पर उत्पादन को तेज कर सके. वर्तमान में सरकार के संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा थोक उर्वरकों की लागत को सब्सिडी देने के लिए लगाया जाता है. हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में बड़ी मात्रा में पौधे पोषण प्रौद्योगिकियां विकसित हुई हैं. अब बाजार में कहीं बेहतर उत्पाद उपलब्ध हैं. इन प्रौद्योगिकियों यानि उत्पादों को लोकप्रिय बनाने के लिए अगर उनके मूल्य को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए कुछ सब्सिडी या प्रोत्साहन के अन्य रूपों को पेश किया जा सकता है, तो किसानों और राजकोष
दोनों को आगे चलकर इसका फायदा मिल पाएगा. इसके अलावा राज्यों में फसलों को मजबूत करने के लिए प्रौद्योगिकियों के महत्व के बारे में प्रचार करना चाहिए.

जैव उर्वरकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें

कृषि अर्थशास्त्र की सबसे बड़ी विडंबना ये है कि बहुत सा निवेश नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों की खरीद में किया जाता है. ऐसा तत्व जो हवा में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है जिसे हम सांस के रूप में लेते हैं. बहुत से ऐसे जीव हैं जो आसानी से उपलब्ध नाइट्रोजन को पौधे के प्रयोग करने हेतु परिवर्तित करते हैं. इनके अलावा कई अन्य जीव हैं जो मिट्टी में पहले से उपलब्ध अन्य खनिजों को पौधे के प्रयोग करने योग्य रूपों में परिवर्तित करते हैं. दोनों ही रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता को कम करते हैं. 

राज्यों को जैव उर्वरकों के वाणिज्यिक विनिर्माण, पैकेजिंग, विपणन और वितरण को बढ़ावा देने में निवेश करना चाहिए. जैव उर्वरकों के बेहतर वितरण और गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए. जैव उर्वरकों का उत्पादन करने के लिए राज्य विभिन्न हितधारकों जैसे डेयरी सहकारी समितियों, एफपीओ, एसएचजी आदि के साथ सार्वजनिक निजी भागीदारी मॉडल का भी पता लगा सकते हैं.

अतिरिक्त वित्त आवंटित करने की आवश्यकता के बिना कृषि उत्पादकता में सुधार करने के लिए राज्यों के पास कई समाधान उपलब्ध हैं. इनमें से अधिकांश समाधान मृदा स्वास्थ्य में सुधार, आयात को कम करके, सरकारी सब्सिडी पर दीर्घकालिक निर्भरता को कम करके और किसानों के साथ सीधे काम करने के लिए ऑफ टेकर्स और छोटे निजी व्यापारियों के लिए एक सहायक वातावरण बनाकर उत्पादन प्रणालियों में सुधार करने में भी सहायता करेंगे. अगर केंद्र और राज्य एक स्थायी समाधान बनाने के लिए मिलकर काम करता है, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत की कृषि वास्तव में आत्मनिर्भर होगी और दुनिया को खिलाने के लिए तैयार होगी.

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