होम / एक्सपर्ट ओपिनियन / सक्रिय प्रशासन या हादसे के बाद सुधार? रेलवे अथॉरिटीज के लिए एक चेतावनी संदेश

सक्रिय प्रशासन या हादसे के बाद सुधार? रेलवे अथॉरिटीज के लिए एक चेतावनी संदेश

विनोद के. बंसल के अनुसार रेलवे को एक संरचित, शहर-विशिष्ट और समयबद्ध योजना के साथ सुरक्षा में निवेश को प्राथमिकता देनी चाहिए.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

जब एक ही सुबह में मुंबई की लोकल ट्रेनों में, जो भीड़भाड़ और सुरक्षा उपायों की कमी के लिए बदनाम हैं, एक रोके जा सकने वाले हादसे में चार जानें चली जाती हैं, तो यह केवल जन आक्रोश ही नहीं भड़काता. यह एक बुनियादी सवाल उठाता है: व्यवस्था केवल त्रासदी के बाद ही क्यों जागती है?

9 जून को सुबह करीब 9:30 बजे, ठाणे जिले के मुंब्रा और दीवा स्टेशनों के बीच एक भीड़भरी लोकल ट्रेन में एक भयावह दुर्घटना घटी, जब उसकी फुटबोर्ड पर लटक रहे 13 यात्री दूसरी दिशा से आ रही ट्रेन से टकरा गए. रिपोर्टिंग के समय चार लोगों की मौत की पुष्टि हुई थी और कई अन्य घायल हुए. यह भयानक घटना अंततः अधिकारियों को यह घोषणा करने के लिए मजबूर कर गई कि मुंबई की लोकल ट्रेनों में जल्द ही ऑटोमैटिक दरवाजे लगाए जाएंगे.

इस बात को जरा महसूस कीजिए
हर दिन लाखों मुंबईवासी अपनी जान जोखिम में डालकर ठसाठस भरी ट्रेनों में सफर करते हैं, अक्सर खुले दरवाजों से लटके रहते हैं, जहां केवल उम्मीद और आदत ही उन्हें फिसलने से बचाती है. फिर भी, ऑटोमैटिक दरवाजे लगाने का निर्णय, जो कि दुनिया भर की शहरी परिवहन प्रणालियों में एक बुनियादी सुरक्षा उपाय है, अब जाकर लिया जा रहा है, वह भी तब जब चार जानें पहले ही जा चुकी हैं. क्यों?

विलंबित प्रतिक्रियाओं का इतिहास
यह पहली बार नहीं है जब भारतीय रेलवे ने किसी त्रासदी के बाद सुरक्षा उन्नयन की दिशा में देर से कदम उठाया हो. 2017 में एलफिंस्टन ब्रिज भगदड़ में 23 लोगों की मौत के बाद आपातकालीन निकास और एस्केलेटर का वादा किया गया था. ट्रेनों में आग लगने और पटरी से उतरने की घटनाओं के बाद अग्निरोधी सामग्री और आधुनिक अलर्ट सिस्टम "विचाराधीन" रहे.

यह एक प्रणालीगत समस्या है: प्रतिक्रियाशील शासन व्यवस्था. जब सुरक्षा में सुधार केवल जान जाने के बाद आते हैं, तो संदेश साफ होता है, नागरिक सुरक्षा प्राथमिकता नहीं, बल्कि एक बाद की सोच है.

मुंबई जैसे शहर में, लोकल ट्रेनें केवल परिवहन का साधन नहीं हैं, वे इस महानगर की जीवन रेखा हैं. 70 लाख से अधिक लोग हर दिन इस प्रणाली पर निर्भर करते हैं. जब इस आवश्यक अवसंरचना में बुनियादी सुरक्षा उपायों की कमी होती है, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि संस्थागत उदासीनता है.

रिपोर्टों से पता चलता है कि उपनगरीय रेलवे लाइनों पर कई मौतें चलती ट्रेनों से गिरने के कारण होती हैं. इसके सामान्य कारण? भीड़, खुले दरवाजे, फिसलनभरे फुटबोर्ड, और खतरनाक रूप से पास की पटरी. ये सभी समस्याएं अच्छी तरह से दर्ज हैं, अक्सर रिपोर्ट की जाती हैं, और बड़े पैमाने पर अनदेखी की जाती हैं.

अक्सर दिया जाने वाला बहाना होता है कि फंड की कमी है, लेकिन क्या जीवन बजट की बाधाओं से कम मूल्यवान है? इसके अलावा, जब मूर्तियां बनाने या स्टेशनों पर वीआईपी लाउंज अपग्रेड करने की बात आती है, तो फंड की कभी कमी नहीं लगती. तो फिर ज़रूरी चीज़ों में देर क्यों होती है?

टेक्नोलॉजी पहले से मौजूद है, फिर भी क्यों नहीं सुरक्षित हैं लोकल ट्रेनें?
मुंबई लोकल में हुए हालिया दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर भारतीय रेलवे की सुरक्षा तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. विडंबना यह है कि जिस टेक्नोलॉजी से हादसे टाले जा सकते थे, वह पहले से ही हमारे पास मौजूद है. कई शहरों की मेट्रो ट्रेनों में ऑटोमैटिक दरवाज़े, प्लेटफ़ॉर्म स्क्रीन डोर्स और भीड़ नियंत्रण के उपाय पहले से लागू हैं. यहां तक कि वंदे भारत जैसी भारतीय ट्रेनों में भी आधुनिक सुरक्षा तकनीकें और ऑटोमेशन शामिल हैं.

क्यों है कम प्राथमिकता में है कामगारों की जान ?
तो फिर सवाल यह है कि जिन लोकल ट्रेनों में सबसे ज़्यादा आम लोग, खासतौर पर श्रमिक वर्ग सफर करते हैं, उनमें बुनियादी सुरक्षा आज भी दशकों पीछे क्यों है? इसका एक संभावित उत्तर है. प्राथमिकता का अभाव. राजनीतिक प्रतिष्ठा वाले प्रोजेक्ट्स को तेजी से आगे बढ़ाया जाता है, जबकि आम यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ी योजनाएं अक्सर उपेक्षित रह जाती हैं. जब कोई हादसा मीडिया की सुर्खियां नहीं बनता या कोई सेलिब्रिटी आवाज नहीं उठाता, तब तक वह व्यवस्था को झकझोरने में असफल रहता है.

यह लेख किसी त्रासदी के बाद का शोक संदेश नहीं है, बल्कि कार्रवाई की पुकार है. केंद्रीय और पश्चिम रेलवे जोन के अधिकारी, रेलवे मंत्रालय और सुरक्षा नियामकों को यह समझना होगा कि प्रतिक्रियात्मक व्यवस्था, असफल व्यवस्था होती है. हर एक जान का नुकसान एक परिवार को तोड़ देता है, सपनों को बिखेर देता है और सरकारी व्यवस्था पर भरोसा डगमगा देता है.

सुरक्षा में निवेश कोई विकल्प नहीं, अनिवार्यता है
रेलवे को अब सुरक्षा निवेश को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए, वह भी एक संरचित, शहर-विशिष्ट और समयबद्ध योजना के तहत. ऑटोमैटिक दरवाजों को किसी तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि रणनीतिक योजना के तहत लागू किया जाना चाहिए. इसके लिए बजट, डेडलाइन, ऑडिट और सार्वजनिक रिपोर्टिंग का स्पष्ट रोडमैप तय हो.

इसके साथ ही तकनीक को जन-जागरूकता से जोड़ना भी आवश्यक है. यात्रियों को सुरक्षा नियमों के बारे में जानकारी देने वाले नियमित अभियान, खतरनाक व्यवहार पर दंड, और भीड़ प्रबंधन में आरपीएफ की सक्रिय भागीदारी, ये सब एक संस्था के तौर पर लागू किए जाने चाहिए.

दुनिया से लें सीख: दिल्ली मेट्रो और टोक्यो से उदाहरण सामने हैं
टोक्यो का ट्रेन सिस्टम मुंबई की तुलना में दुगुने यात्रियों को संभालता है, फिर भी हादसे बेहद कम होते हैं. इसका कारण ऑटोमेशन, समयबद्धता, भीड़ नियंत्रण और सबसे बढ़कर सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता है.

भारत के भीतर ही दिल्ली मेट्रो इसका सटीक उदाहरण है. साफ स्टेशन, ऑटोमैटिक दरवाज़े, कैमरा निगरानी, और निरंतर सुधार, यह सब दिखाता है कि जब राजनीतिक इच्छाशक्ति होती है, तो सुरक्षित और प्रभावशाली शहरी परिवहन बिल्कुल संभव है.

लोक जवाबदेही को नए सिरे से परिभाषित करने का समय

मुंबई के मुंब्रा में हुआ दुर्भाग्यपूर्ण हादसा भी अतीत की अनगिनत घटनाओं की तरह जनता की स्मृति से गुम न हो जाए. यह हमारा कर्तव्य है कि उन जान गंवाने वालों, उनके परिवारों और हर उस यात्री के लिए, जो अगली सुबह ट्रेन में चढ़ेगा. इस घटना को एक नई सोच और पूर्व-सावधानी आधारित व्यवस्था की शुरुआत के रूप में चिन्हित करें.

यह त्रासदी राष्ट्र की चेतना पर एक घाव की तरह हर परिवहन मंत्रालय के अधिकारी, रेलवे अधिकारी और नीति निर्माताओं को यह याद दिलाती रहे कि सक्रिय होना, माफी मांगने से सस्ता होता है, हे वह जान की कीमत हो, पैसे की या जनता के विश्वास की.

अंतिम शब्द

उन अधिकारियों से जो हमारी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की देखरेख करते हैं, आप भले ही रोज सफर करने वाले यात्रियों के चेहरे न देखें, लेकिन वे हर जंग लगी रेलिंग, हर टूटी हुई घोषणा प्रणाली और हर खुला दरवाजा देखकर आपके काम और आपकी लापरवाही को जरूर देखते हैं.

सक्रिय बनिए, इसलिए नहीं कि कोई कैमरा देख रहा है, बल्कि इसलिए कि इंसानियत आपसे यही मांग करती है.

जिंदगी, जिंदगी होती है, चाहे वह किसी वीआईपी की हो या एक दिहाड़ी मजदूर की. उसे वही सम्मान दीजिए, जिसकी वह हकदार है.
 

(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं और आवश्यक नहीं कि ये प्रकाशन के विचारों को दर्शाते हों.)

विनोद के बंसल, गेस्ट लेखक

(विनोद के बंसल एक अनुभवी चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं, जिनके पास वित्तीय बाजारों में 35 वर्षों से अधिक का अनुभव है. दिल्ली स्थित बंसल वैश्विक वित्तीय प्रवृत्तियों और निवेश रणनीतियों की गहरी समझ रखते हैं, जिससे वह वित्तीय क्षेत्र में एक विश्वसनीय आवाज माने जाते हैं. उनसे संपर्क किया जा सकता है: vinodkbansal@gmail.com)


टैग्स
सम्बंधित खबरें

भारत-जापान साझेदारी और मानव-केंद्रित एआई का भविष्य

प्रोफेसर सी. राज कुमार लिखते हैं, 'भारत और जापान एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहां वे AI के लिए चौथा और मौलिक मार्ग विकसित कर सकते हैं.

2 days ago

ईरान को ‘अनफ्रीज’ करना: असली चुनौती अब शुरू होगी

सिद्धार्थ अरोड़ा लिखते हैं, 'अमेरिका-ईरान शांति समझौता अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है और रिपोर्टों के अनुसार 60 दिनों की अवधि में लगभग 24 अरब डॉलर जारी किए जा सकते हैं. ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यह पैसा जब ईरान पहुंचेगा, तब उसका क्या होगा?'

3 days ago

2026 की तीसरी तिमाही का ज्योतिष: एआई, संघर्ष और वैश्विक परिवर्तन

ज्योतिषाचार्य विक्रम चन्दीरमानी लिखते हैं कि 2026 के पहले छह महीनों के दौरान इनमें से कई विषय पहले ही उभरने लगे हैं. प्रौद्योगिकी कंपनियों के मूल्यांकन को लेकर चिंताएँ लगातार अधिक स्पष्ट होती जा रही हैं. यह चिंता केवल AI से जुड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया की कुछ सबसे मूल्यवान निजी कंपनियों, जैसे स्पेसएक्स, के उच्च मूल्यांकन को लेकर भी देखी जा रही है.

5 days ago

दिल्ली में मार्को रुबियो, मेरी मां की Alexa पर गूंजे राजा राम

हंस चुगेगा दाना-दुनका... कौवा मोती खाएगा और भारत सबको उलझन में रखेगा. बैकग्राउंड में बज रहा वह पुराना भजन आधुनिक भू-राजनीति को किसी भी संयुक्त बयान से बेहतर समझता था.

27-May-2026

रणनीतिक रिजर्व एसेट के रूप में तेल: सप्लाई चेन जोखिम के खिलाफ भारत का संप्रभु सुरक्षा कवच

भारत के पास लगभग 700 अरब अमेरिकी डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो मुख्य रूप से अमेरिकी और गैर-अमेरिकी ट्रेजरी, सोना और IMF के स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स से बना है. फिर भी देश की सबसे बड़ी व्यापक आर्थिक कमजोरी, कच्चे तेल, LNG और LPG पर निर्भरता के खिलाफ मौजूदा रिजर्व संरचना में कोई समान सुरक्षा मौजूद नहीं है.

21-May-2026


बड़ी खबरें

ग्रोसरी बाजार में बड़ी एंट्री, मीशो ने 202 करोड़ रुपये में खरीदा किराना क्लब

कंपनी का मानना है कि यह सौदा उसे विभिन्न रिटेल सेगमेंट्स में अपने B2B कारोबार का विस्तार करने में मदद करेगा.

8 hours ago

अब UPI और ATM से निकाल सकेंगे PF का पैसा, जून के अंत तक शुरू हो सकती है नई सुविधा

नई व्यवस्था लागू होने के बाद सदस्य क्लेम की स्वीकृत राशि सीधे अपने बैंक खाते में प्राप्त कर सकेंगे और फिर जरूरत पड़ने पर ATM से नकदी निकाल सकेंगे.

6 hours ago

सरकारी खजाना हुआ मालामाल, डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन 5.21 लाख करोड़ रुपये के पार

सरकार ने इस अवधि के दौरान करदाताओं को 89,026 करोड़ रुपये का टैक्स रिफंड जारी किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 1.19 प्रतिशत अधिक है. इसके बावजूद शुद्ध कर संग्रह में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई.

8 hours ago

NEET-UG री-एग्जाम से पहले टेलीग्राम पर रोक बरकरार, दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के फैसले को दी मंजूरी

NEET-UG 2026 की पुनर्परीक्षा 21 जून को प्रस्तावित है. ऐसे में सरकार ने किसी भी संभावित पेपर लीक या परीक्षा संबंधी अनियमितता को रोकने के लिए टेलीग्राम पर अस्थायी रोक लगाने का फैसला किया था. यह प्रतिबंध 22 जून तक लागू रहेगा.

8 hours ago

भारत फोर्ज की अमेरिकी रक्षा कंपनी से बड़ी डील, मिलकर बनाएंगी 155mm मोबाइल तोप

फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित यूरोसैटरी डिफेंस एक्सपो के दौरान इस साझेदारी पर मुहर लगी. समझौते का उद्देश्य दुनियाभर की सेनाओं के लिए अत्याधुनिक 155mm मोबाइल आर्टिलरी प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराना है.

11 hours ago