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Liger Movie Review: कैसी है 'लाइगर', आपको देखनी चाहिए या नहीं? पढ़ें मूवी रिव्यू
सुपरस्टार विजय देवरकोंडा और अनन्या पांडे स्टारर फिल्म 'लाइगर' थिएटर में आ चुकी है. इस फिल्म को पुरी जगन्नाथ ने डायरेक्ट किया है.
चंदन कुमार 3 years ago
फिल्म : लाइगर (Liger)
मुख्य कलाकार : विजय देवरकोंडा, अनन्या पांडे, राम्या कृष्णन, रोनित रॉय, विश आर., माइक टायसन, चंकी पांडे
निर्देशक : पुरी जगन्नाथ
निर्माता : पुरी जगन्नाथ, करन जौहर, यश जौहर, अपूर्व मेहता, चार्मी कौर
रेटिंग : 1.5/5
क्यों? क्यों? क्यों? भारतीय दर्शकों को फिल्मी दुनिया ने आखिर समझ क्या रखा है? क्या वे वाकई ये नहीं समझ पा रहे कि दर्शकों को आखिर क्या चाहिए? हम बात कर रहे हैं सुपरस्टार विजय देवरकोंडा और अनन्या पांडे स्टारर फिल्म 'लाइगर' की. डायरेक्टर पुरी जगन्नाथ ने कुछ हटके दिखाने के चक्कर में पूरी कहानी का ही सत्यानाश कर डाला है. एक बात तो मैं पहले ही बता दूं कि यदि ये फिल्म भूल से भी बंपर कमाई कर लेती है, तो सिर्फ और सिर्फ विजय देवरकोंडा की फैन फॉलोइंग की वजह से. इस फिल्म में एक्टिंग, डायरेक्शन, स्टोरी सबकुछ ट्रैक से उतरी हुई है.
10 मिनट में ही सपना चकनाचूर
फिल्म जब शुरू होती है तो लगता है कि इसमें कुछ दम होगा, पर अगले 10 मिनट में ही सपना चकनाचूर हो जाता है. एक बेटा MMA चैंपियन बनकर अपने दिवंगत पिता का सपना पूरा करना चाहता है. उसकी मां दिन-रात एक करके चाय बेचकर अपने हकले बेटे को इस लायक बनाना चाहती है कि वो चैंपियन बने. बनारस से मुंबई आती है, ताकि उसके सुपुत्र को बेहतर कोचिंग मिल सके. पर उसका जिगर का टुकड़ा कोच की पहली शर्त 'लड़की से दूर रहना होगा' को चुटकी बजाते ही तोड़ देता है और फिर क्या.... पूरी फिल्म 'लाइगर' नहीं, 'तान्यागर' बन जाती है.
अनन्या के रोल को कई जगह जबरन दिखाया गया
मैं यहां 'तान्यागर' इसलिए कह रहा हूं क्योंकि इस फिल्म में तान्या (अनन्या पांडे) लाइगर (विजय देवरकोंडा) की गर्लफ्रेंड है. लाइगर अपने मिशन पर फोकस करने की जगह तान्या पर फोकस करने लगता है. ऐसा मानो, जैसे उसका लक्ष्य तान्या ही हो. बीच में उसे धोखा भी मिलता है, तो एक बार फिर उम्मीद जगती है कि फिल्म ट्रैक पर आ जाएगी. पर नहीं, ऐसा हुआ नहीं. किसी न किसी बहाने से, जहां बिल्कुल भी जरूरत नहीं थी, वहां भी तान्या को जबरन लाया गया. ऐसा मानो, हमें यह बताने की कोशिश की जा रही थी कि 'दर्शक महोदय' लाइगर का असली मकसद दिवंगत पिता का सपना पूरा करना नहीं, तान्या का दिल जीतना है. लाइगर को फिल्म में एक फाइटर के रूप में काफी सीरियस दिखाने की कोशिश की गई है, लेकिन उसकी मां बालामनी (राम्या कृष्णन) 'चुड़ैल वृत्तांत' सुनाते हुए उसे लड़की से दूर रहने की इस तरह से जिद करती है, मानो उसका बेटा नालायक हो. माइक टायसन जैसे महान फाइटर को तो फिल्म में 'जोकर' ही बना दिया गया है.
क्या है कहानी?
चलिए, अब आपको संक्षेप में कहानी बताते हैं. कहानी की शुरुआत में तान्या को कुछ गुंडे किडनैप कर लेते हैं. उसे बचाने के लिए लाइगर लास वेगास की सड़कों पर दौड़ता है और फिर कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है. बालामनी बेटे लाइगर को अपने दिवंगत पति के दोस्त रोनित रॉय (कोच की भूमिका में) से MMA की ट्रेनिंग दिलवाना चाहती है, इसलिए वह बनारस से मुंबई आती है. वहां चाय बेचकर गुजारा करती है. रोनित रॉय लाइगर को कड़ी ट्रेनिंग देते हैं (ऐसा सिर्फ महसूस कराया गया है, दिखाया नहीं गया है). इस बीच ट्रेनिंग से पहले ही तान्या जो सोशल मीडिया सेलिब्रिटी बनना चाहती है, लाइगर के एक्शन और उसकी बॉडी पर फिदा हो जाती है. देर नहीं लगती और लाइगर भी खुद को रोक नहीं पाता और प्यार में फिसल जाता है.
जब तान्या को लाइगर के हकला होने के बारे में पता चलता है तो वो उसे छोड़ देती है (हालांकि वे कई दिन से एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं, फिर भी प्रेमिका इस बात से अनजान है कि उसका प्रेमी हकला है). मां फिर से बेटे के अंदर की आग को जगाती है और बहुत जल्द वह नेशनल चैंपियन बन जाता है. अब उसका अगला फोकस होता है (सिर्फ कहने के लिए) इंटरनेशनल चैंपियन बनने का. पर पैसे की दिक्कत बीच में आ जाती है, तभी एंट्री होती है चंकी पांडे (तान्या के पिता) की. वे उसे लास वेगास बुलाते हैं और फिर वहां बहुत कुछ होता है. अब वहां पर क्या-क्या होता है, ये जानने के लिए आप चाहें तो फिल्म देख सकते हैं.
फिल्म का आखिरी सीन, सच पूछिए तो बहुत फनी है. ये फनी आपको मजा दिलाने वाला फनी नहीं है, बल्कि सिर पीटने वाला फनी है. द ग्रेट फाइटर माइक टायसन को जिस तरह से दिखाया गया है, वो शोभा नहीं देता. यहां तक कि उस पूरे सीन को फिल्म में जिस तरह से प्रजेंट किया गया है, उसे देखकर आपको ये लगेगा कि क्या भाई... क्या दिखा रहे हो?
कैसा है अभिनय?
फिल्म में एक्शन तो है, इसमें कोई दो राय नहीं, पर कई जगह एक्टिंग बोर कर रही है. जैसे राम्या कृष्णन ने जबरन ही कई जगह अपनी भौंहे चौड़ी की हैं. विजय देवरकोंडा ने हकले की एक्टिंग करने की कोशिश तो की है, पर पूरी तरह से कामयाब नहीं हुए हैं. हां, उन्होंने एक्शन सीन बेहतर किया है. अनन्या पांडे ने बिल्कुल मेहनत नहीं की है. वे फिल्म में हर जगह मौजूद हैं, पर सभी जगह उनकी एक्टिंग अधूरी सी लगती है. माइक टायसन और देवरकोंडा की फाइट में बिल्कुल भी मजा नहीं आता. चंकी पांडे अपने रोल में ठीक-ठीक से दिखते हैं. हां, रोनित रॉय अपने रोल में फिट हैं. गेटअप श्रृणु (लाइगर के दोस्त) का रोल कम है, पर उनकी कॉमेडी अच्छी है. वे हंसाने में कामयाब होते हैं.
क्यों देखनी चाहिए ये फिल्म?
इसका सीधा सा एक जवाब है- विजय देवरकोंडा. यदि आप उनके जबरा फैन हैं तो किसी के मना करने पर भी नहीं मानेंगे, इसलिए फिल्म देखने जा सकते हैं. विजय देवरकोंडा के कुछ डायलॉग्स पर तालियां और सीटियां खूब बजती हैं. कुछ अच्छे एक्शन भी देखने को मिल जाएंगे.
क्यों नहीं देखनी चाहिए ये फिल्म?
सच पूछिए, तो इस फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसके लिए आप फिल्म देखने थिएटर में जाएं. कई जगह ओवरएक्टिंग है. कहानी भटकी हुई है. ट्रेलर में देखकर जो आप कल्पना करते हैं, असली में फिल्म उसके विपरीत है. न तो लव स्टोरी ठीक से दिखाई गई है और ना ही फाइट. डायरेक्शन की भी भारी कमी है.
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