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DHFL मामले में नया मोड़: SC ने NCLT से पिरामल प्लान की वसूली पर दोबारा विचार को कहा

एक मिसाल बनाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने "संदिग्ध लेन-देन" और "धोखाधड़ी वाले लेन-देन" के बीच साफ़ कानूनी फर्क बताया—जिससे भारत के सबसे बड़े दिवालिया सौदे का ढांचा बदल गया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 11 months ago

एक अहम फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बड़े दिवालिया मामलों में जो पैसे वापस मिल सकते हैं, उनकी वैल्यू को सही तरीके से आंकना जरूरी है. कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) को निर्देश दिया है कि वह DHFL और पिरामल ग्रुप के समाधान योजना में जुड़े ₹45,000 करोड़ के "avoidance transactions" (संदिग्ध लेनदेन) को फिर से ध्यान से देखें.

हालांकि कोर्ट ने DHFL को पिरामल कैपिटल और हाउसिंग फाइनेंस द्वारा खरीदे जाने को मंजूरी दे दी, लेकिन यह साफ किया कि जो लेनदेन धोखाधड़ी के शक में हैं, उनकी वैल्यू सिर्फ ₹1 मान लेना गलत है, जब तक कि कोर्ट खुद उसकी जांच न कर ले. यह फैसला "पिरामल कैपिटल बनाम 63 मून्स टेक्नोलॉजीज" केस में आया है और इसका असर सिर्फ DHFL तक नहीं, बल्कि पूरे देश के दिवालिया मामलों के तरीके पर पड़ेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जो लेनदेन "avoidance transactions" (जैसे कर्जदार ने दिवालिया होने से पहले किसी खास व्यक्ति को फायदा पहुंचाया हो या बहुत कम कीमत पर सौदा किया हो), वे अलग होते हैं "fraudulent trading" से, जिसमें जानबूझकर धोखा देने की मंशा होती है. कोर्ट ने कहा कि दोनों तरह के मामलों को अलग-अलग तरीके से देखा जाना चाहिए और दोनों के लिए अलग कानूनी रास्ता अपनाना होगा.

न्यायिक मंजूरी, लेकिन एक शर्त के साथ

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पिरामल के लिए आंशिक जीत है. पिरामल ने दिवालिया हो चुकी DHFL (दीवान हाउसिंग फाइनेंस) को खरीदने के लिए एक समाधान योजना दी थी, जिसमें ₹45,000 करोड़ की संदिग्ध लेन-देन (Avoidance Transactions) से होने वाली संभावित वसूली को सिर्फ ₹1 की प्रतीकात्मक कीमत पर आँका गया था.

हालांकि कोर्ट ने इस योजना को मंजूरी दे दी, लेकिन यह भी साफ कर दिया कि NCLT (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) ऐसे मूल्यांकन को बिना जांचे-मौले मंजूरी नहीं दे सकता. कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामलों में यह देखना जरूरी है कि ये लेन-देन कानून के अनुसार किस कैटेगरी में आते हैं और वाकई में उनसे कितनी वसूली हो सकती है. 

कोर्ट ने कहा, "अगर रेजोल्यूशन प्रोफेशनल ने सेक्शन 43, 45, 50 और 66 के तहत एक साथ आवेदन किया है, तो ट्रिब्यूनल को हर एक को अलग-अलग तरीके से देखना होगा." इसका मतलब यह हुआ कि अब अगर उन संदिग्ध लेन-देन से कोई असली वसूली होती है, तो वह पैसा नए खरीदार (पिरामल) को सीधे नहीं मिलेगा. वह रकम कर्जदाताओं या DHFL की संपत्ति के रूप में इस्तेमाल हो सकती है, लेकिन इसका फैसला ठीक से कानूनी जांच के बाद ही होगा.

वसूली की वैल्यू को लेकर नया कानूनी तरीका

सुप्रीम कोर्ट ने IBC (Insolvency and Bankruptcy Code) के सेक्शन 43 से 51 (जो संदिग्ध लेन-देन, यानी Avoidance Transactions से जुड़े हैं) और सेक्शन 66 (जो धोखाधड़ी या गलत तरीके के व्यापार से जुड़ा है) की जो व्याख्या की है, उससे एक अहम कानूनी दीवार खड़ी हो गई है:

• Avoidance applications का मकसद रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (RP) के ज़रिए कंपनी की संपत्ति को बचाना होता है. इससे सीधे-साधे तौर पर संपत्ति या पैसा वापस लाया जा सकता है.
• Fraudulent trading यानी धोखाधड़ी वाले व्यापार के मामलों में यह साबित करना ज़रूरी होता है कि जानबूझकर धोखा देने की नीयत थी. ऐसे मामलों में लेन-देन अपने आप रद्द नहीं होते, लेकिन गड़बड़ी करने वालों से जुर्माने के तौर पर पैसे वसूले जा सकते हैं.

कोर्ट ने कहा कि IBC के चैप्टर III और VI के तहत जो अलग-अलग कानूनी रास्ते हैं, उन्हें एकसाथ मिलाकर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. यानी अब RP एक ही आवेदन में संपत्ति की वसूली और धोखाधड़ी की सज़ा दोनों नहीं मांग सकता — हर मामले के लिए अलग आवेदन देना होगा.

पिरामल और कर्जदाताओं के लिए क्या है इसका मतलब?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने उन समाधान योजनाओं (Resolution Plans) में एक ज़रूरी जवाबदेही जोड़ दी है, जिनमें बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी या संदिग्ध लेन-देन शामिल हैं. अब कोई भी कंपनी, जो दिवालिया कंपनी को खरीद रही है, संभावित वसूली को मनमाने तरीके से कम नहीं दिखा सकती. कोर्ट ने यह तय किया है कि कर्जदाताओं और दूसरे हितधारकों को भी उनका हक मिलना चाहिए, अगर वह संपत्ति असल में दिवालिया कंपनी की हो.

पिरामल के लिए, यह फैसला DHFL की खरीद को रद्द नहीं करता यानी खरीद बनी रहेगी. लेकिन अब पिरामल यह नहीं कह सकता कि भविष्य में जो ₹45,000 करोड़ तक की वसूली हो सकती है (जैसे कि धोखाधड़ी या बहुत सस्ते में की गई पुरानी डील से), वह सीधे उसके पास ही चली जाएगी. 2021 में जो समाधान योजना क्रेडिटर्स की कमेटी (Committee of Creditors) ने मंजूर की थी, अब कोर्ट की निगरानी में दोबारा देखी जाएगी ताकि यह तय हो सके कि उस वसूली की रकम का सही बंटवारा कैसे हो.

इस फैसले का बड़ा असर: IBC प्रणाली में बड़ा बदलाव

यह सिर्फ एक केस का फैसला नहीं है, बल्कि यह तय करता है कि अब भारत की दिवालिया अदालतें (Insolvency Courts) जटिल लेन-देन को कैसे संभालेंगी. कर्जदाताओं, घर खरीदारों, कंपनी खरीदारों और समाधान विशेषज्ञों के लिए यह फैसला एक नया कानूनी रास्ता दिखाता है:

• धोखाधड़ी वाले लेन-देन (Fraudulent Trading) से वसूली अब अलग से जांच के बाद ही हो सकेगी, और इसे दूसरे संदिग्ध लेन-देन (Avoidance Claims) के साथ मिलाकर नहीं देखा जा सकता.
• अगर कोई समाधान योजना यह दिखाने की कोशिश करेगी कि वसूली की कोई वैल्यू नहीं है, तो अब उसे कोर्ट की गहराई से जांच का सामना करना पड़ेगा. बिना कानूनी जांच के वसूली की कीमत "शून्य" नहीं मानी जा सकती.
• NCLT (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) की भूमिका अब और भी अहम हो गई है. कोर्ट ने उसे यह ज़िम्मेदारी दी है कि वह अलग-अलग तरह के लेन-देन की पहचान करे और हर तरह के मामले में अलग उपाय अपनाए.

यह फैसला पूरे IBC सिस्टम के काम करने के तरीके को नया आकार देता है.

IBC में अनुशासन का नया दौर

इस वक्त भारत की दिवालिया प्रक्रिया (Insolvency Process) में करीब ₹10 लाख करोड़ फंसे हुए हैं. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बहुत बड़ा असर डाल सकता है कि आगे से वसूली (Recovery) कैसे तय की जाएगी और उसका बंटवारा कैसे होगा. पिरामल और दूसरी बड़ी कंपनियों के लिए संदेश साफ है. अगर किसी सौदे में भविष्य में वसूली की उम्मीद है, तो उसकी सही वैल्यू बताना जरूरी है. सिर्फ कागजी प्रक्रिया से उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. 

अब जब NCLT फिर से DHFL मामले में ₹45,000 करोड़ की संदिग्ध लेन-देन (Avoidance transactions) पर विचार करेगा, तो यह फैसला भविष्य के सभी दिवालिया मामलों के लिए एक मिसाल (Touchstone) बन जाएगा, खासकर उन मामलों में, जहाँ पुराने लेन-देन पर धोखाधड़ी का शक हो.

(लेखक- पलक शाह, "द मार्केट माफिया - क्रॉनिकल ऑफ इंडिया’s हाई-टेक स्टॉक मार्केट स्कैंडल एंड द कबाल दैट वेंट स्कॉट-फ्री" किताब के लेखक हैं. पलक शाह पिछले दो दशकों से मुंबई में पत्रकारिता कर रहे हैं. उन्होंने द इकोनॉमिक टाइम्स, बिजनेस स्टैंडर्ड, द फाइनेंशियल एक्सप्रेस और द हिंदू बिजनेस लाइन जैसे प्रमुख पिंक पेपरों में काम किया है. वह 19 साल की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग से जुड़े थे, लेकिन कुछ सालों में इस क्षेत्र में काम करने के बाद उन्हें यह महसूस हुआ कि अपराध की संरचना बदल चुकी थी और वह संगठित गिरोह, जैसा कि मुंबई ने 80 के दशक में देखा था, अब अस्तित्व में नहीं थे.  'व्हाइट मनी' अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को समझने के उनके जुनून ने पलक को वित्त और नियामकों की दुनिया में पहुंचा दिया.)
 


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