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आज से लागू हुए 3 नए कानून, क्या है खास और सरकारी खजाने पर कितना आया बोझ? 

पूरे देश में आज से तीन पुराने आपराधिक कानूनों की जगह तीन नए कानून अमल में आ गए हैं. इन बदलावों के बारे में आपको जानकारी होनी चाहिए.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

देश की कानून व्यवस्था में आज से कई बड़े बदलाव हुए हैं. अंग्रेजों के ज़माने से चले आ रहे तीन कानूनों की जगह नए कानून अमल में आ गए हैं.  भारतीय दंड संहिता (IPC), आपराधिक प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम अब गुजरे ज़माने की बात हो गए हैं. इनकी जगह भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम पूरे देश में लागू हो गए हैं. चलिए जानते हैं कि इन कानूनों के तहत क्या-क्या बदला है और इससे सरकारी खजाने पर कितना बोझ आएगा. 

अब 420 नहीं, 318 कहिये  
भारतीय न्याय संहिता (BNS) में कुल 358 धाराएं हैं. जबकि आईपीसी में 511 धाराएं थीं. BNS में 20 नए अपराध भी शामिल किए गए हैं. नए कानूनों के अमल में आने से पुलिस को अपने दिमाग का ज्यादा इस्तेमाल करना होगा. कहने का मतलब है कि अपराध से जुड़ी जो धाराएं वह सालों से याद करते आ रहे थे, अब उन्हें नई धाराओं को याद करना होगा. पुरानी व्यवस्था के तहत धोखाधड़ी और ठगी करने वालों को पहले IPC की धारा 420 में बुक किया जाता था. अब पुलिस को ऐसे मामलों में धारा 318 के तहत कार्रवाई करनी होगी. इतना ही नहीं, हत्या, रेप, डकैती, चोरी सहित हर धारा का नंबर भारतीय न्याय संहिता यानी BNS में बदल गया है. 

बदल गए धाराओं के नंबर
हत्या के लिए लगने वाली आईपीसी की दफा 302 अब बदलकर भारतीय न्याय संहिता में धारा 103 हो गई है. हत्या की कोशिश    के लिए पहले IPC 307    लगती थी अब BNS 109 के तहत मामला दर्ज होगा. रेप और गैंगरेप    के लिए IPC की धारा 375, 376    के बजाए BNS की धारा 63, 64, 70 में कार्रवाई होगी. चोरी के अपराध की धारा 379    अब BNS 303 हो गई है. लूट के लिए IPC 392 के तहत केस दर्ज किया जाता था लेकिन अब ऐसा     BNS 309 के तहत होगा. इसी तरह, सभी धाराओं के नंबर बदल गए हैं. ऐसे में पुलिसकर्मियों को नई धाराओं को याद करने में काफी मशक्कत करनी होगी.

45 दिन में आएगा फैसला 
BNS में राजद्रोह को शामिल नहीं किया गया है, लेकिन टेरर एक्ट, संगठित अपराध को भारतीय न्याय संहिता यानी BNS में शामिल किया गया है. कानून में मॉब लिंचिंग के लिए अलग से प्रावधान किया गया है और मौत की स्थिति में फांसी तक का प्रावधान है. नए कानून में शादी का वादा कर संबंध बनाने को रेप के दायरे से बाहर रखते हुए इसके लिए अलग से व्यवस्था की गई है. साथ ही 12 साल तक की बच्ची से रेप में फांसी तक की सजा देने का प्रावधान किया गया है. आईपीसी में मॉब लिंचिंग का जिक्र नहीं था. अब इसे बीएनएस की धारा 103 (2) में परिभाषित किया गया है. इन कानूनों में यह प्रावधान किए गए हैं कि ट्रायल पूरा होने के 45 दिन के अंदर फैसला आ जाना चाहिए. इसके अलावा पहली सुनवाई के 60 दिनों के भीतर ही आरोप तय करने होंगे. 

जीरो FIR की व्यवस्था 
नए कानूनों में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति देश के किसी भी थाने में जीरो एफआईआर दर्ज करा सकता है. साथ ही ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराने पर भी जोर दिया गया है. न्याय प्रक्रिया में तेजी के लिए समन भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भेजे जा सकेंगे. पुलिस को अब सभी गंभीर आपराधिक मामलों में क्राइम सीन की वीडियोग्राफी अनिवार्य रूप से करानी होगी. इसके अलावा टाइमलाइन के तहत ही अदालतों में सुनवाई होगी. नए कानूनों की खास बात ये है कि यदि किसी मामले में पीड़ित को FIR दर्ज करानी है तो वह बिना पुलिस थाने गए भी ऐसा कर सकता है. शिकायतकर्ता को एफआईआर की एक कॉपी तत्काल देनी होगी.

इन्हें नहीं जाना होगा थाने
आज से अमल में आए कानूनों के तहत अपराध का शिकार बनीं महिलाओं और बच्चों का अस्पतालों में मुफ्त इलाज होगा. इन कानूनों में गवाहों की सुरक्षा पर भी ध्यान दिया गया है. सभी राज्य सरकारों को अब गवाह संरक्षण योजना पर काम करना होगा. पुलिस को बलात्कार जैसे संवेदनशील मामलों में पीड़ित के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग करानी होगी. नए कानूनों के अनुसार, 15 साल से कम आयु के बच्चों और 60 साल से अधिक आयु के लोगों को थाने जाने की जरूरत नहीं होगी. इसी तरह, दिव्यांग और गंभीर रूप से बीमार लोगों को भी थाने में पेश होने की जरूरत नहीं होगी. 

करोड़ों रुपए का हुआ खर्चा
तीन कानूनों को बदलने से सरकारी खजाने पर काफी बोझ आएगा. कानून की हर किताब के पन्ने अब नए हो गए हैं. ऐसे में उनकी छपाई से लेकर वितरण तक पर भारी-भरकम खर्चा लाजमी है. नए कानूनों के लिए पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षण की व्यवस्था भी करनी होगी, जिस पर भी अच्छी-खासी रकम खर्च होगी. जब भी इस तरह के बदलाव अमल में आते हैं, उस पर करोड़ों रुपए का खर्चा करना पड़ता है. इसी तरह, शहरों के नाम बदलने की प्रक्रिया भी बेहद खर्चीली होती है. क्योंकि हर सरकार सरकारी दस्तावेज में नाम बदला जाता है.     


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