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सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद BSES कंपनियां वसूलेंगी ₹21,413 करोड़ रेगुलेटरी असेट्स

यह फैसला केवल BSES डिस्कॉम्स के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे बिजली क्षेत्र के लिए एक अहम सुधारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है, जिससे उपभोक्ताओं और कंपनियों के बीच बेहतर संतुलन स्थापित हो सकेगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 8 months ago

रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (RIL) की सहायक कंपनियों बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड (BSES Yamuna) और बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड (BSES Rajdhani) को दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (DERC) द्वारा स्वीकृत ₹21,413 करोड़ के रेगुलेटरी असेट्स को चार वर्षों में वसूलने की अनुमति मिल गई है. यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट द्वारा 6 अगस्त 2025 को पारित आदेश के बाद सामने आया है.

सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में बीएसईएस डिस्कॉम्स द्वारा दायर याचिकाओं पर निर्णय सुनाते हुए रेगुलेटरी असेट्स की प्रकृति, उनके निर्माण और भुगतान की प्रक्रिया पर 10 बिंदुओं में दिशा-निर्देश जारी किए हैं. साथ ही, नियामक विफलताओं से बचाव के लिए बिजली नियामक आयोगों (ERCs) और अपीलीय अधिकरण (APTEL) की जिम्मेदारियों और शक्तियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है.

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी निर्देशित किया कि DERC द्वारा स्वीकृत मौजूदा रेगुलेटरी असेट्स को 1 अप्रैल 2024 से शुरू होकर अधिकतम 4 वर्षों में समाप्त किया जाना चाहिए. यह निर्देश बिजली नियम, 2005 के नियम 23 के तहत दिए गए मार्गदर्शन के आधार पर दिया गया है.

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश इस प्रकार हैं:

1. टैरिफ का निर्धारण लागत आधारित होना चाहिए.
2. रेगुलेटरी असेट्स का निर्माण केवल विशेष परिस्थितियों में किया जा सकता है.
3. रेगुलेटरी असेट्स की सीमा कुल वार्षिक राजस्व आवश्यकता (ARR) के 3% से अधिक नहीं होनी चाहिए.
4. नए रेगुलेटरी असेट्स को 3 साल और मौजूदा रेगुलेटरी असेट्स को 4 साल के भीतर समाप्त करना अनिवार्य है.
5. ERCs को प्रत्येक असेट की वसूली की स्पष्ट योजना और ऑडिट प्रक्रिया सुनिश्चित करनी होगी.
6. ERCs को रेगुलेटरी असेट्स की निगरानी के लिए उचित दिशा-निर्देश और रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क बनाना होगा.
7. APTEL को धारा 121 के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए आदेश और निर्देश जारी करने होंगे.
8. APTEL को स्वतः संज्ञान लेते हुए यह निगरानी करनी होगी कि रेगुलेटरी असेट्स की वसूली तय समयसीमा में हो रही है या नहीं.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को ऊर्जा क्षेत्र में एक सुधारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है. इससे बिजली वितरण कंपनियों और नियामक संस्थाओं के बीच उत्तरदायित्व और पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा.

इस निर्णय से बीएसईएस यमुना और बीएसईएस राजधानी को अपने लंबित रेगुलेटरी असेट्स की वसूली का रास्ता तो साफ हुआ ही है, साथ ही देशभर के बिजली नियामक संगठनों को भी एक ऐसा ढांचा मिल गया है जिसके तहत वे उपभोक्ताओं के हितों और कंपनियों की वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन बना सकें.
 


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