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IDBI को खरीदने के लिए IDBI की पूंजी का इस्तेमाल करेगी फेयरफैक्स?
फेयरफैक्स, IDBI बैंक का नियंत्रण हासिल करने के लिए 52,878 करोड़ रुपये का भुगतान कर रहा है. लेकिन इसके चेयरमैन प्रेम वत्सा ने निवेशकों से कहा है कि IDBI खुद फेयरफैक्स के बीमा और वित्तीय सेवा कारोबार को खरीदने के लिए नकद भुगतान करेगा. फेयरफैक्स ने इस रकम को उन स्रोतों में भी शामिल किया है, जिनसे वह अधिग्रहण के लिए भुगतान करेगी.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 hour ago
पलक शाह
IDBI अपने ही अधिग्रहण की फंडिंग में कैसे मदद कर सकता है
खरीदार बैंक खरीद रहा है. बैंक से उम्मीद है कि वह खरीदार का कारोबार खरीदेगा. और दूसरे सौदे से मिलने वाली रकम पहले सौदे की फंडिंग योजना का हिस्सा है. किसी बैंक के अधिग्रहण के लिए यह वित्तीय व्यवस्था का एक असाधारण तरीका है.
फेयरफैक्स के अधिकारियों ने 15 अक्टूबर को निवेशकों के साथ कॉन्फ्रेंस कॉल में खुद इस बात का जिक्र किया था. यह वह दिन था, जब कैबिनेट ने बिक्री को मंजूरी दी थी. Businessworld ने इस बातचीत की पूरी ट्रांसक्रिप्ट की समीक्षा की है.
रेमंड जेम्स के एक विश्लेषक ने सीधा सवाल पूछा. फेयरफैक्स अपनी बीमा कंपनी गो डिजिट को IDBI के तहत कैसे लाएगी? क्या IDBI अपनी अतिरिक्त नकदी का इस्तेमाल बाजार भाव पर शेयर खरीदने के लिए करेगा?
फेयरफैक्स के संस्थापक और चेयरमैन प्रेम वत्सा ने जवाब दिया:
"इसकी प्रक्रिया यह है कि IDBI बैंक के पास अतिरिक्त पूंजी है. इसलिए वे नकद भुगतान करेंगे... हमें उम्मीद है कि सौदे के समय वे बाजार भाव पर नकद भुगतान करेंगे."
इसी कॉन्फ्रेंस कॉल में इससे पहले वत्सा ने बताया था कि फेयरफैक्स IDBI के अधिग्रहण के लिए भुगतान कैसे करेगी. उन्होंने कहा था कि इसके लिए "मौजूदा नकदी, हमारी बीमा कंपनियों से मिलने वाला डिविडेंड, संभावित परिसंपत्ति बिक्री... और डिजिट तथा IIFL कैपिटल का उनके संबंधित बाजार मूल्यों पर योगदान" इस्तेमाल किया जाएगा.
फेयरफैक्स के प्रेसिडेंट पीटर क्लार्क ने इसके बाद इस रकम का आंकड़ा भी बताया. उन्होंने कहा कि इस खरीद के लिए 5.6 अरब डॉलर की जरूरत है. जहां तक "लाइफ ऑपरेशंस और IIFL कैपिटल सहित डिजिट इंश्योरेंस के योगदान" की बात है, तो इन तीनों कंपनियों की कीमत अपने आप में करीब 3 अरब डॉलर है.
क्लार्क का बताया 3 अरब डॉलर का आंकड़ा 5.6 अरब डॉलर की कुल खरीद कीमत के आधे से ज्यादा है. इसका मतलब है कि बैंक अपने ही अधिग्रहण के लिए भुगतान करने में मदद कर सकता है.
इससे इस खबर का सबसे अहम सवाल उठता है: क्या फेयरफैक्स अपने पैसे से IDBI खरीद रही है या अधिग्रहण के लिए जरूरी रकम का एक बड़ा हिस्सा खुद IDBI से आने की उम्मीद है?
एक ही तस्वीर के चार पहलू
यह पहला सवाल नहीं है, जिसे Businessworld ने इस बिक्री को लेकर उठाया है. यह चौथा सवाल है.
कीमत
DIPAM के 13 अगस्त के आंतरिक नोट से पता चलता है कि अधिकारियों ने फेयरफैक्स की बोली खोली, 94.42 रुपये के रिजर्व प्राइस को खारिज किया और उसके बाद ही नए मूल्यांकन का आदेश दिया. नए मूल्यांकन में कीमत 75.99 रुपये आई, जो फेयरफैक्स की 81 रुपये की बोली से कम थी. सरकार का कहना है कि उसकी प्रक्रियाएं दिशानिर्देश हैं, नियम नहीं और यह प्रक्रिया "डबल ब्लाइंड" थी.
विक्रेता के बोर्डरूम में कौन था?
बिक्री प्रक्रिया के सात महीनों के दौरान LIC की निवेश समिति में शामिल एक निदेशक फेयरफैक्स के नियंत्रण वाली कंपनी थॉमस कुक इंडिया के बोर्ड में भी थे. LIC IDBI की 30.24 फीसदी हिस्सेदारी बेच रही थी. LIC ने यह नहीं बताया है कि संबंधित निदेशक ने इस भूमिका की जानकारी दी थी या खुद को इस प्रक्रिया से अलग किया था.
कंपनियां
कैबिनेट की मंजूरी के एक दिन बाद फेयरफैक्स ने घोषणा की कि वह गो डिजिट और IIFL कैपिटल में अपनी हिस्सेदारी IDBI को "उनके संबंधित बाजार मूल्यों" पर हस्तांतरित करेगी. गो डिजिट लाइफ गैर-सूचीबद्ध कंपनी है और उसका कोई बाजार मूल्य उपलब्ध नहीं है. इन तीनों कंपनियों का कोई स्वतंत्र मूल्यांकन सार्वजनिक नहीं किया गया है.
पैसा
अब फेयरफैक्स के अपने अधिकारियों का कहना है कि IDBI इन कंपनियों के लिए नकद भुगतान करेगा और यह नकदी IDBI को खरीदने के लिए इस्तेमाल की जाएगी.
इनमें से हर पहलू को अलग-अलग समझाया जा सकता है. लेकिन एक साथ देखने पर ये ऐसी बिक्री की तस्वीर पेश करते हैं, जिसमें बोली देखे जाने के बाद कीमत तय हुई, विक्रेता का एक निदेशक खरीदार के समूह की कंपनी के बोर्ड में बैठा था और खरीदार की फंडिंग योजना उस बैंक से मिलने वाले पैसे पर निर्भर है, जिसे वह खरीद रहा है.
पैसा कैसे आगे बढ़ेगा
- फेयरफैक्स सरकार और LIC से IDBI की 60.72 फीसदी हिस्सेदारी 52,878 करोड़ रुपये में खरीदेगी. यह सौदा 81 रुपये प्रति शेयर के भाव पर होगा. कैबिनेट के फैसले वाले दिन के बाजार भाव से यह कीमत कम थी.
- फेयरफैक्स को IDBI का नियंत्रण मिलेगा. 30 सितंबर को बैंक की नेटवर्थ 61,164 करोड़ रुपये थी.
- IDBI, फेयरफैक्स की गो डिजिट जनरल, गो डिजिट लाइफ और IIFL कैपिटल में हिस्सेदारी खरीदेगा. फेयरफैक्स के मुताबिक, यह खरीद "उनके संबंधित बाजार मूल्यों" पर होगी.
- पैसा फेयरफैक्स समूह के पास जाएगा. उसके अधिकारियों ने इन "योगदानों" को उन स्रोतों में शामिल किया है, जिनसे IDBI की खरीद के लिए भुगतान किया जाएगा.
क्लार्क का बताया 3 अरब डॉलर का आंकड़ा इन तीनों कारोबारों के लिए फेयरफैक्स का अपना मूल्यांकन है, न कि पूरा हो चुका भुगतान. सौदे की कीमत से संकेतित विनिमय दर के हिसाब से यह करीब 28,300 करोड़ रुपये होता है. यह फेयरफैक्स द्वारा IDBI के लिए चुकाई जा रही रकम का 54 फीसदी है.
ATB कॉरमार्क के एक अन्य विश्लेषक ने कॉन्फ्रेंस कॉल में वत्सा से इस योजना का सार बताते हुए कहा, "डिजिट और IIFL को इसमें शामिल किया जाएगा. आप नकदी लेंगे, शायद अतिरिक्त पूंजी से." वत्सा ने जवाब में कहा, "हां, यह सही है, जेफ." इसके बाद उन्होंने हिस्सेदारी की सीमा पर बात की.
अभी सौदे की कोई अंतिम संरचना तय नहीं हुई है और वत्सा ने यह भी कहा कि IDBI एक सार्वजनिक कंपनी है. लेकिन जब उनसे सीधे पूछा गया कि IDBI भुगतान कैसे करेगा, तो उनका जवाब था- नकद.
IDBI के दूसरे शेयरधारकों के लिए सवाल
फेयरफैक्स के पास IDBI की 60.72 फीसदी हिस्सेदारी होगी. बाकी 39.28 फीसदी हिस्सेदारी अन्य शेयरधारकों के पास होगी, जिसमें ज्यादातर हिस्सा सरकार और LIC का है.
IDBI को अपनी नकदी के बदले इन तीनों कंपनियों के शेयर मिलेंगे, इसलिए यह पैसा बिना किसी बदले के नहीं दिया जा रहा है. लेकिन यह बैंक का पैसा है और हर शेयरधारक का इस बात में हित है कि इसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है. इससे तीन सवाल उठते हैं:
- क्या इन कारोबारों का स्वतंत्र और उचित मूल्यांकन किया जा रहा है, खासकर गो डिजिट लाइफ का, जिसका कोई बाजार मूल्य नहीं है?
- क्या बैंक अपनी इतनी पूंजी इन कंपनियों पर खर्च करने की स्थिति में है?
- क्या यह खरीद सभी शेयरधारकों के हित में है या मुख्य रूप से उस विक्रेता के हित में, जिसका खरीदार पर नियंत्रण है?
यह पूंजी किसकी है?
IDBI की "अतिरिक्त पूंजी" अचानक नहीं आई है.
एक दशक पहले IDBI भारत के सबसे संकटग्रस्त बैंकों में शामिल था. इसे संकट से निकालने के लिए सरकार और भारत की सरकारी बीमा कंपनी LIC ने पूंजी लगाई थी. 2019 में दोनों ने बैंक का नियंत्रण अपने हाथ में लिया. इसी साल कैबिनेट ने 9,300 करोड़ रुपये की अतिरिक्त पूंजी को मंजूरी दी थी, जिसे सरकार और LIC के बीच बांटा गया था.
वत्सा ने कॉन्फ्रेंस कॉल में खुद इस बात को स्वीकार किया. उन्होंने कहा कि IDBI "2016 से 2020 के दौरान संकट में आ गया था" और उसे करीब 6.4 अरब डॉलर का संचयी नुकसान हुआ था, जिसकी भरपाई LIC और भारत सरकार ने की थी.
यह बदलाव सफल रहा. 30 सितंबर, 2026 को IDBI का पूंजी पर्याप्तता अनुपात 27.10 फीसदी था. यह पूंजी संरक्षण बफर सहित 11.5 फीसदी के नियामकीय न्यूनतम स्तर से दोगुने से भी ज्यादा है.
पूंजी पर्याप्तता अनुपात का मतलब तिजोरी में रखी नकदी नहीं है. लेकिन यह वह वित्तीय मजबूती है, जिसे सार्वजनिक धन से दोबारा खड़ा किया गया.
अब यही मजबूती फेयरफैक्स के निवेश प्रस्ताव का अहम आधार है. और फेयरफैक्स के चेयरमैन का कहना है कि बैंक की "अतिरिक्त पूंजी" का इस्तेमाल फेयरफैक्स की अपनी कंपनियों के लिए नकद भुगतान में होगा.
कॉन्फ्रेंस कॉल में वत्सा ने IDBI को "27 फीसदी पूंजी पर्याप्तता के साथ वित्तीय रूप से बेहद मजबूत" बताया और इसकी खरीद को "जीवन में एक बार मिलने वाला अवसर" कहा. बैंक के भविष्य के डिविडेंड के बारे में उन्होंने कहा, "उनके पास बहुत अच्छी पूंजी है. और यह रकम हमारे पास आएगी."
RBI के लिए एक सवाल
RBI इस बात की सीमा तय करता है कि कोई बैंक अपनी कितनी पूंजी दूसरी कंपनियों में लगा सकता है. वित्तीय सेवाओं से जुड़े वाणिज्यिक बैंकों के लिए 2025 के निर्देशों के तहत:
- किसी बैंक की एक सहायक कंपनी या वित्तीय सेवा कंपनी में इक्विटी हिस्सेदारी "बैंक की चुकता शेयर पूंजी और रिजर्व के 10 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए" (पैरा 23).
- ऐसी सभी कंपनियों में बैंक की कुल इक्विटी हिस्सेदारी "20 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए" (पैरा 26).
इन सीमाओं की गणना बैंक की चुकता पूंजी और रिजर्व के आधार पर होती है, न कि नेटवर्थ के आधार पर. IDBI के मौजूदा निवेश भी इन सीमाओं में शामिल होंगे. फेयरफैक्स ने इन तीनों कारोबारों का मूल्य करीब 3 अरब डॉलर बताया है. लेकिन इतनी बड़ी खरीद इन सीमाओं के भीतर कैसे आएगी और इसके लिए किन मंजूरियों की जरूरत होगी, इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.
इन निर्देशों के तहत ऐसे निवेश के लिए RBI की पहले से मंजूरी लेना भी जरूरी है. इसलिए वत्सा की ओर से बताए गए नकद भुगतान नियामकीय स्तर पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. इन सीमाओं को किस तरह लागू किया जाएगा, यह सौदे की संरचना पर निर्भर करेगा और अभी यह तय नहीं हुई है.
फेयरफैक्स ने कहा है कि इन योगदानों के लिए RBI, SEBI और डिजिट के मामले में बीमा नियामक IRDAI की मंजूरी जरूरी होगी.
क्या सरकार ने अपना अधिकार छोड़ दिया?
बिक्री के बाद भी सरकार और LIC के पास IDBI की 34 फीसदी हिस्सेदारी रहेगी. लेकिन उन्होंने कोई विशेष अधिकार अपने पास नहीं रखने पर सहमति जताई है.
DIPAM के 13 अगस्त, 2026 के आंतरिक नोट में इस फैसले का उल्लेख है, जिसकी रिपोर्ट Businessworld पहले ही कर चुका है. नोट के मुताबिक, सरकार ने शेयर खरीद समझौते का विकल्प इसलिए चुना क्योंकि "IDBI बैंक के प्रबंधन नियंत्रण का हस्तांतरण होगा और सौदा पूरा होने के बाद भारत सरकार और LIC को अनुबंध के तहत कोई विशेष अधिकार नहीं दिए जाएंगे" (पैरा 2.6).
क्या इसका मतलब यह है कि उन्हें किसी भी तरह के शेयरधारक मतदान अधिकार नहीं मिलेंगे? ऐसे बयानों पर सरकार से स्पष्टता की जरूरत है. सरकार का यह भी कहना है कि दोनों IDBI के बोर्ड से अपने नामित निदेशकों को वापस बुला लेंगे.
इसी नोट में फेयरफैक्स को खरीदार के रूप में चुनने की सिफारिश की गई थी. इसमें फेयरफैक्स की उस योजना का उल्लेख नहीं है, जिसके तहत IDBI को गो डिजिट और IIFL कैपिटल का अधिग्रहण करना था. यह भी नहीं बताया गया है कि सरकार को इस योजना की जानकारी थी या नहीं. फेयरफैक्स ने 14 अक्टूबर को इस योजना की घोषणा की थी. इसी दिन कैबिनेट ने बिक्री को मंजूरी दी थी.
घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है
- सरकार ने IDBI को 81 रुपये प्रति शेयर के भाव पर बेचा, जो उस दिन के बाजार मूल्य से करीब 10 फीसदी कम था.
- बिक्री के बाद सरकार ने अपने विशेष अधिकार छोड़ दिए.
- एक दिन के भीतर फेयरफैक्स ने कहा कि IDBI की अतिरिक्त पूंजी से फेयरफैक्स की अपनी कंपनियों को बाजार भाव पर खरीदा जाएगा.
## फेयरफैक्स का पक्ष
फेयरफैक्स का कहना है कि इस योजना से "एक एकीकृत वित्तीय सेवा कंपनी तैयार होगी, जो भारतीयों की वित्तीय जरूरतों के लिए एक ही जगह पर समाधान उपलब्ध करा सकेगी." डिजिट, IDBI के ग्राहकों को बीमा बेच सकती है. कॉन्फ्रेंस कॉल में वत्सा ने कहा था कि फेयरफैक्स इन कारोबारों का विलय नहीं करेगी और न ही उनका नाम बदलेगी. उन्होंने कहा, "हमने कभी भी तालमेल से मिलने वाले फायदे (सिनर्जी) में विश्वास नहीं किया है."
इस योजना के पक्ष में एक ठोस तर्क भी है.
एक दशक से भी कम समय पहले शुरू हुई गो डिजिट अब एक सूचीबद्ध और मुनाफे में चल रही बीमा कंपनी है. IIFL कैपिटल एक स्थापित ब्रोकरेज कंपनी है. IDBI के ग्राहकों को डिजिट का बीमा बेचने से बैंक को कमाई हो सकती है और इसका फायदा उसके सभी शेयरधारकों, सरकार और LIC को भी मिल सकता है.
लेकिन कंपनियां अच्छी हैं या नहीं, यह एक अलग सवाल है. शर्तें कौन तय करेगा, यह दूसरा सवाल है. फेयरफैक्स विक्रेता होगी. IDBI के नियंत्रक शेयरधारक के रूप में खरीदार की ओर से भी उसका निर्णायक प्रभाव होगा. कोई अच्छा कारोबार भी बैंक के दूसरे शेयरधारकों को नुकसान पहुंचा सकता है, अगर कीमत और सौदे का समय उस पक्ष की ओर से तय किया जाए, जो दूसरी तरफ बैठा है.
भारतीय नियम इस जोखिम को पहचानते हैं. सूचीबद्ध कंपनियों के लिए SEBI के नियमों के तहत संबंधित पक्षों के साथ बड़े लेनदेन के लिए कंपनी की ऑडिट समिति और शेयरधारकों की मंजूरी जरूरी होती है. ऐसे लेनदेन में संबंधित पक्षों को मतदान करने की अनुमति नहीं होती.
फेयरफैक्स यह वादा भी नहीं कर रही है कि वह IDBI के कामकाज के तरीके में बदलाव करेगी. कॉन्फ्रेंस कॉल में वत्सा ने कहा था कि राकेश शर्मा मुख्य कार्यकारी अधिकारी बने रहेंगे. डिजिट और IIFL कैपिटल "काफी हद तक स्वतंत्र रूप से" काम करती रहेंगी. उन्होंने दोहराया कि फेयरफैक्स ने "कभी भी सिनर्जी में विश्वास नहीं किया है."
इस योजना के पक्ष में तर्क इन कंपनियों के कारोबार पर आधारित है. लेकिन यह खबर पैसे और उसके इस्तेमाल का फैसला कौन करेगा, इस सवाल को उठा रही है.
फेयरफैक्स इस बात पर भी जोर दे रही है कि अभी कुछ भी अंतिम नहीं है.
कोई बाध्यकारी समझौता नहीं हुआ है. उसकी विज्ञप्ति में कहा गया है कि IDBI की खरीद "दोनों या इनमें से किसी एक योगदान के पूरा हुए बिना भी हो सकती है." इसमें यह भी कहा गया है कि डिजिट या IIFL कैपिटल के संचालन और प्रबंधन के तरीके में किसी बदलाव की उम्मीद नहीं है.
वत्सा ने कॉन्फ्रेंस कॉल की शुरुआत में "सरकार और उनकी टीम को बेहद पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया अपनाने" के लिए धन्यवाद दिया था. हालांकि, DIPAM के अपने नोट में दर्ज है कि केवल एक बोलीदाता ने संशोधित प्रस्ताव जमा किया था और पहली बोलियां असफल होने के बाद रिजर्व प्राइस को खारिज कर दिया गया था.
इन सबके बावजूद बुनियादी गणित नहीं बदलता. एक खरीदार, जो कैबिनेट के फैसले वाले दिन IDBI के शेयर मूल्य से करीब 10 फीसदी कम भुगतान कर रहा है, प्रस्ताव दे रहा है कि बैंक अपनी अतिरिक्त पूंजी से खरीदार की अपनी कंपनियों को बाजार भाव पर खरीदे.
सवाल
- क्या फेयरफैक्स की बोली में सरकार को बताया गया था कि IDBI की पूंजी का इस्तेमाल फेयरफैक्स की कंपनियों को खरीदने के लिए किया जाएगा?
- क्या सरकार या उसके मूल्यांकनकर्ताओं ने 81 रुपये की कीमत को उचित मानते समय इस बात को ध्यान में रखा था?
- क्या IDBI नकद भुगतान करेगा या शेयर जारी करेगा? अगर नकद भुगतान होगा, तो कितनी रकम दी जाएगी?
- RBI इन खरीद पर 10 फीसदी और 20 फीसदी की निवेश सीमाएं कैसे लागू करेगा?
- गो डिजिट लाइफ का मूल्यांकन कौन करेगा, जिसका कोई बाजार मूल्य उपलब्ध नहीं है?
- क्या IDBI के सबसे बड़े अल्पसंख्यक शेयरधारकों के रूप में सरकार और LIC को इस हस्तांतरण पर मतदान का अधिकार मिलेगा?
संपादक की टिप्पणी
- श्री वत्सा और श्री क्लार्क के सभी उद्धरण 15 अक्टूबर की कॉन्फ्रेंस कॉल की पूरी ट्रांसक्रिप्ट से लिए गए हैं.
- 28,300 करोड़ रुपये = 3 अरब डॉलर × (52,878 करोड़ रुपये ÷ 5.6 अरब डॉलर). क्लार्क का 3 अरब डॉलर का आंकड़ा तीनों कंपनियों के लिए है, जिसमें गैर-सूचीबद्ध गो डिजिट लाइफ भी शामिल है. 54% = 3 ÷ 5.6. 46% = 28,300 ÷ 61,164.
- हिस्सेदारी का मूल्य Businessworld की गणना पर आधारित है.
- 30 अक्टूबर को कारोबार बंद होने के समय गो डिजिट जनरल का बाजार पूंजीकरण 24,109 करोड़ रुपये था (स्क्रीनर); इसका 57 फीसदी करीब 13,700 करोड़ रुपये होता है.
- 57 फीसदी का आंकड़ा जेफरीज और अन्य रिपोर्टों से लिया गया है; फेयरफैक्स की विज्ञप्ति में कोई प्रतिशत नहीं दिया गया है.
- IIFL कैपिटल के बारे में वत्सा ने कॉन्फ्रेंस कॉल में कहा था कि फेयरफैक्स के पास "मेरा ख्याल है, इसकी 51 फीसदी हिस्सेदारी होगी."
पलक शाह, BW रिपोर्टर्स
(BW रिपोर्टर्स पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free की लेखिका हैं. यह एक तीखा खुलासा है, जिसने भारत के वित्तीय बाजारों के छिपे हुए पक्ष को सामने लाया. मुंबई में करीब दो दशकों की जमीनी रिपोर्टिंग के साथ पलक ने पैसे, सत्ता और नियमन के बीच के गठजोड़ की गहराई से पड़ताल करने वाले पत्रकार के रूप में पहचान बनाई है. उनके लेख भारत के प्रतिष्ठित वित्तीय दैनिकों, जिनमें The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line शामिल हैं, में प्रकाशित हुए हैं.
19 वर्ष की उम्र में अपराध रिपोर्टिंग की ओर आकर्षित हुईं पलक ने जल्द ही महसूस किया कि 1980 के दशक के मुंबई के गैंग युद्धों की जगह अब कॉरपोरेट टावरों में चलने वाली सफेदपोश योजनाओं ने ले ली है. इस समझ ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने भारत की ‘व्हाइट मनी’ अर्थव्यवस्था की जटिल गतिविधियों को समझने में वर्षों बिताए हैं. शेयर बाजार में हेरफेर से लेकर नियामकीय खामियों तक, उनका काम हाई फाइनेंस की चमकदार सतह के पीछे छिपे उन समूहों को सामने लाता है जो पर्दे के पीछे से फैसलों को प्रभावित करते हैं. सच्चाई सामने लाने का उनका जुनून और उन कड़ियों को जोड़ने की क्षमता, जिन्हें दूसरे नजरअंदाज कर देते हैं, उन्हें एक मजबूत पत्रकार बनाती है, जो यथास्थिति को चुनौती देने और उन खिलाड़ियों को बेनकाब करने से नहीं डरतीं जो खुद को कानून से ऊपर समझते हैं.)
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