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Starbucks के भारतीय मूल के सीईओ नरसिम्हन ने क्यों छोड़ दिया कंपनी का साथ?

स्टारबक्स के टॉप मैनेजमेंट में बड़ा बदलाव हुआ है. कंपनी के भारतीय मूल के सीईओ लक्ष्मण नरसिम्हन ने इस्तीफा दे दिया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago

कॉफी के कद्रदानों के बीच स्टारबक्स (Starbucks) बेहद लोकप्रिय है. भारत में भी इस अमेरिकी कंपनी के चाहने वालों की लंबी-चौड़ी फौज है, जिसमें सबसे ज्यादा तादाद युवाओं की है. फिलहाल, Starbucks अपने मैनेजमेंट में हुए बदलाव को लेकर चर्चा में है. कंपनी के भारतीय मूल के सीईओ लक्ष्मण नरसिम्हन ने पद छोड़ दिया है. स्टारबक्स ने लक्ष्मण की जगह ब्रायन निकोल को नया सीईओ बनाया है.

2022 में हुई थी नियुक्ति 
स्टारबक्स ने लक्ष्मण नरसिम्हन को सितंबर 2022 में सीईओ नियुक्त किया था. लेकिन अब वह इस जिम्मेदारी से मुक्त हो गए हैं साथ ही कंपनी के बोर्ड से भी बाहर निकल रहे हैं. यानी लक्ष्मण स्टारबक्स से पूरी तरह से नाता तोड़ने वाले हैं. बताया जा रहा है कि निवेशक इलियट इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट और स्टारबोर्ड वैल्यू द्वारा स्टारबक्स में हिस्सेदारी हासिल करने के बाद कंपनी की लीडरशिप में यह बदलाव आया है. 

Howard Schultz रहे हैं हीरो
अब जब स्टारबक्स की बात निकली है, तो फिर उस शख्स की बात करना भी जरूरी हो जाता है, जिसने Starbucks को सफलता के इस मुकाम तक पहुंचाया. हॉवर्ड स्कूल्ज (Howard Schultz) Starbucks Coffee के पूर्व सीईओ हैं. पिछले साल सितंबर में उनके कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स से इस्तीफा देने की खबर सामने आई थी. कंपनी ने उन्हें Lifelong Chairman Emeritus का दर्जा दिया है. स्कूल्ज की बेहतर रणनीति की बदौलत ही स्टारबक्स आज इस मुकाम पर है कि बच्चे भी उसका नाम जानते हैं. हॉवर्ड स्कूल्ज का जन्म साल 1953 में न्यूयॉर्क में हुआ. परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए उन्होंने कम उम्र में ही नौकरी शुरू कर दी. इस बीच, पिता की जॉब चले जाने से परिवार पर आर्थिक परेशानियों का पहाड़ टूट गया, लेकिन स्कूल्ज हालातों से लड़ते रहे.

एंट्री-लेवल सेल्समैन
स्कूल्ज के सपने बड़े थे और वो उन सपनों को पूरा करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने आगे पढ़ने का फैसला किया. लेकिन पैसों की कमी उनकी इस राह में बाधा थी, इस बाधा को दूर करने के लिए उन्होंने स्कॉलरशिप हासिल की. वह अपने परिवार में यूनिवर्सिटी जाने वाले पहले व्यक्ति थे. हॉवर्ड स्कूल्ज ने Xerox में एंट्री-लेवल सेल्समैन की नौकरी की, ताकि परिवार को संभाल सकें और अपने सपनों को पूरा कर सकें.  

कॉफी बीन्स बेची
कुछ समय बाद उन्होंने एक कॉफी रोस्टर में नौकरी की. बता दें कि स्टारबक्स पहले कॉफी रोस्टर था, जो बाद में कॉफी शॉप बना. हॉवर्ड वहां कॉफी बीन्स बेचा करते थे. हालांकि, जल्द ही अपनी काबिलियत के बल पर उन्होंने बड़ा पद हासिल किया. एक बार वह किसी दूसरे कॉफी हाउस गए, जहां का वातावरण उन्हें बेहद पसंद आया. इसके बाद उनके मन में एक ऐसा कॉफी हाउस खोलने की इच्छा हुई, जहां लोग साथ बैठकर कॉफी पी सकें. उन्होंने अपने मालिकों के सामने यह प्रस्ताव रखा, लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया. हावर्ड को मालिकों का यह रुख नागवार गुजरा और उन्होंने नौकरी छोड़कर खुद की कॉफी आउटलेट शुरू की.  

खरीद लिया स्टारबक्स
1984 में जब हावर्ड को यह पता चला कि स्टारबक्स को बेचा जा रहा है, तो उन्होंने उसे खरीद लिया और फिर अपने सपने पूरे करने में जुट गए. उन्होंने देश-विदेश में कंपनी की शाखाएं खोलीं. नए-नए आईडियाज के दम पर उन्होंने स्टारबक्स को लोगों के बीच फेमस कर दिया. आज स्टारबक्स तेजी विस्तार कर रही है. पिछले साल कंपनी ने 318 नए आउटलेट्स खोले थे. इसके साथ दुनियाभर में उसके आउटलेट्स की संख्या बढ़कर 36,000 हो गई है. भारत में स्टारबक्स ने टाटा ग्लोबल बेवरेजेज के साथ अक्टूबर 2012 में एंट्री ली थी. 
 


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