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मेडिकल डिवाइस के फेक सर्टिफिकेशन को लेकर किसने बढाई इस सेक्टर की समस्या
किसी भी सरकारी या गैरसरकारी टेंडर में हिस्सा लेने के लिए भी ऐसे सर्टिफिकेशन की जरूरत पड़ती है लिहाज़ा सबस्टैंडर्ड क्वालिटी के डिवाईस बनाने वाले मैन्यूफैक्चरर अक्सर फेक सर्टिफिकेशन का सहारा लेते हैं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 3 years ago
देश में धडल्ले से बिकने वाले थर्मामीटर,ब्लडप्रेशर मॉनिटर से लेकर महंगे सर्जिकल इंप्लांट इनकी क्वालिटी को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. ऑल इंडिया मेडिकल डिवाइस मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन के मुताबिक घरेलू मैन्युफैक्चरर बड़े पैमाने पर फेक या काउंटरफीट सर्टिफिकेट का इस्तेमाल कर रहे हैं. ताकि ग्राहकों को क्वालिटी को लेकर संदेह पैदा न हो. अब एसोसिएशन ने इस मुद्दे पर स्वास्थ्य और वाणिज्य मंत्रालय को चिट्ठी लिख कर फेक सर्टिफिकेशन के जरिए लोगों को चूना लगाने के धंधे पर रोक लगाने की मांग की है.
क्या लिखा है आखिर इस खत में
अगर आप बाजार से कोई भी प्रोडक्ट सिर्फ इसलिए खरीद लेते हैं क्योंकि उस पर USFDAअप्रूव्ड लिखा है या CEसर्टिफाइड है या फिर ISO 9000 लिखा होता है तो आपको ये खबर ध्यान से पढ़नी चाहिए. अब आप बाजार से भले ही मास्क,थर्मामीटर,ऑक्सीमीटर,ब्लडप्रेशर मॉनिटर हो या फिर मेल-फीमेल कॉन्ट्रासेप्टिव खरीदें या कुछ और यही नहीं हॉस्पिटल में भी धडल्ले से इस्तेमाल होने वाले सर्जिकल ड्रेसिंग,आईवी सेट,कैनुला,सिरिंज,कोरोनरी स्टेंट्स, ऑर्थोपेडिक और डेन्टल इंप्लांट हो सभी दरअसल संदेह के घेरे में है. क्योंकि ऑल इंडिया मेडिकल डिवाईस मैन्यूफैक्चरर एसोसिएशन के फोरम कोऑर्डिनेटर राजीव नाथ बताते हैं कि उनकी एसोशिएसन के द्वारा सरकार को चिट्ठी लिख देश में बड़े पैमाने पर चल रहे फेक या काउंटरफीट सर्टिफिकेशन के गोरखधंधे पर नकेल कसने की मांग की है. एसोशिएसन की मांग है कि देश में फर्जी सर्टिफिकेशन का कारोबार हो रहा है जिससे इनकी गुणवत्ता सवालों के घेरे में है.
क्यों जरूरत है आखिर सर्टिफिकेट
दरअसल किसी भी सरकारी या गैरसरकारी टेंडर में हिस्सा लेने के लिए भी ऐसे सर्टिफिकेशन की जरूरत पड़ती है लिहाज़ा सबस्टैंडर्ड क्वालिटी के मेडिकल डिवाईस बनाने वाले मैन्यूफैक्चरर अक्सर फेक सर्टिफिकेशन का सहारा लेते हैं. हालांकि इम्पोर्टेड या देश के अंदर बने मेडिकल डिवाईसेज़ की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए MDR 2017लागू होना है. जिसका एक खंड लागू हो चुका है जबकि बाकी अभी लागू होना है। जिसके तहत लो रिस्क से हाई रिस्क वाली मेडिकल डिवाईसेज़ की चार कैटेगरी A, B,औरC, Dतय की गई है. जिसे लागू करने की जिम्मेदारी सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाईजेशन की है. साथ ही क्वालिटी कंट्रोल ऑफ इंडिया भी इस मुहिम में जुटा हुआ है.
क्या है इसका समाधान
एसोसिएशन की ओर से लिखी चिट्ठी में इस समस्या को लेकर उपाय भी सुझाये गए हैं. घरेलू मेडिकल डिवाईसे मैन्यूफैक्चरिंग इंडस्ट्री की ये भी मांग है कि सरकारी खरीद में विदेशी USFDA या CE सर्टिफिकेशन को प्रायोरिटी देने के बजाय नेशनल एक्रेडिशन बोर्ड फॉर सर्टिफिकेशन बॉडीज के द्वारा जारी किए गए सर्टिफिकेट्स का भी विकल्प मुहैया कराएं. जिससे फेक सर्टिफिकेशन में कमी आ सके, और आम आदमी को क्वालिटी मिल सके
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