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जब बोर्डरूम बन जाए ब्रांडरूम: टाटा ब्रांड की रक्षा कौन करेगा?
इतने मजबूत तरीके से भरोसे से जुड़े समूह के लिए बड़ा सवाल यह है कि क्या लंबे समय तक बनी रहने वाली अनिश्चितता अंततः व्यापक टाटा समूह को लेकर धारणाओं को प्रभावित कर सकती है, लिखते हैं डॉ. अनुराग बत्रा
डॉ. अनुराग बत्रा 1 hour ago
टाटा का बोर्डरूम शायद ही कभी वह जगह रहा है, जहां सार्वजनिक मतभेद खबर का विषय बनते हैं. लेकिन टाटा संस के चेयरमैन के रूप में एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर मौजूदा विवाद ने स्थिति बदल दी है. जो मामला शुरुआत में कॉरपोरेट गवर्नेंस का मुद्दा था, वह अब सार्वजनिक रूप से सामने आ रहा है, जिसमें टाटा ट्रस्ट्स ने बोर्ड के फैसले की वैधता पर सवाल उठाया है.
बिजनेस मीडिया के लिए स्वाभाविक रूप से ध्यान गवर्नेंस, नियंत्रण, टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका और टाटा संस के भविष्य पर है. लेकिन एक और सवाल है, जिस पर ध्यान देने की जरूरत है: क्या बोर्डरूम का विवाद अंततः कॉरपोरेट छवि तक पहुंच सकता है और समय के साथ व्यक्तिगत टाटा ब्रांड्स को भी प्रभावित कर सकता है?
प्रतिष्ठा का जोखिम
टाटा केवल एक कॉरपोरेट समूह नहीं है. यह एक ऐसा नाम है, जो पीढ़ियों से भरोसे, ईमानदारी, संस्थागत विश्वसनीयता और जिम्मेदार कारोबार के इर्द-गिर्द बना है. यह प्रतिष्ठा पूरे समूह में एक अमूर्त संपत्ति है.
इसीलिए नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक मतभेद को केवल एक और कॉरपोरेट लड़ाई के रूप में नहीं देखा जा सकता.
तत्काल कारोबारी प्रभाव सीमित हो सकता है. टाटा की कंपनियां कारों का निर्माण, तकनीकी सेवाएं उपलब्ध कराना, होटल चलाना, उपभोक्ता उत्पाद बेचना और अपनी-अपनी विकास रणनीतियों को आगे बढ़ाना जारी रखेंगी. लेकिन प्रतिष्ठा अलग तरह से काम करती है. यह केवल इस बात से प्रभावित नहीं होती कि कोई कंपनी क्या करती है, बल्कि इससे भी प्रभावित होती है कि हितधारक उसके पीछे मौजूद संस्थान को लेकर क्या धारणा रखते हैं.
इतने मजबूत तरीके से भरोसे से जुड़े समूह के लिए बड़ा सवाल यह है कि क्या नेतृत्व स्तर पर लंबे समय तक बनी रहने वाली अनिश्चितता अंततः व्यापक टाटा समूह को लेकर धारणाओं को प्रभावित कर सकती है.
दो छवियों की रक्षा
वास्तव में दो प्रतिष्ठाओं की रक्षा करनी है.
पहली है टाटा की कॉरपोरेट छवि, उसका गवर्नेंस, नेतृत्व, स्थिरता और निवेशकों, कर्मचारियों, साझेदारों तथा नियामकों के बीच विश्वसनीयता.
दूसरी है टाटा की व्यक्तिगत कंपनियों की ब्रांड छवि.
इन दोनों को एक ही कहानी नहीं बनने देना चाहिए.
टाटा की कार खरीदने वाला ग्राहक शायद टाटा संस के बोर्डरूम में चल रही गतिविधियों पर करीबी नजर नहीं रख रहा होगा. टीसीएस का ग्राहक मुख्य रूप से तकनीक, डिलीवरी और कारोबारी नतीजों को लेकर चिंतित होता है. ताज का मेहमान अनुभव पर ध्यान देता है.
लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि दोनों दुनिया पूरी तरह एक-दूसरे से अलग हैं.
सवाल यह है कि क्या शीर्ष स्तर का यह विवाद बोर्डरूम तक सीमित रहेगा या धीरे-धीरे व्यापक कॉरपोरेट और ब्रांड तंत्र को लेकर लोगों की धारणाओं तक पहुंच जाएगा.
फिलहाल ऐसा होने के कोई तत्काल प्रमाण नहीं हो सकते हैं. लेकिन यही वह वजह है कि संचार टीमों को पहले से सोचने की जरूरत है.
प्रतिष्ठा पर दबाव आने के बाद उसे सुधारने की तुलना में दबाव आने से पहले उसकी रक्षा करना हमेशा बेहतर होता है.
सावधानी, घबराहट नहीं
इसका मतलब यह नहीं है कि हर टाटा ब्रांड को बोर्डरूम में हो रहे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देना शुरू कर देना चाहिए.
इसके बिल्कुल विपरीत.
व्यक्तिगत कारोबारों को अपनी ताकत, प्रदर्शन, नवाचार, ग्राहक पेशकश और विकास योजनाओं के बारे में संवाद जारी रखना चाहिए. उन्हें होल्डिंग कंपनी के विवाद को अपने रोजमर्रा के ब्रांड नैरेटिव का हिस्सा बनने से बचना चाहिए.
हालांकि कॉरपोरेट स्तर पर संचार की प्रतिक्रिया अधिक सोच-समझकर तय करने की जरूरत है.
उद्देश्य भरोसा बनाए रखना, जहां जरूरी हो वहां स्पष्टता देना और कर्मचारियों, निवेशकों, साझेदारों तथा अन्य हितधारकों को यह भरोसा दिलाना होना चाहिए कि कारोबारी निरंतरता प्रभावित नहीं हुई है.
यह ऐसा संकट पैदा करने के बारे में नहीं है, जहां शायद कोई संकट है ही नहीं. यह इस संभावना के लिए तैयार रहने के बारे में है कि गवर्नेंस का विवाद प्रतिष्ठा से जुड़ा मुद्दा बन सकता है.
संचार के बीच संतुलन
यहीं टाटा के कॉरपोरेट संचार विभाग के सामने एक नाजुक संतुलन की चुनौती आती है.
बाहरी स्तर पर विवाद को और बढ़ावा दिए बिना स्पष्टता की जरूरत है. आंतरिक स्तर पर कर्मचारियों को यह भरोसा दिलाने की जरूरत है कि उनके कारोबार अपने काम पर केंद्रित हैं और परिचालन प्राथमिकताओं में बदलाव नहीं हुआ है.
ऐसी स्थितियों में सबसे बड़ा खतरा संचार का खालीपन होता है. जब संगठन स्पष्टता उपलब्ध नहीं कराते, तो अटकलें उस जगह को भर देती हैं.
साथ ही, जरूरत से ज्यादा संवाद किसी मुद्दे को उसकी वास्तविकता से बड़ा दिखा सकता है.
इसलिए इसका जवाब जरूरी नहीं कि अधिक संवाद हो. जवाब अधिक उद्देश्यपूर्ण संवाद है.
टाटा संस को गवर्नेंस के मुद्दे को पारदर्शिता और संयम के साथ संबोधित करना होगा, जबकि व्यक्तिगत टाटा कंपनियों को कारोबार, ग्राहकों और विकास पर केंद्रित रहना होगा.
टाटा के प्रभाव की रक्षा
इसका एक और पहलू भी है.
टाटा का नाम उसके कई कारोबारों को एक महत्वपूर्ण संस्थागत प्रभाव प्रदान करता है. यह प्रभाव दशकों में बना है और इसे मूल संगठन को लेकर बनी धारणाओं से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता.
यह वित्तीय बाजारों में विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है, जहां गवर्नेंस और नेतृत्व से जुड़े सवाल निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं.
लेकिन संचार के स्तर पर किसी खास कॉरपोरेट घटनाक्रम को लेकर बाजार की प्रतिक्रिया और व्यक्तिगत कारोबारों के दीर्घकालिक मूल सिद्धांतों के बीच अंतर करना जरूरी है.
उद्देश्य यह होना चाहिए कि गवर्नेंस का विवाद पूरे टाटा समूह के लिए एक संक्षिप्त पहचान न बन जाए.
ब्रांडरूम का महत्व
बोर्डरूम के मतभेद अंततः गवर्नेंस तंत्र, शेयरधारकों के फैसलों या अन्य उपयुक्त प्रक्रियाओं के जरिए सुलझ जाएंगे.
ब्रांड की प्रतिष्ठा अलग होती है.
यह ग्राहकों, कर्मचारियों, निवेशकों और समाज के साथ हजारों संवादों के जरिए धीरे-धीरे बनती है. जब कॉरपोरेट नैरेटिव किसी ब्रांड से जुड़े मूल्यों को चुनौती देने लगे, तो यह तेजी से प्रभावित भी हो सकती है.
इसलिए टाटा के लिए चुनौती यह तय करने से कहीं बड़ी है कि शीर्ष पर कौन बैठता है.
यह सुनिश्चित करने की चुनौती है कि जब बोर्डरूम अपने मतभेदों से निपट रहा हो, तब टाटा ब्रांड उन अपेक्षाओं के अनुरूप बना रहे, जो हितधारकों ने उससे विकसित की हैं.
क्योंकि जब बोर्डरूम ब्रांडरूम बन जाता है, तब संचार केवल संकट को संभालने के बारे में नहीं रह जाता.
यह उस संस्थागत विरासत की रक्षा करने के बारे में होता है, इससे पहले कि बोर्डरूम का विवाद ब्रांड विवाद बनने का मौका पाए.
डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोर्ट्स
(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन और प्रधान संपादक तथा एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप के संस्थापक हैं. पहली पीढ़ी के उद्यमी और मीडिया जगत के दिग्गज के रूप में वह एंजल निवेशक, लेखक, टेलीविजन होस्ट और उद्यमियों तथा मीडिया पेशेवरों के मार्गदर्शक भी हैं.
वह कई कॉरपोरेट और संस्थागत बोर्डों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और प्रबंधन शिक्षा से उनका लंबे समय से जुड़ाव रहा है. MDI गुरुग्राम के पूर्व छात्र डॉ. बत्रा इसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में भी रह चुके हैं और MDI Alumni Association के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य कर चुके हैं.
वह International Academy of Television Arts & Sciences के सदस्य भी हैं. पढ़ने के शौकीन डॉ. बत्रा का मानना है कि जब जुनून ही किसी व्यक्ति का पेशा बन जाता है, तो काम को उद्देश्य की गहरी भावना मिलती है.)
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