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SBI रिपोर्ट में चेतावनी: बढ़ती बॉन्ड यील्ड, घटती लिक्विडिटी और RBI के लिए नई चुनौतियाँ

बैंकिंग सिस्टम में नकदी की कमी, रुपये पर दबाव, और महंगाई के अनुमान में लगातार चूक के बीच, RBI को नीतिगत संतुलन बनाने में बड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 10 months ago

भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल एक नाज़ुक मोड़ पर है. स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की ताजा रिसर्च रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि सरकारी बॉन्ड यील्ड तेजी से ऊपर जा रही है, बैंकिंग सिस्टम की नकदी लगातार कम हो रही है, रुपये पर दबाव बना हुआ है और महंगाई के अनुमान बार-बार चूक रहे हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले महीनों में RBI के सामने नीतिगत और वित्तीय प्रबंधन की बड़ी चुनौतियाँ खड़ी हो सकती हैं.

बॉन्ड यील्ड बढ़ने के कारण

SBI की रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि RBI ने 2025 में ब्याज दरों में कुल 100 आधार अंक की कटौती की, लेकिन 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड सिर्फ लगभग 30 आधार अंक तक ही नीचे आयी और जून के बाद फिर चढ़ने लगी. यह इसलिए क्योंकि वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई है,अमेरिका और यूरोप में ब्याज दरों को लेकर भ्रम, विदेशी निवेशकों का सुरक्षित निवेश की ओर लौटना, आदि. इन सब कारणों ने भारतीय बॉन्ड बाजार पर दबाव डाला है. रिपोर्ट यह भी बताती है कि RBI शायद बैकडोर से सरकारी बॉन्ड खरीद कर यील्ड को स्थिर रखने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि पिछले एक साल में उसकी हिस्सेदारी बढ़ी है.

बैंकिंग सिस्टम में नकदी की कमी क्यों?

रिपोर्ट के अनुसार, बैंकिंग सिस्टम में उपलब्ध लिक्विडिटी हाल के महीनों में बुरी तरह सिकुड़ गई है. SBI ने यह भी दिखाया है कि बैंकिंग व्यवस्था में नकदी की तंगी बनी हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक, RBI ने 30,750 करोड़ रुपये की नकदी व्यवस्था में डाली. इसके अलावा, सरकार के एडवांस टैक्स और जीएसटी भुगतान, सरकारी उधारी, और सबसे बड़ा कारण विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप ने नकदी के बाहर बहाव में योगदान दिया है. SBI रिपोर्ट के मुताबिक, रुपया दबाव को रोकने के लिए RBI ने विदेशी मुद्रा बेचकर बैंकिंग सिस्टम से रुपये बाहर निकाले हैं. 

दोहरी मौद्रिक नीति: OMO और VRRR का एक साथ प्रयोग

स्थिति और जटिल होती जा रही है क्योंकि RBI एक ही समय में दो विपरीत कदम उठा रहा है. एक ओर, वह ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के जरिए सरकारी बॉन्ड खरीद रहा है ताकि सिस्टम में स्थायी नकदी लाई जाए. दूसरी ओर, वह VRRR (वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो) नीलामियों के जरिए अस्थायी नकदी सिस्टम से बाहर ले रहा है.

SBI रिपोर्ट बताती है कि जनवरी से मई तक OMO खरीद के कारण कॉल-रेट गिरा था, लेकिन जून के बाद VRRR नीलामियों ने इसे फिर ऊपर धकेल दिया. यह संकेत है कि बाजार की पोजीशन अभी अस्थिर है और RBI को लिक्विडिटी प्रबंधन में बहुत सावधानी बरतनी पड़ रही है.

कॉरपोरेट बॉन्ड, बैंक लोन और म्युचुअल फंड में तेजी लेकिन जोखिम भी

SBI रिपोर्ट यह भी कहती है कि कॉर्पोरेट बॉन्ड, बैंक क्रेडिट और शॉर्ट‑टर्म म्युचुअल फंड्स में मजबूत वृद्धि दिख रही है. हालांकि, बैंक में जमा (डिपॉज़िट) उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही जितनी कि लोन मांग या बॉन्ड इश्यू. यह असंतुलन भविष्य में जोखिम पैदा कर सकता है क्योंकि अगर क्रेडिट मांग बनी रही और जमा नहीं बढ़ी, तो बैंक लिक्विडिटी की कमी का सामना कर सकते हैं. वहीं म्युचुअल फंड का पैसा ज्यादातर शॉर्ट‑टर्म सेक्टर में जा रहा है, जो संकेत देता है कि निवेशक अभी लम्बी अवधि को लेकर सतर्क हैं.

महंगाई अनुमान में चूक: MPC को नई चुनौती

SBI रिसर्च ने यह नोट किया है कि महंगाई (इन्फ्लेशन) के अनुमान बार-बार गलत साबित हुए हैं. कभी अनुमान से बहुत कम महंगाई आती है, कभी बहुत ज्यादा. यह मौद्रिक नीति बनाने और लागू करने में बड़ी समस्या पैदा करता है. जब मुद्रास्फीति की दिशा अस्पष्ट रहती है, तो RBI के लिए ब्याज दरों का फैसला करना कठिन हो जाता है और वह बहुत जल्दी दरें बदल सकता है या बहुत देर से कदम उठा सकता है, दोनों ही स्थिति में जोखिम है.

आगामी चुनौतियाँ और संभावित हल

SBI रिसर्च का मानना है कि आने वाले महीनों में भारत की अर्थव्यवस्था के सामने अनेक चुनौतियाँ होंगी:

1. बॉन्ड यील्ड का और ऊपर जाना
2. बैंकिंग सिस्टम में नकदी की कमी और लिक्विडिटी स्ट्रेस
3. मुद्रा पर दबाव में वृद्धि
4. वैश्विक अनिश्चितता का बने रहना

हालाँकि, रिपोर्ट यह भी कहती है कि RBI की रणनीति, बाजार के साथ खुले संवाद और नीतिगत संतुलन का प्रयास इन चुनौतियों से निपटने में कारगर हो सकता है.

 


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