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75 वर्ष के हुए यू. के. चौधरी: कॉर्पोरेट से दिवाला कानून तक पांच दशक लंबी कानूनी यात्रा

यू. के. चौधरी का करियर सिर्फ पदों या वर्षों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि भारतीय कानूनी व्यवस्था को मजबूत करने की उनकी निरंतर कोशिशों की कहानी है. अनुशासन, नैतिकता और उत्कृष्टता पर उनका विश्वास आने वाली पीढ़ियों के वकीलों के लिए प्रेरणा बना रहेगा.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 9 months ago

भारतीय कॉर्पोरेट, वाणिज्यिक और दिवाला कानून के क्षेत्र में वरिष्ठ अधिवक्ता यू. के. चौधरी का योगदान पांच दशकों से अधिक समय से संस्थागत मजबूती, अनुशासित अधिवक्तापन और उच्च नैतिक मानकों का प्रतीक रहा है. 15 दिसंबर को यू. के. चौधरी के 75वें जन्मदिन पर पर विधि जगत ने सिर्फ उनका जन्मदिन ही नहीं मनाया, बल्कि उस विरासत को भी सम्मान दिया, जिसने भारत के कॉर्पोरेट, वाणिज्यिक और दिवाला कानून को पाँच दशकों से अधिक समय तकदिशा दी है. दिल्ली उच्च न्यायालय के प्रतिष्ठित वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में उनका करियर अनुशासित वकालत, संस्थागत नेतृत्व और नैतिक मूल्यों के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है.

1986 में रखी यू. के. चौधरी एंड एसोसिएट्स नींव

यू. के. चौधरी ने वर्ष 1986 में यू. के. चौधरी एंड एसोसिएट्स की स्थापना एक स्पष्ट दर्शन के साथ की थी, ऐसी कानूनी सलाह देना जो प्रभावी, दक्ष और रचनात्मक हो, ताकि व्यक्ति और कॉर्पोरेट संस्थान अपने उद्देश्यों को न्यूनतम कानूनी जोखिम के साथ हासिल कर सकें. बीते वर्षों में इस फर्म ने सार्वजनिक उपक्रमों, रियल एस्टेट कंपनियों, मैन्युफैक्चरिंग और माइनिंग सेक्टर, रिटेलर्स, स्टॉक एक्सचेंजों और व्यक्तिगत वादियों सहित अनेक क्षेत्रों में सेवाएं दीं. यह विविधता चौधरी की कॉर्पोरेट और कमर्शियल लॉ पर गहरी पकड़ को दर्शाती है.

सीनियर एडवोकेट के रूप में पहचान

25 मार्च 2000 को दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सीनियर एडवोकेट नामित किए जाने के बाद भी चौधरी की पहचान दिखावे से नहीं, बल्कि बौद्धिक कठोरता और कोर्टरूम की उत्कृष्ट वकालत से बनी. खुद को “हार्ड-कोर लिटिगेंट” बताने वाले चौधरी ने एक बार स्पष्ट शब्दों में कहा था कि मंचीय भाषण देना उनकी शैली नहीं है. यह टिप्पणी उनकी विनम्रता और व्यावहारिक अधिवक्तापन को दर्शाती है.

दिवाला और शोधन अक्षमता कानून में अहम भूमिका

50 वर्षों से अधिक के कानूनी अनुभव के साथ यू. के. चौधरी ने भारत के *इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC)* के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे एनसीएलटी और एनसीएलएटी में कई हाई-प्रोफाइल मामलों में पेश हुए और भारत की क्रेडिटर-ड्रिवन दिवाला व्यवस्था को मजबूती देने में योगदान दिया.

संस्थागत निर्माण में भी सक्रिय

मुकदमों के साथ-साथ चौधरी एक मजबूत संस्थान निर्माता भी रहे हैं. वे वर्तमान में *एनसीएलटी बार एसोसिएशन* के अध्यक्ष हैं और ट्रिब्यूनल्स की बुनियादी संरचना, संस्थागत अधिकारों और न्यायिक स्वतंत्रता के लिए लगातार आवाज उठाते रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए उन्होंने हमेशा यह रेखांकित किया कि ट्रिब्यूनल्स को अधिकार के साथ-साथ गरिमा और दक्षता भी मिलनी चाहिए.

यू. के. चौधरी एलएलएम और लॉ में पीएचडी धारक हैं. वे इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरीज ऑफ इंडिया (ICSI) के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. उनका मानना रहा है कि कानूनी प्रैक्टिस में बौद्धिक गहराई और निरंतर अध्ययन अत्यंत आवश्यक है.

नई पीढ़ी के वकीलों पर भरोसा

युवा वकीलों की आलोचना के विपरीत, चौधरी ने नई पीढ़ी की “ईमानदारी और उच्च नैतिक दृष्टिकोण” की खुले तौर पर सराहना की है. उनके अनुसार आज के युवा वकील तकनीक-सक्षम, रिसर्च ओरिएंटेड और बहु-कौशल से लैस हैं. हालांकि, वे यह चेतावनी भी देते हैं कि उत्कृष्टता एक सतत प्रक्रिया है और औसत से ऊपर बने रहने के लिए निरंतर प्रयास जरूरी है.

नवंबर 2025 में कानूनी समुदाय ने उनके बार में 50 वर्ष और सीनियर एडवोकेट के रूप में 25 वर्ष पूरे होने का भी जश्न मनाया. 75 वर्ष की उम्र में भी यू. के. चौधरी सक्रिय रूप से मुकदमों की पैरवी कर रहे हैं और कॉर्पोरेट व दिवाला कानून से जुड़े विमर्श में अहम भूमिका निभा रहे हैं.


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