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ट्रंप के टैरिफ की मार: आंध्र प्रदेश के झींगा किसानों को नुकसान, कीमतों में 15% तक गिरावट

अमेरिका द्वारा भारतीय झींगा निर्यात पर टैरिफ बढ़ाने के फैसले ने आंध्र प्रदेश के झींगा किसानों को आर्थिक संकट में डाल दिया है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 11 months ago

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने 2 अप्रैल को जब जवाबी शुल्क (टैरिफ) लगाने की घोषणा की, तो भारत सहित दुनिया भर में झींगा पसंद करने वाले लोग निराश हो गए. अमेरिका में झींगा प्रेमी काफी संख्या में हैं और वहां इसकी खपत विभिन्न रूपों में होती है. ऐसे में शुल्क बढ़ने से इसका सीधा असर भारतीय झींगा निर्यात और विशेषकर आंध्र प्रदेश के किसानों पर पड़ा है.

गांवों तक पहुंची वैश्विक राजनीति की गूंज  
आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के लक्ष्मीपुरम-पल्लीपलेम क्षेत्र के किसान जो कभी ट्रंप के नाम से भी अनभिज्ञ थे, अब यह कहने लगे हैं कि “ट्रंप मेरे झींगा कारोबार को नुकसान पहुंचा रहे हैं.” वायरस के हमलों से पहले ही परेशान किसान अब अमेरिकी शुल्क की मार भी झेल रहे हैं, जिससे झींगा कीमतों में 10-15% की गिरावट आ चुकी है.

बीमारी, महंगे उपकरण और अब टैरिफ का संकट  
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कोविड के बाद बीमारी, उपकरणों और बिजली दरों की बढ़ती कीमतों ने किसानों की परेशानी बढ़ा दी थी. पहले उन्हें 60 काउंट वाले झींगे के लिए 400 रुपये प्रति किलो मिलते थे, अब यह घटकर मुश्किल से 300 रुपये रह गया है. अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले 30-50 काउंट झींगों की कीमतों में औसतन 40-50 रुपये प्रति किलो की गिरावट दर्ज की गई है.

झींगा किसानों का संघर्ष  
झींगा पालन से करीब 20 लाख लोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं. पश्चिमी गोदावरी जिले के गुटलापाडु गांव में रहने वाले किसानों का कहना है कि यह व्यवसाय पूरी तरह अनिश्चितताओं से भरा है, वायरस के प्रकोप से लेकर बाजार की गिरती कीमतें तक, हर मोड़ पर जोखिम बना रहता है.

झींगा व्यवसाय का उत्थान से लेकर न्यायालयी प्रतिबंध तक  
किसानों ने बताया कि 1986 में उनके पिता ने झींगा पालन शुरू किया था. 1990 के दशक में चंद्रबाबू नायडू सरकार की नीतियों से इस व्यवसाय को बल मिला. हालांकि बाद में व्हाइट स्पॉट वायरस और पर्यावरणीय चिंताओं के कारण सुप्रीम कोर्ट ने तटीय झींगा पालन पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसे बाद में कानून के जरिये फिर से शुरू किया गया.

वन्नामेई झींगा से उम्मीदें  
2008 में भारत ने रोग मुक्त प्रशांत सफेद झींगे ‘लिटोपेनेअस वन्नामेई’ का परिचय दिया, जिससे किसानों को नई उम्मीद मिली. आज भारत के कुल झींगा निर्यात में इस किस्म की 87% हिस्सेदारी है, और इसका अधिकांश हिस्सा अमेरिका (54%) को निर्यात किया जाता है. सीफूड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के जगदीश थोटा का कहना है कि कीमतों में गिरावट अस्थायी है और अब धीरे-धीरे सुधार हो रहा है. उनका मानना है कि भारत अभी भी इक्वाडोर जैसे प्रतिस्पर्धियों से आगे है और अमेरिकी खरीदार अतिरिक्त शुल्क का भार उठाने को तैयार हैं.

हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट अस्थायी है, लेकिन जमीनी स्तर पर किसान आज भी अनिश्चितता और नुकसान के बीच जूझ रहे हैं. ट्रंप की नीतियों का असर आंध्र प्रदेश के गांवों तक महसूस किया जा रहा है, जहां खेतों में झींगे के साथ उम्मीदें भी डूबती नजर आ रही हैं.

 


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