सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कई जरूरी पार्ट्स और मशीनों पर कस्टम ड्यूटी में राहत दी गई है. यह छूट 31 मार्च 2029 तक लागू रहेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो ।।
केंद्र सरकार ने देश में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए बड़ा कदम उठाया है. सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और लिथियम-आयन बैटरी निर्माण में इस्तेमाल होने वाली कई मशीनों व पुर्जों पर 31 मार्च 2029 तक कस्टम ड्यूटी में छूट देने का ऐलान किया है. इस फैसले से कंपनियों की उत्पादन लागत घटेगी, निवेश को बढ़ावा मिलेगा और भविष्य में उपभोक्ताओं को इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद सस्ती कीमत पर मिल सकते हैं.
'मेक इन इंडिया' को मिलेगा बड़ा बूस्ट
भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की दिशा में सरकार ने अहम कदम उठाया है. इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कई जरूरी पार्ट्स और मशीनों पर कस्टम ड्यूटी में राहत दी गई है. यह छूट 31 मार्च 2029 तक लागू रहेगी. सरकार का मानना है कि इससे देश में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा, विदेशी आयात पर निर्भरता घटेगी और घरेलू विनिर्माण उद्योग अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगा.
उत्पादन लागत घटेगी, निवेश बढ़ेगा
भारत में इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के लिए अब भी विदेशी आयात पर निर्भरता बनी हुई है. कस्टम ड्यूटी में छूट मिलने से कंपनियों की उत्पादन लागत कम होगी और घरेलू सप्लाई चेन मजबूत होगी. उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि इससे इलेक्ट्रॉनिक्स और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नए निवेश आकर्षित होंगे. साथ ही 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को भी मजबूती मिलेगी.
लिथियम-आयन बैटरी उद्योग को बड़ी राहत
इस फैसले का सबसे बड़ा फायदा लिथियम-आयन बैटरी बनाने वाली कंपनियों को मिलेगा. इलेक्ट्रिक वाहनों (EV), स्मार्टफोन्स, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इस्तेमाल होने वाली बैटरियों के निर्माण के लिए जरूरी मशीनों पर कस्टम ड्यूटी में राहत दी गई है.
सेंट्रल बोर्ड ऑफ इनडायरेक्ट टैक्सेस एंड कस्टम्स (CBIC) के नोटिफिकेशन के अनुसार, अब बैटरी निर्माण प्रक्रिया से जुड़ी 85 प्रकार की मशीनें रियायती कस्टम ड्यूटी के दायरे में आएंगी. इनमें पाउडर प्रोसेसिंग, स्लरी मिक्सिंग, कोटिंग, इलेक्ट्रोड वाइंडिंग, लेजर वेल्डिंग, टेस्टिंग, इंस्पेक्शन, पैकेजिंग और एफ्लुएंट ट्रीटमेंट से जुड़ी मशीनें शामिल हैं.
डिस्प्ले कंपोनेंट्स पर भी मिली राहत
सरकार ने ऑटोमोबाइल, मेडिकल उपकरणों और औद्योगिक मशीनों में इस्तेमाल होने वाली डिस्प्ले असेंबली के कई आयातित कंपोनेंट्स पर भी कस्टम ड्यूटी हटा दी है. अब डिस्प्ले सेल, बैकलाइट यूनिट, फ्लेक्सिबल प्रिंटेड सर्किट असेंबली (FPCA) और फ्रेम जैसे पुर्जे कम लागत पर आयात किए जा सकेंगे. हालांकि, यह छूट मोबाइल फोन, टेलीविजन, स्मार्टवॉच और इंटरैक्टिव फ्लैट पैनल डिस्प्ले के कंपोनेंट्स पर लागू नहीं होगी.
वायरलेस चार्जिंग मॉड्यूल बनाना होगा सस्ता
सरकार ने स्मार्टफोन के वायरलेस चार्जिंग मॉड्यूल में इस्तेमाल होने वाले कई अहम कंपोनेंट्स पर भी कस्टम ड्यूटी में छूट दी है. इनमें NFC, इंडक्टर कॉइल, नैनो-क्रिस्टलाइन असेंबली, ई-शील्ड, PET लाइनर, PC शिम और NdFeB मैग्नेट जैसे पुर्जे शामिल हैं. इससे भविष्य में भारत में वायरलेस चार्जिंग तकनीक का स्थानीय उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है.
उपभोक्ताओं को कैसे होगा फायदा?
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि जब कंपनियों की उत्पादन लागत घटेगी तो इसका फायदा धीरे-धीरे उपभोक्ताओं तक भी पहुंचेगा. भविष्य में इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है और ग्राहकों को अधिक प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उत्पाद मिलने की संभावना बढ़ेगी. इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ने से रोजगार सृजन, तकनीकी निवेश और निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा.
सरकार ने सितंबर के दूसरे पखवाड़े के लिए 13.50 लाख टन चीनी बिक्री को मंजूरी दी है. पूरे महीने का कोटा 26.50 लाख टन पहुंच गया है. बाजार में बढ़ी सप्लाई के चलते चीनी की कीमतों पर दबाव बना हुआ है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
त्योहारी सीजन में चीनी की मांग बढ़ने के बावजूद बाजार में इसकी कीमतों में नरमी देखने को मिल रही है. केंद्र सरकार ने घरेलू बाजार में पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए सितंबर में रिकॉर्ड 26.50 लाख टन चीनी की बिक्री की अनुमति दी है. बढ़ी हुई सप्लाई का असर खुदरा कीमतों पर भी दिख रहा है और कुछ बाजारों में चीनी का भाव करीब 55 रुपये प्रति किलोग्राम तक आ गया है.
सितंबर के दूसरे पखवाड़े में 13.50 लाख टन का कोटा
खाद्य मंत्रालय ने 16 से 30 सितंबर 2026 के लिए चीनी मिलों को 13.50 लाख टन बिक्री कोटा आवंटित किया है. इससे पहले 1 से 15 सितंबर के लिए 13 लाख टन का कोटा तय किया गया था. इस तरह सितंबर में कुल बिक्री कोटा 26.50 लाख टन हो गया है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है.
सरकार अब चीनी का बिक्री कोटा पूरे महीने के बजाय 15-15 दिन के आधार पर तय कर रही है. इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में पर्याप्त स्टॉक बनाए रखना और कीमतों में अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना है.
मांग के मुकाबले ज्यादा सप्लाई
अगस्त 2026 में सरकार ने 22.50 लाख मीट्रिक टन चीनी बिक्री का कोटा तय किया था, जबकि जुलाई में यह 22 लाख मीट्रिक टन था. सितंबर का कोटा इन दोनों महीनों की तुलना में काफी अधिक है. त्योहारी सीजन के कारण कई राज्यों में चीनी की खपत बढ़ रही है. महाराष्ट्र समेत कुछ राज्यों में गणेश चतुर्थी के दौरान मांग में भी बढ़ोतरी हुई है. इसके बावजूद बाजार में उपलब्धता को बनाए रखने के लिए सरकार ने बिक्री कोटा ऊंचा रखा है.
खुदरा बाजार में 55 रुपये किलो तक आया भाव
बढ़ी हुई सप्लाई के बीच चीनी की खुदरा कीमतों में भी नरमी आई है. कुछ बाजारों में इसका भाव करीब 55 रुपये प्रति किलोग्राम तक आ गया है. हालांकि, देश के अलग-अलग हिस्सों में कीमतें अलग हैं और फिलहाल खुदरा बाजार में चीनी करीब 55 से 65 रुपये प्रति किलोग्राम के दायरे में बिक रही है.
अगस्त के मध्य में कुछ बाजारों में चीनी की खुदरा कीमत 75 रुपये प्रति किलोग्राम से ऊपर पहुंच गई थी. इसके बाद सरकार की ओर से सप्लाई बढ़ाने और बाजार में उपलब्धता बनाए रखने के कदमों से कीमतों में गिरावट आई है.
40-45 रुपये किलो के सामान्य स्तर पर लाने की कोशिश
सरकार का लक्ष्य चीनी की कीमतों को सामान्य स्तर पर बनाए रखना है. अधिकारियों के मुताबिक, बाजार में मांग के मुकाबले पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध रहने से कीमतों पर आगे भी दबाव रह सकता है. हालांकि, त्योहारी सीजन के अक्टूबर-नवंबर में चरम पर पहुंचने के साथ मांग बढ़ने की संभावना है.
फिलहाल चीनी के एक्स-फैक्टरी भाव में भी गिरावट आई है. यह करीब 4,400 से 4,700 रुपये प्रति क्विंटल के दायरे में है, जबकि थोक बाजार में औसत भाव करीब 5,000 रुपये प्रति क्विंटल बताया जा रहा है. इसके बावजूद खुदरा कीमतें थोक और एक्स-फैक्टरी भाव के मुकाबले ऊंची बनी हुई हैं. आने वाले दिनों में चीनी की कीमतों की दिशा मुख्य रूप से त्योहारी मांग और बाजार में उपलब्ध सप्लाई के बीच संतुलन पर निर्भर करेगी.
WTO की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर बहुपक्षीय व्यापार सहयोग की जगह FTAs का नेटवर्क हावी होता है तो वैश्विक निर्यात 26.9% तक घट सकता है; भारत-EFTA समझौते में टैरिफ कटौती को FDI प्रतिबद्धताओं से जोड़ा गया है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
विश्व व्यापार संगठन (WTO) ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था में बढ़ते विखंडन को लेकर चेतावनी दी है. WTO की ‘वर्ल्ड ट्रेड रिपोर्ट 2026’ के अनुसार, अगर बहुपक्षीय सहयोग की जगह मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) का नेटवर्क प्रमुख हो जाता है और WTO मौजूदा स्वरूप में काम नहीं करता, तो 2050 तक वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 6.9% और निर्यात में 26.9% की कमी आ सकती है.
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर दुनिया भू-राजनीतिक रूप से जुड़े व्यापारिक गुटों में बंट जाती है, तो अधिक सहयोगी स्थिति की तुलना में 2050 तक वैश्विक GDP 5.1% और निर्यात 18.6% कम रह सकता है. वहीं, बहुपक्षीय सहयोग को और मजबूत करने की स्थिति में इसी अवधि में वैश्विक GDP 2.9% और निर्यात 17.9% बढ़ सकता है.
WTO ने कहा कि उसके सदस्यों के सामने विकल्प केवल मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने या सुधार करने का नहीं है. संगठन के अनुसार, चुनौती यह है कि नियम-आधारित सहयोग को आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप बनाया जाए, अन्यथा व्यापार व्यवस्था कम समावेशी और अधिक शक्ति-आधारित हो सकती है.
भारत-EFTA समझौते में टैरिफ और FDI का कनेक्शन
रिपोर्ट में भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) के सदस्य देशों के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते का भी विशेष रूप से उल्लेख किया गया है. यह समझौता 2026 में लागू हुआ है. WTO के अनुसार, इस समझौते में भारत की ओर से टैरिफ में कटौती को EFTA देशों से आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से जुड़ी प्रतिबद्धताओं के साथ जोड़ा गया है. इन निवेश लक्ष्यों को हासिल नहीं किए जाने की स्थिति में भारत के पास कुछ परिस्थितियों में एकतरफा रूप से टैरिफ दोबारा लागू करने का प्रावधान है. हालांकि, इस व्यवस्था में व्यापक परामर्श और अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण लक्ष्यों की दिशा में प्रगति प्रभावित होने पर बदलाव की गुंजाइश भी रखी गई है. WTO के मुताबिक, किसी भी सुधारात्मक टैरिफ उपाय को अस्थायी और अनुपातिक होना जरूरी है.
वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा अब भी WTO नियमों के तहत
WTO ने कहा कि प्राथमिकता वाले व्यापार समझौतों की संख्या बढ़ने के बावजूद संगठन के नियम अभी भी वैश्विक व्यापार के बड़े हिस्से के लिए कानूनी आधार बने हुए हैं. रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक वस्तु व्यापार का करीब 72% हिस्सा अब भी मोस्ट-फेवर्ड-नेशन (MFN) टैरिफ शर्तों के तहत होता है, जिन्हें WTO के 166 सदस्य देशों ने तय किया है और जिनका पालन करने के लिए वे कानूनी रूप से प्रतिबद्ध हैं. हालांकि, यह हिस्सेदारी 2022 में करीब 80% से घटकर 2026 की शुरुआत तक लगभग 72% रह गई.
रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक व्यापार में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की हिस्सेदारी भी बढ़ी है. वैश्विक व्यापार में इन देशों की संयुक्त हिस्सेदारी 1995 में 23% थी, जो 2024 में बढ़कर 45% हो गई.
विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के सामने ज्यादा व्यापार बाधाएं
WTO ने कम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं के लिए गैर-टैरिफ उपायों और सब्सिडी को बड़ी चुनौती बताया है. तकनीकी नियमों, सैनिटरी और फाइटोसैनिटरी मानकों, टेस्टिंग, सर्टिफिकेशन, ट्रेसिबिलिटी और गुणवत्ता मानकों का पालन करने के लिए निर्यातकों को काफी निवेश करना पड़ सकता है.
छोटे निर्यातकों के लिए ये आवश्यकताएं विदेशी बाजारों में प्रवेश की लागत को अपेक्षाकृत अधिक बढ़ा सकती हैं. WTO ने उच्च आय और बड़ी मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में कृषि उत्पादकों को दी जाने वाली सब्सिडी के बढ़ते इस्तेमाल की ओर भी ध्यान दिलाया है.
कुछ क्षेत्रों में सप्लाई का बढ़ता केंद्रीकरण
रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ क्षेत्रों में व्यापार की आपूर्ति अधिक केंद्रित हो रही है. ऐसे उत्पादों से जुड़ा वस्तु व्यापार, जिनकी सप्लाई कुछ सीमित देशों या स्रोतों में केंद्रित है, 2000 में करीब 8% था, जो 2017 में बढ़कर 18% हो गया. इसके बाद इसमें कुछ कमी आई और यह 16% पर आ गया.
सेवाओं के क्षेत्र में 2025 में कुल सेवा व्यापार का करीब 32% हिस्सा ऐसे क्षेत्रों से जुड़ा था, जहां आपूर्ति केंद्रित थी. 2005 में यह आंकड़ा करीब 20% था.
औद्योगिक नीतियों और सरकारी हस्तक्षेप पर भी चिंता
WTO ने बाजारों में सरकारों के बढ़ते हस्तक्षेप को भी एक चुनौती बताया है. संगठन के मुताबिक, सब्सिडी और अन्य सार्वजनिक हस्तक्षेप वाली औद्योगिक नीतियों का इस्तेमाल अब ज्यादा अर्थव्यवस्थाओं में हो रहा है.
इससे समान अवसर और बाजार पहुंच से जुड़े नियमों को लेकर सवाल बढ़ रहे हैं. WTO ने एंटी-डंपिंग उपायों में भी ऐसी नीतियों के बढ़ते इस्तेमाल का उल्लेख किया है. भारत, अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन, ब्राजील, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया सहित कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस समूह में शामिल हैं.
पारदर्शिता से बढ़ सकता है व्यापार
WTO के मुताबिक, व्यापार व्यवस्था में पारदर्शिता सूचना से जुड़ी असमानताओं को कम कर सकती है और बाजारों के बेहतर कामकाज में मदद कर सकती है. क्षेत्रीय व्यापार समझौतों के विश्लेषण में पाया गया कि हर अतिरिक्त पारदर्शिता प्रतिबद्धता द्विपक्षीय व्यापार प्रवाह में 1% से अधिक की वृद्धि से जुड़ी थी. इसका असर खासतौर पर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) और कृषि निर्यातकों के लिए महत्वपूर्ण है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि बाजार पहुंच को लेकर अधिक निश्चितता कंपनियों को निर्यात बाजारों में प्रवेश करने, निवेश करने और वैश्विक वैल्यू चेन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है.
2040 तक AI से वैश्विक व्यापार में 40% बढ़ोतरी की संभावना
WTO ने जहां व्यापार विखंडन को जोखिम बताया है, वहीं तकनीक को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में संभावित बढ़ोतरी का बड़ा स्रोत माना है. रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) 2040 तक वैश्विक व्यापार को 40% तक बढ़ा सकता है. डिजिटल रूप से उपलब्ध कराई जा सकने वाली सेवाओं में इसका सबसे बड़ा असर देखने को मिल सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार, AI अगले 15 वर्षों में वैश्विक GDP में 13% से अधिक की अतिरिक्त वृद्धि कर सकता है. WTO ने कहा कि डिजिटलाइजेशन और तकनीकी बदलाव व्यापार की संरचना और संचालन के तरीके को बदल रहे हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत और बढ़ गई है.
WTO की महानिदेशक न्गोजी ओकोंजो-इवेला ने कहा कि वैश्विक व्यापार का परिदृश्य काफी बदल गया है, लेकिन सहयोग के जरिए सभी अर्थव्यवस्थाओं को एकतरफा कदमों की तुलना में अधिक लाभ मिलने का मूल सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि WTO को बनाए रखने का मतलब उसके मौजूदा नियमों को बिना बदलाव के बनाए रखना नहीं है. इसके बजाय, बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था को अधिक एकीकृत, बहुध्रुवीय और विविध वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप ढालने की जरूरत है.
भारत के संदर्भ में WTO का यह आकलन ऐसे समय आया है जब देश बाजार पहुंच बढ़ाने और व्यापारिक साझेदारों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने के लिए FTAs पर जोर दे रहा है. भारत-EFTA समझौता यह भी दिखाता है कि नए व्यापार समझौतों में टैरिफ रियायतों के साथ निवेश प्रतिबद्धताओं और उनके क्रियान्वयन से जुड़े प्रावधानों को शामिल किया जा रहा है.
अगस्त में खाद्य महंगाई करीब 6% रही, लेकिन खरीफ फसलों की बुवाई में मामूली गिरावट और बेहतर पैदावार की उम्मीद से कीमतों पर दबाव कम होने की संभावना
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंथा नागेश्वरन ने कहा है कि अगस्त में करीब 6% रही खाद्य महंगाई साल के अंत तक इसी ऊंचे स्तर पर बने रहने की संभावना नहीं है. उन्होंने कहा कि मानसून में 15% की कमी फिलहाल प्रबंधनीय है और खरीफ फसलों की बुवाई भी अपेक्षाकृत बेहतर रही है. नागेश्वरन ने भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (Assocham) द्वारा आयोजित एक ऑनलाइन कार्यक्रम में कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं है कि अगस्त में खाद्य कीमतों में हुई बढ़ोतरी साल के अंत तक जारी रहेगी.
CPI में खाद्य और पेय पदार्थों की बड़ी हिस्सेदारी
खाद्य और पेय पदार्थों की भारत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) बास्केट में 36.75% हिस्सेदारी है. ऐसे में खाद्य कीमतों में होने वाले बदलाव का खुदरा महंगाई पर सीधा असर पड़ता है. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त में भारत की खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82% पर पहुंच गई, जो 20 महीने का उच्च स्तर है.
नागेश्वरन ने बताया कि फिलहाल मानसून की कमी करीब 15% है, जबकि गर्मियों की फसलों की खेती का क्षेत्र पिछले साल की तुलना में केवल 2-3% कम हुआ है. उन्होंने कहा कि बुवाई में सीमित गिरावट और अधिकांश खरीफ फसलों की अच्छी पैदावार की उम्मीद को देखते हुए बारिश की कमी को फिलहाल "प्रबंधनीय" माना जा सकता है.
वैश्विक जोखिमों के बावजूद अर्थव्यवस्था में मजबूती
मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि नए भू-राजनीतिक जोखिमों और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार बनी हुई है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमतें 107-108 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई हैं. इसके अलावा वैश्विक बॉन्ड यील्ड में भी बढ़ोतरी हुई है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बाहरी जोखिम बढ़े हैं. नागेश्वरन ने कहा कि हाल के दिनों में वैश्विक स्तर पर जोखिम जरूर बढ़े हैं, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के अधिक लचीली रहने की संभावना है.
बैंक क्रेडिट और GST संग्रह से सहारा
नागेश्वरन ने घरेलू अर्थव्यवस्था को सहारा देने वाले कई मजबूत कारकों का भी उल्लेख किया. इनमें बैंक क्रेडिट में मजबूत वृद्धि, वस्तु एवं सेवा कर (GST) संग्रह में मजबूती और कॉरपोरेट तथा बैंकिंग क्षेत्र की अपेक्षाकृत बेहतर बैलेंस शीट शामिल हैं.
उन्होंने कहा कि सरकार यह आकलन कर रही है कि अर्थव्यवस्था नए बाहरी झटकों का सामना करते हुए मार्च से जुलाई के बीच बाजार में आई अस्थिरता के दौरान दिखाई गई मजबूती को बनाए रख सकती है या नहीं.
उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर बदलाव का है और यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है. ऐसे में आने वाले 25 वर्षों की जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को कई क्षेत्रों में अपनी क्षमता और प्रदर्शन को बेहतर करना होगा.
निवेश और नियुक्तियां बढ़ाने की जरूरत
CEA ने कहा कि मौजूदा अनिश्चितताओं के बीच नीति निर्माण में लचीलापन जरूरी है. साथ ही उन्होंने निजी क्षेत्र से निवेश और नियुक्तियां बढ़ाने की अपील की. उन्होंने कहा कि सरकार भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर करीबी नजर रख रही है और स्थिति के अनुसार अपनी प्रतिक्रिया तय करेगी. सरकार आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाती रहेगी और कारोबार करने तथा जीवनयापन को आसान बनाने की दिशा में काम करेगी.
4.3% राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर भरोसा
बाहरी जोखिमों के बावजूद नागेश्वरन ने वित्त वर्ष 2026-27 में राजकोषीय घाटे को GDP के 4.3% तक सीमित रखने के सरकार के लक्ष्य को लेकर भरोसा जताया. उन्होंने कहा कि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर नहीं रहीं, जबकि उर्वरक कीमतों में भी कमी आई है.
इसके अलावा सरकार को गैर-कर और गैर-ऋण पूंजी प्राप्तियों से भी समर्थन मिलने की उम्मीद है. इसमें विनिवेश से मिलने वाली रकम और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से मिलने वाला लाभांश शामिल है. नागेश्वरन के मुताबिक, इन कारकों को देखते हुए सरकार को वित्त वर्ष 2026-27 में राजकोषीय घाटे को GDP के 4.3% के करीब रखने का भरोसा है.
AI इंटरैक्टिव कंटेंट कंपनी फ्लैम इस पूंजी का इस्तेमाल रिसर्च एंड डेवलपमेंट, अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो के विस्तार और वैश्विक स्तर पर एंटरप्राइज बिक्री बढ़ाने के लिए करेगी.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) इंटरैक्टिव कंटेंट कंपनी फ्लैम (Flam) ने QED इन्वेस्टर्स की अगुवाई में सीरीज B फंडिंग राउंड में 40 मिलियन डॉलर जुटाए हैं. इस फंडिंग राउंड में क्ले पोंड कैपिटल, मार्टिन शावेज, ओलिवियर पोमेल, वेंकी हरिनारायण और शाहरुख खान ने भी हिस्सा लिया. कंपनी के मौजूदा निवेशक RTP Global और Dovetail भी इस राउंड में शामिल हुए.
फ्लैम ने बताया कि वह नई पूंजी का इस्तेमाल अपने AI मॉडल्स में रिसर्च एंड डेवलपमेंट को आगे बढ़ाने, अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो का विस्तार करने और वैश्विक बाजारों में एंटरप्राइज बिक्री को मजबूत करने के लिए करेगी.
2021 में स्थापित और सैन फ्रांसिस्को मुख्यालय वाली फ्लैम ऐसा इंटरैक्टिव कंटेंट विकसित करती है, जो यूजर के इनपुट के आधार पर प्रतिक्रिया देता है और लगभग वीडियो जैसी गति से स्ट्रीम होता है. कंपनी की भारत और जापान में भी टीमें हैं.
कंपनी के प्रोडक्ट पोर्टफोलियो में Flicks, Airboards और Visual Agents शामिल हैं. Flicks ऐसे इंटरैक्टिव वीडियो हैं, जो दर्शकों के इनपुट के आधार पर बदलते हैं. वहीं, Airboards फोन के कैमरा इंटरफेस के जरिए बिना किसी ऐप को डाउनलोड किए इंटरैक्टिव 3D कंटेंट उपलब्ध कराते हैं. Visual Agents AI आधारित इंटरैक्टिव कैरेक्टर्स हैं, जिन्हें यूजर्स के साथ प्रतिक्रिया करने और विभिन्न काम करने के लिए डिजाइन किया गया है.
कंपनी के अनुसार, फ्लैम के पास 15 से अधिक पेटेंट हैं और उसने अमेरिका, यूरोप और एशिया में 100 से ज्यादा एंटरप्राइज ग्राहकों के साथ समझौते किए हैं. इसके ग्राहकों में Google, Reliance और Hyundai शामिल हैं.
फ्लैम के मुताबिक, उसके इंटरैक्टिव कंटेंट का इस्तेमाल प्रोडक्ट विजुअलाइजेशन, लर्निंग एंड डेवलपमेंट, एंटरटेनमेंट, फैन एंगेजमेंट, कस्टमर सपोर्ट, सेल्स और मार्केटिंग जैसे क्षेत्रों में किया जा रहा है.
कैबिनेट ने उत्तर प्रदेश खिलौना निर्माण प्रोत्साहन नीति, 2025 को भी मंजूरी दी है. सरकार के मुताबिक, इस नीति का उद्देश्य राज्य में खिलौना निर्माण को बढ़ावा देना, निवेश आकर्षित करना और रोजगार के अवसर पैदा करना है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने मंगलवार को 23 प्रस्तावों को मंजूरी दी. इनमें मथुरा की बंद पड़ी चीनी मिल को दोबारा शुरू कर एथेनॉल उत्पादन, खिलौना निर्माण को बढ़ावा देने के लिए नई नीति और चित्रकूट लिंक एक्सप्रेसवे समेत कई अहम फैसले शामिल हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में मथुरा जिले की छाता तहसील में 19 साल से बंद चीनी मिल को फिर से शुरू करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई. फिलहाल यहां गन्ने और धान से एथेनॉल का उत्पादन किया जाएगा. प्रस्तावित प्लांट की सालाना उत्पादन क्षमता 3.96 करोड़ लीटर होगी और इसे स्थापित करने पर करीब 200 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे.
11 महीने चलेगा एथेनॉल प्लांट
गन्ना मंत्री चौधरी लक्ष्मी नारायण के मुताबिक, प्लांट साल में करीब 11 महीने संचालित होगा. चीनी मिल को पूरी क्षमता से चलाने के लिए सालाना करीब 50 लाख टन गन्ने की जरूरत होगी, जबकि फिलहाल क्षेत्र में इतनी मात्रा में गन्ना उपलब्ध नहीं है. ऐसे में पहले चरण में एथेनॉल उत्पादन शुरू किया जाएगा. गन्ने की उपलब्धता बढ़ने के बाद यहां चीनी का उत्पादन भी शुरू करने की योजना है. चीनी मिल के पास उपलब्ध 96 एकड़ जमीन पर गोदाम और अन्य सुविधाओं से जुड़ा परिसर भी विकसित किया जाएगा.
खिलौना उद्योग के लिए नई नीति
कैबिनेट ने उत्तर प्रदेश खिलौना निर्माण प्रोत्साहन नीति, 2025 को भी मंजूरी दी है. सरकार के मुताबिक, इस नीति का उद्देश्य राज्य में खिलौना निर्माण को बढ़ावा देना, निवेश आकर्षित करना और रोजगार के अवसर पैदा करना है.
इसके अलावा चित्रकूट लिंक एक्सप्रेसवे के संशोधित परियोजना प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई. करीब 15.172 किलोमीटर लंबा यह छह लेन का ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण (EPC) मॉडल पर बनाया जाएगा. परियोजना की अनुमानित लागत 1,008.67 करोड़ रुपये है, जिसका पूरा खर्च राज्य सरकार वहन करेगी. निर्माण एजेंसी के चयन के लिए वैश्विक टेंडर जारी किया जाएगा.
ऑटोमैटिक टेस्टिंग सेंटर के नियम बदले
परिवहन विभाग के ऑटोमैटिक टेस्टिंग सेंटर को लेकर भी कैबिनेट ने नियमों में बदलाव को मंजूरी दी है. अब एक लाइन वाले सेंटर के लिए 1,500 वर्ग मीटर और दो लाइन वाले सेंटर के लिए 3,000 वर्ग मीटर जमीन पर्याप्त होगी. पहले सेंटर के लिए कम से कम 2.5 एकड़ जमीन की आवश्यकता थी.
राज्य सरकार ने 82 ऑटोमैटिक टेस्टिंग सेंटर के लिए मंजूरी पत्र जारी किए थे, लेकिन इनमें से 42 पर ही काम शुरू हो पाया था. नए नियमों के तहत पूरे साल आवेदन किए जा सकेंगे और एक जिले में अधिकतम तीन सेंटर स्थापित किए जा सकेंगे.
तीन जगह बनेंगे नए बस स्टैंड
परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह के अनुसार, सिद्धार्थनगर जिले के शोहरतगढ़ और बढ़नी तथा हरदोई जिले के सवायजपुर में नए बस स्टैंड बनाए जाएंगे. इनके लिए जमीन राजस्व विभाग उपलब्ध कराएगा.
किसानों और पूर्व अग्निवीरों के लिए फैसले
कैबिनेट ने मुख्यमंत्री कृषक समृद्धि योजना के तहत छोटे और सीमांत किसानों को कम ब्याज दर पर लंबी अवधि का कर्ज उपलब्ध कराने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी. उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक लिमिटेड के माध्यम से किसानों को सालाना 6 फीसदी ब्याज दर पर अधिकतम 6 लाख रुपये तक का कर्ज दिया जाएगा.
इसके अलावा जेल वार्डर की सीधी भर्ती में पूर्व अग्निवीरों के लिए 20 फीसदी पद आरक्षित करने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली है. परिवहन विभाग में प्रवर्तन सिपाही की सीधी भर्ती में भी पूर्व अग्निवीरों को 20 फीसदी क्षैतिज आरक्षण और उम्र सीमा में छूट देने का फैसला किया गया है.
स्मार्ट स्कूल और नई यूनिवर्सिटी को मंजूरी
कैबिनेट ने बेसिक शिक्षा परिषद के तहत आने वाले प्राथमिक विद्यालयों को स्मार्ट स्कूल के रूप में विकसित करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी. इसके अलावा अलीगढ़ में नई यूनिवर्सिटी स्थापित करने और अयोध्या के मिल्कीपुर में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) का क्षेत्रीय केंद्र बनाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी गई.
मंगलवार को सेंसेक्स 1,430 अंक टूटकर 777.94 अंक यानी 1.04 फीसदी की गिरावट के साथ 74,003.82 पर बंद हुआ. निफ्टी भी 279.50 अंक यानी 1.19 फीसदी गिरकर 23,118.60 पर रहा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
मंगलवार को तेज गिरावट के बाद भारतीय शेयर बाजार में बुधवार को भी उतार-चढ़ाव बना रह सकता है. मंगलवार को सेंसेक्स दिन के उच्चतम स्तर से करीब 1,430 अंक फिसलकर बंद हुआ था, जबकि निफ्टी में भी करीब 280 अंकों की गिरावट दर्ज की गई. बुधवार सुबह गिफ्ट निफ्टी में कमजोरी, अमेरिकी बाजारों में गिरावट और 10 साल की अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के 5 फीसदी के पार पहुंचने से घरेलू बाजार में शुरुआती दबाव के संकेत मिल रहे हैं. निवेशकों की नजर अब अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दर फैसले, कच्चे तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर रहेगी.
मंगलवार को सेंसेक्स 778 अंक टूटा
मंगलवार को सेंसेक्स करीब 600 अंकों की बढ़त के साथ खुला था और कारोबार के दौरान 75,436.44 के स्तर तक पहुंच गया. हालांकि, बाद में बिकवाली बढ़ने से सेंसेक्स दिन के उच्चतम स्तर से करीब 1,430 अंक टूटकर 777.94 अंक यानी 1.04 फीसदी की गिरावट के साथ 74,003.82 पर बंद हुआ. निफ्टी भी 279.50 अंक यानी 1.19 फीसदी गिरकर 23,118.60 पर रहा. बाजार में गिरावट के चलते बीएसई पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण करीब 9 लाख करोड़ रुपये घटकर लगभग 472 लाख करोड़ रुपये रह गया. सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 23 गिरावट के साथ बंद हुए.
इन शेयरों में रही सबसे ज्यादा हलचल
मंगलवार के कारोबार में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड का शेयर 6.04 फीसदी गिरकर सेंसेक्स का सबसे बड़ा नुकसान वाला शेयर रहा. श्रीराम फाइनेंस, अडानी एंटरप्राइजेज, इंडिगो और ग्रासिम इंडस्ट्रीज में भी तेज गिरावट दर्ज की गई.
इसके उलट आईटी शेयरों में खरीदारी देखने को मिली. इंफोसिस 3.79 फीसदी, HCL टेक्नोलॉजीज 3.64 फीसदी, TCS 2.28 फीसदी, टेक महिंद्रा 2.26 फीसदी और विप्रो 1.55 फीसदी की बढ़त के साथ बंद हुए.
गिफ्ट निफ्टी दे रहा कमजोरी के संकेत
बुधवार सुबह गिफ्ट निफ्टी 16 अंक की गिरावट के साथ 23,211.50 के स्तर पर कारोबार करता दिखा. यह संकेत देता है कि मंगलवार की तेज गिरावट के बाद घरेलू बाजार की शुरुआत में भी दबाव रह सकता है. हालांकि, शुरुआती संकेत पूरे कारोबारी सत्र की दिशा तय नहीं करते और दिन के दौरान बाजार की चाल वैश्विक संकेतों तथा घरेलू ट्रिगर्स पर निर्भर करेगी.
बुधवार को एशिया-प्रशांत बाजारों में मिला-जुला कारोबार देखने को मिला. जापान का निक्केई 225 करीब 0.19 फीसदी नीचे था, जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी करीब 0.25 फीसदी की बढ़त में कारोबार कर रहा था.
10 साल की अमेरिकी बॉन्ड यील्ड 5 फीसदी के पार
अमेरिका की 10 साल की ट्रेजरी यील्ड बढ़कर 5.04 फीसदी तक पहुंच गई. बॉन्ड यील्ड में यह तेजी वैश्विक बाजारों के लिए महत्वपूर्ण संकेत है. जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वी.के. विजयकुमार ने भी अमेरिकी 10 साल की बॉन्ड यील्ड के 5 फीसदी के स्तर की ओर बढ़ने को इक्विटी बाजारों पर दबाव बढ़ाने वाले कारकों में शामिल किया है.
108 डॉलर के पार ब्रेंट क्रूड
कच्चे तेल की कीमतें भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं. बुधवार को ब्रेंट क्रूड करीब 108.52 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा. पश्चिम एशिया में जारी तनाव और सप्लाई को लेकर चिंताओं के बीच तेल की कीमतों पर बाजार की नजर बनी हुई है. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए लंबे समय तक ऊंची कीमतें रहने से महंगाई और बाहरी खाते पर दबाव की चिंता बढ़ सकती है.
फेड के फैसले पर बाजार की नजर
बुधवार को अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दर फैसले पर वैश्विक बाजारों की नजर रहेगी. ब्याज दरों के फैसले के साथ फेड की आगे की मौद्रिक नीति को लेकर टिप्पणी भी बाजार की दिशा के लिए महत्वपूर्ण होगी. निवेशक यह आकलन करेंगे कि महंगाई, बॉन्ड यील्ड और आर्थिक गतिविधियों को देखते हुए फेड आगे ब्याज दरों को लेकर क्या संकेत देता है.
इन शेयरों रक भी रखें नजर
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आज कई कंपनियों के शेयर फोकस में रहेंगे. दरअसल, BHEL और Titagarh Rail Systems 50:50 हिस्सेदारी वाली जॉइंट वेंचर कंपनी बनाएंगे, जो Vande Bharat Sleeper Trainsets के लिए 35 साल तक मेंटेनेंस सेवाएं देगी. Groww की पैरेंट कंपनी Billionbrains Garage Ventures में Peak XV Partners Investments और Sequoia Capital करीब 1.6 फीसदी हिस्सेदारी बेच सकते हैं, जिसकी संभावित डील वैल्यू करीब ₹1,918 करोड़ है. वेलस्पन एंटरप्राइजेज में Authum Investment & Infrastructure ने 1.73 फीसदी हिस्सेदारी बेची, जबकि Fidelity Blue Chip Growth Fund ने करीब 1.38 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी. सोनाटा सॉफ्टवेयर ने Amazon Web Services के साथ पांच साल का Strategic Collaboration Agreement किया है. वेदांत फैशन्स के को-सीएफओ राहुल मुरारका ने 14 नवंबर 2026 से प्रभावी इस्तीफा दिया है, वहीं कंपनी को GST मामले में ₹2.73 लाख की पेनल्टी से राहत मिली है. सात्विक ग्रीन एनर्जी को SECI से ₹1,041.63 करोड़ का सोलर PV मॉड्यूल सप्लाई ऑर्डर मिला है. NBCC को विभिन्न सरकारी संस्थाओं से कुल ₹144.98 करोड़ के वर्क ऑर्डर मिले हैं. VIP इंडस्ट्रीज का बोर्ड 18 सितंबर को फंड जुटाने के प्रस्ताव पर विचार करेगा. वहीं, ब्लू स्टार से जुड़े ओमान के एक पुराने आर्बिट्रेशन मामले में W.J. Towell & Co LLC ने Dubai Court of Appeal का रुख किया है.
आज किन संकेतकों पर रहेगी नजर?
मंगलवार की तेज गिरावट के बाद बुधवार को बाजार की दिशा के लिए GIFT Nifty, एशियाई बाजारों की चाल, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की कीमतें और फेड के फैसले प्रमुख संकेतक रहेंगे. इन वैश्विक संकेतों के बीच शुरुआती कारोबार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है.
(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
इंजीनियरिंग, पेट्रोलियम, रसायन और कपड़ा क्षेत्र ने निर्यात को गति दी, जबकि अगस्त में सोने का आयात सालाना आधार पर 57.7 प्रतिशत घटा.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत का निर्यात अगस्त में सालाना आधार पर 26.12 प्रतिशत बढ़कर 43.81 अरब डॉलर हो गया. वहीं, व्यापार घाटा घटकर 26.86 अरब डॉलर रह गया. सरकार की ओर से मंगलवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में आयात 14.1 प्रतिशत बढ़कर 70.76 अरब डॉलर रहा. यानी आयात की वृद्धि दर निर्यात की तुलना में काफी कम रही.
निर्यात में यह बढ़ोतरी कई प्रमुख क्षेत्रों की मांग के चलते हुई. वहीं, आयात में अपेक्षाकृत धीमी वृद्धि ने व्यापार घाटे को सीमित रखने में मदद की. अगस्त के आंकड़े चालू वित्त वर्ष में भारत के विदेशी व्यापार में जारी विस्तार के बीच आए हैं.
चालू वित्त वर्ष के अप्रैल-अगस्त के दौरान भारत का निर्यात पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 17.85 प्रतिशत बढ़कर 215.91 अरब डॉलर हो गया. इस दौरान आयात 18.21 प्रतिशत बढ़कर 363 अरब डॉलर रहा. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष के पहले पांच महीनों में वस्तुओं के व्यापार में विस्तार हुआ है. इस अवधि में आयात की वृद्धि दर निर्यात से थोड़ी अधिक रही. यह आंकड़े निर्यात और घरेलू मांग के लिए आयातित वस्तुओं, दोनों में जारी गतिविधियों को दर्शाते हैं.
इंजीनियरिंग और रसायन क्षेत्र ने संभाली निर्यात वृद्धि
वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि निर्यात में सकारात्मक रुझान बना हुआ है. इंजीनियरिंग सामान, पेट्रोलियम उत्पाद, रसायन और कपड़ा प्रमुख क्षेत्र रहे, जिन्होंने अगस्त में निर्यात वृद्धि को समर्थन दिया. अग्रवाल ने कहा कि भारतीय निर्यात को अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिक्स देशों और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं से भी अच्छी मांग मिली है. इन बाजारों से मांग ने प्रमुख उत्पाद श्रेणियों में भारत के निर्यात को बढ़ाने में मदद की है.
सोने के आयात में 57.7 प्रतिशत की भारी गिरावट
अगस्त में भारत का सोने का आयात सालाना आधार पर 57.7 प्रतिशत घटकर 2.3 अरब डॉलर रह गया. पिछले साल अगस्त में सोने का आयात 5.4 अरब डॉलर रहा था. कुल वस्तु आयात में बढ़ोतरी के बावजूद सोने के आयात में यह बड़ी गिरावट दर्ज की गई.
सोने के आयात में तेज गिरावट से अगस्त में भारत के आयात की संरचना में बदलाव आया. हालांकि, कुल आयात फिर भी बढ़कर 70.76 अरब डॉलर रहा. निर्यात की वृद्धि दर आयात से अधिक रहने के कारण अगस्त में वस्तु व्यापार घाटा 26.86 अरब डॉलर रहा.
भारत यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म के लागू होने को लेकर भी अपने निर्यातकों को तैयार कर रहा है. यह तैयारी भारत-EU व्यापार समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर से पहले की जा रही है.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत और चीन ने द्विपक्षीय व्यापार से जुड़े मुद्दों को सुलझाने के लिए व्यापार स्तर पर बातचीत शुरू कर दी है. दोनों देशों के व्यापार मंत्रियों के बीच हुई बैठक को शुरुआती स्तर की बातचीत बताया गया है. भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, दोनों पक्ष सकारात्मक रुख के साथ आगे बढ़ रहे हैं और द्विपक्षीय व्यापार में मौजूद संरचनात्मक असंतुलन को दूर करने के संभावित उपायों पर चर्चा की जा रही है.
अधिकारियों ने कहा कि भारत-चीन संबंधों में हाल के समय में सुधार हुआ है और दोनों देशों के बीच धीरे-धीरे विश्वास बहाली की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है. व्यापार के मुद्दे पर भी दोनों पक्ष सकारात्मक सोच के साथ बातचीत शुरू कर चुके हैं. भारत चीन के साथ मिलकर व्यापार असंतुलन से जुड़े मुद्दों का समाधान तलाशने के लिए तैयार है.
अक्टूबर में लागू हो सकता है भारत-न्यूजीलैंड FTA
अन्य व्यापार समझौतों पर अधिकारियों ने बताया कि भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता (FTA) अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में लागू होने की उम्मीद है. वहीं, भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत तय योजना के मुताबिक आगे बढ़ रही है. अधिकारियों के अनुसार, इसे साल के अंत तक अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है.
भारत यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) के लागू होने को लेकर भी अपने निर्यातकों को तैयार कर रहा है. यह तैयारी भारत-EU व्यापार समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर से पहले की जा रही है.
G20 व्यापार मंत्रियों की बैठक में शामिल होंगे पीयूष गोयल
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल अमेरिका की यात्रा करेंगे, जहां वह G20 व्यापार मंत्रियों की बैठक में शामिल होंगे. इस दौरान भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है. भारत और अमेरिका के बीच व्यापार से जुड़े कुछ लंबित मुद्दों पर बातचीत जारी है. G20 बैठक के दौरान इन विषयों पर दोनों देशों के बीच आगे चर्चा हो सकती है.
BRICS देशों को भारत का निर्यात 13% बढ़ा
भारतीय व्यापार अधिकारियों के अनुसार, अप्रैल-अगस्त 2026 के दौरान BRICS सदस्य देशों को भारत का निर्यात बढ़कर 34.53 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले साल की समान अवधि में 30.49 अरब डॉलर था. इस तरह निर्यात में करीब 13% की वृद्धि दर्ज की गई.
आंकड़ों से पता चलता है कि भारत के लिए BRICS बाजारों का महत्व बढ़ रहा है. भारत अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है.
रूस से आयात 57% बढ़ा
इस अवधि में रूस से भारत का आयात सालाना आधार पर 57% बढ़कर 41.44 अरब डॉलर हो गया. रूस से भारत के प्रमुख आयात में पेट्रोलियम उत्पाद, उर्वरक और वनस्पति तेल शामिल रहे. भारत एक ओर प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर द्विपक्षीय व्यापार असंतुलन को कम करने और वैश्विक व्यापार नियमों में बदलाव के लिए घरेलू निर्यातकों को तैयार करने पर भी ध्यान दे रहा है.
मंगलवार को जारी सरकारी आंकड़ों में यह जानकारी सामने आई. बेरोजगारी दर में यह कमी मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी घटने के कारण आई, जबकि महीने के दौरान शहरी बेरोजगारी दर लगभग स्थिर रही.
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
भारत में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की बेरोजगारी दर अगस्त में घटकर 5% रह गई, जो जुलाई में 5.1% थी. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बेरोजगारी में यह कमी मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति सुधरने से आई है. हालांकि, शहरी बेरोजगारी दर मामूली बढ़कर 6.8% हो गई.
अगस्त में ग्रामीण बेरोजगारी घटकर 4.1% रही, जबकि कुल श्रम बल भागीदारी दर मामूली बढ़कर 55.6% हो गई. 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए भारत की बेरोजगारी दर अगस्त में मामूली घटकर 5% हो गई, जबकि जुलाई में यह 5.1% थी. मंगलवार को जारी सरकारी आंकड़ों में यह जानकारी सामने आई. बेरोजगारी दर में यह कमी मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी घटने के कारण आई, जबकि महीने के दौरान शहरी बेरोजगारी दर लगभग स्थिर रही.
ग्रामीण बेरोजगारी जुलाई के 4.5% से घटकर अगस्त में 4.1% हो गई. वहीं, शहरी बेरोजगारी दर 6.7% से मामूली बढ़कर 6.8% हो गई. सालाना आधार पर अगस्त में कुल बेरोजगारी दर लगभग स्थिर रही. शहरी बेरोजगारी दर में भी खास बदलाव नहीं हुआ, जबकि ग्रामीण बेरोजगारी अगस्त 2025 के 4.3% से घटकर 4.1% रह गई.
श्रम बल भागीदारी दर
15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए कुल श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) जुलाई के 55.4% से मामूली बढ़कर अगस्त में 55.6% हो गई. ग्रामीण LFPR 58% से बढ़कर 58.2% हो गई, जबकि शहरी LFPR 50.4% पर स्थिर रही.
अगस्त 2025 की तुलना में कुल LFPR 0.6 प्रतिशत अंक बढ़कर 55.6% हो गई, जो एक साल पहले 55% थी. ग्रामीण LFPR 1.2 प्रतिशत अंक बढ़कर 58.2% हो गई, जबकि अगस्त 2025 में यह 57% थी. इसके विपरीत, शहरी LFPR 0.5 प्रतिशत अंक घटकर 50.4% रह गई, जो एक साल पहले 50.9% थी.
FY27-FY30 के दौरान शहरी बुनियादी ढांचे के लिए 56 लाख करोड़ रुपये से अधिक निवेश की जरूरत का अनुमान
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बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो
देश के शहरी स्थानीय निकाय वित्त वर्ष 2026-27 से 2029-30 के बीच ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड के जरिए करीब 10,000 करोड़ रुपये जुटा सकते हैं. रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुसार, शहरों में बढ़ती बुनियादी ढांचा जरूरतों को पूरा करने के लिए पूंजी बाजार से फंड जुटाने की भूमिका बढ़ सकती है.
ICRA के मुताबिक, FY27 से FY30 के दौरान शहरी बुनियादी ढांचे में निवेश की जरूरत 56 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहने का अनुमान है. इसमें से करीब 3 लाख करोड़ रुपये तक की जरूरत कमर्शियल डेट के जरिए पूरी की जा सकती है. ऐसे में म्युनिसिपल और ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड के लिए संभावनाएं बढ़ सकती हैं.
पानी और कचरा प्रबंधन जैसी परियोजनाओं को मिल सकता है ग्रीन फाइनेंस
जल आपूर्ति, सीवरेज और वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट, ठोस कचरा प्रबंधन, नवीकरणीय ऊर्जा और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाएं ग्रीन फाइनेंस के लिए पात्र हो सकती हैं. इससे नगर निकायों के पास ग्रीन बॉन्ड के जरिए फंड जुटाने के लिए परियोजनाओं की एक बड़ी संभावित सूची उपलब्ध हो सकती है.
निवेशकों की ग्रीन बॉन्ड में बढ़ रही दिलचस्पी
अब तक म्युनिसिपल बॉन्ड के जरिए जुटाए गए 6,540 करोड़ रुपये में करीब एक-चौथाई राशि ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड के जरिए जुटाई गई है. इसके अलावा करीब एक-चौथाई हिस्से को ग्रीन बॉन्ड के रूप में वर्गीकृत किए जाने की संभावना है.
ICRA ने अनुमान लगाया है कि FY2027-FY2030 के दौरान ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड जारी करने की क्षमता करीब 10,000 करोड़ रुपये हो सकती है. हालांकि, नगर निकायों की तैयारी बेहतर होने पर यह आंकड़ा और बढ़ सकता है.
हाल में जारी किए गए कुछ ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड को इश्यू साइज की तुलना में करीब पांच गुना सब्सक्रिप्शन मिला है. इससे इस तरह के बॉन्ड में निवेशकों की रुचि का संकेत मिलता है. इन बॉन्ड पर सॉवरेन बेंचमार्क की तुलना में 1.90 प्रतिशत अंक तक और राज्य सरकार के बॉन्ड की तुलना में 1.55 प्रतिशत अंक तक अधिक यील्ड भी मिली है.
नगर निकायों की तैयारी बड़ी चुनौती
ICRA के अनुसार, पूंजी बाजार तक नगर निकायों की पहुंच कई कारकों पर निर्भर करेगी. इनमें क्रेडिट क्वालिटी, वित्तीय खुलासे, कर्ज चुकाने की स्पष्टता, परियोजनाओं की तैयारी और बॉन्ड जारी करने से जुड़ी प्रक्रियाओं के लिए तैयारियां शामिल हैं.
रेटिंग एजेंसी का कहना है कि इन शर्तों के कारण उन नगर निकायों की संख्या सीमित हो सकती है जो वास्तव में पूंजी बाजार से बॉन्ड के जरिए फंड जुटाने में सक्षम हैं. यानी शहरी बुनियादी ढांचे के लिए वित्त की जरूरत व्यापक होने के बावजूद सभी नगर निकाय बाजार से पैसा जुटाने की स्थिति में नहीं होंगे.
ICRA के मुताबिक, ग्रीन फाइनेंस के योग्य परियोजनाओं की उपलब्धता बाजार के विस्तार में मुख्य बाधा नहीं है. इसके बजाय नगर निकायों की वित्तीय और संस्थागत तैयारी तथा पूंजी बाजार की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता अधिक महत्वपूर्ण होगी. रेटिंग एजेंसी ने कहा कि निवेशकों की ओर से म्युनिसिपल ग्रीन फाइनेंस में रुचि बढ़ रही है, जबकि बाजार के विस्तार में पूंजी की उपलब्धता की तुलना में आपूर्ति पक्ष से जुड़ी चुनौतियां बड़ी बाधा बनी हुई हैं.