ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड से FY30 तक 10,000 करोड़ रुपये जुटा सकते हैं शहरी निकाय: ICRA

FY27-FY30 के दौरान शहरी बुनियादी ढांचे के लिए 56 लाख करोड़ रुपये से अधिक निवेश की जरूरत का अनुमान

Last Modified:
Tuesday, 15 September, 2026
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देश के शहरी स्थानीय निकाय वित्त वर्ष 2026-27 से 2029-30 के बीच ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड के जरिए करीब 10,000 करोड़ रुपये जुटा सकते हैं. रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुसार, शहरों में बढ़ती बुनियादी ढांचा जरूरतों को पूरा करने के लिए पूंजी बाजार से फंड जुटाने की भूमिका बढ़ सकती है.

ICRA के मुताबिक, FY27 से FY30 के दौरान शहरी बुनियादी ढांचे में निवेश की जरूरत 56 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहने का अनुमान है. इसमें से करीब 3 लाख करोड़ रुपये तक की जरूरत कमर्शियल डेट के जरिए पूरी की जा सकती है. ऐसे में म्युनिसिपल और ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड के लिए संभावनाएं बढ़ सकती हैं.

पानी और कचरा प्रबंधन जैसी परियोजनाओं को मिल सकता है ग्रीन फाइनेंस

जल आपूर्ति, सीवरेज और वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट, ठोस कचरा प्रबंधन, नवीकरणीय ऊर्जा और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाएं ग्रीन फाइनेंस के लिए पात्र हो सकती हैं. इससे नगर निकायों के पास ग्रीन बॉन्ड के जरिए फंड जुटाने के लिए परियोजनाओं की एक बड़ी संभावित सूची उपलब्ध हो सकती है.

निवेशकों की ग्रीन बॉन्ड में बढ़ रही दिलचस्पी

अब तक म्युनिसिपल बॉन्ड के जरिए जुटाए गए 6,540 करोड़ रुपये में करीब एक-चौथाई राशि ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड के जरिए जुटाई गई है. इसके अलावा करीब एक-चौथाई हिस्से को ग्रीन बॉन्ड के रूप में वर्गीकृत किए जाने की संभावना है.

ICRA ने अनुमान लगाया है कि FY2027-FY2030 के दौरान ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड जारी करने की क्षमता करीब 10,000 करोड़ रुपये हो सकती है. हालांकि, नगर निकायों की तैयारी बेहतर होने पर यह आंकड़ा और बढ़ सकता है.

हाल में जारी किए गए कुछ ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड को इश्यू साइज की तुलना में करीब पांच गुना सब्सक्रिप्शन मिला है. इससे इस तरह के बॉन्ड में निवेशकों की रुचि का संकेत मिलता है. इन बॉन्ड पर सॉवरेन बेंचमार्क की तुलना में 1.90 प्रतिशत अंक तक और राज्य सरकार के बॉन्ड की तुलना में 1.55 प्रतिशत अंक तक अधिक यील्ड भी मिली है.

नगर निकायों की तैयारी बड़ी चुनौती

ICRA के अनुसार, पूंजी बाजार तक नगर निकायों की पहुंच कई कारकों पर निर्भर करेगी. इनमें क्रेडिट क्वालिटी, वित्तीय खुलासे, कर्ज चुकाने की स्पष्टता, परियोजनाओं की तैयारी और बॉन्ड जारी करने से जुड़ी प्रक्रियाओं के लिए तैयारियां शामिल हैं.

रेटिंग एजेंसी का कहना है कि इन शर्तों के कारण उन नगर निकायों की संख्या सीमित हो सकती है जो वास्तव में पूंजी बाजार से बॉन्ड के जरिए फंड जुटाने में सक्षम हैं. यानी शहरी बुनियादी ढांचे के लिए वित्त की जरूरत व्यापक होने के बावजूद सभी नगर निकाय बाजार से पैसा जुटाने की स्थिति में नहीं होंगे.

ICRA के मुताबिक, ग्रीन फाइनेंस के योग्य परियोजनाओं की उपलब्धता बाजार के विस्तार में मुख्य बाधा नहीं है. इसके बजाय नगर निकायों की वित्तीय और संस्थागत तैयारी तथा पूंजी बाजार की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता अधिक महत्वपूर्ण होगी. रेटिंग एजेंसी ने कहा कि निवेशकों की ओर से म्युनिसिपल ग्रीन फाइनेंस में रुचि बढ़ रही है, जबकि बाजार के विस्तार में पूंजी की उपलब्धता की तुलना में आपूर्ति पक्ष से जुड़ी चुनौतियां बड़ी बाधा बनी हुई हैं.
 


वैश्विक व्यापार में BRICS की हिस्सेदारी करीब 25%, EEPC India ने समान व्यापार मानकों की मांग की

EEPC इंडिया के अनुसार, नियामकीय अड़चनों को कम करने से सदस्य देशों के बीच कारोबार और भारतीय निर्यातकों की बाजार पहुंच में सुधार हो सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 15 September, 2026
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Tuesday, 15 September, 2026
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इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (EEPC) इंडिया ने BRICS देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाने और भुगतान व्यवस्था को आसान बनाने की मांग की है. संगठन के अनुसार, नियामकीय अड़चनों को कम करने से सदस्य देशों के बीच कारोबार और भारतीय निर्यातकों की बाजार पहुंच में सुधार हो सकता है. EEPC इंडिया के चेयरमैन पंकज छाड़ा ने कहा कि निर्यातकों के सामने आने वाली करीब 75 फीसदी समस्याओं को गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करने और संबंधित देशों की स्थानीय मुद्राओं में सुगम व प्रभावी भुगतान व्यवस्था स्थापित करने से हल किया जा सकता है. उनके मुताबिक, इससे सीमा पार व्यापार से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों को कम करने में मदद मिलेगी.

गैर-टैरिफ बाधाओं पर समान मानक बनाने की मांग

छाड़ा ने कहा कि BRICS देशों को गैर-टैरिफ बाधाओं को लेकर एक साझा समझौते पर विचार करना चाहिए और समान मानकों की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए. यह मुद्दा पिछले कुछ समय से चर्चा में है, लेकिन अब इसे लागू करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि BRICS देशों को केवल चर्चा तक सीमित रहने के बजाय व्यापार में आने वाली बाधाओं को कम करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए.

नियामकीय लागत बनी बड़ी चिंता

EEPC इंडिया के अनुसार, ज्यादातर देशों में गैर-टैरिफ उपायों की वजह से निर्यातकों पर पड़ने वाली लागत कई मामलों में टैरिफ की तुलना में अधिक होती है. ऐसे में व्यापारिक साझेदार देशों के बीच नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाने की जरूरत है, ताकि निर्यातकों का अनुपालन बोझ कम हो और वस्तुओं की आवाजाही आसान हो सके. संगठन के मुताबिक, BRICS देशों की वैश्विक व्यापार में करीब एक-चौथाई हिस्सेदारी है. ऐसे में गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने से सदस्य देशों के बीच व्यापार प्रवाह बढ़ाने की पर्याप्त गुंजाइश है.

इंजीनियरिंग निर्यात के लिए अहम बाजार

इंजीनियरिंग उत्पाद भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्रों में शामिल हैं. उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश के कुल वस्तु निर्यात में इंजीनियरिंग निर्यात की हिस्सेदारी करीब 27 फीसदी है. ऐसे में BRICS देशों के बीच व्यापार प्रक्रियाओं को आसान बनाने से इस क्षेत्र को फायदा मिल सकता है. BRICS के प्रमुख देशों में ब्राजील, चीन, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों के महत्वपूर्ण बाजार हैं. EEPC इंडिया का कहना है कि इन बाजारों में व्यापार सुविधा से जुड़े उपाय मजबूत होने पर भारत के इंजीनियरिंग निर्यात को और बढ़ावा मिल सकता है.

 


17 सितंबर से खुलेगा NSE IPO, ₹4.42 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है वैल्यूएशन, जानें पूरी डिटेल

NSE ने आईपीओ के लिए प्रति शेयर ₹1,700 से ₹1,785 का प्राइस बैंड तय किया है. यह पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) है, जिसके तहत 126.44 करोड़ शेयर बिक्री के लिए पेश किए जाएंगे.

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Published - Tuesday, 15 September, 2026
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Tuesday, 15 September, 2026
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नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का आईपीओ 17 सितंबर को खुलने जा रहा है. 24 सितंबर को संभावित लिस्टिंग के बाद NSE का शेयर बाजार पूंजीकरण के लिहाज से देश की टॉप 15 कंपनियों में शामिल हो सकता है. ₹1,700-1,785 के प्राइस बैंड के आधार पर NSE का अनुमानित मार्केट कैप करीब ₹4.21 लाख करोड़ से ₹4.42 लाख करोड़ के बीच बैठता है.

₹22,562 करोड़ का होगा IPO

NSE ने आईपीओ के लिए प्रति शेयर ₹1,700 से ₹1,785 का प्राइस बैंड तय किया है. यह पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) है, जिसके तहत 126.44 करोड़ शेयर बिक्री के लिए पेश किए जाएंगे. अपर प्राइस बैंड पर इश्यू का आकार करीब ₹22,562 करोड़ होगा. ₹1,785 के अपर प्राइस बैंड पर NSE का अनुमानित मार्केट कैप करीब ₹4.42 लाख करोड़ होगा. इस स्तर पर कंपनी बाजार पूंजीकरण के लिहाज से देश की करीब 12वीं सबसे बड़ी कंपनी बन सकती है.

टॉप कंपनियों की लिस्ट में कहां होगी NSE?

अपर प्राइस बैंड पर NSE का मार्केट कैप करीब ₹4,41,788 करोड़ बैठता है. यह टाइटन कंपनी के करीब ₹4,44,736 करोड़ के मार्केट कैप से थोड़ा कम और सन फर्मास्यूटिकल इंडस्ट्रीज के करीब ₹4,41,478 करोड़ से थोड़ा ज्यादा है. वहीं, अगर NSE की लिस्टिंग ₹1,700 के लोअर प्राइस बैंड पर होती है तो इसका अनुमानित मार्केट कैप करीब ₹4,20,750 करोड़ होगा. इस स्थिति में एनएसई इंफोसिस के करीब ₹4,21,123 करोड़ के मार्केट कैप से थोड़ा नीचे और कोटक महिंद्रा बैंक के करीब ₹4,16,807 करोड़ के मार्केट कैप से ऊपर होगा.

17 सितंबर को खुलेगा NSE IPO

NSE का आईपीओ 17 सितंबर को खुलेगा और 21 सितंबर को बंद होगा. निवेशकों को कम से कम एक लॉट के लिए बोली लगानी होगी. एक लॉट में 8 शेयर हैं. NSE के आईपीओ का आकार पहले करीब ₹30,000 करोड़ रहने का अनुमान था, लेकिन कुछ मौजूदा निवेशकों की ओर से OFS में कम शेयर बेचने के फैसले के बाद इसका आकार घट गया. यदि इश्यू ₹30,000 करोड़ का होता तो यह देश का सबसे बड़ा आईपीओ बन सकता था. फिलहाल यह रिकॉर्ड Hyundai Motor India के पास है, जिसका आईपीओ 2024 में आया था.

NSE का मुकाबला BSE से

NSE भारत के प्रमुख स्टॉक एक्सचेंजों में शामिल है और इसका सीधा मुकाबला BSE से है. BSE एशिया के सबसे पुराने स्टॉक एक्सचेंजों में से एक है, लेकिन ट्रेडिंग वॉल्यूम के मामले में NSE उससे काफी आगे है. NSE की लिस्टिंग से निवेशकों को पहली बार एक्सचेंज के शेयर में सीधे निवेश करने का मौका मिलेगा. हालांकि, लिस्टिंग के बाद शेयर की वास्तविक बाजार पूंजी और कंपनी की रैंकिंग उसके बाजार भाव पर निर्भर करेगी.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)

 


मार्च 2027 तक बैरियर-फ्री होंगे सभी टोल प्लाजा, बिना रुके कटेगा टोल: गडकरी

बैरियर-फ्री व्यवस्था में मल्टी-लेन फ्री-फ्लो (MLFF) सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा. इसके तहत टोल प्लाजा पर लगे कैमरे वाहन की नंबर प्लेट को स्कैन करेंगे.

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Published - Tuesday, 15 September, 2026
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Tuesday, 15 September, 2026
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केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के मुताबिक, मार्च 2027 तक देश के सभी नेशनल हाईवे के टोल प्लाजा को बैरियर-फ्री करने का लक्ष्य रखा गया है. इसके तहत फास्टैग के साथ ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) और मल्टी-लेन फ्री-फ्लो (MLFF) जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा. इससे वाहनों को टोल प्लाजा पर रुकने की जरूरत नहीं होगी और टोल भुगतान की प्रक्रिया भी तेज होगी.

दिसंबर तक 70 फीसदी टोल बूथ होंगे बैरियर-फ्री

नितिन गडकरी ने ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026 में बताया कि सरकार नेशनल हाईवे के टोल बूथ को बैरियर-फ्री बनाने पर काम कर रही है. दिसंबर 2026 के अंत तक 70 फीसदी से अधिक टोल बूथ को बैरियर-फ्री करने का लक्ष्य है, जबकि मार्च 2027 तक इसे 100 फीसदी तक पहुंचाने की योजना है. देश में अब तक 13 करोड़ से ज्यादा फास्टैग जारी किए जा चुके हैं और नेशनल हाईवे पर इनकी पहुंच 98 फीसदी से अधिक है.

बिना रुके कैसे कटेगा टोल?

बैरियर-फ्री व्यवस्था में मल्टी-लेन फ्री-फ्लो (MLFF) सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा. इसके तहत टोल प्लाजा पर लगे कैमरे वाहन की नंबर प्लेट को स्कैन करेंगे. वाहन के टोल जोन से गुजरते ही सिस्टम उसकी पहचान करेगा और संबंधित खाते से टोल राशि काटने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी. इस व्यवस्था में पारंपरिक बैरियर की जरूरत नहीं होगी. इस तकनीक का परीक्षण 11 मई 2026 को मुंबई के एक टोल प्लाजा पर किया जा चुका है.

समय और ईंधन दोनों की होगी बचत

नए सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा टोल प्लाजा पर लगने वाले समय और जाम में कमी के रूप में देखने को मिलेगा. गडकरी के मुताबिक, मौजूदा व्यवस्था में एक वाहन को टोल प्लाजा पर औसतन 12 मिनट तक रुकना पड़ता है. बैरियर-फ्री सिस्टम लागू होने के बाद यह समय काफी कम हो जाएगा. सरकार के मुताबिक, टोल प्लाजा पर वाहनों के रुकने में कमी आने से हर साल करीब 5,250 करोड़ रुपये के ईंधन की बचत हो सकती है.

टोल कलेक्शन में भी बढ़ोतरी की उम्मीद

फास्टैग के इस्तेमाल से टोल कलेक्शन में पहले ही करीब 10 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और इससे सरकार को करीब 7,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व मिला है. देश का कुल टोल राजस्व अब 82,000 करोड़ रुपये से अधिक बताया गया है.

गडकरी के अनुसार, बैरियर-फ्री टोलिंग सिस्टम पूरी तरह लागू होने के बाद सरकार को हर साल करीब 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फायदा हो सकता है. वहीं, टोल बूथ के संचालन की लागत भी मौजूदा करीब 12 फीसदी से घटकर 2-3 फीसदी तक आने की उम्मीद है.
 


अमेजन नाउ का सालाना कारोबार 1 अरब डॉलर के पार, दिवाली तक 100 शहरों में पहुंचाने की तैयारी

कंपनी अपने फुलफिलमेंट नेटवर्क का भी विस्तार कर रही है. अमेजन के मुताबिक, उसके प्लेटफॉर्म पर हजारों उत्पाद कुछ ही मिनटों या कुछ घंटों में, 10 लाख से अधिक उत्पाद उसी दिन और 40 लाख से अधिक उत्पाद अगले दिन डिलीवरी के विकल्प के साथ उपलब्ध हैं.

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Published - Tuesday, 15 September, 2026
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Tuesday, 15 September, 2026
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अमेजन की क्विक डिलीवरी सेवा अमेजन नाउ (Amazon Now) ने भारत में पिछले तीन महीनों के प्रदर्शन के आधार पर 1 अरब डॉलर का सालाना कारोबार पार कर लिया है. कंपनी के मुताबिक, लॉन्च के बाद से अमेजन नाउ के ऑर्डर हर तिमाही दोगुने हो रहे हैं. कंपनी अब दिवाली तक अपनी कुछ ही मिनटों में डिलीवरी वाली सेवा को 100 शहरों तक पहुंचाने की तैयारी कर रही है.

60 से ज्यादा शहरों में पहुंची अमेजन नाउ

अमेजन नाउ का नेटवर्क 10 सप्ताह से भी कम समय में चार गुना बढ़कर 60 से अधिक शहरों और कस्बों तक पहुंच गया है. इनमें महानगरों के अलावा पडुबिदरी, तिरुपति, गुंटूर, गुरदासपुर, जालंधर, वेल्लोर, धारवाड़, वारंगल और बेरहामपुर जैसे शहर शामिल हैं. कंपनी के मुताबिक, ऑर्डर की डिलीवरी 750 से अधिक माइक्रो फुलफिलमेंट और अर्बन फुलफिलमेंट सेंटर के नेटवर्क से की जा रही है. अमेजन नाउ के जरिए किराना, फल-सब्जियां, फ्रोजन फूड, पर्सनल केयर, फैशन, ब्यूटी, छोटे उपकरण और घर-रसोई से जुड़े सामान कुछ ही मिनटों में पहुंचाए जा रहे हैं.

अमेजन इंडिया के कंट्री मैनेजर समीर कुमार ने कहा कि अमेजन नाउ ने कम समय में 1 अरब डॉलर का सालाना कारोबार पार किया है और यह अमेजन इंडिया के इतिहास में सबसे तेजी से बढ़ने वाला ई-कॉमर्स कारोबार बन गया है. उन्होंने कहा कि कंपनी दिवाली तक 100 शहरों में विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रही है.

रोजाना करीब 7 लाख ऑर्डर

घटनाक्रम से परिचित लोगों के मुताबिक, अमेजन नाउ का औसत ऑर्डर मूल्य करीब 540 रुपये है और कंपनी रोजाना लगभग 7 लाख ऑर्डर संभाल रही है. ऑर्डर की संख्या के आधार पर इसकी बाजार हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी और कारोबार के मूल्य के आधार पर लगभग 14 फीसदी बताई गई है.

अमेजन ने जून 2026 में भारत में कुछ ही मिनटों में डिलीवरी करने वाला बड़ा नेटवर्क तैयार करने की योजना की घोषणा की थी. कंपनी ने उस समय अमेजन नाउ को देशभर के 300 से अधिक शहरों तक ले जाने का लक्ष्य बताया था.

कंपनी अपने फुलफिलमेंट नेटवर्क का भी विस्तार कर रही है. अमेजन के मुताबिक, उसके प्लेटफॉर्म पर हजारों उत्पाद कुछ ही मिनटों या कुछ घंटों में, 10 लाख से अधिक उत्पाद उसी दिन और 40 लाख से अधिक उत्पाद अगले दिन डिलीवरी के विकल्प के साथ उपलब्ध हैं.

क्विक कॉमर्स में बढ़ रही प्रतिस्पर्धा

अमेजन नाउ का तेजी से विस्तार ऐसे समय में हो रहा है, जब भारत के क्विक कॉमर्स बाजार में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है. ब्लिंकिट, जेप्टो, स्विगी इंस्टामार्ट और फ्लिपकार्ट मिनट्स जैसी कंपनियां भी डार्क स्टोर और माइक्रो फुलफिलमेंट सेंटर का नेटवर्क तेजी से बढ़ा रही हैं.

सीएलएसए की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश के शीर्ष 10 शहरों में ब्लिंकिट के पास करीब 30 फीसदी डार्क स्टोर हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर इसकी हिस्सेदारी 34 फीसदी से अधिक है. रिपोर्ट के मुताबिक, 180 से अधिक शहरों में ब्लिंकिट की मौजूदगी है.

ब्रोकरेज की ट्रैकिंग के अनुसार, भारत में क्विक कॉमर्स का नेटवर्क अब 477 शहरों तक पहुंच चुका है. शीर्ष 10 शहरों में ब्लिंकिट, जेप्टो, स्विगी इंस्टामार्ट, फ्लिपकार्ट मिनट्स और बिगबास्केट के कुल 3,536 डार्क स्टोर हैं.

इन शहरों में फ्लिपकार्ट मिनट्स के 627 डार्क स्टोर हैं, जबकि स्विगी इंस्टामार्ट के 615 और बिगबास्केट के 497 डार्क स्टोर हैं. इससे संकेत मिलता है कि इंस्टेंट डिलीवरी बाजार में कंपनियां ग्राहकों तक तेजी से पहुंच बनाने के लिए अपने स्थानीय फुलफिलमेंट नेटवर्क को लगातार मजबूत कर रही हैं.
 


₹2,000 तक UPI पेमेंट रहेगा फ्री, बड़े मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर लग सकता है MDR चार्ज

वित्तीय सेवा विभाग (DFS) की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार, तय सीमा तक के UPI और RuPay डेबिट कार्ड भुगतान पर किसी तरह का शुल्क नहीं लिया जा सकता.

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Published - Tuesday, 15 September, 2026
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Tuesday, 15 September, 2026
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यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) से ₹2,000 तक के भुगतान फिलहाल शुल्क-मुक्त रहेंगे. सरकार ने ₹2,000 तक के UPI और RuPay डेबिट कार्ड लेनदेन पर बैंक या भुगतान सेवा प्रदाता की ओर से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कोई शुल्क लगाने पर रोक बरकरार रखी है. वहीं, ₹2,000 से अधिक के कुछ मर्चेंट पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने का कानूनी रास्ता साफ हो गया है. हालांकि, अभी शुल्क की दरें तय नहीं हुई हैं और न ही ₹2,000 से अधिक के हर UPI भुगतान पर चार्ज लगाने का फैसला हुआ है.

₹2,000 से ज्यादा के UPI पेमेंट पर क्या होगा?

वित्तीय सेवा विभाग (DFS) की ओर से सोमवार को जारी अधिसूचना के अनुसार, तय सीमा तक के UPI और RuPay डेबिट कार्ड भुगतान पर किसी तरह का शुल्क नहीं लिया जा सकता. इसका मतलब है कि ₹2,000 तक के भुगतान करने वाले ग्राहकों पर इस बदलाव का कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा. दूसरी ओर, ₹2,000 से अधिक के कुछ मर्चेंट लेनदेन पर MDR लागू करने की संभावना खुल गई है. अभी यह तय होना बाकी है कि किन कारोबारी भुगतानों पर शुल्क लगेगा, इसकी सीमा क्या होगी और MDR की दर कितनी रखी जाएगी.

क्या आम ग्राहकों पर बढ़ सकता है बोझ?

MDR मुख्य रूप से मर्चेंट यानी दुकानदार या कारोबारी से लिया जाने वाला शुल्क है. इसका भुगतान आम तौर पर बैंक या भुगतान सेवा प्रदाता को डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने के लिए किया जाता है. लेकिन अगर कारोबारियों पर अतिरिक्त लागत आती है, तो उसका असर ग्राहकों पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ सकता है.

मसलन, कुछ कारोबारी इस लागत को ग्राहक से अतिरिक्त शुल्क के रूप में वसूल सकते हैं. कुछ मामलों में वे ₹2,000 से अधिक के भुगतान के लिए UPI स्वीकार करने से बच सकते हैं और नकद भुगतान की मांग कर सकते हैं. इसके अलावा, कारोबारी अपनी लागत की भरपाई के लिए सामान या सेवाओं की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी कर सकते हैं. हालांकि, यह अभी संभावित असर है. जब तक MDR की दरें और लागू होने वाले लेनदेन की श्रेणियां तय नहीं होतीं, तब तक ग्राहकों पर वास्तविक प्रभाव का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी.

UPI पर अभी MDR क्यों नहीं लगता?

भारत में UPI को बढ़ावा देने के लिए फिलहाल मर्चेंट डिस्काउंट रेट को शून्य रखा गया है. जनवरी 2020 से UPI और RuPay डेबिट कार्ड से जुड़े भुगतान पर MDR नहीं लिया जा रहा है. इसके विपरीत, क्रेडिट कार्ड जैसे कुछ अन्य डिजिटल भुगतान माध्यमों में कारोबारियों को भुगतान स्वीकार करने पर शुल्क देना पड़ता है. अब सरकार की ओर से किए गए कानूनी बदलाव के बाद UPI पर चुनिंदा बड़े मर्चेंट पेमेंट के लिए MDR व्यवस्था लागू करने का रास्ता खुला है.

एनपीसीआई तय करेगा शुल्क की दर

कानूनी रास्ता साफ होने के बाद अब UPI की व्यवस्था संचालित करने वाली नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. UPI और सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी संबंधित पक्षों के साथ मिलकर शुल्क की दर और लागू होने वाले नियमों पर फैसला करेगी.

जब तक NPCI की ओर से इस संबंध में विस्तृत निर्देश जारी नहीं होते, तब तक नई MDR व्यवस्था लागू नहीं होगी. इसलिए फिलहाल ₹2,000 तक के UPI भुगतान पहले की तरह शुल्क-मुक्त रहेंगे और ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर भी अपने आप कोई नया चार्ज नहीं लगेगा.

क्या ₹2,000 से ज्यादा के हर UPI भुगतान पर चार्ज लगेगा?

नहीं. मौजूदा जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि ₹2,000 से अधिक के हर UPI भुगतान पर शुल्क लगेगा. प्रस्तावित व्यवस्था मुख्य रूप से मर्चेंट पेमेंट से जुड़ी है और किन लेनदेन पर MDR लागू होगा, इसकी अंतिम शर्तें और दरें अभी सामने आना बाकी हैं.

इसलिए फिलहाल UPI उपयोगकर्ताओं के लिए सबसे अहम बात यह है कि ₹2,000 तक के भुगतान पर कोई नया शुल्क नहीं लगाया गया है. बड़े कारोबारी भुगतानों पर शुल्क का असर तभी स्पष्ट होगा, जब NPCI इसकी दरों और नियमों की आधिकारिक घोषणा करेगा.
 


तेजी के संकेतों के बीच खुलेगा बाजार, क्रूड और फेड के फैसले पर भी नजर; ये शेयर रहेंगे फोकस में

बीते कारोबारी सत्र यानी शुक्रवार को निफ्टी 23,398.10 अंक और सेंसेक्स 120.83 अंक की गिरावट के साथ 74,781.76 अंक पर बंद हुआ था. सोमवार को गणेश चतुर्थी के कारण बाजार बंद रहा था.

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Published - Tuesday, 15 September, 2026
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Tuesday, 15 September, 2026
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गिफ्ट निफ्टी में तेजी के बीच मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत बढ़त के साथ होने के संकेत मिल रहे हैं. शुक्रवार के कारोबारी सत्र में निफ्टी 50 79.70 अंक गिरकर 23,398.10 अंक पर और सेंसेक्स 120.83 अंक की गिरावट के साथ 74,781.76 अंक पर बंद हुआ था. सोमवार को गणेश चतुर्थी के कारण बाजार बंद रहा था. अब मंगलवार को निवेशकों की नजर वैश्विक बाजारों, कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक पर रहेगी. 

मंगलवार सुबह गिफ्ट निफ्टी करीब 39 अंक की बढ़त के साथ 23,525 के स्तर पर कारोबार कर रहा था. इससे निफ्टी 50 के सकारात्मक शुरुआत करने के संकेत मिल रहे हैं. हालांकि, वैश्विक बाजारों के मिले-जुले रुख के बीच बाजार की दिशा पर कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी फेड की आगामी बैठक का असर रह सकता है.

एशियाई बाजारों में दबाव

मंगलवार को एशिया-प्रशांत क्षेत्र के प्रमुख शेयर बाजारों में दबाव देखने को मिला. निवेशक महंगाई के रुख और अमेरिकी फेड की मौद्रिक नीति को लेकर सतर्क हैं. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने भी चिंता बढ़ाई है. हैंग सेंग में 0.62 फीसदी और कोस्पी में 0.32 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

अमेरिकी बाजार भी गिरावट के साथ बंद

सोमवार के कारोबार में अमेरिकी शेयर बाजारों में भी कमजोरी रही. Dow Jones Industrial Average 0.29 फीसदी, S&P 500 0.48 फीसदी और Nasdaq Composite 0.56 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुए.

कच्चे तेल की कीमतों में तेजी

सऊदी अरब के ऊर्जा ढांचे पर हुए हमलों के बाद आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है. इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी पड़ा है. इंटरकॉन्टिनेन्टल एक्सचेंज पर सितंबर वायदा 0.81 फीसदी की बढ़त के साथ 107.06 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है. ऐसे में तेल की कीमतों में तेजी से महंगाई और चालू खाते पर दबाव बढ़ने की चिंता बनी रह सकती है.

इन पर भी रखें नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, मंगलवार कई शेयरों में कॉरपोरेट अपडेट के चलते हलचल देखने को मिल सकती है. BHEL के बोर्ड ने NTPC BHEL Power Projects में 65 करोड़ रुपये के अतिरिक्त इक्विटी निवेश को मंजूरी दी है. Solar Industries India की सब्सिडियरी Solar SA Investments Proprietary ने Omnia Holdings के अधिग्रहण के लिए करीब 1.355 अरब डॉलर यानी लगभग 12,951 करोड़ रुपये का समझौता किया है. HFCL ने ऑप्टिकल फाइबर, ऑप्टिकल फाइबर केबल और प्रीफॉर्म की क्षमता बढ़ाने के लिए कैपेक्स बढ़ाकर 1,800 करोड़ रुपये कर दिया है. Indiabulls 1,050 करोड़ रुपये में Fintech Cloud की 70 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करेगी.

Raymond की एयरोस्पेस सब्सिडियरी को एक प्रमुख भारतीय एयरोस्पेस और डिफेंस कंपनी से 300 से अधिक पार्ट नंबरों से जुड़ा नया ऑर्डर मिला है, जिससे अनुमानित उत्पादन स्तर पर करीब 33 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार होने की उम्मीद है. Amazon ने बताया कि उसकी भारत में अल्ट्रा-फास्ट डिलीवरी सर्विस Amazon Now ने पिछले तीन महीनों के आधार पर 1 अरब डॉलर की सालाना अनुमानित ग्रॉस सेल्स का आंकड़ा पार किया है. Google ने अपने AI for the Planet Accelerator के लिए भारत के चार स्टार्टअप्स का चयन किया है. TVS Motor Company ने श्रीलंका में Apache मोटरसाइकिल रेंज का विस्तार किया है. Coforge के स्वतंत्र निदेशक डीके सिंह ने तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दिया है और बोर्ड ने समितियों का पुनर्गठन किया है. वहीं, Sri Lotus Developers and Realty में Morgan Stanley Asia Singapore ने 15 लाख शेयर खरीदे हैं, जो कंपनी में 0.3 फीसदी हिस्सेदारी के बराबर है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते से ऑटो सेक्टर को बड़ा फायदा, 2.5 लाख कारों पर सिर्फ 8% शुल्क

भारत को शुरुआती 2.5 लाख कारों का कोटा मिलेगा, समझौते के तहत शुल्क घटने के साथ 10वें साल से यह कोटा बढ़कर 4 लाख वाहन सालाना हो जाएगा

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 14 September, 2026
Last Modified:
Monday, 14 September, 2026
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यूरोपीय संघ भारत में निर्मित 2.5 लाख यात्री वाहनों को हर साल 8 प्रतिशत की रियायती आयात शुल्क दर पर अपने बाजार में प्रवेश की अनुमति देगा. यह सुविधा प्रस्तावित भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के तहत मिलेगी. यूरोपीय संघ की ओर से जारी समझौते के मसौदे के अनुसार, वार्षिक कोटा धीरे-धीरे बढ़कर समझौते के 10वें साल से 4 लाख वाहन हो जाएगा.

रियायती शुल्क का लाभ भारत में निर्मित आंतरिक दहन इंजन वाली यात्री कारों और संकर विद्युत वाहनों को मिलेगा. इसके लिए वाहन की सीआईएफ आधार पर कीमत 50,000 यूरो तक होनी चाहिए. कोटा के तहत मिलने वाला आयात शुल्क समझौते के लागू होने के दूसरे साल में घटकर 6 प्रतिशत, तीसरे साल में 4 प्रतिशत और चौथे साल में 2 प्रतिशत रह जाएगा.

पांचवें साल से शुल्क हो जाएगा शून्य

समझौते के तहत कोटा के दायरे में आने वाले वाहनों पर पांचवें साल से आयात शुल्क पूरी तरह खत्म हो जाएगा. वार्षिक कोटा पहले साल के 2.5 लाख वाहनों से धीरे-धीरे बढ़कर 10वें साल से 4 लाख वाहन हो जाएगा. कोटा से अधिक वाहनों के आयात पर यूरोपीय संघ की सबसे पसंदीदा राष्ट्र यानी एमएफएन शुल्क दर लागू होगी.

50,000 यूरो से अधिक कीमत वाली कारों को कोटा आधारित शुल्क रियायत नहीं मिलेगी. हालांकि, इन वाहनों पर भी आयात शुल्क पहले साल के 8 प्रतिशत से घटकर समझौते के 10वें साल में शून्य हो जाएगा. भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते पर इस साल के अंत में हस्ताक्षर होने की उम्मीद है और इसके अगले साल से लागू होने की संभावना है.

भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते के निष्कर्ष की घोषणा इस साल 27 जनवरी को की गई थी. समझौते में बैटरी से चलने वाले विद्युत वाहन, प्लग-इन संकर विद्युत वाहन और आंतरिक दहन इंजन तथा संकर विद्युत वाहनों के अलावा अन्य तकनीक से चलने वाले यात्री वाहनों के लिए अलग-अलग शुल्क-दर कोटा भी शामिल है.

विद्युत वाहनों के लिए अलग कोटा

40,000 यूरो तक की सीआईएफ कीमत वाले विद्युत वाहनों के लिए अलग कोटा समझौते के पांचवें साल से शुरू होगा. इसके तहत हर साल 27,500 वाहनों को 8 प्रतिशत आयात शुल्क पर यूरोपीय संघ के बाजार में प्रवेश मिलेगा. यह कोटा नौवें साल में बढ़कर 60,500 वाहन और 14वें साल से हर साल 1.25 लाख वाहन हो जाएगा. इन वाहनों पर आयात शुल्क नौवें साल से पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा.

40,000 यूरो से अधिक और 60,000 यूरो तक की सीआईएफ कीमत वाले वाहनों के लिए भी कोटा पांचवें साल से शुरू होगा. इस श्रेणी में हर साल 16,250 वाहनों को 8 प्रतिशत शुल्क पर प्रवेश मिलेगा. यह वार्षिक कोटा 14वें साल से बढ़कर 75,000 वाहन हो जाएगा और अंततः आयात शुल्क शून्य कर दिया जाएगा. 60,000 यूरो से अधिक कीमत वाले वाहनों के लिए शुल्क-दर कोटा पांचवें साल से शुरू होगा. इसके तहत 6,250 वाहनों को 8 प्रतिशत शुल्क पर प्रवेश मिलेगा. यह कोटा नौवें साल में बढ़कर 13,250 वाहन और 14वें साल से 25,000 वाहन हो जाएगा. इन वाहनों पर भी नौवें साल से आयात शुल्क समाप्त कर दिया जाएगा.

इन कृषि उत्पादों को भी मिलेगी शुल्क रियायत

समझौते के मसौदे के अनुसार, यूरोपीय संघ भारत में निर्मित कुछ कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों पर भी कोटा आधारित शुल्क रियायत देगा. इनमें टेबल अंगूर, सूखे प्याज, खीरे और कॉर्निशन, शीरे से बनी रम और घी शामिल हैं.

घी के लिए मसौदे में कहा गया है कि समझौता प्रभावी होने की तारीख से हर साल कुल 1,000 मीट्रिक टन की मात्रा के लिए कोटा के भीतर शुल्क दर सीमा शुल्क की आधार दर के 50 प्रतिशत के बराबर होगी.

सीआईएफ मूल्य में क्या शामिल होगा

वाहनों की श्रेणी तय करने के लिए इस्तेमाल होने वाले सीआईएफ मूल्य में वाहन की वास्तविक खरीद कीमत के साथ यूरोपीय संघ के प्रवेश बंदरगाह तक शिपिंग या माल ढुलाई की लागत और बीमा भी शामिल होगा. वाहनों पर शुल्क में ये रियायतें भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते के मसौदे में शामिल बाजार पहुंच से जुड़े प्रावधानों का हिस्सा हैं.
 


ब्रिक्स घोषणा से भारत के MSME और निर्यातकों को मिल सकते हैं नए कारोबारी मौके: PHDCCI

PHDCCI के मुताबिक, व्यापार सुगमता, सस्ती वित्तीय व्यवस्था, सीमा पार भुगतान और तकनीकी सहयोग से भारतीय कंपनियों को उभरते बाजारों में विस्तार का अवसर मिल सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 14 September, 2026
Last Modified:
Monday, 14 September, 2026
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ब्रिक्स नई दिल्ली घोषणा (BRICS New Delhi Declaration) भारत के उद्योग जगत के लिए व्यापार, निवेश और विनिर्माण के नए अवसर खोल सकती है. पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (PHDCCI) के मुताबिक, घोषणा में व्यापार सुगमता, किफायती वित्त, भुगतान व्यवस्था, मजबूत आपूर्ति श्रृंखला और तकनीकी सहयोग पर जोर दिए जाने से भारतीय कंपनियों की उभरते बाजारों में भागीदारी बढ़ सकती है.

पीएचडीसीसीआई का कहना है कि इसका फायदा खास तौर पर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs), निर्यातकों, विनिर्माण कंपनियों और प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनियों को मिल सकता है. इससे भारत के वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (Global Value Chains) में और गहराई से जुड़ने की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं.

एमएसएमई और व्यापार वित्त पर जोर

घोषणा में एमएसएमई को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया गया है. पीएचडीसीसीआई के अनुसार, छोटे कारोबारों के लिए सस्ती वित्तीय व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में भागीदारी की बड़ी चुनौती है.

निर्यात आधारित एमएसएमई के लिए ऋण आकलन से जुड़े मार्गदर्शक सिद्धांत और इनवॉइस डिस्काउंटिंग मैकेनिज्म के अध्ययन का प्रस्ताव छोटे कारोबारों के लिए कार्यशील पूंजी उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है. इससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कारोबार बढ़ाने में आसानी हो सकती है.

पीएचडीसीसीआई के अध्यक्ष राजीव जुनेजा ने कहा कि ब्रिक्स नई दिल्ली घोषणा सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग को भारतीय उद्योग के लिए ठोस अवसरों में बदलने का महत्वपूर्ण मौका देती है. उन्होंने कहा कि इसका वास्तविक प्रभाव सीमा पार व्यापार और निवेश को सस्ता, तेज और आसान बनाने वाले उपायों से आएगा.

सीमा पार भुगतान से कारोबार को मिल सकती है राहत

पीएचडीसीसीआई के अनुसार, बेहतर सीमा पार भुगतान व्यवस्था भारतीय कारोबारों के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. घोषणा में भुगतान और संदेश भेजने वाले चैनलों के बीच बेहतर तालमेल के लिए काम जारी रखने के साथ-साथ ब्रिक्स की स्थानीय मुद्राओं में व्यापार निपटान और निवेश पर चर्चा का समर्थन किया गया है. बेहतर भुगतान व्यवस्था से अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में आने वाली दिक्कतें कम हो सकती हैं. इससे ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा मिलने की संभावना है.

विनिर्माण और निवेश सहयोग को बढ़ावा

ब्रिक्स घोषणा सदस्य देशों के बीच विनिर्माण और निवेश सहयोग को मजबूत करने का व्यापक ढांचा भी उपलब्ध कराती है. ब्रिक्स देशों ने मजबूत और भरोसेमंद आपूर्ति श्रृंखलाओं की जरूरत पर जोर दिया है. साथ ही, वैश्विक विनिर्माण और उत्पादन के अधिक मूल्य वाले क्षेत्रों में उभरते बाजारों की भागीदारी बढ़ाने पर भी ध्यान दिया गया है.

पीएचडीसीसीआई के अनुसार, व्यापार, निवेश, तकनीक हस्तांतरण और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के माध्यम से भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं. इससे भारत केवल पारंपरिक आयात-निर्यात संबंधों तक सीमित रहने के बजाय उत्पादन और निवेश साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ सकता है.

बुनियादी ढांचे और लॉजिस्टिक्स पर भी फोकस

घोषणा में बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स और विकास वित्त पर जोर भारत की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत कर सकता है. इसमें सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में सहयोग का स्वागत किया गया है. इसके अलावा, निजी पूंजी जुटाने और वित्तीय लागत कम करने के लिए बहुपक्षीय गारंटी की भूमिका पर भी जोर दिया गया है.

टिकाऊ परिवहन बुनियादी ढांचे और मजबूत लॉजिस्टिक्स आपूर्ति श्रृंखलाओं में सहयोग से भारत की कनेक्टिविटी बेहतर हो सकती है. इससे देश के वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में और मजबूती से जुड़ने में मदद मिल सकती है.

डिजिटल और हरित अर्थव्यवस्था में अवसर

ब्रिक्स घोषणा में डिजिटल बदलाव, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), हरित अर्थव्यवस्था, जलवायु वित्त और मजबूत बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों पर भी ध्यान दिया गया है. पीएचडीसीसीआई के मुताबिक, इन क्षेत्रों में भारतीय प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढांचा, स्वच्छ ऊर्जा और सेवा क्षेत्र की कंपनियों के लिए नए अवसर बन सकते हैं. इससे ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग का दायरा पारंपरिक वस्तु व्यापार से आगे बढ़कर तकनीक और निवेश साझेदारी तक पहुंच सकता है.

घोषणा के अमल पर निर्भर करेगा वास्तविक फायदा

पीएचडीसीसीआई ने कहा कि ब्रिक्स से मिलने वाले आर्थिक लाभ अंततः घोषणा में किए गए प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन और कारोबार के स्तर पर मिलने वाले नतीजों पर निर्भर करेंगे.

बाजार तक पहुंच, व्यापार वित्त, भुगतान, लॉजिस्टिक्स, निवेश और तकनीकी सहयोग के लिए व्यावहारिक व्यवस्था तैयार करना जरूरी होगा. तभी ब्रिक्स सहयोग से भारतीय कंपनियों और व्यापक अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक फायदा मिल सकेगा.

पीएचडीसीसीआई के एसजी और सीईओ डॉ. रणजीत मेहता ने कहा कि ब्रिक्स भारत को पारंपरिक आयात-निर्यात संबंधों से आगे बढ़कर उत्पादन, निवेश और तकनीक साझेदारी की दिशा में ले जाने का अवसर देता है. उन्होंने कहा कि भारत मजबूत वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के निर्माण में भागीदार बन सकता है. इससे देश और ब्रिक्स के अन्य सदस्य देशों में विनिर्माण, निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं.
 


जोमैटो ने कैश ऑन डिलीवरी पर लगाया नया शुल्क, चुनिंदा ऑर्डर पर 20 रुपये तक देना होगा अतिरिक्त चार्ज

ऑनलाइन भुगतान करने वाले ग्राहकों पर नहीं लगेगा यह शुल्क, प्लेटफॉर्म शुल्क और पैकेजिंग चार्ज के अलावा देनी होगी नई फीस

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 14 September, 2026
Last Modified:
Monday, 14 September, 2026
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फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म जोमैटो (Zomato) ने कैश ऑन डिलीवरी करने वाले ग्राहकों के लिए नया शुल्क लागू किया है. कंपनी चुनिंदा ऑर्डर पर ‘डिलीवरी पर भुगतान शुल्क’ के नाम से अतिरिक्त रकम वसूल रही है. अलग-अलग मामलों में यह शुल्क 5 रुपये से लेकर 20 रुपये तक देखा गया है. यह शुल्क मंच शुल्क, रेस्तरां पैकेजिंग शुल्क और लागू वस्तु एवं सेवा कर के अलावा लिया जा रहा है.

बिल में अलग से दिखाई दे रहा है नया शुल्क

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जिन ग्राहकों ने कैश ऑन डिलीवरी का विकल्प चुना, उनके बिल में ‘डिलीवरी पर भुगतान शुल्क’ अलग से दिखाई दे रहा है. कुछ मामलों में यह शुल्क 5 रुपये है, जबकि कुछ ग्राहकों ने 7 रुपये और यहां तक कि 20 रुपये तक शुल्क लगाए जाने की जानकारी दी है. हालांकि, ऑनलाइन भुगतान करने वाले ग्राहकों पर यह कैश ऑन डिलीवरी शुल्क लागू नहीं हो रहा है.

मंच शुल्क के अलावा बढ़ा एक और चार्ज

जोमैटो का नया कैश ऑन डिलीवरी शुल्क मौजूदा मंच शुल्क और अन्य शुल्क के अतिरिक्त है. ग्राहकों को ऑर्डर के दौरान खाने की कीमत के अलावा वितरण, मंच सेवा, पैकेजिंग और कर जैसे अलग-अलग शुल्क का भुगतान करना पड़ सकता है. खाद्य वितरण कंपनियां अब अलग-अलग लेनदेन पर शुल्क बढ़ाकर अपनी कमाई बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं. ऐसे में जोमैटो का नया कैश ऑन डिलीवरी शुल्क भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.

बढ़ रही है खाद्य वितरण बाजार में प्रतिस्पर्धा

भारत के खाद्य वितरण बाजार में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है. रैपिडो की ओनली अपनी मौजूदगी बढ़ा रही है, जबकि फ्लिपकार्ट अपनी ‘ईट इन’ खाद्य वितरण सेवा का परीक्षण कर रहा है. खाद्य वितरण कंपनी स्विश ने भी हाल में नई फंडिंग जुटाई है. फिलहाल जोमैटो और स्विगी इस बाजार की प्रमुख कंपनियां हैं. स्विगी ने अभी तक कैश ऑन डिलीवरी पर ऐसा कोई समान शुल्क लागू नहीं किया है. कंपनी भविष्य में इस तरह का शुल्क लागू करेगी या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है.

छोटा शुल्क, लेकिन बड़ी कमाई की संभावना

ऐसे शुल्क का वित्तीय असर प्रति ग्राहक वसूली जाने वाली रकम से ज्यादा ऑर्डर की बड़ी संख्या पर निर्भर करता है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, जोमैटो रोजाना करीब 23 से 25 लाख खाद्य वितरण ऑर्डर पूरे करता है. अगर हर ऑर्डर पर 5 रुपये का शुल्क लगाया जाए, तो सैद्धांतिक तौर पर कंपनी रोजाना करीब 1.15 से 1.25 करोड़ रुपये अतिरिक्त जुटा सकती है. सालाना आधार पर यह रकम करीब 420 से 456 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है. हालांकि, यह केवल सैद्धांतिक अधिकतम अनुमान है, क्योंकि जोमैटो के सभी ऑर्डर कैश ऑन डिलीवरी के जरिए नहीं किए जाते. कैश ऑन डिलीवरी वाले ऑर्डर कंपनी के कुल ऑर्डर का केवल एक हिस्सा हैं. फिर भी, यह आंकड़ा बताता है कि लाखों लेनदेन पर छोटी रकम का शुल्क भी कंपनियों के लिए बड़ी आय का जरिया बन सकता है.

पहले भी बढ़ा चुकी है मंच शुल्क

कैश ऑन डिलीवरी शुल्क लागू करने से पहले भी खाद्य वितरण कंपनियां मंच शुल्क के साथ प्रयोग करती रही हैं. स्विगी ने शुरुआत में 2 रुपये के मंच शुल्क का परीक्षण किया था, जिसके बाद जोमैटो ने भी मंच शुल्क लागू किया.

जोमैटो ने इस साल की शुरुआत में अपना मंच शुल्क 12.5 रुपये से बढ़ाकर 14.99 रुपये प्रति ऑर्डर कर दिया था. इस पर वस्तु एवं सेवा कर अलग से लगाया जाता है. कंपनी के बड़े ऑर्डर स्तर को देखते हुए शुल्क में मामूली बढ़ोतरी भी सालाना आय में बड़ा इजाफा कर सकती है.

ग्राहकों के लिए बढ़ रहा है अंतिम बिल

खाद्य वितरण मंचों के लिए इस तरह के शुल्क बिना खाने या वितरण की सूचीबद्ध कीमत बढ़ाए कमाई बढ़ाने का एक तरीका हैं. प्रति ऑर्डर कुछ रुपये की अतिरिक्त फीस लाखों लेनदेन पर लागू होने के बाद बड़ी रकम में बदल सकती है.

जोमैटो का नया कैश ऑन डिलीवरी शुल्क इसी रणनीति को भुगतान के तरीके तक बढ़ाता है. यानी जो ग्राहक कैश ऑन डिलीवरी करना पसंद करते हैं, उन्हें मौजूदा शुल्क के अलावा इसके लिए भी अतिरिक्त रकम चुकानी होगी.

ऐसे में खाद्य वितरण का अंतिम बिल पहले की तुलना में ज्यादा हिस्सों में बंटता जा रहा है. ग्राहकों को खाने की कीमत के अलावा वितरण, मंच सेवा, पैकेजिंग, भुगतान के तरीके और कर के लिए अलग-अलग शुल्क का सामना करना पड़ सकता है.
 

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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से वैश्विक स्तर पर मजबूत होगी भारत की ब्रांड इमेज

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत को संभावनाओं वाले देश से तकनीक, प्रतिभा, विनिर्माण और उद्यमिता के दम पर उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी बदलती तस्वीर दुनिया के सामने रखने का अवसर देता है.

डॉ. अनुराग बत्रा by
Published - Monday, 14 September, 2026
Last Modified:
Monday, 14 September, 2026
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वर्षों से भारत को संभावनाओं वाले देश के रूप में देखा जाता रहा है. लेकिन अब यह तस्वीर बदल रही है. आज भारत के पास वैश्विक विमर्श को प्रभावित करने का पैमाना, प्रतिभा, तकनीक और महत्वाकांक्षा है. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी भारत को इस बदलाव और अपनी बढ़ती वैश्विक भूमिका को दुनिया के सामने रखने का महत्वपूर्ण अवसर देती है. 

संभावनाओं से वैश्विक शक्ति तक

एक समय था जब भारत की वैश्विक छवि काफी हद तक उसकी आबादी, लोकतांत्रिक साख और अंग्रेजी बोलने वाली प्रतिभाओं के समूह के इर्द-गिर्द बनी थी. ये अब भी महत्वपूर्ण ताकतें हैं, लेकिन आज का भारत इससे कहीं व्यापक तस्वीर पेश करता है. यह एक ऐसा देश है जो बड़े पैमाने पर तकनीक विकसित कर रहा है, वैश्विक कारोबार खड़ा कर रहा है, कुशल पेशेवर तैयार कर रहा है और पूंजी तथा विनिर्माण के लिए तेजी से महत्वपूर्ण गंतव्य बन रहा है.

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस नए भारत को एक मंच देता है. जब दुनिया की कुछ सबसे महत्वपूर्ण उभरती अर्थव्यवस्थाओं के नेता भारत पहुंचते हैं, तो देश केवल एक कूटनीतिक कार्यक्रम की मेजबानी नहीं कर रहा होता. वह खुद को दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहा होता है.

और यह महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रीय छवि, बिल्कुल कॉर्पोरेट प्रतिष्ठा की तरह, केवल इस बात से नहीं बनती कि कोई देश अपने बारे में क्या कहता है, बल्कि इस बात से बनती है कि दुनिया को वास्तव में क्या देखने को मिलता है.

तकनीक भारत की नई पहचान

शायद कहीं भी बदलाव तकनीक के क्षेत्र से अधिक स्पष्ट नहीं है. भारत की तकनीकी कहानी सॉफ्टवेयर सेवाओं और आईटी आउटसोर्सिंग से शुरू हुई थी. अब यह डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, फिनटेक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अंतरिक्ष तकनीक, डीप टेक और तेजी से विकसित हो रहे स्टार्टअप इकोसिस्टम तक काफी आगे बढ़ चुकी है.

भारत के डिजिटल बदलाव का पैमाना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. देश ने यह दिखाया है कि तकनीक का इस्तेमाल केवल छोटी और संपन्न आबादी के लिए ही नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के बीच भी किया जा सकता है.

बड़े पैमाने के लिए तकनीक विकसित करने की यह क्षमता भारत की सबसे शक्तिशाली वैश्विक संपत्तियों में से एक बन सकती है. दुनिया ऐसे समाधानों की तलाश में है जो किफायती, अनुकूलन योग्य और बड़ी आबादी की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हों. भारत पहले ही घरेलू स्तर पर इस मॉडल के साथ प्रयोग कर रहा है.

मानवीय प्रतिभा अब भी सबसे बड़ी ताकत

हालांकि, तकनीक कहानी का केवल एक हिस्सा है. भारत का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धात्मक लाभ अब भी उसके लोग हो सकते हैं. वैज्ञानिकों और इंजीनियरों से लेकर डॉक्टरों, उद्यमियों, डिजाइनरों, वित्तीय पेशेवरों और कॉर्पोरेट लीडर्स तक, भारतीय प्रतिभा तेजी से वैश्विक कार्यबल का हिस्सा बन गई है. भारतीय मूल के पेशेवर दुनियाभर में तकनीक, कारोबार और शिक्षा के क्षेत्र में प्रभावशाली पदों पर हैं. लेकिन एक महत्वपूर्ण बदलाव हो रहा है. भारत अब केवल प्रतिभाओं को विदेश नहीं भेज रहा है. वह तेजी से देश के भीतर ही इन प्रतिभाओं के लिए अवसर पैदा कर रहा है.

यह संयोजन तकनीक के समर्थन वाली मानवीय प्रतिभा और एक विशाल घरेलू बाजार, एक मजबूत आर्थिक लाभ बन सकता है.

उभर रहा है विनिर्माण वाला भारत

दशकों तक भारत की आर्थिक कहानी में सेवाओं का असमान रूप से अधिक योगदान रहा. अब यह बदल रहा है. चाहे इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, नवीकरणीय ऊर्जा या अन्य उभरते क्षेत्र हों, विनिर्माण देश की वैश्विक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है. आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने की कोशिश कर रही वैश्विक कंपनियां भारत को अपने विकल्पों में तेजी से शामिल कर रही हैं.

ब्रांड इंडिया के लिए यह महत्वपूर्ण है क्योंकि विनिर्माण एक अलग धारणा बनाता है. यह दुनिया को बताता है कि भारत केवल ऐसा बाजार नहीं है जहां उत्पाद बेचे या सेवाएं प्रदान की जाती हैं. यह वह जगह भी हो सकती है जहां उत्पादों को डिजाइन, इंजीनियर और निर्मित किया जाता है.

उद्यमिता की ऊर्जा

एक और ताकत जिस पर ध्यान देने की जरूरत है, वह है भारत की उद्यमशील संस्कृति. स्टार्टअप इकोसिस्टम ने ऐसी पीढ़ी तैयार की है जो पहले दिन से ही वैश्विक स्तर पर सोचने में सहज है. युवा उद्यमी फिनटेक, ई-कॉमर्स, SaaS, हेल्थकेयर, शिक्षा, मोबिलिटी और उभरती तकनीकों के क्षेत्र में कंपनियां बना रहे हैं.

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उद्यमिता अब कुछ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है. छोटे शहर और उपभोक्ताओं की नई पीढ़ी भी भारत के डिजिटल और आर्थिक विस्तार का हिस्सा बन रही है. यह उद्यमशील ऊर्जा राष्ट्रीय ब्रांड में एक महत्वपूर्ण बात जोड़ती है: ऐसे देश की धारणा जो प्रयोग करने के लिए तैयार है.

बुनियादी ढांचा बदल रहा है अनुभव

ब्रांड इंडिया तेजी से इस बात से भी आकार ले रहा है कि आगंतुक वास्तव में क्या अनुभव करते हैं. नए हवाई अड्डे, राजमार्ग, मेट्रो सिस्टम, डिजिटल सेवाएं, शहरी बुनियादी ढांचा और बेहतर कनेक्टिविटी देश के भौतिक अनुभव को बदल रहे हैं. बदलाव असमान है और अभी भी बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं, लेकिन दिशा स्पष्ट है.

शिखर सम्मेलन में शामिल होने वाले किसी अंतरराष्ट्रीय आगंतुक के लिए ये भौतिक अनुभव कभी-कभी सरकारी प्रस्तुति से कहीं अधिक प्रभावशाली तरीके से संदेश दे सकते हैं.

संस्कृति भारत को भावनात्मक बढ़त देती है

एक और आयाम है जिसे आर्थिक आंकड़े नहीं दर्शा सकते.

भारत की सांस्कृतिक पहुंच ऐसी है, जिसकी बराबरी बहुत कम देश कर सकते हैं. इसका खान-पान, सिनेमा, संगीत, योग, त्योहार, फैशन, आध्यात्मिकता और विविध परंपराएं देश की सीमाओं से कहीं आगे तक पहुंच चुकी हैं. यह ब्रांड इंडिया को ऐसी चीज देता है जिसे बनाने के लिए कई आर्थिक शक्तियां संघर्ष करती हैं, एक भावनात्मक जुड़ाव.

अवसर यह है कि इस सांस्कृतिक ताकत को भारत की आर्थिक और तकनीकी कहानी के साथ जोड़ा जाए. आधुनिक भारत को अपनी विरासत और अपनी महत्वाकांक्षा के बीच चुनाव करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए. दोनों साथ-साथ चल सकते हैं.

दुनिया की नजर भारत पर

आखिरकार, यही वजह है कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन महत्वपूर्ण है. भारत को एक वैश्विक मंच पर कूटनीति, कारोबार, तकनीक, संस्कृति और मानवीय प्रतिभा को एक साथ लाने का अवसर मिलता है. नेता बैठकों के लिए आ सकते हैं, लेकिन दुनिया उस देश को भी देख रही होगी जहां ये बैठकें हो रही हैं.

बड़ा अवसर वैश्विक नैरेटिव को “भारत में संभावनाएं हैं” से बदलकर “भारत एक महत्वपूर्ण शक्ति है” करने का है.

यह बदलाव किसी एक शिखर सम्मेलन की वजह से नहीं होगा. यह निरंतर आर्थिक विकास, बेहतर बुनियादी ढांचे, नवाचार, संस्थागत मजबूती और भारत की विशाल मानवीय पूंजी को वैश्विक मूल्य में बदलने की क्षमता के जरिए होगा, लेकिन हर देश को ऐसे पलों की जरूरत होती है जब दुनिया ठहरकर उसे एक अलग नजरिए से देखे.

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिए ऐसा ही एक पल हो सकता है. और अगर ब्रांड इंडिया इस अवसर का सही इस्तेमाल कर पाता है, तो इसका लाभ शिखर सम्मेलन से कहीं आगे तक पहुंच सकता है.

डॉ. अनुराग बत्रा, BW रिपोर्टर्स

डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ हैं. वह exchange4media ग्रुप के संस्थापक भी हैं. पहली पीढ़ी के उद्यमी और मीडिया लीडर होने के साथ-साथ वह एंजल निवेशक, लेखक, टेलीविजन होस्ट और उद्यमियों तथा मीडिया पेशेवरों के मेंटोर भी हैं. वह कई कॉर्पोरेट और संस्थागत बोर्डों में कार्यरत हैं और प्रबंधन शिक्षा से उनका लंबे समय से जुड़ाव रहा है. MDI Gurgaon के पूर्व छात्र और इसके बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में कार्य कर चुके हैं और MDI Alumni Association के अध्यक्ष भी रहे हैं. वह International Academy of Television Arts & Sciences के सदस्य भी हैं. डॉ. बत्रा का मानना है कि जब जुनून किसी का पेशा बन जाता है, तो काम उद्देश्य की गहरी भावना हासिल कर लेता है.