भारत-चीन के बीच व्यापार वार्ता शुरू, द्विपक्षीय व्यापार असंतुलन दूर करने पर जोर

भारत यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म के लागू होने को लेकर भी अपने निर्यातकों को तैयार कर रहा है. यह तैयारी भारत-EU व्यापार समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर से पहले की जा रही है.

Last Modified:
Tuesday, 15 September, 2026
BWHindi

भारत और चीन ने द्विपक्षीय व्यापार से जुड़े मुद्दों को सुलझाने के लिए व्यापार स्तर पर बातचीत शुरू कर दी है. दोनों देशों के व्यापार मंत्रियों के बीच हुई बैठक को शुरुआती स्तर की बातचीत बताया गया है. भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, दोनों पक्ष सकारात्मक रुख के साथ आगे बढ़ रहे हैं और द्विपक्षीय व्यापार में मौजूद संरचनात्मक असंतुलन को दूर करने के संभावित उपायों पर चर्चा की जा रही है.

अधिकारियों ने कहा कि भारत-चीन संबंधों में हाल के समय में सुधार हुआ है और दोनों देशों के बीच धीरे-धीरे विश्वास बहाली की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है. व्यापार के मुद्दे पर भी दोनों पक्ष सकारात्मक सोच के साथ बातचीत शुरू कर चुके हैं. भारत चीन के साथ मिलकर व्यापार असंतुलन से जुड़े मुद्दों का समाधान तलाशने के लिए तैयार है.

अक्टूबर में लागू हो सकता है भारत-न्यूजीलैंड FTA

अन्य व्यापार समझौतों पर अधिकारियों ने बताया कि भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौता (FTA) अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में लागू होने की उम्मीद है. वहीं, भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत तय योजना के मुताबिक आगे बढ़ रही है. अधिकारियों के अनुसार, इसे साल के अंत तक अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है.

भारत यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) के लागू होने को लेकर भी अपने निर्यातकों को तैयार कर रहा है. यह तैयारी भारत-EU व्यापार समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर से पहले की जा रही है.

G20 व्यापार मंत्रियों की बैठक में शामिल होंगे पीयूष गोयल

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल अमेरिका की यात्रा करेंगे, जहां वह G20 व्यापार मंत्रियों की बैठक में शामिल होंगे. इस दौरान भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है. भारत और अमेरिका के बीच व्यापार से जुड़े कुछ लंबित मुद्दों पर बातचीत जारी है. G20 बैठक के दौरान इन विषयों पर दोनों देशों के बीच आगे चर्चा हो सकती है.

BRICS देशों को भारत का निर्यात 13% बढ़ा

भारतीय व्यापार अधिकारियों के अनुसार, अप्रैल-अगस्त 2026 के दौरान BRICS सदस्य देशों को भारत का निर्यात बढ़कर 34.53 अरब डॉलर हो गया, जो पिछले साल की समान अवधि में 30.49 अरब डॉलर था. इस तरह निर्यात में करीब 13% की वृद्धि दर्ज की गई.

आंकड़ों से पता चलता है कि भारत के लिए BRICS बाजारों का महत्व बढ़ रहा है. भारत अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है.

रूस से आयात 57% बढ़ा

इस अवधि में रूस से भारत का आयात सालाना आधार पर 57% बढ़कर 41.44 अरब डॉलर हो गया. रूस से भारत के प्रमुख आयात में पेट्रोलियम उत्पाद, उर्वरक और वनस्पति तेल शामिल रहे. भारत एक ओर प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर द्विपक्षीय व्यापार असंतुलन को कम करने और वैश्विक व्यापार नियमों में बदलाव के लिए घरेलू निर्यातकों को तैयार करने पर भी ध्यान दे रहा है.


अगस्त में बेरोजगारी दर घटकर 5%, ग्रामीण रोजगार में सुधार का असर

मंगलवार को जारी सरकारी आंकड़ों में यह जानकारी सामने आई. बेरोजगारी दर में यह कमी मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी घटने के कारण आई, जबकि महीने के दौरान शहरी बेरोजगारी दर लगभग स्थिर रही.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 15 September, 2026
Last Modified:
Tuesday, 15 September, 2026
BWHindia

भारत में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की बेरोजगारी दर अगस्त में घटकर 5% रह गई, जो जुलाई में 5.1% थी. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बेरोजगारी में यह कमी मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति सुधरने से आई है. हालांकि, शहरी बेरोजगारी दर मामूली बढ़कर 6.8% हो गई.

अगस्त में ग्रामीण बेरोजगारी घटकर 4.1% रही, जबकि कुल श्रम बल भागीदारी दर मामूली बढ़कर 55.6% हो गई. 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए भारत की बेरोजगारी दर अगस्त में मामूली घटकर 5% हो गई, जबकि जुलाई में यह 5.1% थी. मंगलवार को जारी सरकारी आंकड़ों में यह जानकारी सामने आई. बेरोजगारी दर में यह कमी मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी घटने के कारण आई, जबकि महीने के दौरान शहरी बेरोजगारी दर लगभग स्थिर रही.

ग्रामीण बेरोजगारी जुलाई के 4.5% से घटकर अगस्त में 4.1% हो गई. वहीं, शहरी बेरोजगारी दर 6.7% से मामूली बढ़कर 6.8% हो गई. सालाना आधार पर अगस्त में कुल बेरोजगारी दर लगभग स्थिर रही. शहरी बेरोजगारी दर में भी खास बदलाव नहीं हुआ, जबकि ग्रामीण बेरोजगारी अगस्त 2025 के 4.3% से घटकर 4.1% रह गई.

श्रम बल भागीदारी दर

15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए कुल श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) जुलाई के 55.4% से मामूली बढ़कर अगस्त में 55.6% हो गई. ग्रामीण LFPR 58% से बढ़कर 58.2% हो गई, जबकि शहरी LFPR 50.4% पर स्थिर रही.

अगस्त 2025 की तुलना में कुल LFPR 0.6 प्रतिशत अंक बढ़कर 55.6% हो गई, जो एक साल पहले 55% थी. ग्रामीण LFPR 1.2 प्रतिशत अंक बढ़कर 58.2% हो गई, जबकि अगस्त 2025 में यह 57% थी. इसके विपरीत, शहरी LFPR 0.5 प्रतिशत अंक घटकर 50.4% रह गई, जो एक साल पहले 50.9% थी.

 


ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड से FY30 तक 10,000 करोड़ रुपये जुटा सकते हैं शहरी निकाय: ICRA

FY27-FY30 के दौरान शहरी बुनियादी ढांचे के लिए 56 लाख करोड़ रुपये से अधिक निवेश की जरूरत का अनुमान

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 15 September, 2026
Last Modified:
Tuesday, 15 September, 2026
BWHindia

देश के शहरी स्थानीय निकाय वित्त वर्ष 2026-27 से 2029-30 के बीच ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड के जरिए करीब 10,000 करोड़ रुपये जुटा सकते हैं. रेटिंग एजेंसी ICRA के अनुसार, शहरों में बढ़ती बुनियादी ढांचा जरूरतों को पूरा करने के लिए पूंजी बाजार से फंड जुटाने की भूमिका बढ़ सकती है.

ICRA के मुताबिक, FY27 से FY30 के दौरान शहरी बुनियादी ढांचे में निवेश की जरूरत 56 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहने का अनुमान है. इसमें से करीब 3 लाख करोड़ रुपये तक की जरूरत कमर्शियल डेट के जरिए पूरी की जा सकती है. ऐसे में म्युनिसिपल और ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड के लिए संभावनाएं बढ़ सकती हैं.

पानी और कचरा प्रबंधन जैसी परियोजनाओं को मिल सकता है ग्रीन फाइनेंस

जल आपूर्ति, सीवरेज और वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट, ठोस कचरा प्रबंधन, नवीकरणीय ऊर्जा और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाएं ग्रीन फाइनेंस के लिए पात्र हो सकती हैं. इससे नगर निकायों के पास ग्रीन बॉन्ड के जरिए फंड जुटाने के लिए परियोजनाओं की एक बड़ी संभावित सूची उपलब्ध हो सकती है.

निवेशकों की ग्रीन बॉन्ड में बढ़ रही दिलचस्पी

अब तक म्युनिसिपल बॉन्ड के जरिए जुटाए गए 6,540 करोड़ रुपये में करीब एक-चौथाई राशि ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड के जरिए जुटाई गई है. इसके अलावा करीब एक-चौथाई हिस्से को ग्रीन बॉन्ड के रूप में वर्गीकृत किए जाने की संभावना है.

ICRA ने अनुमान लगाया है कि FY2027-FY2030 के दौरान ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड जारी करने की क्षमता करीब 10,000 करोड़ रुपये हो सकती है. हालांकि, नगर निकायों की तैयारी बेहतर होने पर यह आंकड़ा और बढ़ सकता है.

हाल में जारी किए गए कुछ ग्रीन म्युनिसिपल बॉन्ड को इश्यू साइज की तुलना में करीब पांच गुना सब्सक्रिप्शन मिला है. इससे इस तरह के बॉन्ड में निवेशकों की रुचि का संकेत मिलता है. इन बॉन्ड पर सॉवरेन बेंचमार्क की तुलना में 1.90 प्रतिशत अंक तक और राज्य सरकार के बॉन्ड की तुलना में 1.55 प्रतिशत अंक तक अधिक यील्ड भी मिली है.

नगर निकायों की तैयारी बड़ी चुनौती

ICRA के अनुसार, पूंजी बाजार तक नगर निकायों की पहुंच कई कारकों पर निर्भर करेगी. इनमें क्रेडिट क्वालिटी, वित्तीय खुलासे, कर्ज चुकाने की स्पष्टता, परियोजनाओं की तैयारी और बॉन्ड जारी करने से जुड़ी प्रक्रियाओं के लिए तैयारियां शामिल हैं.

रेटिंग एजेंसी का कहना है कि इन शर्तों के कारण उन नगर निकायों की संख्या सीमित हो सकती है जो वास्तव में पूंजी बाजार से बॉन्ड के जरिए फंड जुटाने में सक्षम हैं. यानी शहरी बुनियादी ढांचे के लिए वित्त की जरूरत व्यापक होने के बावजूद सभी नगर निकाय बाजार से पैसा जुटाने की स्थिति में नहीं होंगे.

ICRA के मुताबिक, ग्रीन फाइनेंस के योग्य परियोजनाओं की उपलब्धता बाजार के विस्तार में मुख्य बाधा नहीं है. इसके बजाय नगर निकायों की वित्तीय और संस्थागत तैयारी तथा पूंजी बाजार की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता अधिक महत्वपूर्ण होगी. रेटिंग एजेंसी ने कहा कि निवेशकों की ओर से म्युनिसिपल ग्रीन फाइनेंस में रुचि बढ़ रही है, जबकि बाजार के विस्तार में पूंजी की उपलब्धता की तुलना में आपूर्ति पक्ष से जुड़ी चुनौतियां बड़ी बाधा बनी हुई हैं.
 


वैश्विक व्यापार में BRICS की हिस्सेदारी करीब 25%, EEPC India ने समान व्यापार मानकों की मांग की

EEPC इंडिया के अनुसार, नियामकीय अड़चनों को कम करने से सदस्य देशों के बीच कारोबार और भारतीय निर्यातकों की बाजार पहुंच में सुधार हो सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 15 September, 2026
Last Modified:
Tuesday, 15 September, 2026
BWHindia

इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (EEPC) इंडिया ने BRICS देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाने और भुगतान व्यवस्था को आसान बनाने की मांग की है. संगठन के अनुसार, नियामकीय अड़चनों को कम करने से सदस्य देशों के बीच कारोबार और भारतीय निर्यातकों की बाजार पहुंच में सुधार हो सकता है. EEPC इंडिया के चेयरमैन पंकज छाड़ा ने कहा कि निर्यातकों के सामने आने वाली करीब 75 फीसदी समस्याओं को गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करने और संबंधित देशों की स्थानीय मुद्राओं में सुगम व प्रभावी भुगतान व्यवस्था स्थापित करने से हल किया जा सकता है. उनके मुताबिक, इससे सीमा पार व्यापार से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों को कम करने में मदद मिलेगी.

गैर-टैरिफ बाधाओं पर समान मानक बनाने की मांग

छाड़ा ने कहा कि BRICS देशों को गैर-टैरिफ बाधाओं को लेकर एक साझा समझौते पर विचार करना चाहिए और समान मानकों की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए. यह मुद्दा पिछले कुछ समय से चर्चा में है, लेकिन अब इसे लागू करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि BRICS देशों को केवल चर्चा तक सीमित रहने के बजाय व्यापार में आने वाली बाधाओं को कम करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए.

नियामकीय लागत बनी बड़ी चिंता

EEPC इंडिया के अनुसार, ज्यादातर देशों में गैर-टैरिफ उपायों की वजह से निर्यातकों पर पड़ने वाली लागत कई मामलों में टैरिफ की तुलना में अधिक होती है. ऐसे में व्यापारिक साझेदार देशों के बीच नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाने की जरूरत है, ताकि निर्यातकों का अनुपालन बोझ कम हो और वस्तुओं की आवाजाही आसान हो सके. संगठन के मुताबिक, BRICS देशों की वैश्विक व्यापार में करीब एक-चौथाई हिस्सेदारी है. ऐसे में गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने से सदस्य देशों के बीच व्यापार प्रवाह बढ़ाने की पर्याप्त गुंजाइश है.

इंजीनियरिंग निर्यात के लिए अहम बाजार

इंजीनियरिंग उत्पाद भारत के प्रमुख निर्यात क्षेत्रों में शामिल हैं. उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश के कुल वस्तु निर्यात में इंजीनियरिंग निर्यात की हिस्सेदारी करीब 27 फीसदी है. ऐसे में BRICS देशों के बीच व्यापार प्रक्रियाओं को आसान बनाने से इस क्षेत्र को फायदा मिल सकता है. BRICS के प्रमुख देशों में ब्राजील, चीन, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों के महत्वपूर्ण बाजार हैं. EEPC इंडिया का कहना है कि इन बाजारों में व्यापार सुविधा से जुड़े उपाय मजबूत होने पर भारत के इंजीनियरिंग निर्यात को और बढ़ावा मिल सकता है.

 


17 सितंबर से खुलेगा NSE IPO, ₹4.42 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है वैल्यूएशन, जानें पूरी डिटेल

NSE ने आईपीओ के लिए प्रति शेयर ₹1,700 से ₹1,785 का प्राइस बैंड तय किया है. यह पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) है, जिसके तहत 126.44 करोड़ शेयर बिक्री के लिए पेश किए जाएंगे.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 15 September, 2026
Last Modified:
Tuesday, 15 September, 2026
BWHindia

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का आईपीओ 17 सितंबर को खुलने जा रहा है. 24 सितंबर को संभावित लिस्टिंग के बाद NSE का शेयर बाजार पूंजीकरण के लिहाज से देश की टॉप 15 कंपनियों में शामिल हो सकता है. ₹1,700-1,785 के प्राइस बैंड के आधार पर NSE का अनुमानित मार्केट कैप करीब ₹4.21 लाख करोड़ से ₹4.42 लाख करोड़ के बीच बैठता है.

₹22,562 करोड़ का होगा IPO

NSE ने आईपीओ के लिए प्रति शेयर ₹1,700 से ₹1,785 का प्राइस बैंड तय किया है. यह पूरी तरह ऑफर फॉर सेल (OFS) है, जिसके तहत 126.44 करोड़ शेयर बिक्री के लिए पेश किए जाएंगे. अपर प्राइस बैंड पर इश्यू का आकार करीब ₹22,562 करोड़ होगा. ₹1,785 के अपर प्राइस बैंड पर NSE का अनुमानित मार्केट कैप करीब ₹4.42 लाख करोड़ होगा. इस स्तर पर कंपनी बाजार पूंजीकरण के लिहाज से देश की करीब 12वीं सबसे बड़ी कंपनी बन सकती है.

टॉप कंपनियों की लिस्ट में कहां होगी NSE?

अपर प्राइस बैंड पर NSE का मार्केट कैप करीब ₹4,41,788 करोड़ बैठता है. यह टाइटन कंपनी के करीब ₹4,44,736 करोड़ के मार्केट कैप से थोड़ा कम और सन फर्मास्यूटिकल इंडस्ट्रीज के करीब ₹4,41,478 करोड़ से थोड़ा ज्यादा है. वहीं, अगर NSE की लिस्टिंग ₹1,700 के लोअर प्राइस बैंड पर होती है तो इसका अनुमानित मार्केट कैप करीब ₹4,20,750 करोड़ होगा. इस स्थिति में एनएसई इंफोसिस के करीब ₹4,21,123 करोड़ के मार्केट कैप से थोड़ा नीचे और कोटक महिंद्रा बैंक के करीब ₹4,16,807 करोड़ के मार्केट कैप से ऊपर होगा.

17 सितंबर को खुलेगा NSE IPO

NSE का आईपीओ 17 सितंबर को खुलेगा और 21 सितंबर को बंद होगा. निवेशकों को कम से कम एक लॉट के लिए बोली लगानी होगी. एक लॉट में 8 शेयर हैं. NSE के आईपीओ का आकार पहले करीब ₹30,000 करोड़ रहने का अनुमान था, लेकिन कुछ मौजूदा निवेशकों की ओर से OFS में कम शेयर बेचने के फैसले के बाद इसका आकार घट गया. यदि इश्यू ₹30,000 करोड़ का होता तो यह देश का सबसे बड़ा आईपीओ बन सकता था. फिलहाल यह रिकॉर्ड Hyundai Motor India के पास है, जिसका आईपीओ 2024 में आया था.

NSE का मुकाबला BSE से

NSE भारत के प्रमुख स्टॉक एक्सचेंजों में शामिल है और इसका सीधा मुकाबला BSE से है. BSE एशिया के सबसे पुराने स्टॉक एक्सचेंजों में से एक है, लेकिन ट्रेडिंग वॉल्यूम के मामले में NSE उससे काफी आगे है. NSE की लिस्टिंग से निवेशकों को पहली बार एक्सचेंज के शेयर में सीधे निवेश करने का मौका मिलेगा. हालांकि, लिस्टिंग के बाद शेयर की वास्तविक बाजार पूंजी और कंपनी की रैंकिंग उसके बाजार भाव पर निर्भर करेगी.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)

 


मार्च 2027 तक बैरियर-फ्री होंगे सभी टोल प्लाजा, बिना रुके कटेगा टोल: गडकरी

बैरियर-फ्री व्यवस्था में मल्टी-लेन फ्री-फ्लो (MLFF) सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा. इसके तहत टोल प्लाजा पर लगे कैमरे वाहन की नंबर प्लेट को स्कैन करेंगे.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 15 September, 2026
Last Modified:
Tuesday, 15 September, 2026
BWHindia

केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के मुताबिक, मार्च 2027 तक देश के सभी नेशनल हाईवे के टोल प्लाजा को बैरियर-फ्री करने का लक्ष्य रखा गया है. इसके तहत फास्टैग के साथ ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) और मल्टी-लेन फ्री-फ्लो (MLFF) जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा. इससे वाहनों को टोल प्लाजा पर रुकने की जरूरत नहीं होगी और टोल भुगतान की प्रक्रिया भी तेज होगी.

दिसंबर तक 70 फीसदी टोल बूथ होंगे बैरियर-फ्री

नितिन गडकरी ने ग्लोबल फिनटेक फेस्ट 2026 में बताया कि सरकार नेशनल हाईवे के टोल बूथ को बैरियर-फ्री बनाने पर काम कर रही है. दिसंबर 2026 के अंत तक 70 फीसदी से अधिक टोल बूथ को बैरियर-फ्री करने का लक्ष्य है, जबकि मार्च 2027 तक इसे 100 फीसदी तक पहुंचाने की योजना है. देश में अब तक 13 करोड़ से ज्यादा फास्टैग जारी किए जा चुके हैं और नेशनल हाईवे पर इनकी पहुंच 98 फीसदी से अधिक है.

बिना रुके कैसे कटेगा टोल?

बैरियर-फ्री व्यवस्था में मल्टी-लेन फ्री-फ्लो (MLFF) सिस्टम का इस्तेमाल किया जाएगा. इसके तहत टोल प्लाजा पर लगे कैमरे वाहन की नंबर प्लेट को स्कैन करेंगे. वाहन के टोल जोन से गुजरते ही सिस्टम उसकी पहचान करेगा और संबंधित खाते से टोल राशि काटने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी. इस व्यवस्था में पारंपरिक बैरियर की जरूरत नहीं होगी. इस तकनीक का परीक्षण 11 मई 2026 को मुंबई के एक टोल प्लाजा पर किया जा चुका है.

समय और ईंधन दोनों की होगी बचत

नए सिस्टम का सबसे बड़ा फायदा टोल प्लाजा पर लगने वाले समय और जाम में कमी के रूप में देखने को मिलेगा. गडकरी के मुताबिक, मौजूदा व्यवस्था में एक वाहन को टोल प्लाजा पर औसतन 12 मिनट तक रुकना पड़ता है. बैरियर-फ्री सिस्टम लागू होने के बाद यह समय काफी कम हो जाएगा. सरकार के मुताबिक, टोल प्लाजा पर वाहनों के रुकने में कमी आने से हर साल करीब 5,250 करोड़ रुपये के ईंधन की बचत हो सकती है.

टोल कलेक्शन में भी बढ़ोतरी की उम्मीद

फास्टैग के इस्तेमाल से टोल कलेक्शन में पहले ही करीब 10 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और इससे सरकार को करीब 7,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व मिला है. देश का कुल टोल राजस्व अब 82,000 करोड़ रुपये से अधिक बताया गया है.

गडकरी के अनुसार, बैरियर-फ्री टोलिंग सिस्टम पूरी तरह लागू होने के बाद सरकार को हर साल करीब 20,000 से 25,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फायदा हो सकता है. वहीं, टोल बूथ के संचालन की लागत भी मौजूदा करीब 12 फीसदी से घटकर 2-3 फीसदी तक आने की उम्मीद है.
 


अमेजन नाउ का सालाना कारोबार 1 अरब डॉलर के पार, दिवाली तक 100 शहरों में पहुंचाने की तैयारी

कंपनी अपने फुलफिलमेंट नेटवर्क का भी विस्तार कर रही है. अमेजन के मुताबिक, उसके प्लेटफॉर्म पर हजारों उत्पाद कुछ ही मिनटों या कुछ घंटों में, 10 लाख से अधिक उत्पाद उसी दिन और 40 लाख से अधिक उत्पाद अगले दिन डिलीवरी के विकल्प के साथ उपलब्ध हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 15 September, 2026
Last Modified:
Tuesday, 15 September, 2026
BWHindia

अमेजन की क्विक डिलीवरी सेवा अमेजन नाउ (Amazon Now) ने भारत में पिछले तीन महीनों के प्रदर्शन के आधार पर 1 अरब डॉलर का सालाना कारोबार पार कर लिया है. कंपनी के मुताबिक, लॉन्च के बाद से अमेजन नाउ के ऑर्डर हर तिमाही दोगुने हो रहे हैं. कंपनी अब दिवाली तक अपनी कुछ ही मिनटों में डिलीवरी वाली सेवा को 100 शहरों तक पहुंचाने की तैयारी कर रही है.

60 से ज्यादा शहरों में पहुंची अमेजन नाउ

अमेजन नाउ का नेटवर्क 10 सप्ताह से भी कम समय में चार गुना बढ़कर 60 से अधिक शहरों और कस्बों तक पहुंच गया है. इनमें महानगरों के अलावा पडुबिदरी, तिरुपति, गुंटूर, गुरदासपुर, जालंधर, वेल्लोर, धारवाड़, वारंगल और बेरहामपुर जैसे शहर शामिल हैं. कंपनी के मुताबिक, ऑर्डर की डिलीवरी 750 से अधिक माइक्रो फुलफिलमेंट और अर्बन फुलफिलमेंट सेंटर के नेटवर्क से की जा रही है. अमेजन नाउ के जरिए किराना, फल-सब्जियां, फ्रोजन फूड, पर्सनल केयर, फैशन, ब्यूटी, छोटे उपकरण और घर-रसोई से जुड़े सामान कुछ ही मिनटों में पहुंचाए जा रहे हैं.

अमेजन इंडिया के कंट्री मैनेजर समीर कुमार ने कहा कि अमेजन नाउ ने कम समय में 1 अरब डॉलर का सालाना कारोबार पार किया है और यह अमेजन इंडिया के इतिहास में सबसे तेजी से बढ़ने वाला ई-कॉमर्स कारोबार बन गया है. उन्होंने कहा कि कंपनी दिवाली तक 100 शहरों में विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रही है.

रोजाना करीब 7 लाख ऑर्डर

घटनाक्रम से परिचित लोगों के मुताबिक, अमेजन नाउ का औसत ऑर्डर मूल्य करीब 540 रुपये है और कंपनी रोजाना लगभग 7 लाख ऑर्डर संभाल रही है. ऑर्डर की संख्या के आधार पर इसकी बाजार हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी और कारोबार के मूल्य के आधार पर लगभग 14 फीसदी बताई गई है.

अमेजन ने जून 2026 में भारत में कुछ ही मिनटों में डिलीवरी करने वाला बड़ा नेटवर्क तैयार करने की योजना की घोषणा की थी. कंपनी ने उस समय अमेजन नाउ को देशभर के 300 से अधिक शहरों तक ले जाने का लक्ष्य बताया था.

कंपनी अपने फुलफिलमेंट नेटवर्क का भी विस्तार कर रही है. अमेजन के मुताबिक, उसके प्लेटफॉर्म पर हजारों उत्पाद कुछ ही मिनटों या कुछ घंटों में, 10 लाख से अधिक उत्पाद उसी दिन और 40 लाख से अधिक उत्पाद अगले दिन डिलीवरी के विकल्प के साथ उपलब्ध हैं.

क्विक कॉमर्स में बढ़ रही प्रतिस्पर्धा

अमेजन नाउ का तेजी से विस्तार ऐसे समय में हो रहा है, जब भारत के क्विक कॉमर्स बाजार में प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है. ब्लिंकिट, जेप्टो, स्विगी इंस्टामार्ट और फ्लिपकार्ट मिनट्स जैसी कंपनियां भी डार्क स्टोर और माइक्रो फुलफिलमेंट सेंटर का नेटवर्क तेजी से बढ़ा रही हैं.

सीएलएसए की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश के शीर्ष 10 शहरों में ब्लिंकिट के पास करीब 30 फीसदी डार्क स्टोर हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर इसकी हिस्सेदारी 34 फीसदी से अधिक है. रिपोर्ट के मुताबिक, 180 से अधिक शहरों में ब्लिंकिट की मौजूदगी है.

ब्रोकरेज की ट्रैकिंग के अनुसार, भारत में क्विक कॉमर्स का नेटवर्क अब 477 शहरों तक पहुंच चुका है. शीर्ष 10 शहरों में ब्लिंकिट, जेप्टो, स्विगी इंस्टामार्ट, फ्लिपकार्ट मिनट्स और बिगबास्केट के कुल 3,536 डार्क स्टोर हैं.

इन शहरों में फ्लिपकार्ट मिनट्स के 627 डार्क स्टोर हैं, जबकि स्विगी इंस्टामार्ट के 615 और बिगबास्केट के 497 डार्क स्टोर हैं. इससे संकेत मिलता है कि इंस्टेंट डिलीवरी बाजार में कंपनियां ग्राहकों तक तेजी से पहुंच बनाने के लिए अपने स्थानीय फुलफिलमेंट नेटवर्क को लगातार मजबूत कर रही हैं.
 


₹2,000 तक UPI पेमेंट रहेगा फ्री, बड़े मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर लग सकता है MDR चार्ज

वित्तीय सेवा विभाग (DFS) की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार, तय सीमा तक के UPI और RuPay डेबिट कार्ड भुगतान पर किसी तरह का शुल्क नहीं लिया जा सकता.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 15 September, 2026
Last Modified:
Tuesday, 15 September, 2026
BWHindia

यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) से ₹2,000 तक के भुगतान फिलहाल शुल्क-मुक्त रहेंगे. सरकार ने ₹2,000 तक के UPI और RuPay डेबिट कार्ड लेनदेन पर बैंक या भुगतान सेवा प्रदाता की ओर से सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कोई शुल्क लगाने पर रोक बरकरार रखी है. वहीं, ₹2,000 से अधिक के कुछ मर्चेंट पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने का कानूनी रास्ता साफ हो गया है. हालांकि, अभी शुल्क की दरें तय नहीं हुई हैं और न ही ₹2,000 से अधिक के हर UPI भुगतान पर चार्ज लगाने का फैसला हुआ है.

₹2,000 से ज्यादा के UPI पेमेंट पर क्या होगा?

वित्तीय सेवा विभाग (DFS) की ओर से सोमवार को जारी अधिसूचना के अनुसार, तय सीमा तक के UPI और RuPay डेबिट कार्ड भुगतान पर किसी तरह का शुल्क नहीं लिया जा सकता. इसका मतलब है कि ₹2,000 तक के भुगतान करने वाले ग्राहकों पर इस बदलाव का कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा. दूसरी ओर, ₹2,000 से अधिक के कुछ मर्चेंट लेनदेन पर MDR लागू करने की संभावना खुल गई है. अभी यह तय होना बाकी है कि किन कारोबारी भुगतानों पर शुल्क लगेगा, इसकी सीमा क्या होगी और MDR की दर कितनी रखी जाएगी.

क्या आम ग्राहकों पर बढ़ सकता है बोझ?

MDR मुख्य रूप से मर्चेंट यानी दुकानदार या कारोबारी से लिया जाने वाला शुल्क है. इसका भुगतान आम तौर पर बैंक या भुगतान सेवा प्रदाता को डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने के लिए किया जाता है. लेकिन अगर कारोबारियों पर अतिरिक्त लागत आती है, तो उसका असर ग्राहकों पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ सकता है.

मसलन, कुछ कारोबारी इस लागत को ग्राहक से अतिरिक्त शुल्क के रूप में वसूल सकते हैं. कुछ मामलों में वे ₹2,000 से अधिक के भुगतान के लिए UPI स्वीकार करने से बच सकते हैं और नकद भुगतान की मांग कर सकते हैं. इसके अलावा, कारोबारी अपनी लागत की भरपाई के लिए सामान या सेवाओं की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी कर सकते हैं. हालांकि, यह अभी संभावित असर है. जब तक MDR की दरें और लागू होने वाले लेनदेन की श्रेणियां तय नहीं होतीं, तब तक ग्राहकों पर वास्तविक प्रभाव का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी.

UPI पर अभी MDR क्यों नहीं लगता?

भारत में UPI को बढ़ावा देने के लिए फिलहाल मर्चेंट डिस्काउंट रेट को शून्य रखा गया है. जनवरी 2020 से UPI और RuPay डेबिट कार्ड से जुड़े भुगतान पर MDR नहीं लिया जा रहा है. इसके विपरीत, क्रेडिट कार्ड जैसे कुछ अन्य डिजिटल भुगतान माध्यमों में कारोबारियों को भुगतान स्वीकार करने पर शुल्क देना पड़ता है. अब सरकार की ओर से किए गए कानूनी बदलाव के बाद UPI पर चुनिंदा बड़े मर्चेंट पेमेंट के लिए MDR व्यवस्था लागू करने का रास्ता खुला है.

एनपीसीआई तय करेगा शुल्क की दर

कानूनी रास्ता साफ होने के बाद अब UPI की व्यवस्था संचालित करने वाली नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. UPI और सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी संबंधित पक्षों के साथ मिलकर शुल्क की दर और लागू होने वाले नियमों पर फैसला करेगी.

जब तक NPCI की ओर से इस संबंध में विस्तृत निर्देश जारी नहीं होते, तब तक नई MDR व्यवस्था लागू नहीं होगी. इसलिए फिलहाल ₹2,000 तक के UPI भुगतान पहले की तरह शुल्क-मुक्त रहेंगे और ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर भी अपने आप कोई नया चार्ज नहीं लगेगा.

क्या ₹2,000 से ज्यादा के हर UPI भुगतान पर चार्ज लगेगा?

नहीं. मौजूदा जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि ₹2,000 से अधिक के हर UPI भुगतान पर शुल्क लगेगा. प्रस्तावित व्यवस्था मुख्य रूप से मर्चेंट पेमेंट से जुड़ी है और किन लेनदेन पर MDR लागू होगा, इसकी अंतिम शर्तें और दरें अभी सामने आना बाकी हैं.

इसलिए फिलहाल UPI उपयोगकर्ताओं के लिए सबसे अहम बात यह है कि ₹2,000 तक के भुगतान पर कोई नया शुल्क नहीं लगाया गया है. बड़े कारोबारी भुगतानों पर शुल्क का असर तभी स्पष्ट होगा, जब NPCI इसकी दरों और नियमों की आधिकारिक घोषणा करेगा.
 


तेजी के संकेतों के बीच खुलेगा बाजार, क्रूड और फेड के फैसले पर भी नजर; ये शेयर रहेंगे फोकस में

बीते कारोबारी सत्र यानी शुक्रवार को निफ्टी 23,398.10 अंक और सेंसेक्स 120.83 अंक की गिरावट के साथ 74,781.76 अंक पर बंद हुआ था. सोमवार को गणेश चतुर्थी के कारण बाजार बंद रहा था.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 15 September, 2026
Last Modified:
Tuesday, 15 September, 2026
BWHindia

गिफ्ट निफ्टी में तेजी के बीच मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार की शुरुआत बढ़त के साथ होने के संकेत मिल रहे हैं. शुक्रवार के कारोबारी सत्र में निफ्टी 50 79.70 अंक गिरकर 23,398.10 अंक पर और सेंसेक्स 120.83 अंक की गिरावट के साथ 74,781.76 अंक पर बंद हुआ था. सोमवार को गणेश चतुर्थी के कारण बाजार बंद रहा था. अब मंगलवार को निवेशकों की नजर वैश्विक बाजारों, कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक पर रहेगी. 

मंगलवार सुबह गिफ्ट निफ्टी करीब 39 अंक की बढ़त के साथ 23,525 के स्तर पर कारोबार कर रहा था. इससे निफ्टी 50 के सकारात्मक शुरुआत करने के संकेत मिल रहे हैं. हालांकि, वैश्विक बाजारों के मिले-जुले रुख के बीच बाजार की दिशा पर कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी फेड की आगामी बैठक का असर रह सकता है.

एशियाई बाजारों में दबाव

मंगलवार को एशिया-प्रशांत क्षेत्र के प्रमुख शेयर बाजारों में दबाव देखने को मिला. निवेशक महंगाई के रुख और अमेरिकी फेड की मौद्रिक नीति को लेकर सतर्क हैं. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने भी चिंता बढ़ाई है. हैंग सेंग में 0.62 फीसदी और कोस्पी में 0.32 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

अमेरिकी बाजार भी गिरावट के साथ बंद

सोमवार के कारोबार में अमेरिकी शेयर बाजारों में भी कमजोरी रही. Dow Jones Industrial Average 0.29 फीसदी, S&P 500 0.48 फीसदी और Nasdaq Composite 0.56 फीसदी की गिरावट के साथ बंद हुए.

कच्चे तेल की कीमतों में तेजी

सऊदी अरब के ऊर्जा ढांचे पर हुए हमलों के बाद आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है. इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी पड़ा है. इंटरकॉन्टिनेन्टल एक्सचेंज पर सितंबर वायदा 0.81 फीसदी की बढ़त के साथ 107.06 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया. भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है. ऐसे में तेल की कीमतों में तेजी से महंगाई और चालू खाते पर दबाव बढ़ने की चिंता बनी रह सकती है.

इन पर भी रखें नजर

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, मंगलवार कई शेयरों में कॉरपोरेट अपडेट के चलते हलचल देखने को मिल सकती है. BHEL के बोर्ड ने NTPC BHEL Power Projects में 65 करोड़ रुपये के अतिरिक्त इक्विटी निवेश को मंजूरी दी है. Solar Industries India की सब्सिडियरी Solar SA Investments Proprietary ने Omnia Holdings के अधिग्रहण के लिए करीब 1.355 अरब डॉलर यानी लगभग 12,951 करोड़ रुपये का समझौता किया है. HFCL ने ऑप्टिकल फाइबर, ऑप्टिकल फाइबर केबल और प्रीफॉर्म की क्षमता बढ़ाने के लिए कैपेक्स बढ़ाकर 1,800 करोड़ रुपये कर दिया है. Indiabulls 1,050 करोड़ रुपये में Fintech Cloud की 70 फीसदी हिस्सेदारी हासिल करेगी.

Raymond की एयरोस्पेस सब्सिडियरी को एक प्रमुख भारतीय एयरोस्पेस और डिफेंस कंपनी से 300 से अधिक पार्ट नंबरों से जुड़ा नया ऑर्डर मिला है, जिससे अनुमानित उत्पादन स्तर पर करीब 33 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार होने की उम्मीद है. Amazon ने बताया कि उसकी भारत में अल्ट्रा-फास्ट डिलीवरी सर्विस Amazon Now ने पिछले तीन महीनों के आधार पर 1 अरब डॉलर की सालाना अनुमानित ग्रॉस सेल्स का आंकड़ा पार किया है. Google ने अपने AI for the Planet Accelerator के लिए भारत के चार स्टार्टअप्स का चयन किया है. TVS Motor Company ने श्रीलंका में Apache मोटरसाइकिल रेंज का विस्तार किया है. Coforge के स्वतंत्र निदेशक डीके सिंह ने तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दिया है और बोर्ड ने समितियों का पुनर्गठन किया है. वहीं, Sri Lotus Developers and Realty में Morgan Stanley Asia Singapore ने 15 लाख शेयर खरीदे हैं, जो कंपनी में 0.3 फीसदी हिस्सेदारी के बराबर है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)


भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते से ऑटो सेक्टर को बड़ा फायदा, 2.5 लाख कारों पर सिर्फ 8% शुल्क

भारत को शुरुआती 2.5 लाख कारों का कोटा मिलेगा, समझौते के तहत शुल्क घटने के साथ 10वें साल से यह कोटा बढ़कर 4 लाख वाहन सालाना हो जाएगा

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 14 September, 2026
Last Modified:
Monday, 14 September, 2026
BWHindia

यूरोपीय संघ भारत में निर्मित 2.5 लाख यात्री वाहनों को हर साल 8 प्रतिशत की रियायती आयात शुल्क दर पर अपने बाजार में प्रवेश की अनुमति देगा. यह सुविधा प्रस्तावित भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के तहत मिलेगी. यूरोपीय संघ की ओर से जारी समझौते के मसौदे के अनुसार, वार्षिक कोटा धीरे-धीरे बढ़कर समझौते के 10वें साल से 4 लाख वाहन हो जाएगा.

रियायती शुल्क का लाभ भारत में निर्मित आंतरिक दहन इंजन वाली यात्री कारों और संकर विद्युत वाहनों को मिलेगा. इसके लिए वाहन की सीआईएफ आधार पर कीमत 50,000 यूरो तक होनी चाहिए. कोटा के तहत मिलने वाला आयात शुल्क समझौते के लागू होने के दूसरे साल में घटकर 6 प्रतिशत, तीसरे साल में 4 प्रतिशत और चौथे साल में 2 प्रतिशत रह जाएगा.

पांचवें साल से शुल्क हो जाएगा शून्य

समझौते के तहत कोटा के दायरे में आने वाले वाहनों पर पांचवें साल से आयात शुल्क पूरी तरह खत्म हो जाएगा. वार्षिक कोटा पहले साल के 2.5 लाख वाहनों से धीरे-धीरे बढ़कर 10वें साल से 4 लाख वाहन हो जाएगा. कोटा से अधिक वाहनों के आयात पर यूरोपीय संघ की सबसे पसंदीदा राष्ट्र यानी एमएफएन शुल्क दर लागू होगी.

50,000 यूरो से अधिक कीमत वाली कारों को कोटा आधारित शुल्क रियायत नहीं मिलेगी. हालांकि, इन वाहनों पर भी आयात शुल्क पहले साल के 8 प्रतिशत से घटकर समझौते के 10वें साल में शून्य हो जाएगा. भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते पर इस साल के अंत में हस्ताक्षर होने की उम्मीद है और इसके अगले साल से लागू होने की संभावना है.

भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते के निष्कर्ष की घोषणा इस साल 27 जनवरी को की गई थी. समझौते में बैटरी से चलने वाले विद्युत वाहन, प्लग-इन संकर विद्युत वाहन और आंतरिक दहन इंजन तथा संकर विद्युत वाहनों के अलावा अन्य तकनीक से चलने वाले यात्री वाहनों के लिए अलग-अलग शुल्क-दर कोटा भी शामिल है.

विद्युत वाहनों के लिए अलग कोटा

40,000 यूरो तक की सीआईएफ कीमत वाले विद्युत वाहनों के लिए अलग कोटा समझौते के पांचवें साल से शुरू होगा. इसके तहत हर साल 27,500 वाहनों को 8 प्रतिशत आयात शुल्क पर यूरोपीय संघ के बाजार में प्रवेश मिलेगा. यह कोटा नौवें साल में बढ़कर 60,500 वाहन और 14वें साल से हर साल 1.25 लाख वाहन हो जाएगा. इन वाहनों पर आयात शुल्क नौवें साल से पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा.

40,000 यूरो से अधिक और 60,000 यूरो तक की सीआईएफ कीमत वाले वाहनों के लिए भी कोटा पांचवें साल से शुरू होगा. इस श्रेणी में हर साल 16,250 वाहनों को 8 प्रतिशत शुल्क पर प्रवेश मिलेगा. यह वार्षिक कोटा 14वें साल से बढ़कर 75,000 वाहन हो जाएगा और अंततः आयात शुल्क शून्य कर दिया जाएगा. 60,000 यूरो से अधिक कीमत वाले वाहनों के लिए शुल्क-दर कोटा पांचवें साल से शुरू होगा. इसके तहत 6,250 वाहनों को 8 प्रतिशत शुल्क पर प्रवेश मिलेगा. यह कोटा नौवें साल में बढ़कर 13,250 वाहन और 14वें साल से 25,000 वाहन हो जाएगा. इन वाहनों पर भी नौवें साल से आयात शुल्क समाप्त कर दिया जाएगा.

इन कृषि उत्पादों को भी मिलेगी शुल्क रियायत

समझौते के मसौदे के अनुसार, यूरोपीय संघ भारत में निर्मित कुछ कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों पर भी कोटा आधारित शुल्क रियायत देगा. इनमें टेबल अंगूर, सूखे प्याज, खीरे और कॉर्निशन, शीरे से बनी रम और घी शामिल हैं.

घी के लिए मसौदे में कहा गया है कि समझौता प्रभावी होने की तारीख से हर साल कुल 1,000 मीट्रिक टन की मात्रा के लिए कोटा के भीतर शुल्क दर सीमा शुल्क की आधार दर के 50 प्रतिशत के बराबर होगी.

सीआईएफ मूल्य में क्या शामिल होगा

वाहनों की श्रेणी तय करने के लिए इस्तेमाल होने वाले सीआईएफ मूल्य में वाहन की वास्तविक खरीद कीमत के साथ यूरोपीय संघ के प्रवेश बंदरगाह तक शिपिंग या माल ढुलाई की लागत और बीमा भी शामिल होगा. वाहनों पर शुल्क में ये रियायतें भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते के मसौदे में शामिल बाजार पहुंच से जुड़े प्रावधानों का हिस्सा हैं.
 


ब्रिक्स घोषणा से भारत के MSME और निर्यातकों को मिल सकते हैं नए कारोबारी मौके: PHDCCI

PHDCCI के मुताबिक, व्यापार सुगमता, सस्ती वित्तीय व्यवस्था, सीमा पार भुगतान और तकनीकी सहयोग से भारतीय कंपनियों को उभरते बाजारों में विस्तार का अवसर मिल सकता है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Monday, 14 September, 2026
Last Modified:
Monday, 14 September, 2026
BWHindia

ब्रिक्स नई दिल्ली घोषणा (BRICS New Delhi Declaration) भारत के उद्योग जगत के लिए व्यापार, निवेश और विनिर्माण के नए अवसर खोल सकती है. पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (PHDCCI) के मुताबिक, घोषणा में व्यापार सुगमता, किफायती वित्त, भुगतान व्यवस्था, मजबूत आपूर्ति श्रृंखला और तकनीकी सहयोग पर जोर दिए जाने से भारतीय कंपनियों की उभरते बाजारों में भागीदारी बढ़ सकती है.

पीएचडीसीसीआई का कहना है कि इसका फायदा खास तौर पर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs), निर्यातकों, विनिर्माण कंपनियों और प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनियों को मिल सकता है. इससे भारत के वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (Global Value Chains) में और गहराई से जुड़ने की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं.

एमएसएमई और व्यापार वित्त पर जोर

घोषणा में एमएसएमई को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया गया है. पीएचडीसीसीआई के अनुसार, छोटे कारोबारों के लिए सस्ती वित्तीय व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में भागीदारी की बड़ी चुनौती है.

निर्यात आधारित एमएसएमई के लिए ऋण आकलन से जुड़े मार्गदर्शक सिद्धांत और इनवॉइस डिस्काउंटिंग मैकेनिज्म के अध्ययन का प्रस्ताव छोटे कारोबारों के लिए कार्यशील पूंजी उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है. इससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कारोबार बढ़ाने में आसानी हो सकती है.

पीएचडीसीसीआई के अध्यक्ष राजीव जुनेजा ने कहा कि ब्रिक्स नई दिल्ली घोषणा सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग को भारतीय उद्योग के लिए ठोस अवसरों में बदलने का महत्वपूर्ण मौका देती है. उन्होंने कहा कि इसका वास्तविक प्रभाव सीमा पार व्यापार और निवेश को सस्ता, तेज और आसान बनाने वाले उपायों से आएगा.

सीमा पार भुगतान से कारोबार को मिल सकती है राहत

पीएचडीसीसीआई के अनुसार, बेहतर सीमा पार भुगतान व्यवस्था भारतीय कारोबारों के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. घोषणा में भुगतान और संदेश भेजने वाले चैनलों के बीच बेहतर तालमेल के लिए काम जारी रखने के साथ-साथ ब्रिक्स की स्थानीय मुद्राओं में व्यापार निपटान और निवेश पर चर्चा का समर्थन किया गया है. बेहतर भुगतान व्यवस्था से अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में आने वाली दिक्कतें कम हो सकती हैं. इससे ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा मिलने की संभावना है.

विनिर्माण और निवेश सहयोग को बढ़ावा

ब्रिक्स घोषणा सदस्य देशों के बीच विनिर्माण और निवेश सहयोग को मजबूत करने का व्यापक ढांचा भी उपलब्ध कराती है. ब्रिक्स देशों ने मजबूत और भरोसेमंद आपूर्ति श्रृंखलाओं की जरूरत पर जोर दिया है. साथ ही, वैश्विक विनिर्माण और उत्पादन के अधिक मूल्य वाले क्षेत्रों में उभरते बाजारों की भागीदारी बढ़ाने पर भी ध्यान दिया गया है.

पीएचडीसीसीआई के अनुसार, व्यापार, निवेश, तकनीक हस्तांतरण और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के माध्यम से भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं. इससे भारत केवल पारंपरिक आयात-निर्यात संबंधों तक सीमित रहने के बजाय उत्पादन और निवेश साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ सकता है.

बुनियादी ढांचे और लॉजिस्टिक्स पर भी फोकस

घोषणा में बुनियादी ढांचे, लॉजिस्टिक्स और विकास वित्त पर जोर भारत की दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत कर सकता है. इसमें सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में सहयोग का स्वागत किया गया है. इसके अलावा, निजी पूंजी जुटाने और वित्तीय लागत कम करने के लिए बहुपक्षीय गारंटी की भूमिका पर भी जोर दिया गया है.

टिकाऊ परिवहन बुनियादी ढांचे और मजबूत लॉजिस्टिक्स आपूर्ति श्रृंखलाओं में सहयोग से भारत की कनेक्टिविटी बेहतर हो सकती है. इससे देश के वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में और मजबूती से जुड़ने में मदद मिल सकती है.

डिजिटल और हरित अर्थव्यवस्था में अवसर

ब्रिक्स घोषणा में डिजिटल बदलाव, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), हरित अर्थव्यवस्था, जलवायु वित्त और मजबूत बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों पर भी ध्यान दिया गया है. पीएचडीसीसीआई के मुताबिक, इन क्षेत्रों में भारतीय प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढांचा, स्वच्छ ऊर्जा और सेवा क्षेत्र की कंपनियों के लिए नए अवसर बन सकते हैं. इससे ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग का दायरा पारंपरिक वस्तु व्यापार से आगे बढ़कर तकनीक और निवेश साझेदारी तक पहुंच सकता है.

घोषणा के अमल पर निर्भर करेगा वास्तविक फायदा

पीएचडीसीसीआई ने कहा कि ब्रिक्स से मिलने वाले आर्थिक लाभ अंततः घोषणा में किए गए प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन और कारोबार के स्तर पर मिलने वाले नतीजों पर निर्भर करेंगे.

बाजार तक पहुंच, व्यापार वित्त, भुगतान, लॉजिस्टिक्स, निवेश और तकनीकी सहयोग के लिए व्यावहारिक व्यवस्था तैयार करना जरूरी होगा. तभी ब्रिक्स सहयोग से भारतीय कंपनियों और व्यापक अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक फायदा मिल सकेगा.

पीएचडीसीसीआई के एसजी और सीईओ डॉ. रणजीत मेहता ने कहा कि ब्रिक्स भारत को पारंपरिक आयात-निर्यात संबंधों से आगे बढ़कर उत्पादन, निवेश और तकनीक साझेदारी की दिशा में ले जाने का अवसर देता है. उन्होंने कहा कि भारत मजबूत वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं के निर्माण में भागीदार बन सकता है. इससे देश और ब्रिक्स के अन्य सदस्य देशों में विनिर्माण, निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं.