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भारत में लैंगिक समानता की रफ्तार धीमी, पूर्ण समानता हासिल करने में लगेंगे 123 साल: WEF
विश्व आर्थिक मंच (WEF) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने लैंगिक समानता की दिशा में कुछ प्रगति की है, लेकिन यह रफ्तार बेहद धीमी है.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 1 year ago
भारत ने लैंगिक समानता की दिशा में मामूली प्रगति की है, लेकिन पूरी समानता हासिल करने में अभी भी 123 साल लग सकते हैं. यह जानकारी विश्व आर्थिक मंच (WEF) की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 में दी गई है, जो गुरुवार को जारी की गई.
रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अपनी कुल लैंगिक खाई का 64.1 प्रतिशत पाट लिया है. यह पिछले वर्ष की तुलना में थोड़ी प्रगति दर्शाता है, लेकिन भारत अब भी 148 देशों में 127वें स्थान पर है. मौजूदा रफ्तार से चलते हुए, भारत को लैंगिक समानता हासिल करने में एक सदी से ज्यादा का समय लगेगा.
इस वर्ष रिपोर्ट का यह 19वां संस्करण है. इसमें वैश्विक स्तर पर लैंगिक खाई 68.8 प्रतिशत तक सिमटने की बात कही गई है, जो कि कोविड-19 महामारी के बाद सबसे तेज प्रगति है. इसके बावजूद, दुनिया को पूर्ण लैंगिक समानता तक पहुंचने में 123 साल का समय और लगेगा.
दक्षिण एशिया दुनिया का दूसरा सबसे कमजोर क्षेत्र बना हुआ है, जहाँ औसतन 64.6 प्रतिशत लैंगिक खाई पाटी जा चुकी है. क्षेत्र में बांग्लादेश सबसे आगे है, जिसने 77.5 प्रतिशत खाई बंद कर ली है, जबकि भारत अब भी पीछे चल रहा है, हालांकि शिक्षा और राजनीतिक सशक्तिकरण में कुछ सुधार जरूर हुआ है.
WEF की प्रबंध निदेशक सादिया जाहिदी ने कहा, "वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और धीमी वृद्धि के इस दौर में, लैंगिक समानता को आगे बढ़ाना आर्थिक पुनरुत्थान का एक प्रमुख जरिया है. जो अर्थव्यवस्थाएं समानता में निवेश करती हैं, वे अधिक लचीली, नवाचारी और उत्पादक होती हैं."
भारत ने राजनीतिक सशक्तिकरण में अच्छा प्रदर्शन किया है, खासकर पिछले दो दशकों में संसद में महिलाओं की मजबूत भागीदारी के चलते. हालांकि, आर्थिक भागीदारी के मामले में भारत अब भी पीछे है. महिलाओं की कार्यबल में हिस्सेदारी मात्र 23 प्रतिशत है, और कॉर्पोरेट नेतृत्व में वे केवल 14.6 प्रतिशत पदों पर मौजूद हैं.
शैक्षिक उपलब्धि के मामले में भारत लगभग बराबरी पर आ गया है. कई उच्च शिक्षा क्षेत्रों में महिलाएं अब पुरुषों से आगे हैं. फिर भी, इस शिक्षा निवेश का आर्थिक लाभ बहुत सीमित रहा है, जिसकी वजह संरचनात्मक बाधाएं, देखभाल की जिम्मेदारियाँ और कार्यस्थल पर भेदभाव हैं.
वैश्विक स्तर पर, राजनीतिक सशक्तिकरण 2006 से अब तक का सबसे बड़ा सुधार क्षेत्र रहा है, फिर भी इसमें अब तक केवल 22.9 प्रतिशत खाई बंद हुई है. आर्थिक भागीदारी और अवसर, जो दूसरा सबसे कमजोर क्षेत्र है, उसमें भी सुधार बहुत धीमा है. मौजूदा रफ्तार से, वैश्विक आर्थिक लैंगिक खाई को बंद करने में 135 साल, और राजनीतिक समानता पाने में 162 साल लगेंगे.
LinkedIn की ग्लोबल पब्लिक पॉलिसी प्रमुख, सू ड्यूक, ने चेतावनी देते हुए कहा है कि जैसे-जैसे एआई अर्थव्यवस्थाओं को पुनर्परिभाषित कर रहा है और नई क्षमताएँ आवश्यक हो रही हैं, नेतृत्व से महिलाओं का बहिष्कार सिर्फ अन्यायपूर्ण ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी अदूरदर्शिता है.
रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि भारत समेत उभरती अर्थव्यवस्थाओं में महिलाएँ व्यापारिक व्यवधानों और तकनीकी बदलावों के चलते विशेष रूप से असुरक्षित हैं. इससे औपचारिक रोजगार और आय समानता में हुई प्रगति पर पानी फिर सकता है. WEF ने नीति-निर्माताओं से समावेशी व्यापार, लचीली कार्य नीतियाँ और महिलाओं के लिए पुनः प्रवेश मार्ग सुनिश्चित करने की अपील की है.
रिपोर्ट के अनुसार, भारत की यह सीमित प्रगति यह दर्शाती है कि लक्ष्यित प्रयासों से बदलाव संभव है, लेकिन संरचनात्मक सुधार, निजी क्षेत्र की भागीदारी, और राजनीतिक इच्छाशक्ति बेहद आवश्यक है यदि देश को वास्तविक समानता की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ना है और समावेशी अर्थव्यवस्था का लाभ उठाना है.
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