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TATA का बड़ा कदम: ब्रिटेन में बनेगा देश का सबसे बड़ा बैटरी प्लांट, 750 मिलियन यूरो का लोन मंजूर
TATA की यह डील न सिर्फ एक मेगा मैन्युफैक्चरिंग प्लांट की शुरुआत है, बल्कि यह संकेत है कि भारत की कंपनियां अब ग्लोबल स्तर पर तकनीकी और वित्तीय रूप से बड़ी जिम्मेदारियां उठाने के लिए तैयार हैं.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 11 months ago
भारत की दिग्गज कंपनी टाटा ग्रुप (Tata Group) अब ग्लोबल ग्रीन एनर्जी रेस में बड़ा दांव खेलने जा रही है. दरअसल, टाटा संस (TATA SONS) की पूर्ण स्वामित्व वाली यूनिट Agratas Energy Storage Solutions ने ब्रिटेन में देश की सबसे बड़ी बैटरी निर्माण इकाई स्थापित करने के लिए 750 मिलियन यूरो (लगभग 990.79 मिलियन डॉलर) के लोन पर हस्ताक्षर किए हैं. इस रणनीतिक डील में करीब 15 अंतरराष्ट्रीय बैंकों ने हिस्सा लिया है, जो कि इसे 2025 की भारत की टॉप फॉरेन फंडिंग डील्स में शामिल करता है. टाटा का यह कदम इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और एनर्जी स्टोरेज के क्षेत्र में भारत की वैश्विक उपस्थिति को मजबूत बनाने की दिशा में एक बड़ा निवेश माना जा रहा है.
क्या है डील की डिटेल?
इस महीने टाटा ग्रुप की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी Agratas Energy Storage Solutions Pvt. Ltd. के लिए करीब 15 अंतरराष्ट्रीय बैंकों के साथ दो साल के ब्रिज लोन समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं. यह डील इस साल किसी भारतीय कंपनी द्वारा लिए गए तीन सबसे बड़े फॉरेन करेंसी लोन में से एक मानी जा रही है. कर्ज की दर स्टर्लिंग ओवरनाइट इंडेक्स एवरेज (SONIA) के ऊपर एक निर्धारित स्प्रेड पर तय की गई है. यह डील ऐसे समय में साइन हुई है जब वैश्विक वित्तीय बाज़ार ब्याज दरों और टैरिफ में बढ़ोतरी के कारण अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं.
क्या है टाटा का प्लान?
Agratas कंपनी ब्रिटेन और भारत में बैटरी सेल निर्माण के लिए फैक्ट्रियां स्थापित कर रही है. कंपनी का लक्ष्य है कि 2030 के दशक की शुरुआत तक यह प्लांट ब्रिटेन के ऑटोमोटिव सेक्टर की बैटरी जरूरतों का लगभग 50% तक उत्पादन कर सके. टाटा ने पहले भी एक स्टेटमेंट में कहा था कि ब्रिटेन में बनने वाला यह कारखाना न सिर्फ देश का सबसे बड़ा बैटरी मैन्युफैक्चरिंग प्लांट होगा, बल्कि यह क्लीन एनर्जी और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने के लिहाज से एक रणनीतिक कदम भी है.
भारतीय कंपनियों के लिए क्या मायने रखता है ये कदम?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2024 की तुलना में इस साल भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशी मुद्रा में लिए गए ऋण में 23% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो अब 6.6 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है. टाटा की यह डील इस ट्रेंड को और बल देती है और यह संकेत देती है कि भारतीय कंपनियां अब अंतरराष्ट्रीय फाइनेंशियल नेटवर्क में पहले से कहीं अधिक एक्टिव और सशक्त हो चुकी हैं.
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