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सुप्रीम कोर्ट से वेदांता को झटका, अडानी की ₹14,543 करोड़ की बोली पर रोक से इनकार
अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि रेजोल्यूशन प्रोसेस में गड़बड़ी हुई है. कंपनी के मुताबिक, उसका बेहतर ऑफर होने के बावजूद उसे खारिज कर दिया गया.
बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 months ago
सुप्रीम कोर्ट ने जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड के रेजोल्यूशन प्लान को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने अडानी एंटरप्राइजेज की करीब ₹14,543 करोड़ की बोली पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है. इसके साथ ही कोर्ट ने वेदांता लिमिटेड की याचिका भी खारिज कर दी. हालांकि, अदालत ने प्रक्रिया को लेकर एक अहम शर्त भी तय की है.
कोर्ट ने क्यों नहीं लगाई रोक
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि इस तरह के विवादों को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल के सामने उठाया जाना चाहिए. अदालत ने वेदांता और अन्य पक्षों को अपनी आपत्तियां NCLAT में रखने का निर्देश दिया.
शर्त के साथ आगे बढ़ेगा रेजोल्यूशन प्लान
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण शर्त भी रखी है. कोर्ट ने कहा कि रेजोल्यूशन प्रक्रिया की निगरानी कर रही समिति किसी भी बड़े फैसले से पहले NCLAT की मंजूरी लेगी. इसके अलावा. अदालत ने NCLAT को इस मामले की जल्द सुनवाई करने को कहा है. अब इस केस की अगली सुनवाई 10 अप्रैल को होगी.
वेदांता ने क्यों उठाए सवाल
वेदांता लिमिटेड ने इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शिता और निष्पक्षता के आधार पर चुनौती दी थी. कंपनी का कहना था कि उसकी ज्यादा ऊंची बोली को नजरअंदाज किया गया. वेदांता का दावा है कि उसका संशोधित प्रस्ताव अडानी ग्रुप से कुल वैल्यू में करीब ₹3,400 करोड़ ज्यादा और नेट प्रेजेंट वैल्यू में लगभग ₹500 करोड़ अधिक था.
सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंची वेदांता
अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि रेजोल्यूशन प्रोसेस में गड़बड़ी हुई है. कंपनी के मुताबिक. उसका बेहतर ऑफर होने के बावजूद उसे खारिज कर दिया गया. जिससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं.
अडानी ग्रुप को क्यों मिली मंजूरी
कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स ने आखिरकार अदाणी ग्रुप के प्रस्ताव को मंजूरी दी. अडानी का प्लान करीब ₹6,000 करोड़ की तत्काल पेमेंट और बाकी रकम दो साल में चुकाने का था. वहीं, वेदांता ने भुगतान के लिए करीब पांच साल का समय मांगा था.
लेंडर्स का मानना था कि जल्दी भुगतान ज्यादा महत्वपूर्ण है. IBC नियमों के तहत कंपनी का समय पर समाधान प्राथमिकता होती है. भले ही रिकवरी थोड़ी कम क्यों न हो.
विशेषज्ञों के अनुसार. इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया में सिर्फ सबसे बड़ी बोली ही निर्णायक नहीं होती. पूर्व IBBI चेयरमैन एम एस साहू के मुताबिक. IBC का मुख्य उद्देश्य कंपनी को बचाना होता है. जबकि रिकवरी सेकेंडरी होती है. इस तरह सुप्रीम कोर्ट के फैसले से फिलहाल अडानी ग्रुप के लिए रास्ता साफ हो गया है. लेकिन अंतिम फैसला अब NCLAT की सुनवाई और आगे की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा.
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