RIL पहली तिमाही में जबरदस्त मुनाफा, एशियन पेंट्स में हिस्सेदारी बेचकर हुई रिकॉर्ड कमाई

रिलायंस इंडस्ट्रीज ने जहां जियो और रिटेल सेगमेंट में शानदार प्रदर्शन किया, वहीं तेल एवं गैस बिजनेस में चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

Last Modified:
Saturday, 19 July, 2025
BWHindi

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) ने वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में शानदार प्रदर्शन किया है. कंपनी का शुद्ध मुनाफा 78.3% बढ़कर ₹26,994 करोड़ पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की समान तिमाही में ₹15,138 करोड़ और वित्त वर्ष 2025 की चौथी तिमाही में ₹19,407 करोड़ था. इस जबरदस्त वृद्धि का मुख्य कारण एशियन पेंट्स में 4.9% हिस्सेदारी बेचकर हुई ₹8,924 करोड़ की एकमुश्त कमाई रहा.

परिचालन आय में मामूली बढ़ोतरी

वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही में रिलायंस की परिचालन आय ₹2.48 लाख करोड़ रही, जो पिछले साल की समान अवधि में ₹2.36 लाख करोड़ थी, यह 5.26% की वृद्धि को दर्शाती है. हालांकि, कंपनी के O2C (ऑयल टू केमिकल्स) और तेल एवं गैस सेगमेंट में कमज़ोर प्रदर्शन देखने को मिला. कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और संयंत्र बंद होने के कारण उत्पादन घटा, जिससे इस क्षेत्र की आय में 1.5% की गिरावट आई.

हालांकि, कंपनी की कुल आय में वित्त वर्ष 2025 की चौथी तिमाही की तुलना में 6.8% की गिरावट दर्ज की गई. साथ ही, संचयी शुद्ध आय साल-दर-साल सिर्फ 5.1% बढ़ी, जो विश्लेषकों की उम्मीदों से कम रही.

जियो प्लेटफॉर्म्स का मुनाफा 24.9% बढ़ा

रिलायंस की दूरसंचार इकाई जियो प्लेटफॉर्म्स ने तिमाही के दौरान बेहतरीन प्रदर्शन किया. इस अवधि में जियो का शुद्ध मुनाफा ₹7,110 करोड़ रहा, जो साल-दर-साल 24.9% अधिक है. आय भी 18.8% बढ़कर ₹41,054 करोड़ रही. प्रति ग्राहक औसत राजस्व (ARPU) 14.9% बढ़कर ₹208.8 हुआ.

रिलायंस रिटेल का मुनाफा 33.2% उछला

रिटेल सेगमेंट में भी कंपनी को शानदार नतीजे मिले. रिलायंस रिटेल वेंचर्स ने ₹3,267 करोड़ का शुद्ध मुनाफा कमाया, जो पिछले साल की समान तिमाही की तुलना में 33.2% अधिक है.
कंपनी की आय 11.3% बढ़कर ₹73,720 करोड़ पर पहुंची. तिमाही में कंपनी ने 388 नए स्टोर खोलकर अपने कुल स्टोरों की संख्या 19,592 तक पहुंचा दी.

अंबानी का बयान

कंपनी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी ने तिमाही नतीजों पर संतोष जताया. उन्होंने कहा, “वित्त वर्ष 2026 की शुरुआत रिलायंस ने मजबूत परिचालन और वित्तीय प्रदर्शन के साथ की है. वैश्विक अस्थिरता और ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता के बावजूद कंपनी की संचयी एबिटा में स्थिरता रही है.” उन्होंने यह भी बताया कि जियो-बीपी नेटवर्क और घरेलू मांग पर फोकस करके O2C बिजनेस में कंपनी ने मूल्यवर्धन किया है.

 


340 अरब डॉलर के एल्गोरिदम का झूठ जिसने भारत की अर्थव्यवस्था की कहानी बदल दी

एक निजी विदेशी एल्गोरिद्म ने चुपचाप भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़ी सबसे बड़ी सुर्खियों में से एक गढ़ दी और किसी ने उसकी जांच तक नहीं की.

Last Modified:
Wednesday, 01 July, 2026
BWHindia

पलक शाह

जून 2026 में पेरिस स्थित आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) ने अपनी 'एशिया कैपिटल मार्केट्स रिपोर्ट 2026' प्रकाशित की, जिसमें दावा किया गया कि पिछले 12 महीनों के दौरान भारत में 340 अरब डॉलर का क्रिप्टोकरेंसी निवेश (इनफ्लो) आया. यह राशि भारत की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 9 प्रतिशत बताई गई. इस दावे का पूरा आधार केवल Chainalysis था, जो अमेरिका की एक निजी ब्लॉकचेन एनालिटिक्स कंपनी है. यह कंपनी सरकारों को निगरानी (सर्विलांस) सॉफ्टवेयर बेचती है और इसकी कार्यप्रणाली (मेथडोलॉजी) का कभी स्वतंत्र ऑडिट नहीं हुआ है.

कुछ ही दिनों में इस आंकड़े को भारत के क्रिप्टो एक्सचेंज लॉबी ने व्यापक रूप से प्रचारित किया और यह उस समय चर्चा का हिस्सा बन गया, जब संसद की एक समिति क्रिप्टोकरेंसी नियमन पर सुनवाई करने वाली थी, जिसमें भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को अपने सतर्क रुख का बचाव करना था.

लेकिन BW की जांच में सामने आया कि 340 अरब डॉलर का यह आंकड़ा भारत में आई वास्तविक पूंजी को नहीं दर्शाता. यह केवल ब्लॉकचेन पर दर्ज कुल लेनदेन (ग्रॉस ऑन-चेन ट्रांजैक्शन वॉल्यूम) को मापता है, जिसमें एक ही पैसा कई बार अलग-अलग एक्सचेंजों के जरिए घूमने से आंकड़ा बढ़ जाता है. इसका भारत के आधिकारिक भुगतान संतुलन (Balance of Payments), विदेशी मुद्रा भंडार या सरकार के किसी भी आधिकारिक वित्तीय रिकॉर्ड से कोई मेल नहीं है.

यदि वास्तव में एक वर्ष में 340 अरब डॉलर क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से भारत में आए होते, तो यह देश की GDP का लगभग 9 प्रतिशत होता. यह भारत में आए कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) से चार गुना से भी अधिक होता. यह आधुनिक भारतीय आर्थिक इतिहास में दर्ज सबसे बड़े पूंजी प्रवाहों में शामिल होता. यह आज के मूल्य के हिसाब से मार्शल प्लान से भी बड़ा और 1997 के एशियाई वित्तीय संकट के बाद किसी भी उभरते एशियाई बाजार में एक वर्ष के सबसे बड़े विदेशी पूंजी प्रवाह के बराबर होता.

ऐसी स्थिति में रुपये की विनिमय दर पर असर दिखता. भारतीय रिजर्व बैंक को आपात बैठकें बुलानी पड़तीं. संसद जवाब मांगती. वित्त मंत्रालय को आधिकारिक बयान जारी करने पड़ते. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

फिर भी न्यूयॉर्क स्थित एक निजी एल्गोरिद्म ने यह घोषित कर दिया कि ऐसा हुआ था और भारत के लगभग पूरे वित्तीय मीडिया ने इस पर भरोसा कर लिया.

OECD की एशिया कैपिटल मार्केट्स रिपोर्ट 2026 जून में प्रकाशित हुई. कुछ ही घंटों के भीतर भारत के लगभग सभी प्रमुख बिजनेस मीडिया संस्थानों में एक जैसी सुर्खियां दिखाई देने लगीं कि जून 2024 से जून 2025 के बीच भारत में 340 अरब डॉलर का क्रिप्टो निवेश आया, जो GDP का 9 प्रतिशत है और एशिया में सबसे अधिक है. इस आंकड़े का हवाला विश्लेषकों ने दिया, क्रिप्टो एक्सचेंजों ने इसे साझा किया, नीति विशेषज्ञों ने सोशल मीडिया पर प्रसारित किया और देखते ही देखते इसे आर्थिक तथ्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया.

लेकिन किसी ने रिपोर्ट का फुटनोट नहीं देखा.

रिपोर्ट के डेटा सेक्शन में एक छोटा-सा उल्लेख था कि यह पूरा आंकड़ा **Chainalysis** से लिया गया है. यह न्यूयॉर्क में पंजीकृत एक निजी ब्लॉकचेन एनालिटिक्स कंपनी है, जिसकी अधिकतम वैल्यूएशन 8.6 अरब डॉलर रही है. इसके राजस्व का बड़ा हिस्सा अमेरिकी संघीय एजेंसियों जैसे FBI, IRS, DEA, DOJ और दर्जनभर अन्य सरकारी संस्थाओं के साथ किए गए निगरानी संबंधी अनुबंधों से आता है.

यह कहानी इस बारे में है कि एक ऐसा आंकड़ा, जिसका वास्तविक अर्थ शायद वही नहीं है जो बताया गया, कैसे एक निजी एल्गोरिद्म से निकलकर OECD की रिपोर्ट तक पहुंचा और फिर वहां से भारत की आर्थिक सोच का हिस्सा बन गया. यह सब ठीक उस समय हुआ, जब क्रिप्टो नीति पर देश में एक महत्वपूर्ण बहस चल रही थी.

समय महज संयोग नहीं था

2 जुलाई 2026 को. यानी भारतीय मीडिया में OECD की रिपोर्ट के व्यापक रूप से प्रसारित होने के सिर्फ चार दिन बाद. संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने क्रिप्टोकरेंसी नियमन पर बैठक बुलाई. पहली बार भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने समिति के सामने सीधे अपना पक्ष रखा. RBI, जो लगातार और खुलकर भारत में क्रिप्टोकरेंसी को औपचारिक मान्यता देने का विरोध करता रहा है, उसकी आमने-सामने बैठक CoinDCX और CoinSwitch जैसे क्रिप्टो एक्सचेंजों के प्रतिनिधियों से हुई. ये कंपनियां लंबे समय से नियामकीय स्पष्टता यानी व्यवहारिक रूप से क्रिप्टो को औपचारिक स्वीकृति दिलाने के लिए प्रयास कर रही हैं.

340 अरब डॉलर का आंकड़ा समिति की बैठक शुरू होने से पहले ही वहां पहुंच चुका था.

इस प्रकाशन के अनुरोध पर OECD रिपोर्ट की समीक्षा करने वाले और संस्थागत निवेशकों के लिए पूंजी प्रवाह पर नजर रखने वाले एक वरिष्ठ अर्थशास्त्री ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा, "इस तरह का आंकड़ा पहले से तय निष्कर्ष (Fait Accompli) जैसा तर्क बन जाता है. यह नियामकीय बहस को 'क्या हमें इसकी अनुमति देनी चाहिए?' से बदलकर 'जब यह पहले ही हमारी GDP का 9 प्रतिशत है तो इसे कैसे नियंत्रित किया जाए?' पर ले आता है. यह बहुत बड़ा बदलाव है. और यदि यह आंकड़ा ही पद्धतिगत रूप से टिकाऊ नहीं है, तो इसके आधार पर बनाया गया पूरा नीतिगत दबाव ढह जाता है."

बैठक से जुड़े लोगों के अनुसार, समिति के सामने RBI का रुख पहले की तरह सतर्क ही रहा. लेकिन OECD की विश्वसनीयता के साथ आया 340 अरब डॉलर का आंकड़ा सार्वजनिक विमर्श में अपना असर छोड़ चुका था. इससे केंद्रीय बैंक को एक ऐसे संस्थान के रूप में पेश किया गया जो एक कथित अटल आर्थिक वास्तविकता का विरोध कर रहा हो.

हितों का पीछा करें

पत्रकारिता में जब कोई बड़ा दावा तेजी से फैलता है और कोई उसकी जांच नहीं करता, तो पहला सवाल हमेशा यही होता है. इससे फायदा किसे होता है?

सबसे पहले Chainalysis को देखें. जिस कंपनी ने यह मूल आंकड़ा तैयार किया, वह कोई शोध संस्थान नहीं है. यह एक व्यावसायिक कंपनी है, जिसकी वार्षिक आवर्ती आय (Annual Recurring Revenue) करीब 25 करोड़ डॉलर है. इसके 1,500 से अधिक सरकारी एजेंसियां ग्राहक हैं और 2022 में अपने उच्चतम स्तर 8.6 अरब डॉलर की वैल्यूएशन से गिरकर अब इसकी अनुमानित वैल्यू करीब 2.5 अरब डॉलर रह गई है. यानी लगभग 70 प्रतिशत की गिरावट. कंपनी अभी तक लाभ में भी नहीं पहुंची है.

Chainalysis का कारोबारी मॉडल एक सरल सिद्धांत पर आधारित है. जितनी अधिक सरकारें क्रिप्टोकरेंसी को एक बड़े, गंभीर और संभावित रूप से जोखिमपूर्ण आर्थिक क्षेत्र के रूप में देखेंगी, उतनी ही उन्हें ब्लॉकचेन निगरानी और अनुपालन (Compliance) सॉफ्टवेयर की जरूरत पड़ेगी. भारत के क्रिप्टो बाजार को GDP के 9 प्रतिशत के बराबर बताने वाली हर सुर्खी, Chainalysis के लिए एक बिक्री दस्तावेज जैसी है. यह हर नियामक, हर वित्तीय खुफिया इकाई और हर कानून प्रवर्तन एजेंसी के लिए सीधा संदेश है कि यह बाजार इतना बड़ा है कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और इसकी निगरानी के लिए उनके उपकरण जरूरी हैं.

यह जरूरी नहीं कि कंपनी ने जानबूझकर यह आंकड़ा गढ़ा हो. समस्या सिर्फ इतनी है कि उसने ऐसी कार्यप्रणाली तैयार की हो, जो अपने ढांचे के कारण बहुत बड़े आंकड़े पैदा करती हो और वही कार्यप्रणाली बाद में किसी प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संस्था की रिपोर्ट की अदृश्य नींव बन जाए.

भारत के एक नियामक निकाय के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने, जिन्होंने पृष्ठभूमि की शर्त पर बात की, कहा, "इसी वजह से क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों, वित्तीय बेंचमार्क और बाजार संबंधी डेटा उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाता है. जब किसी निजी संस्था के व्यावसायिक हित किसी विशेष निष्कर्ष से सीधे जुड़े हों, तो उसकी कार्यप्रणाली को केवल उसके स्वयं के प्रमाणन के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता. विश्वसनीय आंकड़े इसी तरह काम नहीं करते. यह हैरानी की बात है कि OECD जैसी संस्था ने इस डेटा को बिना किसी स्पष्ट स्वतंत्र सत्यापन के स्वीकार कर लिया."

भारत का क्रिप्टो एक्सचेंज उद्योग भी 340 अरब डॉलर के इस आंकड़े को व्यापक रूप से प्रचारित करने का अपना कारण रखता है. CoinDCX और CoinSwitch जैसी कंपनियां संसद की वित्त समिति के सामने नियामकीय सामान्यीकरण की मांग कर चुकी हैं. उनके लिए सबसे मजबूत तर्क वही है, जो यह आंकड़ा प्रस्तुत करता है. यानी भारत की क्रिप्टो अर्थव्यवस्था पहले से ही विशाल है, गहराई तक स्थापित हो चुकी है और सक्रिय रूप से काम कर रही है. ऐसे में प्रतिबंध या अत्यधिक सख्त नियम व्यावहारिक नहीं होंगे. 340 अरब डॉलर की यह सुर्खी उनके लिए लॉबिंग का प्रभावी माध्यम बन जाती है. इसमें कोई लागत नहीं आती और यह OECD जैसी संस्था की विश्वसनीयता के साथ पहले से तैयार रूप में मिल जाती है.

अब OECD की भूमिका भी देखिए. पिछले तीन वर्षों से यह संस्था **Crypto-Asset Reporting Framework (CARF)** को विकसित और बढ़ावा दे रही है. यह एक बहुपक्षीय कर रिपोर्टिंग व्यवस्था है, जिसके तहत सदस्य देशों के क्रिप्टो एक्सचेंजों को सीमा पार लेनदेन संबंधी डेटा साझा करना होगा. भारत ने अप्रैल 2027 तक CARF लागू करने की प्रतिबद्धता जताई है. ऐसे में OECD का भी संस्थागत हित इसी बात में है कि क्रिप्टो बाजार को बड़ा, जटिल और वैश्विक रूप से परस्पर जुड़ा हुआ बताया जाए, ताकि उसी ढांचे की आवश्यकता साबित हो सके, जिसे OECD बढ़ावा दे रहा है. भारत में 340 अरब डॉलर का आंकड़ा ठीक इसी कहानी को मजबूत करता है.

इन तथ्यों में कहीं भी किसी समन्वित साजिश का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है. लेकिन यह निश्चित रूप से प्रोत्साहनों (Incentives) की ऐसी संरचना दिखाते हैं, जिसमें एक बेहद संदिग्ध आंकड़ा बिना किसी गंभीर जांच के व्यापक रूप से फैल गया. जिन पक्षों के हित इससे जुड़े थे, उन्होंने इसे उत्साहपूर्वक अपनाया और जिस स्तर की जांच किसी इतने बड़े वित्तीय आंकड़े पर सामान्य रूप से होनी चाहिए थी, वह कभी नहीं हुई.

यह आंकड़ा वास्तव में क्या मापता है

Chainalysis पूंजी (Capital) को नहीं मापता. यह "ऑन-चेन वैल्यू रिसीव्ड" (On-chain Value Received) नामक एक मापदंड का उपयोग करता है. इसका अर्थ है कि किसी देश के उपयोगकर्ताओं से जुड़े ब्लॉकचेन पतों (Addresses) पर पहुंची कुल क्रिप्टोकरेंसी का मूल्य. इस अनुमान को कंपनी एक्सचेंज वेबसाइटों पर आने वाले वेब ट्रैफिक के पैटर्न के आधार पर तैयार करती है.

कंपनी की अपनी प्रकाशित कार्यप्रणाली में लिखा है.

"हम विभिन्न प्रकार की क्रिप्टोकरेंसी सेवाओं और प्रोटोकॉल के लिए देशों के लेनदेन की मात्रा का अनुमान, उन सेवाओं और प्रोटोकॉल की वेबसाइटों पर आने वाले वेब ट्रैफिक के पैटर्न के आधार पर लगाते हैं."

यानी कंपनी यह देखती है कि कौन लोग क्रिप्टो एक्सचेंजों की वेबसाइटों पर जा रहे हैं. फिर उसी ट्रैफिक के आधार पर लेनदेन का अनुमान लगाती है और IP एड्रेस के जरिए उसे संबंधित देशों से जोड़ देती है.

असल समस्या डेटा जुटाने के तरीके में नहीं है. समस्या इस बात में है कि व्यवहार में "वैल्यू रिसीव्ड" का अर्थ क्या होता है. हर बार जब वही क्रिप्टोकरेंसी किसी नए पते पर पहुंचती है, तो उसे फिर से गिना जाता है. यानी वही पैसा बार-बार गिना जाता है.

भारतीय खुदरा निवेशकों के सामान्य ट्रेडिंग व्यवहार को समझिए. कोई निवेशक एक एक्सचेंज पर बिटकॉइन खरीदता है. बेहतर कीमत पाने के लिए उसे दूसरे एक्सचेंज में भेजता है. फिर सुरक्षा के लिए उसे USDT में बदल देता है. इसके बाद उस USDT को किसी DeFi लेंडिंग प्रोटोकॉल में स्थानांतरित करता है और अंत में उसे वापस किसी एक्सचेंज में ले आता है. इस पूरी प्रक्रिया में मूल निवेश सिर्फ 10 लाख रुपये का था. लेकिन उससे "वैल्यू रिसीव्ड" की चार या पांच अलग-अलग घटनाएं दर्ज हो जाती हैं. वास्तविक पूंजी अब भी 10 लाख रुपये ही रहती है, जबकि रिकॉर्ड की गई "वैल्यू रिसीव्ड" 40 से 50 लाख रुपये तक पहुंच जाती है.

यदि लाखों भारतीय ट्रेडर 12 महीनों तक हर दिन इस तरह कई लेनदेन करें, तो केवल पैसे के बार-बार घूमने (Velocity Effect) के कारण "वैल्यू रिसीव्ड" का कुल आंकड़ा वास्तविक निवेश से चार या पांच गुना तक बढ़ सकता है. लेकिन 340 अरब डॉलर के इस दावे को प्रकाशित करने वालों में से किसी ने भी यह गणना नहीं की और न ही Chainalysis से इसका स्पष्टीकरण मांगा.

Chainalysis ने अपनी ही रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि उसका विश्लेषण "OTC डेस्क, हवाला जैसे अनौपचारिक बाजारों या नकद आधारित क्रिप्टो दुकानों के माध्यम से होने वाली गतिविधियों को शामिल नहीं करता."

दूसरे शब्दों में, 340 अरब डॉलर का यह आंकड़ा एक साथ दो तरह की त्रुटि करता है. एक ओर यह औपचारिक एक्सचेंजों पर होने वाले लेनदेन को Velocity Effect के कारण जरूरत से ज्यादा दिखाता है, वहीं दूसरी ओर अनौपचारिक बाजार की गतिविधियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता है. इसलिए यह भारत की क्रिप्टो अर्थव्यवस्था का कोई सतर्क या कम अनुमान नहीं है, बल्कि दोनों दिशाओं में गलत माप है.

VPN की समस्या इस स्थिति को और जटिल बना देती है. भारत में 2024 में दूरसंचार नियामकों द्वारा Binance पर रोक लगाए जाने और वैश्विक एक्सचेंजों तक पहुंच समय-समय पर सीमित किए जाने के बाद, क्रिप्टो ट्रेडरों के बीच VPN का उपयोग सामान्य बात बन चुका है. जब कोई भारतीय उपयोगकर्ता सिंगापुर के VPN सर्वर के जरिए किसी सिंगापुर स्थित एक्सचेंज से जुड़ता है, तो संभव है कि Chainalysis उस पूरे लेनदेन को सिंगापुर के खाते में जोड़ दे. यदि ट्रैफिक की पहचान गलत होती है, तो भारत का आंकड़ा कम हो जाएगा. यदि पहचान सही होती है, तो बढ़ जाएगा. लेकिन इस त्रुटि का आकलन संभव नहीं है, क्योंकि Chainalysis ने कभी भी अपने फॉल्स पॉजिटिव और फॉल्स नेगेटिव की दर सार्वजनिक नहीं की है. बल्कि अदालत में उसने यह भी स्वीकार किया है कि वह इनका व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं रखती.

अमेरिका में Chainalysis की कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाले वकील टॉर एकेलैंड ने कंपनी के उपकरणों को "जंक साइंस, जिसका संघीय अदालत में कोई स्थान नहीं होना चाहिए" बताया था.

2022 में Chainalysis की जांच प्रमुख एलिजाबेथ बिस्बी से शपथ के तहत पूछा गया कि क्या कंपनी ने अपने Reactor सॉफ्टवेयर के लिए त्रुटि की सीमा (Margin of Error) की गणना की है. उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें ऐसी किसी गणना की जानकारी नहीं है.

एक प्रतिस्पर्धी एनालिटिक्स कंपनी CipherTrace ने विशेष परीक्षण परिस्थितियों में Chainalysis की मुख्य क्लस्टरिंग तकनीक में 64 प्रतिशत तक की विसंगति पाई थी. आज तक Chainalysis की देशों के आधार पर डेटा आवंटित करने की कार्यप्रणाली का कोई स्वतंत्र, सहकर्मी-समीक्षित (Peer Reviewed) सत्यापन प्रकाशित नहीं हुआ है.

फिर भी OECD ने इसी कंपनी के आंकड़ों को आर्थिक तथ्य के रूप में उद्धृत किया.

वह साधारण जांच जो पूरी बहस खत्म कर देती है

कार्यप्रणाली पर बहस करने से भी आसान एक परीक्षण है. इसे करने में केवल 30 सेकंड लगते हैं.

वित्त वर्ष 2024-25 में भारत को 81 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) प्राप्त हुआ. यह आंकड़ा भारत सरकार ने जारी किया, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सत्यापित किया, वाणिज्य मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों में प्रकाशित हुआ और वित्त मंत्रालय ने प्रेस विज्ञप्ति के जरिए इसकी घोषणा की. भारत में आने वाले विदेशी निवेश का प्रत्येक रुपया विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत दर्ज किया जाता है, जहां हर विदेशी पूंजी प्रवाह की अनिवार्य रिपोर्टिंग होती है.

इसी वर्ष विदेशों में काम कर रहे भारतीयों ने 135 अरब डॉलर की रिकॉर्ड धनराशि (Remittances) देश भेजी. यह आंकड़ा भी RBI ने जारी किया और बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से प्रत्येक लेनदेन के आधार पर दर्ज किया गया. ये दोनों आंकड़े भारत की अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक निगरानी वाले पूंजी प्रवाह का प्रतिनिधित्व करते हैं. दोनों को मिलाकर कुल राशि 216 अरब डॉलर होती है.

इसके विपरीत, OECD का दावा है कि Chainalysis के आंकड़ों के अनुसार इसी अवधि में भारत को क्रिप्टोकरेंसी के जरिए 340 अरब डॉलर प्राप्त हुए. यानी यह 340 अरब डॉलर भारत के पूंजी खाते (Capital Account) में कहीं दर्ज नहीं हुआ. इसके लिए FEMA के तहत कोई रिपोर्टिंग नहीं हुई. यह RBI की विदेशी मुद्रा निगरानी प्रणाली की नजर से भी पूरी तरह बच गया, जबकि यह प्रणाली सीमा पार होने वाले हर बड़े पूंजी प्रवाह पर बेहद बारीकी से नजर रखती है. इतना ही नहीं, इस कथित निवेश का रुपये की विनिमय दर, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार, मुद्रा आपूर्ति या कर संग्रह पर भी कोई स्पष्ट प्रभाव नहीं पड़ा.

एक अंतरराष्ट्रीय संस्थागत निवेशक के लिए उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह पर नजर रखने वाले अर्थशास्त्री ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा, "यदि आप किसी गंभीर मैक्रोइकोनॉमिस्ट से कहें कि भारत की GDP का 9 प्रतिशत हिस्सा एक ही माध्यम से एक वर्ष में देश में आया और केंद्रीय बैंक को इसकी भनक तक नहीं लगी, तो वह सीधा कहेगा कि यह आंकड़ा गलत है. बस. यह कार्यप्रणाली की बहस नहीं है. यह साधारण अंकगणित का सवाल है."

संप्रभुता का सवाल

अब कार्यप्रणाली और प्रोत्साहनों की बहस से थोड़ा पीछे हटकर देखिए कि वास्तव में यहां हुआ क्या है.

भारत की आर्थिक कहानी. यानी देश की अपनी वित्तीय स्थिति और बड़े पैमाने पर अनियमित परिसंपत्ति वर्ग (क्रिप्टोकरेंसी) के प्रति उसकी समझ. एक ऐसे निजी अमेरिकी एल्गोरिद्म द्वारा तय की जा रही है, जिसका संचालन एक निजी कंपनी करती है. भारत का कोई नियामक उसका ऑडिट नहीं कर सकता. कोई भारतीय अदालत उसे अपनी कार्यप्रणाली सार्वजनिक करने का आदेश नहीं दे सकती. संसद उसे जवाबदेह नहीं ठहरा सकती. इस डेटा को सूचना के अधिकार (FOI) के तहत भी प्राप्त नहीं किया जा सकता और न ही स्वतंत्र रूप से सत्यापित किया जा सकता है. लेकिन OECD की मुहर लगने के बाद इसे भारत के अधिकांश संपादकों ने अंतिम और निर्विवाद सत्य मान लिया.

यह पूरी व्यवस्था असहज रूप से परिचित लगती है.

2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से पहले भी क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां. जो स्वयं निजी कंपनियां थीं और जिनके व्यावसायिक हित उनके निष्कर्षों से सीधे जुड़े थे. उन्होंने ऐसे वित्तीय उत्पादों को AAA रेटिंग दे दी थी, जो वास्तव में बेहद जोखिमपूर्ण थे. उनकी कार्यप्रणाली भी निजी थी. उन्हें भी प्रतिष्ठित वित्तीय संस्थानों का समर्थन प्राप्त था. अंतर केवल इतना है कि इस बार परिसंपत्ति वर्ग नया है, कार्यप्रणाली पहले से भी अधिक अपारदर्शी है और जिस देश को उसकी अपनी अर्थव्यवस्था की कहानी सुनाई जा रही है, वह भारत है. दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था. जो इस समय इस महत्वपूर्ण बहस के बीच खड़ी है कि क्रिप्टोकरेंसी को कैसे और किस सीमा तक विनियमित किया जाए. RBI जहां इसका लगातार विरोध करता रहा है, वहीं क्रिप्टो उद्योग इसे वैधता दिलाने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास कर रहा है.

इस प्रकाशन के अनुरोध पर रिपोर्ट की समीक्षा करने वाले एक ब्लॉकचेन शोधकर्ता ने कहा, "इस पूरे मामले में संप्रभुता (Sovereignty) का पहलू लगभग पूरी तरह गायब रहा है. एक अपारदर्शी विदेशी एल्गोरिद्म ने प्रभावी रूप से भारत के सबसे अधिक उद्धृत आर्थिक आंकड़ों में से एक तैयार कर दिया. यदि यही आंकड़ा भारत के राजकोषीय घाटे, चालू खाते या महंगाई से संबंधित होता और इसे किसी निजी अमेरिकी कंपनी ने बिना स्वतंत्र ऑडिट के तैयार किया होता, तो भारी विरोध होता. लेकिन क्योंकि मामला क्रिप्टोकरेंसी का है, इसलिए लगभग सभी ने इसे बिना सवाल स्वीकार कर लिया."

वास्तव में सच क्या है

यह सच है कि भारत में क्रिप्टोकरेंसी का बाजार बड़ा और सक्रिय है. इस बात पर कोई विवाद नहीं है. लाखों भारतीय डिजिटल परिसंपत्तियों में कारोबार करते हैं. विशेषकर युवा शहरी निवेशकों के बीच डॉलर में निवेश की इच्छा और प्रवासी भारतीयों (NRI) के सीमा पार धन हस्तांतरण के कारण स्टेबलकॉइन का उपयोग लगातार बढ़ रहा है. भारत के साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) द्वारा दर्ज हवाला-से-क्रिप्टो नेटवर्क वास्तव में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए एक गंभीर चुनौती है. आयकर विभाग द्वारा क्रिप्टो ट्रेडरों को भेजे गए 44,000 नोटिस भी इस बात का संकेत हैं कि इस क्षेत्र में वास्तविक और आंशिक रूप से अघोषित कारोबार हो रहा है.

भारत की वास्तविक क्रिप्टो अर्थव्यवस्था. यानी पहली बार रुपये को डिजिटल परिसंपत्तियों में बदला गया वास्तविक निवेश और वास्तव में लगाई गई पूंजी. संभवतः 20 से 50 अरब डॉलर के बीच रही होगी. यह भी एक बड़ी राशि है. यह नियामकों के लिए एक वास्तविक चुनौती और कर प्रशासन के लिए गंभीर प्राथमिकता का विषय है. यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण कहानी है.

लेकिन यह 340 अरब डॉलर नहीं है.

और 30 अरब डॉलर तथा 340 अरब डॉलर के बीच का अंतर कोई मामूली गणना त्रुटि नहीं है. यह एक बढ़ते खुदरा निवेश बाजार और पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाली असाधारण घटना (Existential Macroeconomic Event) के बीच का अंतर है. यह एक सामान्य नीतिगत चुनौती और पहले से तय हो चुके निष्कर्ष (Fait Accompli) के बीच का अंतर है. यह "भारत को क्रिप्टोकरेंसी के नियमन पर गंभीरता से विचार करना चाहिए" और "भारत चाहे या न चाहे, वह पहले ही एक क्रिप्टो अर्थव्यवस्था बन चुका है" जैसी दो बिल्कुल अलग कहानियों के बीच का अंतर है.

340 अरब डॉलर वाली यही दूसरी कहानी ठीक उसी समय सामने आती है, जब भारत की संसद, भारतीय रिजर्व बैंक और वित्तीय नीति निर्माता यह तय कर रहे हैं कि क्रिप्टोकरेंसी के साथ आगे क्या किया जाए. यह OECD की विश्वसनीयता के साथ प्रस्तुत होती है. इसे उन क्रिप्टो एक्सचेंजों द्वारा बढ़ावा दिया जाता है, जिनका इस परिणाम में प्रत्यक्ष व्यावसायिक हित है. और इसकी पूरी नींव ऐसे आधार पर टिकी है, जो किसी भी गंभीर सवाल का सामना नहीं कर सकती.

वह सवाल जो कभी पूछा ही नहीं गया

जब से यह रिपोर्ट सार्वजनिक चर्चा में आई है, भारत के किसी बड़े वित्तीय प्रकाशन ने Chainalysis से यह नहीं पूछा कि व्यवहार में “ऑन-चेन वैल्यू रिसीव्ड” का अर्थ क्या है. किसी ने OECD से यह नहीं पूछा कि उसने Velocity Effect से बढ़े हुए लेनदेन के आंकड़े को “क्यूम्युलेटिव इन्वेस्टमेंट” कैसे बताया. किसी ने 340 अरब डॉलर की तुलना भारत के आधिकारिक पूंजी खाते (Capital Account) के आंकड़ों से नहीं की और न ही इस दावे की व्यावहारिक असंभवता पर सवाल उठाया. किसी ने यह भी नहीं पूछा कि जिस कंपनी ने यह आंकड़ा तैयार किया, क्या उसका बड़े आंकड़े दिखाने में व्यावसायिक हित जुड़ा हुआ है.

आंकड़े वैश्विक स्तर पर संयोग से नहीं फैलते. वे इसलिए फैलते हैं क्योंकि उनके इर्द-गिर्द मौजूद प्रोत्साहनों (Incentives) की संरचना उनके प्रसार को पुरस्कृत करती है और उनकी जांच को हतोत्साहित करती है. हर एक्सचेंज जिसने यह सुर्खी साझा की, हर विश्लेषक जिसने इसका हवाला दिया, हर संपादक जिसने बिना किसी चेतावनी के इसे प्रकाशित किया. उन सभी ने एक छोटा-सा निर्णय लिया. और उन छोटे निर्णयों के सामूहिक प्रभाव ने एक निजी तौर पर निर्मित आंकड़े को आर्थिक सत्य का दर्जा दिला दिया.

340 अरब डॉलर किसी भी सार्थक अर्थ में वह राशि नहीं है, जो भारत को प्राप्त हुई. यह वह राशि है, जो एक एल्गोरिद्म ने कहा कि भारत को मिली. ऐसी डिजिटल परिसंपत्ति में, जिसे मुद्रा नहीं माना जाता. ऐसी कार्यप्रणाली के आधार पर, जिसका कभी स्वतंत्र ऑडिट नहीं हुआ. ऐसी कंपनी द्वारा प्रकाशित, जो सरकारों के इसी विश्वास से लाभ कमाती है. और फिर ऐसे सूचना तंत्र द्वारा दोहराई गई, जिसने विश्वसनीय स्रोत और सत्यापित तथ्य के बीच का अंतर मिटा दिया.

यह केवल क्रिप्टोकरेंसी की कहानी नहीं है. यह इस बात की कहानी है कि आर्थिक वास्तविकता कैसे निर्मित की जाती है.

प्रकाशन से पहले Chainalysis और OECD दोनों से टिप्पणी मांगी गई थी. OECD ने कोई जवाब नहीं दिया. Chainalysis ने कहा, “संपर्क करने के लिए धन्यवाद. इस सप्ताह हमारे पास स्टाफ की कमी है और आपके प्रश्नों की समीक्षा के लिए हमें अतिरिक्त समय चाहिए.”

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


सरकार पर बढ़ा वित्तीय दबाव, दो महीनों में राजकोषीय घाटा 1.62 लाख करोड़ रुपये पहुंचा

राजस्व संग्रह में गिरावट और बढ़े सरकारी खर्च से बढ़ा घाटा. हालांकि पूंजीगत निवेश की रफ्तार बरकरार रही

Last Modified:
Wednesday, 01 July, 2026
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वित्त वर्ष 2026-27 के पहले दो महीनों में केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 12 गुना से अधिक बढ़ गया है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से रिकॉर्ड लाभांश मिलने के बावजूद कर और गैर-कर राजस्व में कमी तथा सरकारी खर्च में तेज बढ़ोतरी के कारण वित्तीय दबाव बढ़ा है. हालांकि सरकार ने बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं पर पूंजीगत व्यय की गति बनाए रखी है.

बजट अनुमान का करीब 10 प्रतिशत पहुंचा घाटा

महालेखा नियंत्रक (CGA) के मंगलवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-मई के दौरान केंद्र का राजकोषीय घाटा लगभग 1.62 लाख करोड़ रुपये रहा. यह वित्त वर्ष 2026-27 के लिए निर्धारित 19.96 लाख करोड़ रुपये के बजट अनुमान का करीब 9.6 प्रतिशत है. पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा बजट अनुमान का केवल 0.8 प्रतिशत था.

राजस्व प्राप्तियों में आई कमी

अप्रैल-मई के दौरान सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियां घटकर करीब 6.99 लाख करोड़ रुपये रह गईं, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह लगभग 7.08 लाख करोड़ रुपये थीं. कर राजस्व और गैर-कर राजस्व दोनों में करीब 1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई. कुल प्राप्तियां भी 2 प्रतिशत घटकर लगभग 7.19 लाख करोड़ रुपये रहीं, जो पूरे वर्ष के बजट अनुमान का करीब 20 प्रतिशत है.

उत्पाद शुल्क में गिरावट का असर

सरकार का उत्पाद शुल्क संग्रह अप्रैल-मई में करीब 2.12 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत कम है. इसकी प्रमुख वजह मार्च के अंत में पेट्रोल और डीजल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क में की गई कटौती रही. सरकार ने दोनों ईंधनों पर प्रति लीटर करीब 10 रुपये उत्पाद शुल्क घटाया था.

पूंजीगत खर्च में सरकार ने बनाए रखी तेजी

राजस्व में कमी के बावजूद सरकार ने पूंजीगत व्यय में कटौती नहीं की. अप्रैल-मई के दौरान पूंजीगत खर्च 13 प्रतिशत से अधिक बढ़कर लगभग 2.51 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. यह पूरे वर्ष के 12.22 लाख करोड़ रुपये के पूंजीगत व्यय लक्ष्य का करीब 21 प्रतिशत है. वहीं राजस्व व्यय भी 20 प्रतिशत बढ़कर लगभग 6.30 लाख करोड़ रुपये हो गया. इसके चलते कुल सरकारी खर्च 18 प्रतिशत बढ़कर लगभग 8.81 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया.

मई में दर्ज हुआ राजकोषीय अधिशेष

मई महीने में सरकार ने लगभग 2 लाख करोड़ रुपये का राजकोषीय अधिशेष दर्ज किया. इसकी सबसे बड़ी वजह RBI से मिला करीब 2.87 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड लाभांश रहा. इसके चलते गैर-कर राजस्व 13 प्रतिशत बढ़कर लगभग 3.27 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. RBI के अप्रत्याशित अधिशेष हस्तांतरण की बदौलत सरकार लगातार तीसरे वर्ष मई में राजकोषीय अधिशेष दर्ज करने में सफल रही.

क्या कहती है इक्रा की रिपोर्ट

इक्रा लिमिटेड की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर के अनुसार पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट सरकार की वित्तीय स्थिति के लिए राहत लेकर आई है. उनका कहना है कि वित्त वर्ष 2026-27 में सरकार का राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.3 प्रतिशत के लक्ष्य से केवल मामूली अधिक रहने की संभावना है.

 


शेयरों से मुंह मोड़ सरकारी बॉन्ड की ओर बढ़े विदेशी निवेशक, जून में ₹55,518 करोड़ का रिकॉर्ड निवेश

नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड के आंकड़ों के मुताबिक, जून में सोमवार तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने ऋण बाजार में 55,518 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया.

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Wednesday, 01 July, 2026
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भारतीय शेयर बाजार से दूरी बना रहे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का झुकाव अब सरकारी बॉन्ड की ओर बढ़ता दिख रहा है. जून में विदेशी निवेशकों ने भारतीय सरकारी ऋण बाजार में 55,518 करोड़ रुपये का निवेश किया, जबकि इसी दौरान शेयर बाजार से 49,340 करोड़ रुपये की निकासी की. विशेषज्ञों का मानना है कि आरबीआई और केंद्र सरकार की हालिया नीतिगत पहल, टैक्स राहत और भारतीय बॉन्ड की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता ने विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया है.

नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के आंकड़ों के मुताबिक, जून में सोमवार तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने ऋण बाजार में 55,518 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश किया. वहीं, 29 जून तक वे शेयर बाजार में 49,340 करोड़ रुपये के शुद्ध बिकवाल रहे.

ऋण बाजार में सबसे अधिक 30,620 करोड़ रुपये का निवेश सामान्य श्रेणी के तहत हुआ. इसके अलावा पूर्णत: सुलभ मार्ग (FAR) के जरिए 21,652 करोड़ रुपये और स्वैच्छिक रिटेंशन मार्ग (VRR) के तहत 3,246 करोड़ रुपये का निवेश आया.

आरबीआई और सरकार के कदमों से बढ़ा आकर्षण

विशेषज्ञों के अनुसार, आरबीआई द्वारा FAR के दायरे का विस्तार कर 15, 30 और 40 वर्ष की अवधि वाली नई सरकारी प्रतिभूतियों को शामिल करने और विदेशी निवेश नियमों को आसान बनाने से बॉन्ड बाजार को बड़ा समर्थन मिला है.

इसके अलावा केंद्र सरकार ने विदेशी निवेशकों को कुछ सरकारी प्रतिभूतियों से होने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर कर छूट देने का फैसला किया है. इन कदमों का उद्देश्य घरेलू बॉन्ड बाजार को मजबूत करना और विदेशी पूंजी आकर्षित करना है.

भारतीय बॉन्ड बने ज्यादा आकर्षक

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू बॉन्ड यील्ड में गिरावट, कच्चे तेल की अपेक्षाकृत कम कीमतें, स्थिर आर्थिक माहौल और भारतीय बॉन्ड के वैश्विक सूचकांकों में शामिल होने की संभावनाओं ने भी विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है.

सिटी के भारतीय बाजार प्रमुख आदित्य बागरी के अनुसार, विदहोल्डिंग टैक्स हटने के बाद भारतीय सरकारी बॉन्ड विदेशी निवेशकों के लिए और आकर्षक हो गए हैं. उनका मानना है कि बेहतर व्यापक आर्थिक स्थिति और आरबीआई के हालिया कदमों के कारण आने वाले समय में भी बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेश का रुझान मजबूत बना रह सकता है.

शेयर बाजार से जारी रही निकासी

सरकारी बॉन्ड में रिकॉर्ड निवेश के बावजूद विदेशी निवेशकों ने शेयर बाजार में बिकवाली जारी रखी. वैश्विक स्तर पर जोखिम से बचने की प्रवृत्ति और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के कारण उभरते बाजारों में निवेश प्रभावित हुआ है.

साल 2026 में अब तक एफपीआई भारतीय शेयर बाजार से कुल 2.74 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं. इसके विपरीत, इसी अवधि में उन्होंने भारतीय ऋण बाजार में 63,784 करोड़ रुपये का निवेश किया है. बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया सुधारों के बाद भारत के ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होने की संभावना और मजबूत हुई है, जिससे आने वाले समय में विदेशी निवेश में और तेजी देखने को मिल सकती है.
 


पश्चिम एशिया में शांति से घटी आर्थिक चिंताएं, लेकिन कच्चे तेल और AI शेयरों पर बरकरार जोखिम: RBI

RBI की छमाही वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (Financial Stability Report) के अनुसार, पश्चिम एशिया में अंतरिम शांति समझौते के बाद भू-राजनीतिक तनाव से जुड़े जोखिमों में कमी आई है.

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Wednesday, 01 July, 2026
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पश्चिम एशिया में अंतरिम शांति समझौते के बाद भारत के लिए वैश्विक आर्थिक जोखिम कुछ कम हुए हैं, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने चेताया है कि कच्चे तेल की कीमतों में संभावित उछाल, आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं और AI शेयरों के ऊंचे वैल्यूएशन आगे चलकर वित्तीय बाजारों में अस्थिरता पैदा कर सकते हैं. हालांकि, मजबूत आर्थिक बुनियाद और हालिया नीतिगत कदमों के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था इन चुनौतियों से निपटने की बेहतर स्थिति में है.

पश्चिम एशिया में शांति से जोखिम का संतुलन भारत के पक्ष में

RBI की छमाही वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (Financial Stability Report) के अनुसार, पश्चिम एशिया में अंतरिम शांति समझौते के बाद भू-राजनीतिक तनाव से जुड़े जोखिमों में कमी आई है. इसके बावजूद केंद्रीय बैंक ने कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय प्रणाली अभी भी वैश्विक घटनाक्रमों के प्रति संवेदनशील बनी हुई है.

कच्चे तेल और AI शेयरों से बढ़ सकती है चिंता

रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि आपूर्ति श्रृंखला सामान्य होने में देरी होती है और कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो रुपये की विनिमय दर में अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. इसके अलावा, वैश्विक शेयर बाजारों में संभावित गिरावट, कॉरपोरेट आय के नए आकलन और AI कंपनियों के ऊंचे वैल्यूएशन भी बाजारों पर दबाव बना सकते हैं.

मजबूत आर्थिक बुनियाद बनी बड़ी ताकत

RBI के अनुसार, कम मुद्रास्फीति, मजबूत आर्थिक वृद्धि और पर्याप्त वित्तीय बफर भारत को बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता प्रदान करते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत में प्रणालीगत वित्तीय संकट की संभावना काफी कम है.

विदेशी निवेश बढ़ाने के कदमों का मिलेगा फायदा

रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकार और RBI के हालिया नीतिगत उपायों से जोखिम का संतुलन भारत के पक्ष में हुआ है. सरकार ने विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) के लिए सरकारी प्रतिभूतियों पर आय और पूंजीगत लाभ कर समाप्त करने का फैसला किया है, जबकि RBI ने विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए रियायती स्वैप विंडो शुरू की है. इन कदमों से 55 से 60 अरब डॉलर तक विदेशी पूंजी आने की उम्मीद है.

RBI गवर्नर बोले- सतर्कता रहेगी जारी

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और बाहरी जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं. ऐसे माहौल में वित्तीय स्थिरता बनाए रखना और बैंकिंग प्रणाली को अधिक लचीला बनाना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है.

उन्होंने कहा कि RBI अर्थव्यवस्था और वित्तीय प्रणाली को संभावित झटकों से सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षा उपायों को लगातार मजबूत करता रहेगा. साथ ही, केंद्रीय बैंक ऐसी वित्तीय व्यवस्था विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है जो मजबूत, समावेशी, कुशल और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरा कर सके.


बाजार की कमजोर शुरुआत के संकेत, GIFT Nifty फिसला, आज इन शेयरों में दिख सकती है हलचल

मंगलवार को कारोबार के अंत में सेंसेक्स 249.70 अंक गिरकर 76,478.67 अंक पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 50, 80.50 अंक की गिरावट के साथ 23,865.75 अंक पर बंद हुआ.

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Wednesday, 01 July, 2026
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घरेलू शेयर बाजार लगातार दो कारोबारी सत्रों से दबाव में है. मंगलवार को सेंसेक्स करीब 250 अंक टूटकर बंद हुआ और निफ्टी में भी गिरावट दर्ज की गई. अब बुधवार को भी बाजार की शुरुआत कमजोर रहने के संकेत मिल रहे हैं. GIFT Nifty गिरावट के साथ कारोबार कर रहा है, जबकि एशियाई बाजारों में मिला-जुला रुख है. अमेरिका-ईरान तनाव, वैश्विक बाजारों के संकेत और कई बड़ी कंपनियों के कॉर्पोरेट अपडेट्स के चलते आज बाजार में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है.

मंगलवार को कारोबार के अंत में बीएसई सेंसेक्स 249.70 अंक यानी 0.33 प्रतिशत गिरकर 76,478.67 अंक पर बंद हुआ. वहीं, एनएसई निफ्टी 50, 80.50 अंक यानी 0.34 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23,865.75 अंक पर बंद हुआ. अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और बातचीत को लेकर अनिश्चितता के बीच निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया, जिससे बाजार सीमित दायरे में कारोबार करता रहा.

आईटी शेयरों ने बढ़ाया दबाव

सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 17 गिरावट के साथ बंद हुए. आईटी सेक्टर सबसे ज्यादा दबाव में रहा. इन्फोसिस और टीसीएस के शेयर 3 प्रतिशत से अधिक टूट गए, जबकि एचसीएल टेक और टेक महिंद्रा में भी 2 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई. इसके अलावा हिंदुस्तान यूनिलीवर, आईटीसी, एशियन पेंट्स और एसबीआई के शेयरों में भी कमजोरी रही.

इन शेयरों ने संभाला बाजार

गिरावट के बीच मारुति सुजुकी, टाइटन, बजाज फाइनेंस, इटरनल और अडानी पोर्ट्स के शेयर बढ़त के साथ बंद हुए. वहीं, ब्रॉडर मार्केट में मजबूती देखने को मिली. निफ्टी मिडकैप इंडेक्स 0.37 प्रतिशत और निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 1.02 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुए.

आज की शुरुआत कैसी रह सकती है

बुधवार सुबह GIFT Nifty 39 अंक की गिरावट के साथ 23,978 के स्तर पर कारोबार करता दिखा, जिससे भारतीय शेयर बाजार की कमजोर शुरुआत के संकेत मिले हैं. एशियाई बाजारों में भी मिला-जुला रुख रहा. जापान का निक्केई बढ़त में रहा, जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी दबाव में कारोबार करता दिखा. निवेशकों की नजर अमेरिका-ईरान तनाव, जापानी येन की कमजोरी और इस सप्ताह आने वाले अमेरिकी रोजगार आंकड़ों पर भी रहेगी. वहीं, मंगलवार को अमेरिकी बाजार बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और सोना-चांदी में गिरावट देखने को मिली.

आज इन शेयरों पर रहेगी नजर

आज के कारोबार में NTPC Green Energy, Kotak Mahindra Bank, RailTel, Axis Bank, Power Finance Corporation (PFC), Tata Communications, Hexaware Technologies, Indo Tech Transformers और Krishna Defence के शेयर निवेशकों के रडार पर रह सकते हैं. NTPC Green Energy की सहायक कंपनी को मध्य प्रदेश में 193 मेगावाट का पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट मिला है. Kotak Mahindra Bank ने भारत में Deutsche Bank के रिटेल बैंकिंग और वेल्थ मैनेजमेंट कारोबार के अधिग्रहण का अंतिम समझौता किया है. RailTel को 107.60 करोड़ रुपये का नया ऑर्डर मिला है, जबकि Axis Bank ने 800 मिलियन डॉलर के बॉन्ड जारी किए हैं. इसके अलावा PFC, Tata Communications, Hexaware Technologies, Indo Tech Transformers और Krishna Defence से जुड़े कॉर्पोरेट अपडेट्स के चलते इन शेयरों में भी कारोबार के दौरान हलचल देखने को मिल सकती है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
 


उबर ने सुरक्षा को लेकर बड़ा कदम उठाया, ‘रिकॉर्ड माई राइड’ और एम्बुलेंस सहायता फीचर लॉन्च

राइड-हेलिंग सुरक्षा के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने वाले ये उद्योग में पहली बार पेश किए गए फीचर हैं. कंपनी ने पूरे राइड-हेलिंग उद्योग में सुरक्षा मानकों को और बेहतर बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया.

Last Modified:
Tuesday, 30 June, 2026
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यात्रियों और ड्राइवरों की सुरक्षा को और मजबूत बनाने के उद्देश्य से उबर सुरक्षा कार्यक्रम में मंगलवार को कई नए और उद्योग में पहली बार पेश किए गए सुरक्षा फीचर्स लॉन्च करने की घोषणा की है. कंपनी ने ‘रिकॉर्ड माई राइड’ फीचर पेश किया है, जिसके माध्यम से ड्राइवर यात्रा के दौरान अपने मोबाइल फोन का उपयोग करके उबर ऐप के भीतर सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड इन-कैब वीडियो रिकॉर्ड कर सकेंगे.

मेडिकल लॉजिस्टिक्स सेवा

इसके अलावा, आपातकालीन सहायता को मजबूत करने के लिए उबर ने मेडिकल लॉजिस्टिक्स सेवा प्रदाता डायल 4242 के साथ साझेदारी की है, जिसके तहत प्लेटफॉर्म पर सीधे एम्बुलेंस सहायता सुविधा को जोड़ा गया है. ये नई पहल हाल के वर्षों में उबर द्वारा सुरक्षा के क्षेत्र में किए गए नवाचारों को आगे बढ़ाती हैं.

कंपनी पहले ही ऑडियो रिकॉर्डिंग, महिला राइडर वरीयता, हेलमेट सेल्फी सत्यापन और सीटबेल्ट रिमाइंडर जैसे उद्योग में पहली बार पेश किए गए फीचर्स उपलब्ध करा चुकी है. इसके अलावा, तकनीक और मानवीय हस्तक्षेप पर आधारित कई अन्य उपाय भी हर यात्रा को अधिक सुरक्षित और जवाबदेह बनाने के लिए लागू किए गए हैं.

सुरक्षित परिवहन को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों में निवेश

तकनीकी नवाचारों के अलावा, उबर सुरक्षित परिवहन को बढ़ावा देने वाली साझेदारियों और कार्यक्रमों में भी निवेश कर रही है. कंपनी सड़क सुरक्षा अभियान के तहत सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की साझेदार रही है और अपने प्लेटफॉर्म के माध्यम से गति से अधिक सुरक्षा को प्राथमिकता देने के प्रति जागरूकता फैलाने का काम कर रही है.

साथ ही, कंपनी ड्राइवरों की सुरक्षा को मजबूत करने और परिवारों के लिए विशेष सेवाएं विकसित करने की दिशा में भी कार्य कर रही है. इसके अंतर्गत उबर फॉर टीन्स और उबर फॉर सीनियर्स जैसे उत्पाद शामिल हैं.

उबर इंडिया एवं दक्षिण एशिया में सुरक्षा संचालन प्रमुख सूरज नायर ने कहा, “जो चीज आज नवाचार लगती है, वह कल एक सामान्य अपेक्षा बन जाती है. सुरक्षा का विकास भी इसी तरह होना चाहिए. हमारा मानना है कि सुरक्षा संबंधी नवाचार उद्योग का बुनियादी मानक बनने चाहिए, न कि केवल प्रतिस्पर्धात्मक अंतर. हमारे उद्योग में पहली बार पेश किए गए सुरक्षा फीचर और साझेदारियां सुरक्षा मानकों को लगातार बेहतर बनाने की हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं. जैसे-जैसे अपेक्षाएं बढ़ेंगी, हमें उम्मीद है कि पूरा उद्योग भी उन पर खरा उतरेगा.”

नए फीचर्स

1. रिकॉर्ड माई राइड

ड्राइवर यदि यात्रा के दौरान असुरक्षित महसूस करते हैं तो वे अपने मोबाइल फोन की मदद से उबर ऐप के भीतर सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड वीडियो रिकॉर्ड कर सकेंगे. यह रिकॉर्डिंग लागू कानूनों के अनुरूप होगी और पूरी तरह एन्क्रिप्टेड रहेगी. न तो ड्राइवर और न ही उबर इन रिकॉर्डिंग्स तक पहुंच सकेगा. केवल तब ही इनका उपयोग किया जाएगा जब ड्राइवर किसी सुरक्षा रिपोर्ट के साथ इन्हें साझा करने का निर्णय लेगा.

2. एम्बुलेंस सहायता

डायल 4242 के साथ साझेदारी में उबर ने एम्बुलेंस सहायता सुविधा शुरू की है, जिससे प्लेटफॉर्म पर यात्रा के दौरान दुर्घटना होने की स्थिति में यात्री और ड्राइवर तुरंत चिकित्सीय सहायता प्राप्त कर सकेंगे. यह सुविधा उबर की मौजूदा 24x7 सेफ्टी लाइन के माध्यम से उपलब्ध होगी.

3. डोंट टाइप एंड ड्राइव*

ड्राइविंग के दौरान ध्यान भटकने की समस्या को कम करने के लिए उबर ड्राइवर ऐप में वाहन के चलते समय मैन्युअल टाइपिंग की सुविधा सीमित कर दी जाएगी. ड्राइवरों को संदेशों का जवाब देने से पहले सुरक्षित स्थान पर वाहन रोकने के लिए प्रेरित किया जाएगा.

4. सेट योर ओन पिन

यात्री अब अपनी यात्रा सत्यापन प्रक्रिया के लिए स्वयं अपना विशिष्ट पिन सेट, प्रबंधित और अनिवार्य कर सकेंगे. इससे यात्रा की पुष्टि प्रक्रिया पर उनका पूर्ण नियंत्रण रहेगा. इन नए फीचर्स के अलावा उबर पहले से ही राइडचेक, 24x7 सेफ्टी लाइन, सेफ्टी प्रेफरेंसेस, फोन और पता गोपनीयता जैसी सुविधाएं उपलब्ध करा रहा है, जो यात्रा से पहले, यात्रा के दौरान और यात्रा के बाद यात्रियों एवं ड्राइवरों की सुरक्षा में मदद करती हैं. इनमें से कई सुविधाएं सबसे पहले उबर द्वारा शुरू की गई थीं और अब वे राइड-हेलिंग सेवाओं से यात्रियों की सामान्य अपेक्षाओं का हिस्सा बन चुकी हैं. ये पहल तकनीक और विशेषज्ञों के सहयोग के माध्यम से बेहतर सुरक्षा प्रदान करने के प्रति उबर की प्रतिबद्धता को और मजबूत करती हैं.

 

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सड़क हादसों से GDP को 3% की चोट, गडकरी ने सामूहिक प्रयासों पर दिया जोर

गडकरी ने बताया कि बेहतर और सुरक्षित ड्राइविंग को बढ़ावा देने के लिए देश में 2,500 ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल स्थापित किए जा रहे हैं.

रितु राणा by
Published - Tuesday, 30 June, 2026
Last Modified:
Tuesday, 30 June, 2026
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केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने उबर के सुरक्षा कार्यक्रम में कहा कि सड़क दुर्घटनाएं भारत और दुनिया के लिए एक गंभीर समस्या हैं. उन्होंने कहा कि सड़क हादसों के कारण देश को हर साल जीडीपी का करीब 3 प्रतिशत नुकसान उठाना पड़ता है. गडकरी ने कहा कि आतंकवाद, युद्ध और अन्य आपदाओं की तुलना में सड़क दुर्घटनाओं में सबसे अधिक लोगों की जान जाती है.

अपने संबोधन के दौरान गडकरी ने एक पुरानी घटना का जिक्र करते हुए बताया कि वर्ष 1999 में महाराष्ट्र में उनका भी एक गंभीर सड़क हादसा हुआ था. उन्होंने कहा कि ट्रक के नीचे लगी सुरक्षा संरचना की वजह से उनकी और उनके परिवार की जान बच सकी. इस घटना के बाद उन्होंने सड़क सुरक्षा को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल कर लिया.

ब्लैक स्पॉट सुधारने पर 50 हजार करोड़ रुपये खर्च

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सरकार ने देशभर में दुर्घटना संभावित ब्लैक स्पॉट की पहचान की है. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों में भूस्खलन वाले क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. इन स्थानों को सुरक्षित बनाने के लिए करीब 50 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं.

अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार हो रहा सड़क निर्माण

गडकरी ने कहा कि नई सड़कों और हाईवे के निर्माण में अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपनाया जा रहा है. बेहतर साइनेज, मार्किंग सिस्टम, अंडरपास और अन्य सुरक्षा सुविधाओं को शामिल किया जा रहा है ताकि सड़क दुर्घटनाओं को कम किया जा सके.

कैब कंपनियों से मांगा सहयोग

उन्होंने कहा कि देश में कैब सेवाओं का क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है और उबर की इसमें बड़ी हिस्सेदारी है. ऐसे में कैब कंपनियों की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है. उन्होंने उबर और अन्य प्लेटफॉर्म से सड़क सुरक्षा अभियान में सक्रिय सहयोग देने की अपील की.

वाहन सुरक्षा और हेलमेट नियमों को किया सख्त

गडकरी ने बताया कि सरकार ने ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग और वाहन सुरक्षा मानकों में कई सुधार किए हैं. दोपहिया वाहन चालकों के लिए हेलमेट पहनना अनिवार्य किया गया है. साथ ही वाहन कंपनियों को निर्देश दिया गया है कि वे बाइक बेचते समय हेलमेट भी उपलब्ध कराएं, ताकि लोगों की जान बचाई जा सके.

दुर्घटना पीड़ितों की मदद करने वालों को मिलेगा पुरस्कार

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सड़क हादसे में घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने वाले लोगों को पुलिस या प्रशासन की ओर से किसी तरह की परेशानी नहीं होगी. सरकार ऐसे 'गुड सेमेरिटन' लोगों को 25 हजार रुपये का पुरस्कार भी देती है.

दुर्घटना पीड़ितों के इलाज का खर्च उठाएगी सरकार

उन्होंने कहा कि देश की किसी भी सड़क पर दुर्घटना होने के बाद घायल व्यक्ति को किसी भी अस्पताल में भर्ती कराया जा सकता है. सरकार सात दिनों तक इलाज के लिए अधिकतम एक लाख रुपये तक का खर्च वहन कर रही है. इस योजना का लाभ हजारों लोगों को मिल चुका है.

देशभर में खुलेंगे 2,500 ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल

गडकरी ने बताया कि बेहतर और सुरक्षित ड्राइविंग को बढ़ावा देने के लिए देश में 2,500 ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल स्थापित किए जा रहे हैं. इसके अलावा परिवहन विभाग की 16 सेवाओं को ऑनलाइन कर दिया गया है, जिससे लोगों को सुविधा मिलेगी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा.

हिट एंड रन मामलों में बढ़ाया गया मुआवजा

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हिट एंड रन मामलों में मुआवजा राशि बढ़ा दी गई है. अब ऐसे मामलों में मृत्यु होने पर पीड़ित परिवार को दो लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता दी जाती है, जिससे परिवार को तत्काल राहत मिल सके.

अपने संबोधन के अंत में नितिन गडकरी ने कहा कि सड़क सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है. इसमें कैब कंपनियों, परिवहन क्षेत्र से जुड़े हितधारकों और आम नागरिकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है. उन्होंने सभी से मिलकर सड़क दुर्घटनाओं को कम करने और सुरक्षित परिवहन व्यवस्था बनाने की अपील की.
 

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Zee को मिला Invesco का साथ, सरकार ने मंजूर किया ₹418 करोड़ का FDI

सरकार से 418 करोड़ रुपये के FDI को मंजूरी मिलने के बाद Invesco की करीब तीन साल बाद Zee Entertainment में वापसी हो गई है.

Last Modified:
Tuesday, 30 June, 2026
BWHindia

करीब तीन साल बाद वैश्विक निवेश प्रबंधन कंपनी Invesco ने एक बार फिर Zee Entertainment में वापसी की है. भारत सरकार ने OFI Global China Fund LLC के जरिए किए गए 418 करोड़ रुपये के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को मंजूरी दे दी है. ऐसे समय में यह निवेश आया है, जब कंपनी अपने विस्तार और दीर्घकालिक विकास योजनाओं को गति देने के लिए 2,300 करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी कर रही है.

तीन साल बाद हुई वापसी

Zee Entertainment Enterprises Limited में OFI Global China Fund LLC के जरिए 418 करोड़ रुपये के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को केंद्र सरकार से मंजूरी मिल गई है. उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के अनुसार यह निवेश वित्त वर्ष 2025-26 की जनवरी-मार्च तिमाही के दौरान शेयर खरीद के माध्यम से किया गया. यह प्रस्ताव उस अवधि में सरकार द्वारा स्वीकृत 1,141 विदेशी निवेश प्रस्तावों में शामिल था.

2,300 करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी

यह निवेश ऐसे समय में हुआ है, जब Zee Entertainment अपनी दीर्घकालिक विकास रणनीति को आगे बढ़ाने के लिए कम से कम 2,300 करोड़ रुपये जुटाने की योजना पर काम कर रही है. कंपनी इक्विटी आधारित वित्तीय साधनों के जरिए पूंजी जुटाएगी. इस राशि का उपयोग डिजिटल कारोबार, स्पोर्ट्स बिजनेस और अन्य प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्रों में निवेश के साथ-साथ कंपनी की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में किया जाएगा.

2023 में बेची थी पूरी हिस्सेदारी

गौरतलब है कि Invesco ने अप्रैल 2023 में Zee Entertainment में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेच दी थी. उस समय OFI Global China Fund LLC ने करीब 5.11 प्रतिशत हिस्सेदारी ब्लॉक डील के जरिए बेची थी. लगभग 4.91 करोड़ शेयर 204.50 रुपये प्रति शेयर के भाव पर बेचे गए थे और इस सौदे का कुल मूल्य करीब 1,004 करोड़ रुपये था. इसी के साथ कंपनी और निवेशक के बीच कॉरपोरेट गवर्नेंस को लेकर लंबे समय से चल रहा विवाद भी समाप्त हो गया था.

बढ़ा विदेशी निवेशकों का भरोसा

सरकार से 418 करोड़ रुपये के FDI को मंजूरी मिलने के बाद Invesco की करीब तीन साल बाद Zee Entertainment में वापसी हो गई है. इसे कंपनी की विकास योजनाओं और भविष्य की संभावनाओं में विदेशी निवेशकों के बढ़ते भरोसे के रूप में देखा जा रहा है.


भारत की चेतना पर युद्ध

यह कोई आर्थिक हमला नहीं है. यह राजनीतिक हमला भी नहीं है. बल्कि यह एक सतत, बहु-मोर्चीय अभियान है जिसका उद्देश्य एक राष्ट्र का स्वयं पर से विश्वास खत्म करना है और इसका समय भी संयोग नहीं है.

Last Modified:
Tuesday, 30 June, 2026
BWHindia

पलक शाह 

"जनभावना ही सब कुछ है. जनभावना के साथ कोई भी चीज असफल नहीं हो सकती और उसके बिना कोई भी चीज सफल नहीं हो सकती."

— अब्राहम लिंकन, 1858

सेनाएं क्षेत्र पर कब्जा कर सकती हैं. चुनाव सरकारें बदल सकते हैं. लेकिन विजय का सबसे टिकाऊ रूप वह होता है जो न तो क्षेत्र पर कब्जा करता है और न ही सरकार पर. वह जनमानस पर कब्जा करता है. यही सबसे पुराना राजनीतिक हथियार है.

भूराजनीति और सूचना युद्ध का यह स्थापित सिद्धांत इंटरनेट, टेलीविजन और संभवतः प्रिंटिंग प्रेस से भी पहले का है. यदि आप किसी सरकार को चुनाव के माध्यम से पराजित नहीं कर सकते, तो आप उसे माहौल के माध्यम से पराजित करते हैं. आप वातावरण को भारी बना देते हैं. भविष्य को अंधकारमय महसूस कराते हैं. वर्तमान को ऐसी स्थिति में दिखाते हैं मानो देश किसी खाई के किनारे खड़ा हो. और फिर जब वास्तविक आर्थिक मंदी आती है, जैसा कि हर अर्थव्यवस्था में कभी न कभी होता है, तब आप उस चिंगारी को प्रज्वलित करते हैं जिसे आपने वर्षों तक धैर्यपूर्वक तैयार किया होता है.

साल 2026 का भारत ठीक इसी रणनीति का अनुभव कर रहा है. और जिस परिष्कृत तरीके से इसे अंजाम दिया जा रहा है, वह गंभीर और निष्पक्ष विश्लेषण की मांग करता है.

विनाश की भविष्यवाणी करने वाला समूह

किसी भी नैरेटिव युद्ध का पहला चरण होता है  शोर, आपको निराशा का ऐसा आधार तैयार करना होता है कि जब वास्तविक आर्थिक दबाव सामने आए, तो वह संयोग नहीं बल्कि पुष्टि जैसा लगे.

राहुल गांधी लगातार इसी वाद्ययंत्र को बजाते रहे हैं. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, "भारतीय अर्थव्यवस्था मर चुकी है. मोदी ने इसे मार दिया." उन्होंने कहा, "भारत अपने इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक संकट का सामना कर रहा है और आपदा की ओर बढ़ रहा है." एक अन्य बयान में कहा गया, "मोदी द्वारा निर्मित आपदाओं के नीचे भारत दबा हुआ है."

यह भाषा केवल आलोचनात्मक नहीं है, बल्कि सर्वनाश की चेतावनी देने वाली है, जिसे अधिकतम प्रभाव और न्यूनतम जटिलता के लिए तैयार किया गया है. प्रत्येक बयान विश्लेषण के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी हेडलाइन के रूप में सामने आता है जिसे वायरल होने के लिए तैयार किया गया हो.

अब यहां यह समझना महत्वपूर्ण है कि शोर और वास्तविक संकेतों में अंतर कैसे किया जाए.

वास्तविक आर्थिक तस्वीर यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ वास्तविक चुनौतियां हैं. खुदरा महंगाई दर 3.48 प्रतिशत है, जो भारतीय रिजर्व बैंक के संतोषजनक दायरे में है. वित्त वर्ष 2026 में सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 94.5 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. विनिर्माण क्षेत्र का पीएमआई 56.6 और सेवा क्षेत्र का पीएमआई 58.9 है, जो स्वस्थ विस्तार का संकेत देते हैं. मई 2026 में ई-वे बिल जनरेशन में 12.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.

ये आंकड़े काल्पनिक नहीं हैं. ये सरकारी आंकड़े हैं, जिनकी पुष्टि की जा सकती है.

लेकिन यहां वह बारीकी है जिसे विपक्ष दबाता है. एक वास्तविक और संरचनात्मक आर्थिक मंदी वास्तव में आ रही है, और इसकी उत्पत्ति का नई दिल्ली में कौन बैठा है, उससे कोई संबंध नहीं है.

वह एआई तूफान जिसे भारत ने आते नहीं देखा

भारत की वर्तमान आर्थिक कमजोरी को समझने के लिए यह समझना आवश्यक है कि पिछले तीन दशकों में भारत के मध्यम वर्ग की समृद्धि का निर्माण किसने किया. वह था आईटी सेवा उद्योग.

टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल केवल कंपनियां नहीं थीं. वे एक सामाजिक सीढ़ी थीं, जिन्होंने छोटे शहरों से लाखों लोगों को उठाकर आरामदायक शहरी जीवन तक पहुंचाया. उन्होंने विदेशी मुद्रा अर्जित की, रुपये को सहारा दिया, पुणे से लेकर हैदराबाद तक रियल एस्टेट बाजारों को गति दी और उपभोग के पूरे तंत्र को जन्म दिया.

अब यह मॉडल अस्तित्वगत दबाव में है. इसका कारण कोई सरकारी नीति नहीं है, बल्कि वह तकनीकी क्रांति है जो भारत से लगभग 10,000 किलोमीटर दूर घटित हो रही है.

वैश्विक ग्राहक, जो पहले भारतीय आईटी कंपनियों को काम सौंपते थे, अब वही काम एआई प्लेटफॉर्म की ओर भेज रहे हैं. मानव-घंटे पर आधारित वह मॉडल, जिसे भारत ने 30 वर्षों में विकसित किया, अब स्वचालन के कारण समाप्त होने की ओर बढ़ रहा है.

आंकड़े एक गंभीर तस्वीर प्रस्तुत करते हैं. टीसीएस ने अपने इतिहास की सबसे बड़ी छंटनी की घोषणा करते हुए 12,000 पद समाप्त किए. भारत की शीर्ष पांच आईटी कंपनियों ने मिलकर वित्त वर्ष 2026 में 7,000 कर्मचारियों की संख्या कम की. उद्योग के अनुमान बताते हैं कि वर्ष 2031 तक आईटी से जुड़े करीब 27 लाख रोजगार प्रभावित हो सकते हैं.

भारत के प्रमुख शहरों में वर्ष 2026 की पहली तिमाही में घरों की बिक्री में 13 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और विश्लेषकों ने इसका सीधा संबंध आईटी क्षेत्र में आय की असुरक्षा से जोड़ा है.

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक, जो कभी भारतीय आईटी कंपनियों में भारी निवेश करते थे, अब अपनी हिस्सेदारी बेच रहे हैं. जब एक्सेंचर की आय संबंधी चेतावनी ने आईटी सेवाओं पर एआई के प्रभाव की गहराई को उजागर किया, तब एक ही कारोबारी सत्र में इंफोसिस का शेयर 8 प्रतिशत और टीसीएस का शेयर 6 प्रतिशत गिर गया.

और यहीं पर नैरेटिव की मशीन सक्रिय होती है.

वैश्विक एआई बदलाव के कारण किसी एक क्षेत्र में विदेशी निवेशकों की बिकवाली को "वैश्विक ग्राहक एआई प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रहे हैं" के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता. इसे इस रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि "वैश्विक निवेशकों का भारत पर से भरोसा उठ रहा है."

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मीडिया में जो शीर्षक दिखाई देता है और फिर घरेलू राजनीति में वापस लौटता है, वह कभी जटिल नहीं होता. वह हमेशा सरल होता है.

और वह सरल संदेश यही कहता है, भारत में कुछ गलत हो रहा है.

कमरे में तिलचट्टा, जेन जेड विद्रोह का निर्माण

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने 16 मई 2026 को अपना पदार्पण किया. यह अभिजीत दिपके की रचना थी, जो बोस्टन विश्वविद्यालय की पृष्ठभूमि वाले एक राजनीतिक संचार रणनीतिकार हैं और भारत के डिजिटल रूप से संचालित विरोध प्रदर्शनों के पारिस्थितिकी तंत्र से पूर्व राजनीतिक संबंध रख चुके हैं. सबसे बढ़कर, वह एक दलित चेहरा हैं.

6 जून को जंतर-मंतर पर आयोजित एक प्रदर्शन को आकर्षक सोशल मीडिया पैकेजिंग, एक नकली घोषणापत्र और "आलसी और बेरोजगारों की आवाज़" जैसी ब्रांडिंग के साथ प्रस्तुत किया गया, जिसे ट्रेंड कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया था.

महत्वपूर्ण रूप से, सीजेपी को तत्काल अखिलेश यादव, महुआ मोइत्रा और कीर्ति आजाद जैसे स्थापित विपक्षी नेताओं का समर्थन मिला. ये ऐसे राजनेता हैं जो भलीभांति समझते हैं कि जेन जेड की इस सौंदर्यात्मक राजनीति की उपयोगिता क्या है.

इस आंदोलन को स्वाभाविक और स्वतःस्फूर्त युवा आक्रोश के रूप में प्रस्तुत किया गया. लेकिन यह न तो स्वाभाविक था और न ही स्वतःस्फूर्त. इतनी सटीक संचार संरचना केवल निराशा से उत्पन्न नहीं होती. यह उन लोगों द्वारा बनाई जाती है जो राजनीतिक संदेशों को समझते हैं और पहले भी ऐसा कर चुके हैं. साथ ही, इसके लिए वित्तीय और रणनीतिक समर्थन की भी आवश्यकता होती है.

दिपके स्वयं सावधानीपूर्वक सीजेपी की तुलना नेपाल और बांग्लादेश से करने से बचते रहे. इसका कारण भी महत्वपूर्ण है. क्योंकि जो कार्यप्रणाली अपनाई गई है, वह काफी हद तक वही है जो बांग्लादेश और नेपाल में देखने को मिली थी, और उस तुलना को खुलकर स्वीकार करना पूरी संरचना को उजागर कर सकता था.

जुलाई 2024 में बांग्लादेश में जेन जेड की "क्रांति" ने शेख हसीना की सरकार को गिरा दिया. यह एक स्वतःस्फूर्त छात्र आंदोलन के रूप में दिखाई दिया, जो नौकरी में आरक्षण के विरोध से शुरू हुआ था.

सितंबर 2025 में नेपाल में जेन जेड के विरोध प्रदर्शनों ने, जो केवल पांच दिनों तक चले लेकिन जिनमें 76 लोगों की मौत हुई, केपी शर्मा ओली की सरकार को गिरा दिया.

दोनों मामलों में पैटर्न एक जैसा था. वास्तविक शिकायतें, सोशल मीडिया के माध्यम से विस्तार, आकर्षक और "गैर-राजनीतिक" ब्रांडिंग, तथा पृष्ठभूमि में राजनीतिक लाभार्थियों की मौजूदगी.

बांग्लादेश में लाभार्थियों के ऐसे नेटवर्कों से गहरे संबंध थे जो भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण माने जाते हैं. नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता ने ऐसी स्थिति पैदा की जिसका लाभ चीन ने शांत तरीके से उठाया.

यह पैटर्न कोई संयोग नहीं है. यह एक तरीका और एक संरचना है.

भारत में इस मॉडल को दोहराने का प्रयास संभवतः उसी स्तर तक नहीं पहुंच पाएगा. भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं अधिक मजबूत हैं, इसकी संघीय संरचना अधिक व्यापक है और इसकी सुरक्षा व्यवस्था अधिक परिष्कृत है.

लेकिन किसी आंदोलन को प्रभावी होने के लिए सरकार गिराने की आवश्यकता नहीं होती. उसे केवल आर्थिक मंदी के समय निराशा के माहौल को बढ़ाना होता है.

जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शनों के दृश्य, यदि संदर्भ से अलग कर दिए जाएं, तो वे अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों की सामग्री बन जाते हैं. यह सामग्री "भारत संकट में है" वाले नैरेटिव को मजबूत करती है. वही नैरेटिव विदेशी निवेशकों की धारणा को प्रभावित करता है और फिर विपक्ष के आर्थिक संदेशों को बल देता है.

यह एक ऐसा चक्र है जो स्वयं को लगातार मजबूत करता रहता है.

द्वीप की बाजी, पर्यावरण को भू-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना

यहीं पर नैरेटिव का यह युद्ध वास्तव में खतरनाक क्षेत्र में प्रवेश करता है.

भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना इस पीढ़ी में देश द्वारा किए गए सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक निवेशों में से एक है.

यह परियोजना मलक्का जलडमरूमध्य से लगभग 40 समुद्री मील की दूरी पर स्थित है. इसी मार्ग से चीन के 80 प्रतिशत से अधिक तेल आयात गुजरते हैं. यदि ग्रेट निकोबार में भारत का सैन्य और लॉजिस्टिक केंद्र पूरी तरह विकसित हो जाता है, तो भविष्य में बीजिंग के साथ किसी भी टकराव की स्थिति में भारत के हाथ में एक असाधारण रणनीतिक कार्ड होगा.

यह ऐसा रणनीतिक अवरोध बिंदु है जो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बदल सकता है. ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य की भूमिका ने यह दिखाया भी था.

चीन इस बात को अच्छी तरह समझता है. बीजिंग भारत की द्वीप-श्रृंखला रणनीति को ध्यान से देख रहा है.

पूर्व में वाईएएनआई श्रृंखला (यांगून–अंडमान–निकोबार–सबांग) और पश्चिम में एलएमडी श्रृंखला (लक्षद्वीप–मालदीव–डिएगो गार्सिया) को चीन काफी रणनीतिक चिंता के साथ देखता है.

चीन की 80 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा सुरक्षा उन समुद्री मार्गों पर निर्भर करती है, जिन पर भारत अब प्रभाव स्थापित करने की स्थिति में पहुंच रहा है.

इसके बाद अप्रैल 2026 में राहुल गांधी ने व्यक्तिगत रूप से ग्रेट निकोबार का दौरा किया.

5 जून, जिसे विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है और जो प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण दिन माना जाता है, उस दिन उन्होंने ग्रेट निकोबार परियोजना को "झूठ" बताया.

उन्होंने आरोप लगाया कि यह परियोजना एक उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के लिए बनाई गई है और "सेव निकोबार" अभियान शुरू किया. उनकी अभियान वेबसाइट में भी इसे प्रमुख मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया गया.

पर्यावरण संबंधी चिंताएं अपने स्तर पर पूरी तरह निराधार नहीं हो सकतीं. यह परियोजना प्राचीन प्रवाल भित्तियों और वर्षावन पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती है.

फिर भी, परियोजना का रणनीतिक महत्व उससे कहीं अधिक बड़ा बताया गया है.

लेकिन यहां समय, प्रस्तुति और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि अंडमान क्षेत्र में भारत की रणनीतिक निष्क्रियता से लाभ किसे होगा.

अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन, पर्यावरण नेटवर्क और डिजिटल प्रभावशाली व्यक्ति — जिनमें ध्रुव राठी भी शामिल हैं — एक साथ समान तर्कों को आगे बढ़ा रहे हैं.

ध्रुव राठी इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में एक विशेष स्थान रखते हैं. जर्मनी में रहने वाले इस भारतीय कंटेंट क्रिएटर की सरकार-विरोधी सामग्री, चाहे उद्देश्यवश हो या उपयोगिता के कारण, कई बार ऐसे नैरेटिव का स्रोत बनी है जिन्हें भारत के विदेशी विरोधियों ने अपने लिए उपयोगी पाया है.

जब पर्यावरण कार्यकर्ता, विपक्षी राजनेता और वैश्विक गैर-सरकारी नेटवर्क एक ही समय पर, एक ही रणनीतिक क्षेत्र के विरुद्ध और लगभग समान तर्कों के साथ सक्रिय दिखाई देते हैं, तब समन्वय के प्रश्न को केवल संदेह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता.

इसे सामान्य पैटर्न पहचान के रूप में भी देखा जा सकता है.

सेबी पैटर्न, नियमन को नैरेटिव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना

वित्तीय नियामक संस्थाएं नुकसान पहुंचाने वाली खबरों के सबसे विश्वसनीय स्रोतों में से होती हैं. सेबी का कोई आदेश वह संस्थागत महत्व रखता है जो किसी राजनीतिक भाषण में नहीं होता. और यहां भी एक ऐसा पैटर्न दिखाई देता है, जिसकी सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए.

पूर्व सेबी अध्यक्ष माधबी पुरी बुच ने भारतीय शेयर बाजारों में बार-बार "फ्रॉथ" और "बबल" जैसी स्थितियों को लेकर चेतावनी दी. इन बयानों की आवृत्ति और उनका स्वर — यहां तक कि मजबूत बुनियादी आर्थिक प्रदर्शन के दौर में भी — अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बाजार कहानी के आसपास लगातार अस्थिरता और नाजुकता का माहौल बनाता रहा. यह ऐसे समय में हुआ जब भारत को वैश्विक पूंजी के सामने एक स्थिर और उच्च विकास वाले गंतव्य के रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता थी.

अब जून 2026 में राजेश एक्सपोर्ट्स के खिलाफ सेबी के आदेश को देखें, जिसमें 15.15 लाख करोड़ रुपये के राजस्व संबंधी गलत प्रस्तुतीकरण का दावा किया गया. यह आंकड़ा इतना बड़ा था कि उसने तत्काल अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां पैदा कर दीं और भारत को "घोटाले वाली अर्थव्यवस्था" के रूप में पेश करने वाली चर्चाओं को जन्म दिया.

वास्तविकता, यदि सावधानीपूर्वक देखी जाए, तो यह है कि राजेश एक्सपोर्ट्स संभवतः एक कमजोर प्रबंधन वाली कंपनी है, जहां कई प्रकार की कमियां मौजूद थीं. इसकी विदेशी सहायक कंपनियों के राजस्व का स्वतंत्र रूप से सत्यापन नहीं हो सका, फॉरेंसिक ऑडिटर को ईआरपी तक पहुंच नहीं दी गई और प्रमोटर पर प्रतिबंध लगाया गया. ये चिंताएं वास्तविक और वैध हो सकती हैं.

लेकिन 15.15 लाख करोड़ रुपये पारंपरिक अर्थों में कोई "घोटाला" नहीं है. यह एक ऐसी स्वर्ण व्यापार कंपनी का पांच वर्षों का संचयी कारोबार है, जो अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से धातु का व्यापार करती है.

बड़े स्तर पर सोने का व्यापार वास्तविक लाभ मार्जिन की तुलना में अत्यधिक नाममात्र का राजस्व उत्पन्न करता है. स्वयं सेबी के अनुसार शेयरधारकों की संपत्ति में 12,726 करोड़ रुपये की कमी आई, जो 15 लाख करोड़ रुपये की चोरी के दावे से पूरी तरह अलग बात है.

महत्वपूर्ण रूप से, प्रवर्तन निदेशालय की जांच में कोई असामान्य संपत्ति नहीं मिली. राजेश एक्सपोर्ट्स ने सेबी के आदेश को चुनौती नहीं दी, जिसने बाजार को आश्चर्यचकित किया. वहीं, सुर्खियों और वास्तविक स्थिति के बीच का अंतर काफी हद तक अनदेखा रह गया.

इसके बाद अयोध्या का मामला भी है. राम मंदिर में दान प्रबंधन से जुड़ी प्रशासनिक कमियों — जो वास्तविक थीं और जिनमें वास्तविक गिरफ्तारियां भी हुईं — को "20 मिलियन रुपये के मंदिर फंड घोटाले" के रूप में प्रस्तुत किया गया.

यह मामला वर्तमान राजनीतिक दौर की सबसे प्रतीकात्मक संस्थाओं में से एक को लक्ष्य बनाता दिखाई दिया.

यहां भी वही सूत्र दिखाई देता है. एक सीमित और वास्तविक समस्या को अधिकतम नैरेटिव प्रभाव के लिए बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करना और ऐसे लक्ष्य को चुनना जिसका प्रतीकात्मक महत्व वित्तीय महत्व से कहीं अधिक हो.

इन सभी घटनाओं में एक समान पैटर्न दिखाई देता है. एक वैध लेकिन सीमित समस्या को लें. उसके आकार को सबसे नाटकीय सुर्खी तक बढ़ा दें. उस सुर्खी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलने दें. और फिर उसे विदेशी विश्वसनीयता के साथ घरेलू राजनीतिक विमर्श में वापस आते हुए देखें.

सिद्धांत का खुलासा

फरवरी 2023 में अरबपति निवेशक जॉर्ज सोरोस ने दावोस में सार्वजनिक रूप से कहा था कि अडाणी समूह के आसपास पैदा हुआ संकट नरेंद्र मोदी को कमजोर कर सकता है और भारत में उस चीज का मार्ग प्रशस्त कर सकता है जिसे उन्होंने "लोकतांत्रिक पुनर्जागरण" कहा.

यह कोई निवेश संबंधी टिप्पणी नहीं थी. यह दुनिया के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक वित्तपोषकों में से एक द्वारा खुलकर व्यक्त किया गया एक राजनीतिक उद्देश्य था.

ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस के माध्यम से जॉर्ज सोरोस की संस्थाओं की पूर्वी यूरोप, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई राजनीतिक परिवर्तनों में प्रलेखित भूमिकाएं रही हैं.

यहां महत्व केवल सोरोस का नहीं था. महत्व उस असाधारण स्पष्टता का था, जिसके साथ पहली बार किसी प्रमुख वैश्विक राजनीतिक व्यक्ति ने खुलकर कहा कि आर्थिक अस्थिरता भारत में राजनीतिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है.

इस बयान ने एक सिद्धांत को उजागर किया. और जब कोई सिद्धांत सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर दिया जाता है, तो उसके क्रियान्वयन को पहचानना आसान हो जाता है.

अब देखें कि व्यवहार में यह प्रक्रिया कैसी दिखाई देती है.

घरेलू विवाद, जिन्हें विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र के खिलाड़ी उत्पन्न करते हैं या बढ़ाते हैं, उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीय मीडिया संस्थान उठाते हैं — जैसे भारत पर बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री, न्यूयॉर्क टाइम्स की लोकतंत्र संबंधी रिपोर्टिंग, ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्टें या पर्यावरणीय गैर-सरकारी संगठनों के अभियान.

इसके बाद विदेशी संस्थागत निवेशक इन्हें एक प्रकार की पुष्टि के रूप में ग्रहण करते हैं. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की धारणा बदलती है. बाजार पर दबाव बढ़ता है. घरेलू विपक्ष उस दबाव को शासन की विफलता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करता है. फिर अंतरराष्ट्रीय मीडिया उसी चक्र को दोबारा चलाता है.

यह कोई षड्यंत्र सिद्धांत नहीं है. यह एक प्रलेखित फीडबैक लूप है, जिसे दुनिया के कई राजनीतिक संदर्भों में देखा गया है.

ब्राजील में बोल्सोनारो के दौर से लेकर हंगरी तक, पाकिस्तान के पीटीआई दौर से लेकर बांग्लादेश के 2024 के राजनीतिक परिवर्तन और नेपाल तक, इस प्रकार की प्रक्रिया विभिन्न रूपों में दिखाई देती है.

इस चक्र को संचालित करने के लिए किसी केंद्रीकृत समन्वय की आवश्यकता नहीं होती. इसके लिए केवल किसी विशेष परिणाम में साझा रुचि और ऐसे पर्याप्त पारिस्थितिकी तंत्र के खिलाड़ियों की आवश्यकता होती है, जो उस संकेत को समझते हों.

कूटनीतिक शतरंज की बिसात, जहां भारत वास्तव में जीत रहा है

यह वही बात है जिसे यह शोर छिपाने के लिए बनाया गया है.

चीन मोर्चा

साल 2017 का डोकलाम गतिरोध भारत की वह रेखा थी, जिसके आगे पीछे हटना संभव नहीं था. यह 73 दिनों तक चला एक ऐसा टकराव था जिसने यह प्रदर्शित किया कि भारत एक महत्वपूर्ण सामरिक क्षेत्र के निकट चीनी बुनियादी ढांचे के विस्तार को शारीरिक रूप से रोकने के लिए तैयार है.

अक्टूबर 2024 में डेपसांग बुल्ज और डेमचोक को लेकर हुए अलगाव समझौते के बाद, जो 2020 के गतिरोध के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा के अंतिम विवादित क्षेत्र थे, चीन की उकसावे वाली गतिविधियों में उल्लेखनीय कमी आई है.

फरवरी 2025 में बीजिंग ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह सीमा संबंधी समझौतों को "व्यापक और प्रभावी तरीके" से लागू कर रहा है.

यह शांति सद्भावना का परिणाम नहीं है. चीन भावनाओं को नहीं बल्कि रणनीतिक गणना को समझता है.

वह जानता है कि भारत ने वह भूमिका नहीं निभाई, जिसकी अपेक्षा अमेरिका की विदेश नीति व्यवस्था उससे करती रही है — अर्थात चीन के विरुद्ध एक अग्रिम मोर्चे वाले एशियाई नाटो सहयोगी की.

भारत ने यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की निंदा नहीं की. उसने पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूसी तेल खरीदा. उसने ब्रिक्स मुद्रा व्यवस्था पर चर्चाओं में भाग लिया और ईरान के प्रति स्वतंत्र रुख बनाए रखा.

एक ऐसा भारत, जो रणनीतिक रूप से स्वतंत्र बना रहता है और पश्चिम का उपकरण नहीं बनता, चीन के लिए एक अधिक जटिल प्रतिद्वंद्वी है.

सीमा पर तनाव में कमी आना आंशिक रूप से इसी रणनीतिक गणना का परिणाम है.

चीन पर कभी भी पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता और उसकी रणनीतिक धैर्य की अवधि दशकों में मापी जाती है. लेकिन वर्तमान संतुलन एक वास्तविक और कठिन परिश्रम से हासिल की गई उपलब्धि है.

डिएगो गार्सिया / चागोस उपलब्धि

सितंबर 2025 में भारत ने एक उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की, जिस पर लगभग कोई चर्चा नहीं हुई.

जब ब्रिटेन-मॉरीशस संधि के तहत चागोस द्वीपसमूह की संप्रभुता मॉरीशस को हस्तांतरित की गई, तब भारत ने, जिसने लंबे समय से मॉरीशस के उपनिवेशवाद समाप्ति के दावे का समर्थन किया था, अपनी कूटनीतिक पूंजी का लाभ उठाया.

भारत ने विस्तारित चागोस विशेष आर्थिक क्षेत्र के भीतर एक उपग्रह टेलीमेट्री, ट्रैकिंग और संचार स्टेशन स्थापित करने के लिए एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए.

इसके अतिरिक्त, भारत ने मॉरीशस के लिए 680 मिलियन डॉलर के विशेष आर्थिक पैकेज के हिस्से के रूप में समुद्री निगरानी सहायता प्रदान करने का भी वादा किया.

यह रणनीतिक भूगोल का वास्तविक बुनियादी ढांचे में बदलना है.

अब भारत के पास हिंद महासागर के मध्य में स्थायी निगरानी क्षमता है, ठीक उन समुद्री मार्गों पर जहां से चीनी नौसैनिक जहाज प्रशांत और हिंद महासागर के बीच आवागमन करते हैं.

यह ऐसी शांत, धैर्यपूर्ण और परिणामकारी कूटनीति है, जो टेलीविजन की सुर्खियां नहीं बनती, लेकिन रणनीतिक मानचित्र को बदल देती है.

द्वीप श्रृंखला की रणनीति

जिसे राहुल गांधी पर्यावरणीय खतरा बता रहे हैं, उसे रणनीतिक विश्लेषक और भारतीय नौसेना एक पीढ़ी में मिलने वाला बुनियादी ढांचे का अवसर मानते हैं.

ग्रेट निकोबार, लक्षद्वीप, मॉरीशस और सेशेल्स के माध्यम से भारत हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति का एक व्यापक चक्र बना रहा है.

चीन की "स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स" रणनीति — जिसके तहत ग्वादर, हम्बनटोटा और चिटगांव जैसे बंदरगाहों के माध्यम से भारत को घेरने की कोशिश की गई — अब उसका जवाब दिया जा रहा है.

ग्रेट निकोबार के विरुद्ध विपक्ष का पर्यावरणीय अभियान, चाहे उसकी घोषित मंशा कुछ भी हो, इस प्रतिरक्षा रणनीति के सबसे महत्वपूर्ण बिंदु को लक्ष्य बनाता दिखाई देता है.

राजनीतिक विरोध और रणनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के हितों के इस मेल को कम से कम स्वीकार करना आवश्यक है.

मनोस्थिति का युद्ध

इक्कीसवीं सदी के सबसे बड़े संघर्ष अब केवल भूभाग के लिए नहीं लड़े जाते. वे लोगों की मनःस्थिति के लिए लड़े जाते हैं.

हर बड़ी अर्थव्यवस्था और हर बड़ा लोकतंत्र निर्मित नैरेटिव युद्ध के चक्रों का सामना कर रहा है.

संयुक्त राज्य अमेरिका ने इसका अनुभव किया है. यूनाइटेड किंगडम ने ब्रेक्जिट के दौरान सूचना तंत्र के प्रभाव को देखा. फ्रांस, जर्मनी और ब्राजील भी इस प्रकार की प्रक्रियाओं से गुजरे हैं.

जो बात उन देशों को अलग करती है जो इन परिस्थितियों का सामना कर लेते हैं और उन देशों से जो टूट जाते हैं, वह वास्तविक समस्याओं की अनुपस्थिति नहीं है. हर देश के पास वास्तविक समस्याएं होती हैं.

महत्वपूर्ण बात यह है कि संस्थागत स्पष्टता मौजूद हो — वैध आलोचना और रणनीतिक नैरेटिव युद्ध के बीच अंतर करने की क्षमता.

वास्तविक चुनौतियों को स्वीकार करते हुए कृत्रिम रूप से बढ़ाई गई निराशा के सामने आत्मसमर्पण न करना और नागरिकों तक वास्तविक स्थिति को पहुंचाना, जो लगातार सूचनात्मक शोर से घिरे हुए हैं.

भारत के आईटी क्षेत्र की चुनौतियां वास्तविक हैं और उन्हें ईमानदार उत्तर की आवश्यकता है.

पुनः कौशल विकास, एआई-तैयारी नीतियां और ऐसे नए आर्थिक क्षेत्रों का निर्माण, जो उस प्रतिभा को समाहित कर सकें जिसे पुराना मॉडल खो रहा है, आवश्यक हैं.

वैश्विक आर्थिक मंदी आने वाले कई तिमाहियों में आय पर दबाव डालेगी और भारत इसके विपरीत होने का दावा नहीं कर सकता.

लेकिन यह नैरेटिव कि भारत आर्थिक विनाश की ओर बढ़ रहा है, कि उसके बाजार एक घोटाला हैं, कि उसकी रणनीतिक अवसंरचना पर्यावरणीय विनाश है और कि उसके युवा क्रांति के कगार पर हैं, यह विश्लेषण नहीं है.

यह एक घेराबंदी है.

और इसे उसी रूप में पहचानना, इसका मुकाबला करने की दिशा में पहला कदम है.

पिछले एक दशक में भारत ने शांत लेकिन महत्वपूर्ण तरीके से वास्तविक कूटनीतिक सफलताएं, रणनीतिक संपत्तियां और आर्थिक आधार तैयार किए हैं.

इसके आसपास निर्मित की जा रही कृत्रिम निराशा की संरचना पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि भारत और भारतीय इन उपलब्धियों को भूल जाएं.

यह विश्लेषण नीति एवं खुफिया क्षेत्रों से प्राप्त स्रोतों, ओपन-सोर्स रिपोर्टिंग, बाजार आंकड़ों, रणनीतिक अनुसंधान और राजनीतिक अवलोकनों पर आधारित है. आर्थिक आंकड़े सरकारी और स्वतंत्र वित्तीय स्रोतों से लिए गए हैं.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


अडानी के विझिंजम पोर्ट में 49% हिस्सेदारी खरीदेगी MSC, भारत को मिलेगा नया ग्लोबल शिपिंग हब

MSC की टर्मिनल कंपनी TiL खरीदेगी 49% हिस्सेदारी. 2.85 अरब डॉलर वैल्यूएशन वाली इस साझेदारी से चीन और मध्य-पूर्व के बड़े पोर्ट्स को मिलेगी चुनौती.

Last Modified:
Tuesday, 30 June, 2026
BWHindia

अडानी पोर्ट्स ने अपने महत्वाकांक्षी विझिंजम पोर्ट प्रोजेक्ट के लिए दुनिया की सबसे बड़ी शिपिंग कंपनियों में शामिल MSC समूह की टर्मिनल इकाई TiL के साथ 1.397 अरब डॉलर (करीब 13 हजार करोड़ रुपये) की रणनीतिक साझेदारी की है. इस निवेश के बाद केरल स्थित विझिंजम पोर्ट को हिंद महासागर क्षेत्र के प्रमुख ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह पोर्ट भविष्य में चीन और मध्य-पूर्व के बड़े बंदरगाहों को कड़ी चुनौती दे सकता है.

TiL खरीदेगी 49 फीसदी हिस्सेदारी
अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड (APSEZ) ने मेडिटेरेनियन शिपिंग कंपनी (MSC) समूह की टर्मिनल कंपनी टर्मिनल इन्वेस्टमेंट लिमिटेड (TiL) के साथ एक निर्णायक समझौता किया है. इसके तहत TiL, अडानी विझिंजम पोर्ट प्राइवेट लिमिटेड (AVPPL) में 49 फीसदी हिस्सेदारी खरीदेगी.

इस निवेश की कुल राशि 1.397 अरब डॉलर है, जबकि कंपनी का कुल मूल्यांकन 2.85 अरब डॉलर आंका गया है. डील पूरी होने के बाद APSEZ के पास 51 फीसदी हिस्सेदारी बनी रहेगी और कंपनी का प्रबंधन नियंत्रण भी उसके पास रहेगा.

दो चरणों में होगा निवेश
कंपनी के मुताबिक TiL का निवेश दो चरणों में किया जाएगा. पहले चरण में 539 मिलियन डॉलर का निवेश कर 49 फीसदी हिस्सेदारी खरीदी जाएगी. वहीं, शेष 858 मिलियन डॉलर का निवेश दिसंबर 2028 तक पोर्ट के विस्तार कार्य पूरा होने के बाद कर्ज और इक्विटी के माध्यम से किया जाएगा.

कार्गो कारोबार को मिलेगा बड़ा बढ़ावा
इस रणनीतिक साझेदारी से विझिंजम पोर्ट पर कार्गो ट्रैफिक बढ़ने की उम्मीद है. खास तौर पर बांग्लादेश और दक्षिण एशिया के अन्य देशों से आने वाले कार्गो को आकर्षित करने में मदद मिलेगी. कंपनियों का मानना है कि इससे पोर्ट की संचालन क्षमता बेहतर होगी और हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी स्थिति एक बड़े ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में मजबूत होगी.

2028 तक तीन गुना से ज्यादा बढ़ेगी क्षमता
दिसंबर 2024 में शुरू हुआ विझिंजम पोर्ट भारत का पहला डीप-ड्राफ्ट मेगा ट्रांसशिपमेंट पोर्ट है. वर्तमान में इसकी कार्गो हैंडलिंग क्षमता 1.6 मिलियन TEU है. पोर्ट के विस्तार के बाद दिसंबर 2028 तक इसकी क्षमता बढ़कर 5.7 मिलियन TEU तक पहुंच जाएगी, जिससे यह एशिया के प्रमुख कंटेनर हब्स में शामिल हो सकता है.

अडानी और MSC की तीसरी बड़ी साझेदारी
मुंद्रा और एन्नोर पोर्ट्स में सहयोग के बाद APSEZ और TiL के बीच यह तीसरी रणनीतिक साझेदारी है. अडानी पोर्ट्स के होल-टाइम डायरेक्टर और सीईओ अश्वनी गुप्ता ने कहा कि MSC के साथ यह सहयोग वैश्विक सप्लाई चेन को मजबूत करेगा और भारत की अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच को और बेहतर बनाएगा.

भारत के लिए क्यों अहम है यह डील?
विझिंजम पोर्ट की भौगोलिक स्थिति अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट के बेहद करीब है. ऐसे में यह पोर्ट भारत के लिए एक बड़े ट्रांसशिपमेंट केंद्र के रूप में उभर सकता है. इससे विदेशी बंदरगाहों पर भारत की निर्भरता कम होगी और देश के समुद्री व्यापार को नई गति मिलेगी.