भारत की चेतना पर युद्ध

यह कोई आर्थिक हमला नहीं है. यह राजनीतिक हमला भी नहीं है. बल्कि यह एक सतत, बहु-मोर्चीय अभियान है जिसका उद्देश्य एक राष्ट्र का स्वयं पर से विश्वास खत्म करना है और इसका समय भी संयोग नहीं है.

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Tuesday, 30 June, 2026
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पलक शाह 

"जनभावना ही सब कुछ है. जनभावना के साथ कोई भी चीज असफल नहीं हो सकती और उसके बिना कोई भी चीज सफल नहीं हो सकती."

— अब्राहम लिंकन, 1858

सेनाएं क्षेत्र पर कब्जा कर सकती हैं. चुनाव सरकारें बदल सकते हैं. लेकिन विजय का सबसे टिकाऊ रूप वह होता है जो न तो क्षेत्र पर कब्जा करता है और न ही सरकार पर. वह जनमानस पर कब्जा करता है. यही सबसे पुराना राजनीतिक हथियार है.

भूराजनीति और सूचना युद्ध का यह स्थापित सिद्धांत इंटरनेट, टेलीविजन और संभवतः प्रिंटिंग प्रेस से भी पहले का है. यदि आप किसी सरकार को चुनाव के माध्यम से पराजित नहीं कर सकते, तो आप उसे माहौल के माध्यम से पराजित करते हैं. आप वातावरण को भारी बना देते हैं. भविष्य को अंधकारमय महसूस कराते हैं. वर्तमान को ऐसी स्थिति में दिखाते हैं मानो देश किसी खाई के किनारे खड़ा हो. और फिर जब वास्तविक आर्थिक मंदी आती है, जैसा कि हर अर्थव्यवस्था में कभी न कभी होता है, तब आप उस चिंगारी को प्रज्वलित करते हैं जिसे आपने वर्षों तक धैर्यपूर्वक तैयार किया होता है.

साल 2026 का भारत ठीक इसी रणनीति का अनुभव कर रहा है. और जिस परिष्कृत तरीके से इसे अंजाम दिया जा रहा है, वह गंभीर और निष्पक्ष विश्लेषण की मांग करता है.

विनाश की भविष्यवाणी करने वाला समूह

किसी भी नैरेटिव युद्ध का पहला चरण होता है  शोर, आपको निराशा का ऐसा आधार तैयार करना होता है कि जब वास्तविक आर्थिक दबाव सामने आए, तो वह संयोग नहीं बल्कि पुष्टि जैसा लगे.

राहुल गांधी लगातार इसी वाद्ययंत्र को बजाते रहे हैं. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, "भारतीय अर्थव्यवस्था मर चुकी है. मोदी ने इसे मार दिया." उन्होंने कहा, "भारत अपने इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक संकट का सामना कर रहा है और आपदा की ओर बढ़ रहा है." एक अन्य बयान में कहा गया, "मोदी द्वारा निर्मित आपदाओं के नीचे भारत दबा हुआ है."

यह भाषा केवल आलोचनात्मक नहीं है, बल्कि सर्वनाश की चेतावनी देने वाली है, जिसे अधिकतम प्रभाव और न्यूनतम जटिलता के लिए तैयार किया गया है. प्रत्येक बयान विश्लेषण के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी हेडलाइन के रूप में सामने आता है जिसे वायरल होने के लिए तैयार किया गया हो.

अब यहां यह समझना महत्वपूर्ण है कि शोर और वास्तविक संकेतों में अंतर कैसे किया जाए.

वास्तविक आर्थिक तस्वीर यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ वास्तविक चुनौतियां हैं. खुदरा महंगाई दर 3.48 प्रतिशत है, जो भारतीय रिजर्व बैंक के संतोषजनक दायरे में है. वित्त वर्ष 2026 में सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 94.5 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया. विनिर्माण क्षेत्र का पीएमआई 56.6 और सेवा क्षेत्र का पीएमआई 58.9 है, जो स्वस्थ विस्तार का संकेत देते हैं. मई 2026 में ई-वे बिल जनरेशन में 12.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई.

ये आंकड़े काल्पनिक नहीं हैं. ये सरकारी आंकड़े हैं, जिनकी पुष्टि की जा सकती है.

लेकिन यहां वह बारीकी है जिसे विपक्ष दबाता है. एक वास्तविक और संरचनात्मक आर्थिक मंदी वास्तव में आ रही है, और इसकी उत्पत्ति का नई दिल्ली में कौन बैठा है, उससे कोई संबंध नहीं है.

वह एआई तूफान जिसे भारत ने आते नहीं देखा

भारत की वर्तमान आर्थिक कमजोरी को समझने के लिए यह समझना आवश्यक है कि पिछले तीन दशकों में भारत के मध्यम वर्ग की समृद्धि का निर्माण किसने किया. वह था आईटी सेवा उद्योग.

टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल केवल कंपनियां नहीं थीं. वे एक सामाजिक सीढ़ी थीं, जिन्होंने छोटे शहरों से लाखों लोगों को उठाकर आरामदायक शहरी जीवन तक पहुंचाया. उन्होंने विदेशी मुद्रा अर्जित की, रुपये को सहारा दिया, पुणे से लेकर हैदराबाद तक रियल एस्टेट बाजारों को गति दी और उपभोग के पूरे तंत्र को जन्म दिया.

अब यह मॉडल अस्तित्वगत दबाव में है. इसका कारण कोई सरकारी नीति नहीं है, बल्कि वह तकनीकी क्रांति है जो भारत से लगभग 10,000 किलोमीटर दूर घटित हो रही है.

वैश्विक ग्राहक, जो पहले भारतीय आईटी कंपनियों को काम सौंपते थे, अब वही काम एआई प्लेटफॉर्म की ओर भेज रहे हैं. मानव-घंटे पर आधारित वह मॉडल, जिसे भारत ने 30 वर्षों में विकसित किया, अब स्वचालन के कारण समाप्त होने की ओर बढ़ रहा है.

आंकड़े एक गंभीर तस्वीर प्रस्तुत करते हैं. टीसीएस ने अपने इतिहास की सबसे बड़ी छंटनी की घोषणा करते हुए 12,000 पद समाप्त किए. भारत की शीर्ष पांच आईटी कंपनियों ने मिलकर वित्त वर्ष 2026 में 7,000 कर्मचारियों की संख्या कम की. उद्योग के अनुमान बताते हैं कि वर्ष 2031 तक आईटी से जुड़े करीब 27 लाख रोजगार प्रभावित हो सकते हैं.

भारत के प्रमुख शहरों में वर्ष 2026 की पहली तिमाही में घरों की बिक्री में 13 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और विश्लेषकों ने इसका सीधा संबंध आईटी क्षेत्र में आय की असुरक्षा से जोड़ा है.

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक, जो कभी भारतीय आईटी कंपनियों में भारी निवेश करते थे, अब अपनी हिस्सेदारी बेच रहे हैं. जब एक्सेंचर की आय संबंधी चेतावनी ने आईटी सेवाओं पर एआई के प्रभाव की गहराई को उजागर किया, तब एक ही कारोबारी सत्र में इंफोसिस का शेयर 8 प्रतिशत और टीसीएस का शेयर 6 प्रतिशत गिर गया.

और यहीं पर नैरेटिव की मशीन सक्रिय होती है.

वैश्विक एआई बदलाव के कारण किसी एक क्षेत्र में विदेशी निवेशकों की बिकवाली को "वैश्विक ग्राहक एआई प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ रहे हैं" के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाता. इसे इस रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि "वैश्विक निवेशकों का भारत पर से भरोसा उठ रहा है."

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मीडिया में जो शीर्षक दिखाई देता है और फिर घरेलू राजनीति में वापस लौटता है, वह कभी जटिल नहीं होता. वह हमेशा सरल होता है.

और वह सरल संदेश यही कहता है, भारत में कुछ गलत हो रहा है.

कमरे में तिलचट्टा, जेन जेड विद्रोह का निर्माण

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने 16 मई 2026 को अपना पदार्पण किया. यह अभिजीत दिपके की रचना थी, जो बोस्टन विश्वविद्यालय की पृष्ठभूमि वाले एक राजनीतिक संचार रणनीतिकार हैं और भारत के डिजिटल रूप से संचालित विरोध प्रदर्शनों के पारिस्थितिकी तंत्र से पूर्व राजनीतिक संबंध रख चुके हैं. सबसे बढ़कर, वह एक दलित चेहरा हैं.

6 जून को जंतर-मंतर पर आयोजित एक प्रदर्शन को आकर्षक सोशल मीडिया पैकेजिंग, एक नकली घोषणापत्र और "आलसी और बेरोजगारों की आवाज़" जैसी ब्रांडिंग के साथ प्रस्तुत किया गया, जिसे ट्रेंड कराने के उद्देश्य से तैयार किया गया था.

महत्वपूर्ण रूप से, सीजेपी को तत्काल अखिलेश यादव, महुआ मोइत्रा और कीर्ति आजाद जैसे स्थापित विपक्षी नेताओं का समर्थन मिला. ये ऐसे राजनेता हैं जो भलीभांति समझते हैं कि जेन जेड की इस सौंदर्यात्मक राजनीति की उपयोगिता क्या है.

इस आंदोलन को स्वाभाविक और स्वतःस्फूर्त युवा आक्रोश के रूप में प्रस्तुत किया गया. लेकिन यह न तो स्वाभाविक था और न ही स्वतःस्फूर्त. इतनी सटीक संचार संरचना केवल निराशा से उत्पन्न नहीं होती. यह उन लोगों द्वारा बनाई जाती है जो राजनीतिक संदेशों को समझते हैं और पहले भी ऐसा कर चुके हैं. साथ ही, इसके लिए वित्तीय और रणनीतिक समर्थन की भी आवश्यकता होती है.

दिपके स्वयं सावधानीपूर्वक सीजेपी की तुलना नेपाल और बांग्लादेश से करने से बचते रहे. इसका कारण भी महत्वपूर्ण है. क्योंकि जो कार्यप्रणाली अपनाई गई है, वह काफी हद तक वही है जो बांग्लादेश और नेपाल में देखने को मिली थी, और उस तुलना को खुलकर स्वीकार करना पूरी संरचना को उजागर कर सकता था.

जुलाई 2024 में बांग्लादेश में जेन जेड की "क्रांति" ने शेख हसीना की सरकार को गिरा दिया. यह एक स्वतःस्फूर्त छात्र आंदोलन के रूप में दिखाई दिया, जो नौकरी में आरक्षण के विरोध से शुरू हुआ था.

सितंबर 2025 में नेपाल में जेन जेड के विरोध प्रदर्शनों ने, जो केवल पांच दिनों तक चले लेकिन जिनमें 76 लोगों की मौत हुई, केपी शर्मा ओली की सरकार को गिरा दिया.

दोनों मामलों में पैटर्न एक जैसा था. वास्तविक शिकायतें, सोशल मीडिया के माध्यम से विस्तार, आकर्षक और "गैर-राजनीतिक" ब्रांडिंग, तथा पृष्ठभूमि में राजनीतिक लाभार्थियों की मौजूदगी.

बांग्लादेश में लाभार्थियों के ऐसे नेटवर्कों से गहरे संबंध थे जो भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण माने जाते हैं. नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता ने ऐसी स्थिति पैदा की जिसका लाभ चीन ने शांत तरीके से उठाया.

यह पैटर्न कोई संयोग नहीं है. यह एक तरीका और एक संरचना है.

भारत में इस मॉडल को दोहराने का प्रयास संभवतः उसी स्तर तक नहीं पहुंच पाएगा. भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं अधिक मजबूत हैं, इसकी संघीय संरचना अधिक व्यापक है और इसकी सुरक्षा व्यवस्था अधिक परिष्कृत है.

लेकिन किसी आंदोलन को प्रभावी होने के लिए सरकार गिराने की आवश्यकता नहीं होती. उसे केवल आर्थिक मंदी के समय निराशा के माहौल को बढ़ाना होता है.

जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शनों के दृश्य, यदि संदर्भ से अलग कर दिए जाएं, तो वे अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों की सामग्री बन जाते हैं. यह सामग्री "भारत संकट में है" वाले नैरेटिव को मजबूत करती है. वही नैरेटिव विदेशी निवेशकों की धारणा को प्रभावित करता है और फिर विपक्ष के आर्थिक संदेशों को बल देता है.

यह एक ऐसा चक्र है जो स्वयं को लगातार मजबूत करता रहता है.

द्वीप की बाजी, पर्यावरण को भू-राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना

यहीं पर नैरेटिव का यह युद्ध वास्तव में खतरनाक क्षेत्र में प्रवेश करता है.

भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना इस पीढ़ी में देश द्वारा किए गए सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक निवेशों में से एक है.

यह परियोजना मलक्का जलडमरूमध्य से लगभग 40 समुद्री मील की दूरी पर स्थित है. इसी मार्ग से चीन के 80 प्रतिशत से अधिक तेल आयात गुजरते हैं. यदि ग्रेट निकोबार में भारत का सैन्य और लॉजिस्टिक केंद्र पूरी तरह विकसित हो जाता है, तो भविष्य में बीजिंग के साथ किसी भी टकराव की स्थिति में भारत के हाथ में एक असाधारण रणनीतिक कार्ड होगा.

यह ऐसा रणनीतिक अवरोध बिंदु है जो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बदल सकता है. ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य की भूमिका ने यह दिखाया भी था.

चीन इस बात को अच्छी तरह समझता है. बीजिंग भारत की द्वीप-श्रृंखला रणनीति को ध्यान से देख रहा है.

पूर्व में वाईएएनआई श्रृंखला (यांगून–अंडमान–निकोबार–सबांग) और पश्चिम में एलएमडी श्रृंखला (लक्षद्वीप–मालदीव–डिएगो गार्सिया) को चीन काफी रणनीतिक चिंता के साथ देखता है.

चीन की 80 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा सुरक्षा उन समुद्री मार्गों पर निर्भर करती है, जिन पर भारत अब प्रभाव स्थापित करने की स्थिति में पहुंच रहा है.

इसके बाद अप्रैल 2026 में राहुल गांधी ने व्यक्तिगत रूप से ग्रेट निकोबार का दौरा किया.

5 जून, जिसे विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है और जो प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण दिन माना जाता है, उस दिन उन्होंने ग्रेट निकोबार परियोजना को "झूठ" बताया.

उन्होंने आरोप लगाया कि यह परियोजना एक उद्योगपति को लाभ पहुंचाने के लिए बनाई गई है और "सेव निकोबार" अभियान शुरू किया. उनकी अभियान वेबसाइट में भी इसे प्रमुख मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया गया.

पर्यावरण संबंधी चिंताएं अपने स्तर पर पूरी तरह निराधार नहीं हो सकतीं. यह परियोजना प्राचीन प्रवाल भित्तियों और वर्षावन पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती है.

फिर भी, परियोजना का रणनीतिक महत्व उससे कहीं अधिक बड़ा बताया गया है.

लेकिन यहां समय, प्रस्तुति और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि अंडमान क्षेत्र में भारत की रणनीतिक निष्क्रियता से लाभ किसे होगा.

अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन, पर्यावरण नेटवर्क और डिजिटल प्रभावशाली व्यक्ति — जिनमें ध्रुव राठी भी शामिल हैं — एक साथ समान तर्कों को आगे बढ़ा रहे हैं.

ध्रुव राठी इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में एक विशेष स्थान रखते हैं. जर्मनी में रहने वाले इस भारतीय कंटेंट क्रिएटर की सरकार-विरोधी सामग्री, चाहे उद्देश्यवश हो या उपयोगिता के कारण, कई बार ऐसे नैरेटिव का स्रोत बनी है जिन्हें भारत के विदेशी विरोधियों ने अपने लिए उपयोगी पाया है.

जब पर्यावरण कार्यकर्ता, विपक्षी राजनेता और वैश्विक गैर-सरकारी नेटवर्क एक ही समय पर, एक ही रणनीतिक क्षेत्र के विरुद्ध और लगभग समान तर्कों के साथ सक्रिय दिखाई देते हैं, तब समन्वय के प्रश्न को केवल संदेह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता.

इसे सामान्य पैटर्न पहचान के रूप में भी देखा जा सकता है.

सेबी पैटर्न, नियमन को नैरेटिव के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना

वित्तीय नियामक संस्थाएं नुकसान पहुंचाने वाली खबरों के सबसे विश्वसनीय स्रोतों में से होती हैं. सेबी का कोई आदेश वह संस्थागत महत्व रखता है जो किसी राजनीतिक भाषण में नहीं होता. और यहां भी एक ऐसा पैटर्न दिखाई देता है, जिसकी सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए.

पूर्व सेबी अध्यक्ष माधबी पुरी बुच ने भारतीय शेयर बाजारों में बार-बार "फ्रॉथ" और "बबल" जैसी स्थितियों को लेकर चेतावनी दी. इन बयानों की आवृत्ति और उनका स्वर — यहां तक कि मजबूत बुनियादी आर्थिक प्रदर्शन के दौर में भी — अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बाजार कहानी के आसपास लगातार अस्थिरता और नाजुकता का माहौल बनाता रहा. यह ऐसे समय में हुआ जब भारत को वैश्विक पूंजी के सामने एक स्थिर और उच्च विकास वाले गंतव्य के रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता थी.

अब जून 2026 में राजेश एक्सपोर्ट्स के खिलाफ सेबी के आदेश को देखें, जिसमें 15.15 लाख करोड़ रुपये के राजस्व संबंधी गलत प्रस्तुतीकरण का दावा किया गया. यह आंकड़ा इतना बड़ा था कि उसने तत्काल अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां पैदा कर दीं और भारत को "घोटाले वाली अर्थव्यवस्था" के रूप में पेश करने वाली चर्चाओं को जन्म दिया.

वास्तविकता, यदि सावधानीपूर्वक देखी जाए, तो यह है कि राजेश एक्सपोर्ट्स संभवतः एक कमजोर प्रबंधन वाली कंपनी है, जहां कई प्रकार की कमियां मौजूद थीं. इसकी विदेशी सहायक कंपनियों के राजस्व का स्वतंत्र रूप से सत्यापन नहीं हो सका, फॉरेंसिक ऑडिटर को ईआरपी तक पहुंच नहीं दी गई और प्रमोटर पर प्रतिबंध लगाया गया. ये चिंताएं वास्तविक और वैध हो सकती हैं.

लेकिन 15.15 लाख करोड़ रुपये पारंपरिक अर्थों में कोई "घोटाला" नहीं है. यह एक ऐसी स्वर्ण व्यापार कंपनी का पांच वर्षों का संचयी कारोबार है, जो अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से धातु का व्यापार करती है.

बड़े स्तर पर सोने का व्यापार वास्तविक लाभ मार्जिन की तुलना में अत्यधिक नाममात्र का राजस्व उत्पन्न करता है. स्वयं सेबी के अनुसार शेयरधारकों की संपत्ति में 12,726 करोड़ रुपये की कमी आई, जो 15 लाख करोड़ रुपये की चोरी के दावे से पूरी तरह अलग बात है.

महत्वपूर्ण रूप से, प्रवर्तन निदेशालय की जांच में कोई असामान्य संपत्ति नहीं मिली. राजेश एक्सपोर्ट्स ने सेबी के आदेश को चुनौती नहीं दी, जिसने बाजार को आश्चर्यचकित किया. वहीं, सुर्खियों और वास्तविक स्थिति के बीच का अंतर काफी हद तक अनदेखा रह गया.

इसके बाद अयोध्या का मामला भी है. राम मंदिर में दान प्रबंधन से जुड़ी प्रशासनिक कमियों — जो वास्तविक थीं और जिनमें वास्तविक गिरफ्तारियां भी हुईं — को "20 मिलियन रुपये के मंदिर फंड घोटाले" के रूप में प्रस्तुत किया गया.

यह मामला वर्तमान राजनीतिक दौर की सबसे प्रतीकात्मक संस्थाओं में से एक को लक्ष्य बनाता दिखाई दिया.

यहां भी वही सूत्र दिखाई देता है. एक सीमित और वास्तविक समस्या को अधिकतम नैरेटिव प्रभाव के लिए बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करना और ऐसे लक्ष्य को चुनना जिसका प्रतीकात्मक महत्व वित्तीय महत्व से कहीं अधिक हो.

इन सभी घटनाओं में एक समान पैटर्न दिखाई देता है. एक वैध लेकिन सीमित समस्या को लें. उसके आकार को सबसे नाटकीय सुर्खी तक बढ़ा दें. उस सुर्खी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलने दें. और फिर उसे विदेशी विश्वसनीयता के साथ घरेलू राजनीतिक विमर्श में वापस आते हुए देखें.

सिद्धांत का खुलासा

फरवरी 2023 में अरबपति निवेशक जॉर्ज सोरोस ने दावोस में सार्वजनिक रूप से कहा था कि अडाणी समूह के आसपास पैदा हुआ संकट नरेंद्र मोदी को कमजोर कर सकता है और भारत में उस चीज का मार्ग प्रशस्त कर सकता है जिसे उन्होंने "लोकतांत्रिक पुनर्जागरण" कहा.

यह कोई निवेश संबंधी टिप्पणी नहीं थी. यह दुनिया के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक वित्तपोषकों में से एक द्वारा खुलकर व्यक्त किया गया एक राजनीतिक उद्देश्य था.

ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस के माध्यम से जॉर्ज सोरोस की संस्थाओं की पूर्वी यूरोप, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई राजनीतिक परिवर्तनों में प्रलेखित भूमिकाएं रही हैं.

यहां महत्व केवल सोरोस का नहीं था. महत्व उस असाधारण स्पष्टता का था, जिसके साथ पहली बार किसी प्रमुख वैश्विक राजनीतिक व्यक्ति ने खुलकर कहा कि आर्थिक अस्थिरता भारत में राजनीतिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है.

इस बयान ने एक सिद्धांत को उजागर किया. और जब कोई सिद्धांत सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर दिया जाता है, तो उसके क्रियान्वयन को पहचानना आसान हो जाता है.

अब देखें कि व्यवहार में यह प्रक्रिया कैसी दिखाई देती है.

घरेलू विवाद, जिन्हें विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र के खिलाड़ी उत्पन्न करते हैं या बढ़ाते हैं, उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीय मीडिया संस्थान उठाते हैं — जैसे भारत पर बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री, न्यूयॉर्क टाइम्स की लोकतंत्र संबंधी रिपोर्टिंग, ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्टें या पर्यावरणीय गैर-सरकारी संगठनों के अभियान.

इसके बाद विदेशी संस्थागत निवेशक इन्हें एक प्रकार की पुष्टि के रूप में ग्रहण करते हैं. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की धारणा बदलती है. बाजार पर दबाव बढ़ता है. घरेलू विपक्ष उस दबाव को शासन की विफलता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करता है. फिर अंतरराष्ट्रीय मीडिया उसी चक्र को दोबारा चलाता है.

यह कोई षड्यंत्र सिद्धांत नहीं है. यह एक प्रलेखित फीडबैक लूप है, जिसे दुनिया के कई राजनीतिक संदर्भों में देखा गया है.

ब्राजील में बोल्सोनारो के दौर से लेकर हंगरी तक, पाकिस्तान के पीटीआई दौर से लेकर बांग्लादेश के 2024 के राजनीतिक परिवर्तन और नेपाल तक, इस प्रकार की प्रक्रिया विभिन्न रूपों में दिखाई देती है.

इस चक्र को संचालित करने के लिए किसी केंद्रीकृत समन्वय की आवश्यकता नहीं होती. इसके लिए केवल किसी विशेष परिणाम में साझा रुचि और ऐसे पर्याप्त पारिस्थितिकी तंत्र के खिलाड़ियों की आवश्यकता होती है, जो उस संकेत को समझते हों.

कूटनीतिक शतरंज की बिसात, जहां भारत वास्तव में जीत रहा है

यह वही बात है जिसे यह शोर छिपाने के लिए बनाया गया है.

चीन मोर्चा

साल 2017 का डोकलाम गतिरोध भारत की वह रेखा थी, जिसके आगे पीछे हटना संभव नहीं था. यह 73 दिनों तक चला एक ऐसा टकराव था जिसने यह प्रदर्शित किया कि भारत एक महत्वपूर्ण सामरिक क्षेत्र के निकट चीनी बुनियादी ढांचे के विस्तार को शारीरिक रूप से रोकने के लिए तैयार है.

अक्टूबर 2024 में डेपसांग बुल्ज और डेमचोक को लेकर हुए अलगाव समझौते के बाद, जो 2020 के गतिरोध के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा के अंतिम विवादित क्षेत्र थे, चीन की उकसावे वाली गतिविधियों में उल्लेखनीय कमी आई है.

फरवरी 2025 में बीजिंग ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह सीमा संबंधी समझौतों को "व्यापक और प्रभावी तरीके" से लागू कर रहा है.

यह शांति सद्भावना का परिणाम नहीं है. चीन भावनाओं को नहीं बल्कि रणनीतिक गणना को समझता है.

वह जानता है कि भारत ने वह भूमिका नहीं निभाई, जिसकी अपेक्षा अमेरिका की विदेश नीति व्यवस्था उससे करती रही है — अर्थात चीन के विरुद्ध एक अग्रिम मोर्चे वाले एशियाई नाटो सहयोगी की.

भारत ने यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की निंदा नहीं की. उसने पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूसी तेल खरीदा. उसने ब्रिक्स मुद्रा व्यवस्था पर चर्चाओं में भाग लिया और ईरान के प्रति स्वतंत्र रुख बनाए रखा.

एक ऐसा भारत, जो रणनीतिक रूप से स्वतंत्र बना रहता है और पश्चिम का उपकरण नहीं बनता, चीन के लिए एक अधिक जटिल प्रतिद्वंद्वी है.

सीमा पर तनाव में कमी आना आंशिक रूप से इसी रणनीतिक गणना का परिणाम है.

चीन पर कभी भी पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता और उसकी रणनीतिक धैर्य की अवधि दशकों में मापी जाती है. लेकिन वर्तमान संतुलन एक वास्तविक और कठिन परिश्रम से हासिल की गई उपलब्धि है.

डिएगो गार्सिया / चागोस उपलब्धि

सितंबर 2025 में भारत ने एक उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की, जिस पर लगभग कोई चर्चा नहीं हुई.

जब ब्रिटेन-मॉरीशस संधि के तहत चागोस द्वीपसमूह की संप्रभुता मॉरीशस को हस्तांतरित की गई, तब भारत ने, जिसने लंबे समय से मॉरीशस के उपनिवेशवाद समाप्ति के दावे का समर्थन किया था, अपनी कूटनीतिक पूंजी का लाभ उठाया.

भारत ने विस्तारित चागोस विशेष आर्थिक क्षेत्र के भीतर एक उपग्रह टेलीमेट्री, ट्रैकिंग और संचार स्टेशन स्थापित करने के लिए एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए.

इसके अतिरिक्त, भारत ने मॉरीशस के लिए 680 मिलियन डॉलर के विशेष आर्थिक पैकेज के हिस्से के रूप में समुद्री निगरानी सहायता प्रदान करने का भी वादा किया.

यह रणनीतिक भूगोल का वास्तविक बुनियादी ढांचे में बदलना है.

अब भारत के पास हिंद महासागर के मध्य में स्थायी निगरानी क्षमता है, ठीक उन समुद्री मार्गों पर जहां से चीनी नौसैनिक जहाज प्रशांत और हिंद महासागर के बीच आवागमन करते हैं.

यह ऐसी शांत, धैर्यपूर्ण और परिणामकारी कूटनीति है, जो टेलीविजन की सुर्खियां नहीं बनती, लेकिन रणनीतिक मानचित्र को बदल देती है.

द्वीप श्रृंखला की रणनीति

जिसे राहुल गांधी पर्यावरणीय खतरा बता रहे हैं, उसे रणनीतिक विश्लेषक और भारतीय नौसेना एक पीढ़ी में मिलने वाला बुनियादी ढांचे का अवसर मानते हैं.

ग्रेट निकोबार, लक्षद्वीप, मॉरीशस और सेशेल्स के माध्यम से भारत हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति का एक व्यापक चक्र बना रहा है.

चीन की "स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स" रणनीति — जिसके तहत ग्वादर, हम्बनटोटा और चिटगांव जैसे बंदरगाहों के माध्यम से भारत को घेरने की कोशिश की गई — अब उसका जवाब दिया जा रहा है.

ग्रेट निकोबार के विरुद्ध विपक्ष का पर्यावरणीय अभियान, चाहे उसकी घोषित मंशा कुछ भी हो, इस प्रतिरक्षा रणनीति के सबसे महत्वपूर्ण बिंदु को लक्ष्य बनाता दिखाई देता है.

राजनीतिक विरोध और रणनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के हितों के इस मेल को कम से कम स्वीकार करना आवश्यक है.

मनोस्थिति का युद्ध

इक्कीसवीं सदी के सबसे बड़े संघर्ष अब केवल भूभाग के लिए नहीं लड़े जाते. वे लोगों की मनःस्थिति के लिए लड़े जाते हैं.

हर बड़ी अर्थव्यवस्था और हर बड़ा लोकतंत्र निर्मित नैरेटिव युद्ध के चक्रों का सामना कर रहा है.

संयुक्त राज्य अमेरिका ने इसका अनुभव किया है. यूनाइटेड किंगडम ने ब्रेक्जिट के दौरान सूचना तंत्र के प्रभाव को देखा. फ्रांस, जर्मनी और ब्राजील भी इस प्रकार की प्रक्रियाओं से गुजरे हैं.

जो बात उन देशों को अलग करती है जो इन परिस्थितियों का सामना कर लेते हैं और उन देशों से जो टूट जाते हैं, वह वास्तविक समस्याओं की अनुपस्थिति नहीं है. हर देश के पास वास्तविक समस्याएं होती हैं.

महत्वपूर्ण बात यह है कि संस्थागत स्पष्टता मौजूद हो — वैध आलोचना और रणनीतिक नैरेटिव युद्ध के बीच अंतर करने की क्षमता.

वास्तविक चुनौतियों को स्वीकार करते हुए कृत्रिम रूप से बढ़ाई गई निराशा के सामने आत्मसमर्पण न करना और नागरिकों तक वास्तविक स्थिति को पहुंचाना, जो लगातार सूचनात्मक शोर से घिरे हुए हैं.

भारत के आईटी क्षेत्र की चुनौतियां वास्तविक हैं और उन्हें ईमानदार उत्तर की आवश्यकता है.

पुनः कौशल विकास, एआई-तैयारी नीतियां और ऐसे नए आर्थिक क्षेत्रों का निर्माण, जो उस प्रतिभा को समाहित कर सकें जिसे पुराना मॉडल खो रहा है, आवश्यक हैं.

वैश्विक आर्थिक मंदी आने वाले कई तिमाहियों में आय पर दबाव डालेगी और भारत इसके विपरीत होने का दावा नहीं कर सकता.

लेकिन यह नैरेटिव कि भारत आर्थिक विनाश की ओर बढ़ रहा है, कि उसके बाजार एक घोटाला हैं, कि उसकी रणनीतिक अवसंरचना पर्यावरणीय विनाश है और कि उसके युवा क्रांति के कगार पर हैं, यह विश्लेषण नहीं है.

यह एक घेराबंदी है.

और इसे उसी रूप में पहचानना, इसका मुकाबला करने की दिशा में पहला कदम है.

पिछले एक दशक में भारत ने शांत लेकिन महत्वपूर्ण तरीके से वास्तविक कूटनीतिक सफलताएं, रणनीतिक संपत्तियां और आर्थिक आधार तैयार किए हैं.

इसके आसपास निर्मित की जा रही कृत्रिम निराशा की संरचना पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि भारत और भारतीय इन उपलब्धियों को भूल जाएं.

यह विश्लेषण नीति एवं खुफिया क्षेत्रों से प्राप्त स्रोतों, ओपन-सोर्स रिपोर्टिंग, बाजार आंकड़ों, रणनीतिक अनुसंधान और राजनीतिक अवलोकनों पर आधारित है. आर्थिक आंकड़े सरकारी और स्वतंत्र वित्तीय स्रोतों से लिए गए हैं.

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)
 


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RBI के 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी के बाद इंडस्ट्री की मिली-जुली प्रतिक्रिया, विशेषज्ञों ने महंगे कर्ज के बीच मजबूत मांग और लंबी अवधि के ग्रोथ आउटलुक को बताया अहम

रितु राणा by
Published - Wednesday, 07 October, 2026
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Wednesday, 07 October, 2026
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने महंगाई के बढ़ते दबाव के बीच रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% कर दिया है. RBI के सख्त रुख के बाद रियल एस्टेट, इंफ्रास्ट्रक्चर और वित्तीय सेवा क्षेत्र से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. इंडस्ट्री विशेषज्ञों के मुताबिक, बढ़ी ब्याज दरों से होम लोन और फाइनेंसिंग लागत बढ़ सकती है, लेकिन मजबूत आय वृद्धि, शहरीकरण, इंफ्रास्ट्रक्चर और घरों की मांग के चलते रियल एस्टेट पर असर सीमित रह सकता है. वहीं, वित्तीय क्षेत्र के विशेषज्ञों ने महंगाई, सिस्टम में लिक्विडिटी, क्रेडिट फ्लो और आगे की ब्याज दरों को लेकर सावधानी बरतने की जरूरत बताई है. कुछ विशेषज्ञों ने दिसंबर में एक और 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की संभावना भी जताई है.

रियल एस्टेट की लंबी अवधि की मांग मजबूत

बीपीटीपी के सीईओ और प्रेसिडेंट मानिक मलिक के मुताबिक, RBI का फैसला अर्थव्यवस्था की मजबूती और उभरते महंगाई दबाव से निपटने की क्षमता को दर्शाता है. उन्होंने कहा कि रियल एस्टेट के लिए लंबे समय में अवसर बरकरार हैं. बढ़ती आय, शहरीकरण, इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार और घर खरीदने की बढ़ती आकांक्षा आवासीय मांग को लगातार समर्थन दे रहे हैं.

उन्होंने कहा कि स्थिर मैक्रोइकोनॉमिक माहौल, नियंत्रित महंगाई और आर्थिक विकास उपभोक्ता भरोसे और निवेश के लिए मजबूत आधार तैयार करते हैं. मलिक ने गुणवत्तापूर्ण रियल एस्टेट को एंड-यूजर्स और निवेशकों दोनों के लिए लंबे समय तक महत्वपूर्ण एसेट बने रहने की उम्मीद जताई.

पायनियर अर्बन लैंड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट ऋषभ पेरिवाल ने भी कहा कि 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी का रियल एस्टेट पर असर सीमित रह सकता है. उनके मुताबिक, गुरुग्राम के लग्जरी रेजिडेंशियल सेगमेंट में संपन्न खरीदार और वरिष्ठ पेशेवर EMI में मामूली बदलाव की तुलना में जगह, डिजाइन और लाइफस्टाइल को अधिक महत्व देते हैं.

उन्होंने बताया कि कमर्शियल रियल एस्टेट को भी ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) की बढ़ती मांग और प्रमुख कॉरिडोर में प्रीमियम वर्कस्पेस की जरूरत से समर्थन मिल रहा है. मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी के कारण गुरुग्राम के दोनों सेगमेंट में आने वाली तिमाहियों में मांग को लेकर भरोसा बना हुआ है.

एयू रियल एस्टेट के डायरेक्टर आशीष अग्रवाल ने कहा, "रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी से खरीदार फाइनेंसिंग को लेकर थोड़ा सोच-समझकर फैसला ले सकते हैं, लेकिन NCR में घरों की असल मांग अभी भी स्थिर बनी हुई है. आज के खरीदार सिर्फ लोन की लागत पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, बल्कि लोकेशन, कनेक्टिविटी, कंस्ट्रक्शन की क्वालिटी और लंबे समय में मिलने वाली वैल्यू को भी देख रहे हैं. खुद रहने के लिए घर खरीदने वाले लोगों के लिए यह फैसला उनकी लाइफस्टाइल और जीवन के अलग-अलग पड़ावों की जरूरतों से भी जुड़ा है. आने वाले समय में खरीदार सोच-समझकर फैसला ले सकते हैं और अच्छी लोकेशन, बेहतर प्लानिंग और अच्छी वैल्यू देने वाले घरों को प्राथमिकता दे सकते हैं."

महंगे कर्ज से कुछ खरीदार कर सकते हैं इंतजार

सिल्वरडोम रियल्टर्स के फाउंडर और सीईओ ऋषि सिंह ने कहा कि रेपो रेट बढ़कर 5.50% होने से अल्पावधि में फाइनेंसिंग लागत पर कुछ दबाव बढ़ सकता है और कुछ खरीदार अपने बजट का दोबारा आकलन करने के लिए समय ले सकते हैं. हालांकि, उनके मुताबिक इससे भारतीय रियल एस्टेट की व्यापक तस्वीर बदलने की संभावना कम है. उन्होंने कहा कि घर खरीदने की इच्छा बनी हुई है और आय में वृद्धि के साथ खरीदार भरोसेमंद डेवलपमेंट्स को प्राथमिकता दे रहे हैं. खासकर अच्छी कनेक्टिविटी और स्थापित माइक्रो-मार्केट्स में वास्तविक जरूरत वाले खरीदार अपनी योजनाओं के साथ आगे बढ़ सकते हैं.

ओमैक्स लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर मोहित गोयल ने कहा कि रेपो रेट को 5.50% तक बढ़ाना महंगाई को नियंत्रित करने और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने पर RBI के फोकस को दिखाता है. हालांकि, बढ़ी हुई उधारी लागत और खरीदारों के रुख में कुछ नरमी देखने को मिल सकती है, खासकर ब्याज दरों के प्रति संवेदनशील सेगमेंट में.

उनके मुताबिक, बढ़ती आय, बदलती आकांक्षाएं और गुणवत्तापूर्ण प्रोजेक्ट्स की मांग आवासीय बाजार को समर्थन देती रहेगी. ऐसे में डेवलपर्स के लिए खरीदारों को बेहतर वैल्यू देने और परियोजनाओं के क्रियान्वयन में वित्तीय अनुशासन बनाए रखना अहम होगा.

टियर-2 और टियर-3 शहरों पर भी नजर

मंगलम ग्रुप की डायरेक्टर अमृता गुप्ता ने कहा कि 5.50% की रेपो रेट से उधारी लागत पर दबाव आएगा, लेकिन रियल एस्टेट बाजार के पास ऐसे बदलावों से निपटने के लिए पहले की तुलना में मजबूत आधार है.

उन्होंने कहा कि महानगरों से आगे बढ़ती मांग एक महत्वपूर्ण ट्रेंड बन रही है. टियर-2 शहरों में खरीदार अब केवल कीमत के आधार पर फैसला नहीं कर रहे, बल्कि विकास की गुणवत्ता, कनेक्टिविटी और लंबी अवधि की संभावनाओं को भी महत्व दे रहे हैं. त्योहारी सीजन में खरीदारों की रुचि बढ़ने के बावजूद ऊंची ब्याज दरें कुछ लोगों को निर्णय लेने में थोड़ा अधिक समय लेने के लिए प्रेरित कर सकती हैं.

एसोटेक रियल्टी के मैनेजिंग डायरेक्टर नीरज गुलाटी ने कहा कि 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है. इससे लोन और फाइनेंसिंग लागत बढ़ सकती है, जिसका असर ग्राहकों के फैसलों और भरोसे पर पड़ सकता है.

हालांकि, उन्होंने रियल एस्टेट और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर के लिए लंबी अवधि की संभावनाओं को मजबूत बताया. उनके मुताबिक, धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर बढ़ती आवाजाही इन क्षेत्रों में प्रॉपर्टी और हॉस्पिटैलिटी की मांग को सहारा दे रही है.

न्यूमैक्स ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर सुनील गोयल ने कहा कि रेपो रेट बढ़ोतरी का असर मुख्य रूप से होम लोन की ब्याज दरों के जरिए दिख सकता है. टियर-2 और टियर-3 शहरों में खरीदार EMI को लेकर अधिक संवेदनशील होते हैं, इसलिए कुछ समय के लिए निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. हालांकि, किफायती और मिड-सेगमेंट आवास की मजबूत मांग इस असर को सीमित कर सकती है.

महंगाई के दबाव के बावजूद अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत

क्रीवा के सीईओ मयंक जैन ने कहा कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक महंगाई की स्थिति को देखते हुए 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी समझ में आती है. उन्होंने कहा कि RBI का रुख अब थोड़ा सख्त हुआ है और अगर महंगाई का दबाव बना रहता है तो आगे भी कदम उठाए जा सकते हैं.

जैन के मुताबिक, भारतीय अर्थव्यवस्था अभी मजबूत है और पहली तिमाही में वास्तविक GDP ग्रोथ 7.8% रही है. रियल एस्टेट के लिए अहम यह होगा कि ब्याज दरों में बदलाव का लोन की उपलब्धता और बाजार में पैसे की उपलब्धता पर कितना असर पड़ता है. उन्होंने कहा कि एक बार की रेपो रेट बढ़ोतरी को रियल एस्टेट बाजार में बड़े बदलाव के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.

राइज इंफ्रावेंचर्स लिमिटेड के वाइस प्रेजीडेंट मोहित गवरी ने कहा कि इस समय केवल ब्याज दरों में बदलाव के बजाय बाजार की बुनियादी स्थिति पर ध्यान देना जरूरी है. उन्होंने खरीदारों के लिए लोकेशन, डेवलपर की विश्वसनीयता, लोन की उपलब्धता और निवेश अवधि जैसे पहलुओं को महत्वपूर्ण बताया. उनके मुताबिक, अच्छी लोकेशन और सही कीमत वाले रेजिडेंशियल और कमर्शियल प्रोजेक्ट्स में आगे भी रुचि बनी रह सकती है.

इंफ्रास्ट्रक्चर और कैपेक्स से कंस्ट्रक्शन सेक्टर को सहारा

एक्शन कंस्ट्रक्शन इक्विप्मेंट (ACE) के सीएफओ राजन लूथरा ने कहा कि 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी बढ़ती महंगाई और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सोच-समझकर लिया गया कदम है. उन्होंने वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम और कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव को प्रमुख जोखिम बताया.

उन्होंने कहा कि कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट सेक्टर में बढ़ी हुई फाइनेंसिंग लागत आने वाले समय में निवेश के फैसलों को प्रभावित कर सकती है. हालांकि, सड़कों, रेलवे और शहरी विकास में सरकारी कैपेक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर गतिविधियां मांग और सेक्टर की ग्रोथ को समर्थन देती रहेंगी.

महंगा कर्ज, लेकिन मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर से निवेश की उम्मीद

रिलायंस मेट सिटी के सीईओ मनीष जायसवाल ने कहा कि करीब चार साल में पहली बार RBI द्वारा दरें बढ़ाने का फैसला महंगाई को लेकर समय रहते कदम उठाने का संकेत है. उनके मुताबिक, आने वाले समय में कर्ज थोड़ा महंगा हो सकता है, लेकिन गंभीर निवेशकों के लिए कुछ तिमाहियों तक सस्ता कर्ज मिलने से अधिक महत्वपूर्ण कीमतों में स्थिरता है.

उन्होंने कहा कि इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम के लिए निवेश की रफ्तार बनाए रखना, उत्पादकता बढ़ाना और तैयार इंफ्रास्ट्रक्चर का बेहतर इस्तेमाल जरूरी होगा. इंटीग्रेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर और मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के समय और लागत को कम कर सकती है. ऐसे फायदे महंगी पूंजी के दौर में और महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

दिसंबर में एक और बढ़ोतरी की संभावना?

कोटक महिंद्रा एएमसी के सीआईओ-डेट दीपक अग्रवाल ने कहा कि RBI की MPC ने सर्वसम्मति से रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% किया है, जो बाजार की उम्मीदों के अनुरूप है. उन्होंने कहा कि महंगाई अब पहले की तरह कम नहीं है और पॉलिसी स्टांस को “न्यूट्रल” से “कैलिब्रेटेड टाइटनिंग” में बदलना RBI के अधिक सख्त रुख का संकेत है.

अग्रवाल के मुताबिक, मौजूदा नीति को देखते हुए दिसंबर की पॉलिसी में भी 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की संभावना है, हालांकि यह अंतर्निहित महंगाई और उसके दूसरे दौर के प्रभावों पर निर्भर करेगी. FY2027 के लिए महंगाई का अनुमान 5% से बढ़ाकर 5.2% किया गया है, जबकि GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7% से बढ़ाकर 7.1% किया गया है. उन्होंने बताया कि पॉलिसी के बाद बॉन्ड बाजार में कमजोरी रही और G-Sec यील्ड में करीब 5-6 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी हुई, जिसके बाद यह करीब 7.25% के स्तर पर कारोबार कर रही थी.

NBFCs के लिए महंगाई से ज्यादा जरूरी क्रेडिट फ्लो

जियो फाइनेंशियल सर्विसेज की ग्रुप एग्जीक्यूटिव और सीएफओ अन्नापूर्णा वेंकटरमानन ने कहा कि RBI की ओर से रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% करना उम्मीद के मुताबिक है. उनके अनुसार 'calibrated tightening' का रुख महंगाई के खिलाफ RBI के निर्णायक कदम को दर्शाता है. उन्होंने कहा कि जियोपॉलिटिकल संघर्ष, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और प्रतिकूल मानसून जैसे कारणों से महंगाई पर दबाव बढ़ा है.

वेंकटरमानन के मुताबिक अगले तीन तिमाहियों में हेडलाइन CPI महंगाई औसतन 5.8% रह सकती है, जबकि इस वित्त वर्ष में कोर महंगाई 4.4% रहने का अनुमान है. उन्होंने कहा कि पिछली रेपो रेट पर फॉरवर्ड-लुकिंग महंगाई अनुमान के मुकाबले रियल रेट नकारात्मक थे. ऐसे में अमेरिकी फेड की हालिया दर बढ़ोतरी, 'higher for longer' रुख और रुपये पर लगातार बने दबाव के बीच RBI का यह फैसला बाजार को जरूरी स्पष्टता देता है.

उन्होंने कहा कि सिस्टम में करीब ₹5 लाख करोड़ की लिक्विडिटी मौजूद है और RBI के OMO तथा विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप के जरिए इसमें और कमी आ सकती है. इससे निकट अवधि में यील्ड कर्व में फ्लैटनिंग देखने को मिल सकती है. उनके मुताबिक NBFCs को अपनी Asset-Liability Management पर अनुशासन बनाए रखने और अवधि के बेहतर मिलान पर ध्यान देने की जरूरत होगी, ताकि मार्जिन सुरक्षित रहते हुए क्रेडिट फ्लो जारी रह सके.

हालांकि, वेंकटरमानन ने इस टाइटनिंग साइकिल को ग्रोथ के लिए बाधा के तौर पर नहीं देखा है. उन्होंने कहा कि निकट अवधि में क्रेडिट डिमांड पर कोई बड़ा असर पड़ने की उम्मीद नहीं है, क्योंकि त्योहारी सीजन की मजबूत गतिविधि और ब्याज दरों के असर के अर्थव्यवस्था में पहुंचने में लगने वाला समय मांग को सपोर्ट कर सकता है. RBI की ओर से FY2027 के लिए GDP ग्रोथ अनुमान बढ़ाकर 7.1% किए जाने से भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक मजबूती भी बनी हुई है.

उनके मुताबिक रिटेल, MSME और कमर्शियल सेक्टर में लंबे समय तक क्रेडिट की मांग मजबूत रह सकती है. ऐसे में जैसे-जैसे यील्ड में उतार-चढ़ाव स्थिर होगा, मजबूत पूंजी वाली NBFCs को अच्छी गुणवत्ता वाले बाजार हिस्सेदारी के अवसर मिल सकते हैं.


पारंपरिक कारोबार से नए ग्रोथ इंजन तक, BW Businessworld के नए अंक में पार्थ जिंदल पर फोकस

नए अंक में अगली पीढ़ी के नेतृत्व, बदलते उपभोक्ता बाजार और कारोबार के विस्तार पर विशेष कवरेज; BW Future of Design Summit and Awards 2026 पर भी विशेष पैकेज

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 07 October, 2026
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Wednesday, 07 October, 2026
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BW बिजनेसवर्ल्ड के नए अंक में भारत के स्थापित कारोबारी समूहों के पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर नए कारोबार और ग्रोथ इंजन तैयार करने की रणनीति पर फोकस किया गया है. अंक में अगली पीढ़ी के नेतृत्व, बदलते उपभोक्ता बाजार और उन क्षमताओं को प्रमुखता दी गई है, जो भारत की आर्थिक वृद्धि के अगले चरण को आकार दे सकती हैं.

JSW के विस्तार पर पार्थ जिंदल का कवर फीचर

अंक के कवर पैकेज में पार्थ जिंदल और JSW के बदलते कारोबारी विस्तार पर विस्तृत चर्चा की गई है. इसमें बताया गया है कि समूह अपने पारंपरिक औद्योगिक कारोबार से आगे बढ़कर सीमेंट, पेंट्स और ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी का विस्तार कर रहा है.

कवर स्टोरी और इंटरव्यू में पार्थ जिंदल की इन नए कारोबारों से जुड़ी जिम्मेदारियों के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग के अनुभव और पूंजी के इस्तेमाल से ऐसे बाजारों में प्रवेश की रणनीति पर चर्चा की गई है, जहां व्यक्तिगत उपभोक्ता की जरूरतों और पसंद को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है.

फीचर में कारोबार खड़ा करने, अधिग्रहण करने और साझेदारी के जरिए विस्तार करने के बीच विकल्पों पर भी चर्चा की गई है. इसके साथ ही नए कारोबारों को सफल बनाने के लिए जरूरी प्रबंधन अनुशासन और मजबूत संस्थागत ढांचे पर जोर दिया गया है.

पार्थ जिंदल ने JSW के नए कारोबारों को उनके व्यावसायिक आधार पर आगे बढ़ाए जाने वाले अवसरों के तौर पर देखा है. कवर पैकेज में अगली पीढ़ी के कारोबारी नेताओं की बढ़ती जिम्मेदारियों को भी रेखांकित किया गया है.

उद्योग से उपभोक्ता बाजार तक बढ़ रहा फोकस

अंक में ‘From Smokestack To Storefront’ शीर्षक से एक विशेष विश्लेषण भी शामिल है. इसमें बताया गया है कि औद्योगिक समूह उपभोक्ता कारोबार की ओर क्यों बढ़ रहे हैं और इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा पर क्या असर पड़ सकता है.

इस हिस्से में रिलायंस और आदित्य बिड़ला ग्रुप के उदाहरणों के जरिए अलग-अलग उपभोक्ता श्रेणियों में स्थापित कारोबारी समूहों की बढ़ती मौजूदगी का विश्लेषण किया गया है. इसमें पैमाने, पूंजी और वितरण नेटवर्क को विस्तार के महत्वपूर्ण साधनों के रूप में देखा गया है. हालांकि, लंबे समय तक सफलता के लिए उपभोक्ताओं की जरूरत और पसंद को समझना भी अहम बताया गया है.

अंक में यह भी चर्चा की गई है कि स्थापित कारोबारी समूहों के नए क्षेत्रों में विस्तार से प्रतिस्पर्धा, उपभोक्ता विकल्प, नवाचार और रोजगार के अवसरों पर असर पड़ सकता है. साथ ही, लंबे समय तक विकास के लिए मजबूत संस्थानों, दीर्घकालिक निवेश और उपभोक्ता-केंद्रित क्षमताओं को जरूरी बताया गया है.

कारोबार में अगली पीढ़ी की भूमिका पर जोर

BW बिजनेसवर्ल्ड के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ने कहा कि बाजार और तकनीक को लेकर लिए जा रहे फैसले भारत को भविष्य के अवसरों के लिए तैयार कर रहे हैं और इनका असर पारिवारिक कारोबार से आगे उपभोक्ताओं और लोगों की आजीविका तक पड़ रहा है.

उन्होंने कहा कि भारत के पुराने कारोबारी घराने एक नए दौर में प्रवेश कर रहे हैं, जहां अगली पीढ़ी के नेता कारोबार में क्या बनाया जाए, क्या खरीदा जाए और किन क्षेत्रों को पेशेवर प्रबंधन के लिए छोड़ा जाए, जैसे सवालों पर विचार कर रहे हैं. उनके मुताबिक, इन समूहों की महत्वाकांक्षाओं को लंबे समय के आर्थिक मूल्य में बदलने में उपभोक्ता-केंद्रित दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होगा.

BW बिजनेसवर्ल्ड की ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर नूर फातिमा वारसिया ने कहा कि इस विस्तार के पीछे कारोबारी अनुशासन महत्वपूर्ण है. औद्योगिक क्षमता से उपभोक्ता बाजार में प्रासंगिकता हासिल करने के लिए धैर्य, संस्थागत क्षमता और उपभोक्ताओं का भरोसा हासिल करने की जरूरत होती है.

BW Future of Design Summit and Awards 2026 पर विशेष पैकेज

नए अंक में BW Future of Design Summit and Awards 2026 पर भी विशेष पैकेज शामिल किया गया है. इसमें इस बात पर फोकस किया गया है कि कारोबारी और संस्थान नए विचारों को वास्तविक उत्पादों, सेवाओं और उपयोगी अनुभवों में किस तरह बदल सकते हैं.

‘Designing for a Self-Reliant India’ थीम के तहत आयोजित इस समिट में तेजी से बदलते भारतीय बाजार के लिए बेहतर उत्पाद, सेवाएं और रोजमर्रा के अनुभव तैयार करने में डिजाइन की भूमिका पर चर्चा की गई.

अवार्ड्स में ऐसे प्रोटोटाइप और तैयार डिजाइन को शामिल किया गया, जिनका उद्देश्य केवल बेहतर दिखना नहीं बल्कि वास्तविक समस्याओं का समाधान करना, उपयोगिता बढ़ाना और बेहतर उपभोक्ता अनुभव तैयार करना है.

डिजाइन पैकेज के जरिए भारत की अगली विकास यात्रा में नवाचार, क्षमता निर्माण और नए विचारों को व्यावहारिक समाधानों में बदलने की भूमिका को रेखांकित किया गया है. BWBusinessworld का यह नया अंक डिजिटल और प्रिंट, दोनों प्रारूपों में उपलब्ध है. 


त्योहारी सीजन में 6% तक पहुंच सकती है महंगाई; कच्चा तेल और अल नीनो बढ़ाएंगे दबाव: RBI

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि आने वाले समय में महंगाई पर सप्लाई से जुड़े कई दबाव बने रह सकते हैं. इनमें मानसून की स्थिति, अल नीनो और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव प्रमुख हैं.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 07 October, 2026
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Wednesday, 07 October, 2026
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने महंगाई को लेकर अपने अनुमान में बढ़ोतरी की है. केंद्रीय बैंक को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2027 में खुदरा महंगाई दर 5.2 फीसदी रह सकती है. सबसे ज्यादा चिंता दिसंबर तिमाही को लेकर है, जब महंगाई दर 6 फीसदी तक पहुंचने का अनुमान है. यह वही दौर होगा जब देश में त्योहारी सीजन के बाद मांग बनी रहती है. RBI के मुताबिक, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, कमजोर मानसून, अल नीनो और रुपये में कमजोरी महंगाई का दबाव बढ़ा सकते हैं. ऐसे में आने वाले महीनों में आम लोगों के घरेलू बजट और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर असर पड़ने की आशंका है.

वित्त वर्ष 2027 में 5.2% रह सकती है महंगाई

RBI ने वित्त वर्ष 2027 के लिए CPI महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.2 फीसदी कर दिया है. केंद्रीय बैंक के मुताबिक, दूसरी तिमाही में महंगाई 4.9 फीसदी, तीसरी तिमाही में 6 फीसदी और चौथी तिमाही में 5.7 फीसदी रह सकती है. वित्त वर्ष 2028 की पहली तिमाही के लिए भी महंगाई का अनुमान 5.6 फीसदी रखा गया है.

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि आने वाले समय में महंगाई पर सप्लाई से जुड़े कई दबाव बने रह सकते हैं. इनमें मानसून की स्थिति, अल नीनो और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव प्रमुख हैं.

कच्चा तेल क्यों बढ़ा सकता है महंगाई?

पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है. भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है. ऐसे में वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने पर देश में ईंधन और परिवहन की लागत बढ़ सकती है.

इसका असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता. परिवहन महंगा होने से माल ढुलाई, उत्पादन और रोजमर्रा की कई वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है. कंपनियों की लागत बढ़ने पर उसका कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंच सकता है, जिससे महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है.

अल नीनो से खाने-पीने की चीजें हो सकती हैं महंगी

महंगाई के मोर्चे पर दूसरा बड़ा जोखिम अल नीनो और कमजोर या असमान मानसून से जुड़ा है. बारिश कम होने पर फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है. इसका असर सब्जियों, अनाज और अन्य कृषि उत्पादों की सप्लाई पर पड़ सकता है.

अगर कृषि उत्पादन कम रहता है तो खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं. इससे खाद्य महंगाई बढ़ेगी और इसका असर कुल खुदरा महंगाई यानी CPI पर भी दिखाई दे सकता है. यही वजह है कि RBI आने वाले महीनों में खाद्य कीमतों और मानसून की स्थिति पर करीबी नजर रख रहा है.

कमजोर रुपया भी बढ़ा सकता है दबाव

महंगाई का एक और जोखिम रुपये की कमजोरी से जुड़ा है. इस साल रुपये में करीब 6 फीसदी की गिरावट आई है. कमजोर रुपया आयातित वस्तुओं को महंगा कर देता है. कच्चे तेल का भुगतान अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर में होता है, इसलिए रुपये की कमजोरी के साथ तेल आयात की लागत और बढ़ सकती है.

इसका असर ईंधन से लेकर परिवहन और उत्पादन लागत तक दिखाई दे सकता है. ऐसे में कच्चे तेल की ऊंची कीमत और कमजोर रुपया मिलकर महंगाई का दबाव बढ़ा सकते हैं.

दिसंबर तिमाही पर सबसे ज्यादा नजर

RBI का 6 फीसदी का अनुमान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दिसंबर तिमाही में महंगाई केंद्रीय बैंक की ऊपरी सहनशीलता सीमा के करीब पहुंच सकती है. अर्थशास्त्रियों ने भी पहले से ही इस अवधि में महंगाई बढ़ने की आशंका जताई थी.

अगर महंगाई उम्मीद से ज्यादा बढ़ती है और लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है तो RBI पर ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख बनाए रखने का दबाव बढ़ सकता है. बुधवार को RBI MPC ने रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50 फीसदी कर दिया है.

दुनिया के दूसरे केंद्रीय बैंक भी महंगाई से चिंतित

महंगाई का दबाव केवल भारत तक सीमित नहीं है. अमेरिका, यूरोप और जापान के केंद्रीय बैंक भी ऊर्जा कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव से पैदा होने वाले महंगाई जोखिम पर नजर रख रहे हैं.

ऊंची ऊर्जा कीमतें वैश्विक स्तर पर उत्पादन और परिवहन की लागत बढ़ा सकती हैं. ऐसे माहौल में दुनिया के केंद्रीय बैंकों के लिए महंगाई को नियंत्रित करना और आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है.

फिलहाल RBI के सामने भी यही चुनौती है. एक तरफ अर्थव्यवस्था की विकास दर मजबूत बनी हुई है, वहीं दूसरी तरफ कच्चे तेल, खाद्य कीमतों और मौसम से जुड़े जोखिम महंगाई को फिर से ऊपर धकेल सकते हैं.
 


RBI ने 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ाया रेपो रेट, अब महंगे होंगे होम और कार लोन

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के चलते आर्थिक माहौल चुनौतीपूर्ण बना हुआ है. इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार मजबूत बनी हुई है.

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Published - Wednesday, 07 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 07 October, 2026
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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने करीब 44 महीने बाद रेपो रेट में बढ़ोतरी की है. महंगाई के बढ़ते दबाव और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी का फैसला किया है. इसके साथ ही रेपो रेट 5.25 फीसदी से बढ़कर 5.50 फीसदी हो गया है. ब्याज दर बढ़ने का सीधा असर नए कर्ज की लागत पर पड़ेगा, जबकि फ्लोटिंग रेट वाले होम और कार लोन की EMI भी बढ़ सकती है.

फरवरी 2023 के बाद पहली बार बढ़ी ब्याज दर

RBI ने आखिरी बार फरवरी 2023 में रेपो रेट बढ़ाया था. इसके बाद लंबे समय तक ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया. वहीं, साल 2025 में RBI ने फरवरी से दिसंबर के बीच रेपो रेट में कुल 125 बेसिस प्वाइंट की कटौती की थी. अब महंगाई के दबाव के बीच केंद्रीय बैंक ने रुख बदलते हुए रेपो रेट में 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी की है.

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के चलते आर्थिक माहौल चुनौतीपूर्ण बना हुआ है. इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार मजबूत बनी हुई है. हालांकि, महंगाई को लेकर जोखिम बढ़ा है, जिसके चलते मौद्रिक नीति में सख्ती का फैसला लिया गया.

महंगाई बढ़ने की क्या है वजह?

मध्य पूर्व में जारी तनाव और युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव देखने को मिला है. इसका असर केवल ईंधन की कीमतों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राकृतिक गैस, खाद और दूसरी जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति पर भी पड़ा है. इससे महंगाई के मोर्चे पर दबाव बढ़ा है.

इसके अलावा अल नीनो के प्रभाव और कमजोर मानसून ने कृषि उत्पादन को प्रभावित किया है. इससे आने वाले समय में खाद्य कीमतों पर भी दबाव बने रहने की आशंका है. RBI ने अनुमान जताया है कि अगले तीन तिमाहियों में हेडलाइन CPI महंगाई औसतन करीब 5.8 फीसदी रह सकती है.

होम और कार लोन की EMI पर क्या होगा असर?

रेपो रेट बढ़ने से बैंकों के लिए RBI से पैसा लेना महंगा हो जाता है. इसका असर बैंकिंग सिस्टम की ब्याज दरों पर पड़ सकता है. खास तौर पर फ्लोटिंग ब्याज दर वाले होम लोन और अन्य रिटेल लोन की EMI बढ़ सकती है. हालांकि, किसी ग्राहक की EMI में वास्तविक बढ़ोतरी उसके लोन की राशि, बची हुई अवधि, ब्याज दर और बैंक द्वारा दर में किए गए बदलाव पर निर्भर करेगी. यानी रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी का मतलब यह नहीं है कि हर ग्राहक की EMI भी ठीक 25 बेसिस प्वाइंट बढ़ जाएगी. कार लोन समेत अन्य फ्लोटिंग रेट वाले कर्ज पर भी इसका असर पड़ सकता है. वहीं फिक्स्ड रेट वाले मौजूदा लोन पर तुरंत असर जरूरी नहीं है.

आगे भी बढ़ सकती हैं ब्याज दरें

RBI के रुख से संकेत मिलता है कि अगर महंगाई का दबाव आगे भी बना रहता है तो दिसंबर की मौद्रिक नीति बैठक में भी ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. केंद्रीय बैंक का फोकस फिलहाल महंगाई को नियंत्रित रखने के साथ आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखने पर है.

7.1 फीसदी रह सकती है GDP ग्रोथ

RBI के मुताबिक, वैश्विक चुनौतियों के बावजूद घरेलू आर्थिक गतिविधियों में मजबूती बनी हुई है. पहली तिमाही में वास्तविक GDP ग्रोथ 7.8 फीसदी रही. केंद्रीय बैंक ने मौजूदा वित्त वर्ष के लिए GDP ग्रोथ का अनुमान 7.1 फीसदी रखा है.

RBI के अनुमान के मुताबिक दूसरी तिमाही में GDP ग्रोथ 7.2 फीसदी, तीसरी तिमाही में 6.9 फीसदी और चौथी तिमाही में 6.8 फीसदी रह सकती है. वित्त वर्ष 2028 की पहली तिमाही के लिए भी GDP ग्रोथ का अनुमान 7.1 फीसदी रखा गया है.


4 अरब डॉलर का Jio IPO केक के साथ आया

अंबानी परिवार का कैलेंडर ही Jio की IPO टाइमलाइन है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 07 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 07 October, 2026
BWHindia

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

जन्मदिन वाला IPO, एक केक और एक ग्रे मार्केट

रिलायंस अपने भव्य पारिवारिक समारोहों और शानदार पार्टियों के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. परंपरा के मुताबिक, Jio Platforms का मेगा IPO 4 अरब डॉलर की मेहमान सूची, ब्लॉक हुए पैसे और साथ में कोस्टक ट्रेडर्स लेकर आया है. शेयर बाजार के ऊपरी तबके में यह तय माना जा रहा है कि Jio की लिस्टिंग इसे भारत की सबसे मूल्यवान कंपनी बना देगी, जो अपनी पैरेंट कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज की मार्केट कैपिटलाइजेशन को भी पीछे छोड़ देगी. हालांकि, आंकड़ों से परे, आगे काफी ड्रामा और जश्न है और वह भी पूरे रिलायंस स्टाइल में.

आम लोग भारत के अब तक के सबसे बड़े IPO का समय उबाऊ तरीके से तय करते हैं. आप इंतजार करते हैं कि बाजार का मूड खराब होना बंद हो. आप FII के फ्लो की जांच करते हैं. आप पूछते हैं कि क्या 2024 और 2025 में जुटाई गई रकम की मुश्किल से आधी रकम जुटाने वाले इस साल में किसी के पास अब भी अतिरिक्त पैसा बचा है.

या फिर आप अंबानी हैं, ऐसी स्थिति में आप परिवार का व्हाट्सऐप ग्रुप खोलते हैं और लाल रंग से जन्मदिनों को घेरना शुरू कर देते हैं.

बेशक, कुछ भी आधिकारिक नहीं है. SEBI की मंजूरी कई हफ्ते पहले आ चुकी है, लेकिन तारीखें, प्राइस बैंड और लॉट साइज अब भी पकड़ में नहीं आ रहे हैं. बाजार ने इस खाली जगह को वैसे भी भर दिया है. चर्चाएं, भले ही आधी सही हों, कहती हैं कि Jio कोई IPO लॉन्च नहीं कर रहा. वह एक पारिवारिक उत्सव और जन्मदिन की पार्टी आयोजित कर रहा है, जिसमें दलाल स्ट्रीट अति-उत्साहित बारातियों की तरह शामिल है.

जुड़वां पार्टी की शुरुआत करते हैं

बाजार में चर्चा है कि इश्यू शुक्रवार, 23 अक्टूबर को खुलेगा, जो जुड़वां बच्चों ईशा और आकाश का जन्मदिन है. Jio Platforms के हाल ही में नियुक्त मैनेजिंग डायरेक्टर आकाश को उसी दिन मोमबत्तियां बुझाने और किताबें खोलने का मौका मिलेगा. ज्यादातर प्रमोटर एक शांत टोस्ट से संतुष्ट हो जाते हैं. अंबानी परिवार सब्सक्रिप्शन विंडो को केक के साथ सिंक्रोनाइज करना पसंद करता है. दामाद आनंद पीरामल अपना जन्मदिन 25 अक्टूबर को मनाते हैं, जब Jio के लिए सब्सक्रिप्शन का सिलसिला जारी रहेगा.

ग्रे-मार्केट आफ्टर-पार्टी

इसके बाद पैसा ब्लॉक हो जाता है और लाखों भारतीय डिमैट ऐप्स को रिफ्रेश करना राष्ट्रीय खेल बना लेते हैं, जबकि दिखावा करते हैं कि उन्हें कोई परवाह नहीं है. आधिकारिक बाजार एक जिम्मेदार वयस्क की तरह वीकेंड मनाता है. ग्रे मार्केट ऐसा नहीं करता. गुजरात के कोस्टक विशेषज्ञ और हर वह काका जो "किसी को जानता है" Jio के प्रीमियम को शादी में आने वाले मेहमानों की सूची से भी ज्यादा बार काटेंगे और फिर से बनाएंगे.

नीता की बर्थडे पार्टी

शेयर रविवार, 1 नवंबर, नीता अंबानी के जन्मदिन तक स्क्रीन पर आ जाने चाहिए. उस दिन बाजार बंद रहेगा, जो लगभग विचारशील बात है. ऐसा कुछ भी नहीं है जो "हैप्पी बर्थडे, मम्मी" कहने जैसा हो, एक नई लिस्टेड कंपनी के अलावा, जबकि बाकी भारत इस बात पर बहस करेगा कि किसे कितने शेयर मिले.

एंटीलिया की भव्य दिवाली

इसके बाद मुहूर्त ट्रेडिंग आएगी, जिसमें हर स्क्रीन पर नई लिस्टेड Jio चमकती दिखाई देगी और एंटीलिया देश के सबसे महंगे दीये से जगमगाएगा. और अगर बाजार को एक और धक्का चाहिए, तो 28 दिसंबर को धीरूभाई का जन्मदिन कैलेंडर में एक अतिरिक्त शुभ तारीख की तरह मौजूद है.

बैंकरों का तर्क बेशर्म है: बाजार के Jio के प्यार में पड़ने का इंतजार क्यों करें, जब आप शादी तय कर सकते हैं और उसे तोहफों के साथ वहां पहुंचने के लिए मजबूर कर सकते हैं?

Jio ₹15 लाख करोड़ की कहानी बनता है या एक ऐसा बच्चा जो अपने माता-पिता की मार्केट कैप पर आक्रामक नजर रख रहा है, यह बाद की समस्या है.

जुड़वां रिबन काटते हैं. नीता को केक मिलता है. एंटीलिया आफ्टर-पार्टी की मेजबानी करता है. और भारत के निवेशक सोचते हैं कि उन्हें इस जश्न में बुलाया गया था... या सिर्फ नकद लाने के लिए कहा गया था.

दिवाली से पहले रिलायंस ग्रुप ₹30 लाख करोड़ की मार्केट कैप को पार कर जाएगा. यह उसके कट्टर प्रतिद्वंद्वी अडानी से लगभग दोगुना और बिना उत्तराधिकारी वाले टाटा साम्राज्य से भी लगभग दोगुना होगा.

 

पलक शाह, BW रिपोर्टर्स

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)

(पलक शाह एक अनुभवी खोजी पत्रकार हैं और The Market Mafia: Chronicle of India’s High-Tech Stock Market Scandal & The Cabal That Went Scot-Free के लेखक हैं. लगभग दो दशकों के अनुभव के साथ, उन्होंने मुंबई में जमीनी रिपोर्टिंग करते हुए पैसे, ताकत और नियमों के गठजोड़ को उजागर किया है. उनके लेख The Economic Times, Business Standard, The Financial Express और The Hindu Business Line जैसे प्रमुख प्रकाशनों में प्रकाशित हुए हैं. 19 साल की उम्र में अपराध पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले पलक ने जल्द ही समझ लिया कि 1980 के दशक के गैंगवार अब कॉरपोरेट अपराध में बदल चुके हैं. इसी ने उन्हें वित्तीय पत्रकारिता की ओर मोड़ा, जहां उन्होंने बाजार हेरफेर और सिस्टम की खामियों को उजागर किया.)


टाटा स्टील को दूसरी छमाही में घरेलू स्टील मांग 8-10% बढ़ने की उम्मीद, नीदरलैंड्स प्रोजेक्ट पर बातचीत जारी

टाटा स्टील अपने नीदरलैंड्स स्थित प्रोजेक्ट में बदलाव को लेकर वहां की सरकार के साथ लगातार बातचीत कर रही है. कंपनी बाध्यकारी समझौते की ओर बढ़ने से पहले कई लंबित मुद्दों को सुलझाना चाहती है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 07 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 07 October, 2026
BWHindia

टाटा स्टील को चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में घरेलू स्टील की मांग 8-10 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है. कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) और प्रबंध निदेशक (MD) टी. वी. नरेंद्रन ने मंगलवार को कहा कि स्टील की खपत से जुड़े विभिन्न सेक्टरों में मांग मजबूत बनी हुई है, जिससे घरेलू इस्पात उद्योग के लिए आउटलुक सकारात्मक है. नई दिल्ली में इंडियन फाउंडेशन फॉर क्वालिटी मैनेजमेंट (IFQM) के संगोष्ठी कार्यक्रम के दौरान नरेंद्रन ने कहा कि देश में स्टील की मांग को कई प्रमुख खपत वाले क्षेत्रों से समर्थन मिल रहा है. उन्होंने कहा कि दूसरी छमाही में मांग 8-10 प्रतिशत के आसपास रह सकती है और कंपनी भारतीय स्टील उद्योग की संभावनाओं को लेकर सकारात्मक है.

दूसरी छमाही में मांग मजबूत रहने की उम्मीद

नरेंद्रन के मुताबिक, स्टील की खपत करने वाले लगभग सभी प्रमुख सेक्टरों में गतिविधियां मजबूत हैं. ऐसे में चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में घरेलू मांग में अच्छी वृद्धि की उम्मीद है. इससे स्टील कंपनियों के कारोबार को भी समर्थन मिलने की संभावना है.

नीदरलैंड्स में प्रोजेक्ट को लेकर सरकार से बातचीत जारी

टाटा स्टील अपने नीदरलैंड्स स्थित प्रोजेक्ट में बदलाव को लेकर वहां की सरकार के साथ लगातार बातचीत कर रही है. कंपनी बाध्यकारी समझौते (Binding Agreement) की ओर बढ़ने से पहले कई लंबित मुद्दों को सुलझाना चाहती है.

नरेंद्रन ने बताया कि बातचीत में कोक ओवन बंद करने और स्टील स्लैग के वर्गीकरण व प्रबंधन जैसे मुद्दे शामिल हैं. इन सभी मामलों का समाधान होने के बाद ही कंपनी अंतिम समझौते की दिशा में आगे बढ़ सकेगी.

टाटा स्टील नीदरलैंड्स के IJmuiden में स्टील प्लांट संचालित करती है, जिसकी वार्षिक स्थापित क्षमता करीब 70 लाख टन है. कंपनी इस प्लांट में उत्पादन क्षमता और दक्षता बढ़ाने, स्थायी लागत कम करने और उत्पाद मिश्रण तथा मार्जिन को बेहतर बनाने के साथ कम-कार्बन स्टील उत्पादन की दिशा में बदलाव पर काम कर रही है.

2027 तक अंतिम समझौते का लक्ष्य

टाटा स्टील, नीदरलैंड्स सरकार और नॉर्थ हॉलैंड प्रांत ने IJmuiden प्लांट के डीकार्बोनाइजेशन को लेकर बातचीत आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है. अब तीनों पक्ष 1 मार्च 2027 तक अंतिम समझौते तक पहुंचने की दिशा में काम कर रहे हैं.

प्रस्तावित बदलाव के तहत टाटा स्टील नीदरलैंड्स मौजूदा परिसंपत्तियों की जगह डायरेक्ट रिडक्शन प्लांट और इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस लगाने की योजना पर काम कर रही है. इसके पहले चरण का उद्देश्य कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाना है. कंपनी और नीदरलैंड्स सरकार परमिट, कोक और गैस प्लांट, स्टील स्लैग तथा परियोजना के वित्तीय ढांचे से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत कर रहे हैं.


RBI के फैसले से आज तय होगी बाजार की दिशा, गिफ्ट निफ्टी 110 अंक टूटा; इन शेयरों पर नजर

बीते कारोबारी सत्र यानी मंगलवार को सेंसेक्स 685.34 अंक यानी 0.95 फीसदी चढ़कर 73,067.81 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 220.35 अंक यानी 0.98 फीसदी की बढ़त के साथ 22,776.10 पर पहुंच गया.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Wednesday, 07 October, 2026
Last Modified:
Wednesday, 07 October, 2026
BWHindia

भारतीय शेयर बाजार में मंगलवार को लगातार दूसरे दिन जोरदार तेजी के बाद बुधवार को कारोबार की शुरुआत दबाव में होने के संकेत मिल रहे हैं. गिफ्ट निफ्टी 110 अंक से ज्यादा टूटकर 22,700 के नीचे आ गया है, जबकि एशियाई बाजार भी लाल निशान में कारोबार कर रहे हैं. दूसरी ओर, अमेरिकी बाजारों के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने से घरेलू बाजार को कुछ सहारा मिल सकता है. अब निवेशकों की नजर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के फैसले पर है. ब्याज दरों में बदलाव का असर बैंकिंग, NBFC, रियल एस्टेट और ऑटो समेत कई सेक्टर के शेयरों पर देखने को मिल सकता है.

लगातार दूसरे दिन बाजार में जोरदार तेजी

बीते कारोबारी सत्र यानी मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार में लगातार दूसरे दिन तेजी रही. सेंसेक्स 685.34 अंक यानी 0.95 फीसदी चढ़कर 73,067.81 पर बंद हुआ. वहीं, निफ्टी 220.35 अंक यानी 0.98 फीसदी की बढ़त के साथ 22,776.10 पर पहुंच गया. बैंक निफ्टी भी 414 अंक चढ़कर 55,128 पर बंद हुआ, जबकि मिडकैप इंडेक्स में 638 अंक की तेजी रही और यह 59,761 पर पहुंच गया.

सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 21 बढ़त के साथ बंद हुए. ट्रेंट 12.78 फीसदी की तेजी के साथ सबसे बड़ा गेनर रहा. कोटक महिंद्रा बैंक, हिंदुस्तान यूनिलीवर, रिलायंस इंडस्ट्रीज और इंडिगो में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली. दूसरी ओर, टेक महिंद्रा, टाइटन और बजाज फाइनेंस दबाव में रहे.

आज कमजोर शुरुआत के संकेत

मंगलवार की तेज बढ़त के बाद बुधवार सुबह गिफ्ट निफ्टी में कमजोरी बढ़ गई. यह 110 अंक से ज्यादा टूटकर 22,700 के नीचे फिसल गया. इससे घरेलू बाजार में कमजोर शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं. इससे पहले गिफ्ट निफ्टी करीब 22,780 के स्तर पर कारोबार कर रहा था.

बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिकी शेयर बाजारों की रिकॉर्ड तेजी घरेलू बाजार के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और RBI के फैसले से पहले निवेशकों की सतर्कता बाजार पर दबाव डाल सकती है.

RBI का फैसला आज, ब्याज दरों पर बाजार की नजर

आज बाजार की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा घरेलू ट्रिगर RBI की मौद्रिक नीति समिति का फैसला होगा. बाजार में 25 बेसिस पॉइंट की रेपो रेट बढ़ोतरी की अटकलें हैं. हालांकि, कुछ जानकारों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितता और घरेलू महंगाई को देखते हुए RBI इस बार भी ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं कर सकता है.

निवेशकों की नजर सिर्फ रेपो रेट पर ही नहीं, बल्कि RBI के नीतिगत रुख और आगे ब्याज दरों को लेकर उसके संकेतों पर भी रहेगी. अगस्त में खुदरा महंगाई 4.82 फीसदी रही थी. वहीं, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी महंगाई और भारत के चालू खाते पर दबाव बढ़ा सकती है.

ब्रेंट क्रूड 101 डॉलर के पार

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में दो दिन की गिरावट के बाद फिर तेजी लौटी है. ब्रेंट क्रूड 101 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए कीमतों में बढ़ोतरी से आयात बिल, रुपये और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है. इसका असर शेयर बाजार की धारणा पर भी पड़ सकता है.

एशियाई बाजार कमजोर, अमेरिकी बाजार रिकॉर्ड ऊंचाई पर

बुधवार सुबह एशियाई बाजारों में कमजोरी देखने को मिल रही है. जापान का निक्केई करीब 0.40 फीसदी नीचे कारोबार कर रहा है, जबकि हेंगसेंग और कोस्पी करीब 0.50 फीसदी की गिरावट में हैं.

इसके उलट मंगलवार को अमेरिकी बाजारों में मजबूती रही. नैस्डैक और S&P 500 रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचे. अमेरिकी बाजारों की यह तेजी भारतीय शेयर बाजार के लिए सकारात्मक संकेत दे सकती है, हालांकि घरेलू स्तर पर RBI का फैसला आज सबसे बड़ा बाजार ट्रिगर रहेगा.

टाइटन के शेयर पर भी नजर

आज टाइटन का शेयर भी फोकस में रहेगा. कंपनी के सितंबर तिमाही के कारोबारी अपडेट के मुताबिक, घरेलू कारोबार में सालाना आधार पर 22 फीसदी और अंतरराष्ट्रीय कारोबार में 97 फीसदी की वृद्धि हुई. कंपनी का कुल कंज्यूमर कारोबार 25 फीसदी बढ़ा.

तिमाही के दौरान ज्वैलरी कारोबार में 21 फीसदी, घड़ियों से जुड़े कारोबार में 30 फीसदी और आईकेयर कारोबार में 28 फीसदी की वृद्धि हुई. कंपनी ने दूसरी तिमाही में भारत में 77 और विदेश में एक नया स्टोर खोला. इसके साथ 30 सितंबर 2026 तक टाइटन के कुल स्टोर की संख्या 3,758 हो गई.

इन शेयरों पर भी रहेगी नजर

RBI के ब्याज दरों के फैसले के चलते बैंकिंग और NBFC शेयरों में हलचल रह सकती है. ICICI बैंक, HDFC बैंक, SBI, एक्सिस बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक के शेयर फोकस में रहेंगे. NBFC में बजाज फाइनेंस, श्रीराम फाइनेंस और चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट पर नजर रहेगी. हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों में LIC हाउसिंग फाइनेंस, PNB हाउसिंग फाइनेंस और बजाजा हाउसिंग फाइनेंस अहम रहेंगे.

दूसरी ओर, ब्याज दरों में बढ़ोतरी से होम लोन महंगा होने और आवासीय मांग प्रभावित होने की आशंका के कारण DLF, गोदरेज प्रॉपर्टीज, लोढ़ा डेवलपर्स, प्रेस्टीज एस्टेट्स और शोभा डेवलपर्स जैसे रियल एस्टेट शेयरों पर दबाव देखने को मिल सकता है. वाहन लोन महंगा होने की स्थिति में मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स, महिंद्रा, बजाज ऑटो, हीरो मोटोकॉर्प, टीवीएस मोटर और आयशर मोटर्स भी बाजार के रडार पर रहेंगे.

आज बाजार के लिए ये संकेत अहम

आज कारोबार के दौरान निवेशकों की नजर RBI MPC का फैसला, रेपो रेट, RBI का नीतिगत रुख, कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, एशियाई बाजार और गिफ्ट निफ्टी पर रहेगी. मंगलवार की जोरदार तेजी के बाद अगर बाजार कमजोर खुलता है, तो शुरुआती कारोबार में मुनाफावसूली देखने को मिल सकती है. हालांकि, RBI के फैसले और उसके बाद गवर्नर के संकेतों के आधार पर बाजार की दिशा में तेजी से बदलाव भी संभव है.

(डिस्क्लेमर: शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है. 'BW हिंदी' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता. सोच-समझकर, अपने विवेक के आधार पर और किसी सर्टिफाइड एक्सपर्ट से सलाह के बाद ही निवेश करें, अन्यथा आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है.)
 


प्रोटीन की जरूरत समझ रहे शहरी भारतीय, फिर भी 70% रोजाना 41 ग्राम से कम कर रहे सेवन: रिपोर्ट

पोषण को लेकर जागरूकता बढ़ने के बावजूद प्रोटीन और फाइबर का पर्याप्त सेवन नहीं कर पा रहे शहरी भारतीय, कीमत और सुविधाजनक विकल्पों की कमी बनी बड़ी बाधा

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 06 October, 2026
Last Modified:
Tuesday, 06 October, 2026
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भारतीय उपभोक्ताओं में पोषण और खासकर प्रोटीन को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, लेकिन इसका असर उनके रोजाना के खान-पान में पर्याप्त रूप से दिखाई नहीं दे रहा है. यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मिलेट रिसर्च के साथ मिलकर किए गए पेप्सिको इंडिया के एक अध्ययन के मुताबिक, सर्वे में शामिल 70% शहरी भारतीय रोजाना 41 ग्राम से कम प्रोटीन का सेवन करते हैं. वहीं, 61% लोग रोजाना जरूरी मात्रा से कम फाइबर ले रहे हैं.

‘शहरी भारत में प्रोटीन एवं फाइबर की स्थिति’ नाम से किए गए इस अध्ययन में दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता और कोच्चि के 18 से 50 वर्ष की उम्र के 1,250 लोगों को शामिल किया गया. अध्ययन में लोगों की प्रोटीन और फाइबर को लेकर जानकारी, सेवन की आदतों, लाइफस्टाइल, नाश्ते की पसंद और खान-पान के विकल्पों को प्रभावित करने वाले कारकों को समझने की कोशिश की गई.

प्रोटीन को लेकर जागरूकता, लेकिन सही जानकारी का अभाव

अध्ययन के मुताबिक, 74% उपभोक्ताओं ने कहा कि उन्हें प्रोटीन की रोजाना जरूरत के बारे में जानकारी है. हालांकि, इनमें से 56% लोगों की जानकारी सही नहीं थी. यानी प्रोटीन की जरूरत को लेकर जागरूक होने का दावा करने वाले बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं को इसकी सही मात्रा का पता नहीं था या वे इसे लेकर अनिश्चित थे.

इसका असर वास्तविक सेवन में भी दिखाई देता है. सर्वे में शामिल 70% लोग रोजाना 41 ग्राम से कम प्रोटीन का सेवन कर रहे थे. यह स्थिति अध्ययन में शामिल सभी पांच शहरों में देखने को मिली.

फाइबर के मामले में जागरूकता और जानकारी का अंतर ज्यादा

फाइबर को लेकर स्थिति और चुनौतीपूर्ण दिखाई दी. 59% लोगों ने कहा कि उन्हें पता है कि उन्हें रोजाना कितने फाइबर की जरूरत है, लेकिन इनमें से 89% लोगों की जानकारी गलत निकली. केवल 11% उपभोक्ता ही फाइबर की सही जरूरत के बारे में जानते थे.

अध्ययन में शामिल 61% लोग रोजाना अनुशंसित मात्रा से कम फाइबर का सेवन कर रहे थे. जेन एक्स में यह आंकड़ा 65% रहा, जबकि जेन जी और मिलेनियल्स में 58% लोग पर्याप्त फाइबर नहीं ले रहे थे.

कीमत और सुविधाजनक विकल्पों की कमी बड़ी बाधा

प्रोटीन को रोजाना के आहार में शामिल करने की राह में कीमत और सुविधाजनक विकल्पों की कमी प्रमुख बाधाओं के रूप में सामने आई. करीब 60% लोगों ने अधिक कीमत को बड़ी चुनौती बताया, जबकि 57% ने सुविधाजनक और भरोसेमंद प्रोटीन वाले खाद्य विकल्पों की कमी को समस्या माना.

फाइबर के मामले में भी यही स्थिति दिखाई दी. 69% उपभोक्ताओं ने कहा कि सुविधाजनक और भरोसेमंद फाइबर वाले खाद्य विकल्पों की कमी उनके लिए बड़ी बाधा है. कोच्चि में यह आंकड़ा 74%, कोलकाता में 72% और मुंबई में 71% रहा.

उपभोक्ता चाहते हैं रोजमर्रा के खाने में आसानी से शामिल हो प्रोटीन

अध्ययन में यह भी सामने आया कि उपभोक्ता प्रोटीन को किसी अलग या मुश्किल डाइट के बजाय अपने रोजमर्रा के खान-पान का हिस्सा बनाना चाहते हैं. सभी आयु वर्गों में करीब 10 में से 9 लोगों ने कहा कि प्रोटीन को आहार में शामिल करना आसान और स्वाभाविक होना चाहिए.

जेन जी के बीच भी ऐसी ही प्राथमिकता देखने को मिली. अध्ययन के अनुसार, 89% उपभोक्ता चाहते हैं कि प्रोटीन को रोजमर्रा के आहार में आसानी से शामिल किया जा सके, जबकि 90% लोग चाहते हैं कि प्रोटीन परिचित और रोजाना खाए जाने वाले खाद्य विकल्पों के रूप में उपलब्ध हो.

जागरूकता से आगे बढ़कर सही जानकारी की जरूरत

पेप्सिको इंडिया की डायरेक्टर, आरएंडडी लाइफसाइंस और इंडिया आरएंडडी साइट लीड डॉ. अंकिता मारवाह ने कहा कि केवल पोषण के प्रति जागरूकता पर्याप्त नहीं है. उपभोक्ताओं को विश्वसनीय जानकारी को रोजमर्रा के व्यावहारिक विकल्पों में बदलने में मदद करना जरूरी है. उनके मुताबिक, अध्ययन प्रोटीन और फाइबर को लेकर जागरूकता, सही जानकारी और वास्तविक खान-पान के बीच के अंतर को सामने लाता है.

यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल के सीनियर कंसल्टेंट दिलीप राधाकृष्ण के अनुसार, अध्ययन से पता चलता है कि उपभोक्ताओं में प्रोटीन और फाइबर को लेकर रुचि तो है, लेकिन रोजाना की जरूरत की सही समझ का अभाव बना हुआ है. खासकर फाइबर के मामले में जागरूकता और सही जानकारी के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है.

अध्ययन के निष्कर्षों को भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के सहयोग से आयोजित एक कार्यक्रम में जारी किया गया. कार्यक्रम में पोषण, जन स्वास्थ्य और उद्योग जगत से जुड़े विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया. चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि पोषण संबंधी जानकारी को केवल जागरूकता तक सीमित रखने के बजाय ऐसे व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराने की जरूरत है, जिन्हें लोग आसानी से अपने रोजमर्रा के खान-पान में शामिल कर सकें.


सितंबर में ऑटो रिटेल बिक्री ने तोड़े रिकॉर्ड, 25.37 लाख वाहनों की हुई बिक्री; टू-व्हीलर की मांग सबसे मजबूत

सितंबर 2026 में देश में कुल 25,36,920 वाहनों की खुदरा बिक्री हुई, जो पिछले साल के मुकाबले 31.82% अधिक है. FADA के मुताबिक, त्योहारी मांग के साथ पिछले साल का कमजोर बेस भी इस तेज वृद्धि की बड़ी वजह है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 06 October, 2026
Last Modified:
Tuesday, 06 October, 2026
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भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में सितंबर 2026 में जबरदस्त तेजी देखने को मिली है. फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में देशभर में कुल 25,36,920 वाहनों की खुदरा बिक्री हुई. यह सितंबर 2025 की तुलना में 31.82% अधिक है और किसी एक महीने में ऑटो रिटेल बिक्री का रिकॉर्ड स्तर है. त्योहारी सीजन से पहले मांग बढ़ने के साथ-साथ पिछले साल की कम बिक्री का भी इस वृद्धि को फायदा मिला.

टू-व्हीलर और पैसेंजर व्हीकल की बिक्री में जोरदार उछाल

सितंबर में लगभग सभी प्रमुख ऑटो सेगमेंट में बिक्री बढ़ी. टू-व्हीलर की खुदरा बिक्री 33.08% बढ़कर 17,90,188 यूनिट हो गई. वहीं, पैसेंजर व्हीकल्स की बिक्री 32.1% की वृद्धि के साथ 4,27,213 यूनिट रही. कमर्शियल व्हीकल सेगमेंट में भी मजबूत मांग देखने को मिली. सितंबर में इसकी बिक्री 37.62% बढ़ी. थ्री-व्हीलर की बिक्री में 22.25% की वृद्धि दर्ज की गई.

पिछले साल के कमजोर बेस का भी असर

FADA के अध्यक्ष साई गिरिधर के मुताबिक, सितंबर की तेज वृद्धि को समझने के लिए पिछले साल के बेस को देखना जरूरी है. सितंबर 2025 के तीसरे सप्ताह में GST 2.0 लागू होने की आशंका के कारण कई ग्राहकों ने वाहन खरीदने का फैसला टाल दिया था. इससे पिछले साल सितंबर की बिक्री अपेक्षाकृत कमजोर रही थी और इस साल तुलना का आधार नीचे रहा.

हालांकि, FADA के मुताबिक सिर्फ बेस इफेक्ट को इस तेजी की वजह नहीं माना जा सकता. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में कुल वाहन बिक्री 1.55 करोड़ से अधिक रही है. इसके आधार पर वास्तविक वृद्धि दर करीब 20.77% रही, जो ऑटो बाजार में मांग की मजबूती को दर्शाती है.

पेट्रोल और वैकल्पिक ईंधन की हिस्सेदारी करीब बराबर

सितंबर के आंकड़ों में वाहन खरीद के बदलते रुझान की एक और तस्वीर सामने आई है. पेट्रोल और वैकल्पिक ईंधन से चलने वाले वाहनों की हिस्सेदारी अब लगभग बराबर पहुंच गई है. पेट्रोल वाहनों की हिस्सेदारी 41.27% रही, जबकि सीएनजी, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों सहित वैकल्पिक ईंधन वाले वाहनों की हिस्सेदारी करीब 41% तक पहुंच गई. इससे संकेत मिलता है कि भारतीय उपभोक्ताओं के बीच पारंपरिक पेट्रोल वाहनों के अलावा हाइब्रिड, सीएनजी और इलेक्ट्रिक विकल्पों की स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है.

त्योहारी सीजन से आगे भी मांग मजबूत रहने की उम्मीद

डीलर्स को उम्मीद है कि त्योहारी सीजन के दौरान ऑटो बिक्री की रफ्तार बनी रह सकती है. नवरात्रि, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान वाहन खरीदारी बढ़ने से आने वाले महीनों में बिक्री को और समर्थन मिल सकता है.

हालांकि, वाहनों की बढ़ती कीमतें उद्योग के लिए चुनौती बनी हुई हैं. डीलर्स का कहना है कि अगर कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती रही तो इससे ग्राहकों की खरीद क्षमता प्रभावित हो सकती है. ऐसे में मजबूत मांग के बावजूद वाहन कीमतों में बढ़ोतरी आने वाली तिमाहियों में बाजार की रफ्तार के लिए अहम जोखिम बन सकती है.
 


VB-G-RAM G में कामों का दायरा बढ़ा, अब 375 तरह के कामों को मंजूरी; पानी और आजीविका पर जोर

सरकार का कहना है कि कामों का दायरा बढ़ाने का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को मजदूरी के अवसर देने के साथ ऐसी परिसंपत्तियां तैयार करना है, जिनका गांवों में लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सके.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो by
Published - Tuesday, 06 October, 2026
Last Modified:
Tuesday, 06 October, 2026
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ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के साथ बुनियादी सुविधाओं और आजीविका के अवसर बढ़ाने के लिए सरकार ने कामों का दायरा काफी बढ़ा दिया है. विकसित भारत रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) यानी वीबी-जी राम जी के तहत अब 375 तरह के काम कराए जा सकेंगे. ग्रामीण विकास मंत्रालय की नई सूची में पानी संरक्षण, गांवों की बुनियादी सुविधाओं, आजीविका से जुड़े ढांचे और आपदा से बचाव के काम शामिल किए गए हैं. पहले इस व्यवस्था में 266 तरह के काम शामिल थे, यानी नई सूची में इनकी संख्या करीब 41 फीसदी बढ़ गई है.

मंत्रालय के अनुसार, 375 कामों को चार प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया है. इनमें पानी की सुरक्षा से जुड़े 128 काम, गांवों की बुनियादी सुविधाओं से जुड़े 111 काम, आजीविका से जुड़े ढांचे के 98 काम और आपदा की तैयारी एवं बचाव से संबंधित 38 काम शामिल हैं. सरकार का कहना है कि कामों का दायरा बढ़ाने का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को मजदूरी के अवसर देने के साथ ऐसी परिसंपत्तियां तैयार करना है, जिनका गांवों में लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सके.

पानी संरक्षण के लिए सबसे ज्यादा काम

नई सूची में सबसे ज्यादा 128 काम पानी से जुड़े हैं. इनमें छोटे बांध बनाने, भूजल स्तर बढ़ाने वाले ढांचे तैयार करने, नदियों और नालों के सुधार, जलभराव वाली जमीन को उपयोगी बनाने और खेतों तक पानी पहुंचाने वाली नालियों की मरम्मत जैसे काम शामिल हैं.

इसके अलावा बूंद-बूंद सिंचाई, फव्वारा सिंचाई और छतों से बारिश का पानी जमा करने से जुड़े काम भी कराए जा सकेंगे. पानी संरक्षण और सिंचाई को बढ़ावा देने के लिए बर्फ के स्तूप और कृत्रिम हिमनद जैसे उपायों को भी सूची में शामिल किया गया है.

गांवों में पुस्तकालय से स्वास्थ्य केंद्र तक

गांवों की बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के लिए 111 तरह के कामों को मंजूरी दी गई है. इनमें सौर ऊर्जा से चलने वाली सड़क बत्तियां, ग्रामीण पुस्तकालय, पशु चिकित्सा केंद्र, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र और साझा सेवा केंद्र शामिल हैं.

सरकारी स्कूलों में अतिरिक्त कक्षाओं और प्रयोगशालाओं का निर्माण भी कराया जा सकेगा. जल जीवन मिशन के तहत तैयार जलापूर्ति ढांचे की मरम्मत और रखरखाव के अलावा कचरे की छंटाई, पुनर्चक्रण और इस्तेमाल किए गए पानी को साफ करने से जुड़ी सुविधाएं भी इस श्रेणी में शामिल हैं.

ग्रामीण आजीविका बढ़ाने वाले 98 काम

नई सूची में ग्रामीण आय और कारोबार से जुड़े ढांचे पर भी खास जोर दिया गया है. इसके तहत 98 तरह के काम कराए जा सकेंगे. कुल कामों में इनकी हिस्सेदारी करीब 26 फीसदी है, जबकि पुराने ढांचे में ऐसे कामों की हिस्सेदारी केवल 1.1 फीसदी थी. यह आंकड़ा कामों की संख्या के आधार पर है.

इनमें कृषि उत्पादों की सफाई, छंटाई और पैकिंग की इकाइयां, शीत भंडारण, छोटी आटा मिलें, मंडी परिसर और डेयरी से जुड़े ढांचे शामिल हैं. इसके अलावा मशरूम उत्पादन, रेशम उत्पादन, पॉलीहाउस और मछली पालन के लिए जरूरी ढांचे भी बनाए जा सकेंगे.

महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए कार्यस्थल, समूहों के लिए बाजार केंद्र और उनके संघों के भवन बनाने के साथ प्रशिक्षण एवं कौशल विकास केंद्रों को भी मंजूरी दी गई है.

आपदा से बचाव के लिए अलग श्रेणी

नई सूची में पहली बार आपदा की तैयारी और उससे होने वाले नुकसान को कम करने के लिए अलग श्रेणी बनाई गई है. इसमें 38 तरह के काम शामिल हैं. बाढ़ के दौरान राहत आश्रय बनाने, मिट्टी खिसकने से रोकने वाली दीवारें तैयार करने, तटबंध मजबूत करने और बाढ़ से बचाव के उपायों को इसमें शामिल किया गया है. आपदा के बाद ग्रामीण सड़कों और सामुदायिक सुविधाओं को फिर से तैयार करने के काम भी कराए जा सकेंगे. जंगल की आग को फैलने से रोकने वाले उपाय भी इस श्रेणी का हिस्सा हैं.

खेती, महिलाओं और युवाओं पर भी जोर

मंत्रालय ने खेती, कमजोर परिवारों, महिलाओं और ग्रामीण युवाओं को ध्यान में रखते हुए भी कामों की पहचान की है. कुल सूची में खेती और इससे जुड़े क्षेत्रों के 181 काम हैं, जिनमें 52 काम व्यक्तिगत लाभार्थियों के लिए हैं.

कमजोर और अंत्योदय परिवारों के लिए 107 काम चिह्नित किए गए हैं. इनमें 68 काम व्यक्तिगत लाभार्थियों से जुड़े हैं. इनके तहत आवास, शौचालय, ऊर्जा, सिंचाई और पशुओं के आश्रय जैसी सुविधाएं तैयार की जा सकेंगी. महिलाओं और युवाओं से जुड़े 36-36 काम भी चिह्नित किए गए हैं. ये लाभार्थियों के आधार पर बनाई गई श्रेणियां हैं और इन्हें चार प्रमुख श्रेणियों के अतिरिक्त काम नहीं माना जाएगा.

ग्राम सभा तय करेगी प्राथमिकता

हर गांव में स्थानीय जरूरतों के आधार पर विकसित ग्राम पंचायत योजना के जरिए कामों का चयन किया जाएगा. इसके बाद ग्राम सभा से इन योजनाओं को मंजूरी मिलेगी. कामों की डिजिटल निगरानी विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना ढांचे के जरिए की जाएगी.

सरकार के मुताबिक, इस व्यवस्था से केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर की विभिन्न योजनाओं के संसाधनों को एक साथ जोड़ने में मदद मिलेगी. साथ ही, एक ही काम पर अलग-अलग योजनाओं के तहत दोहराव वाला खर्च रोकने की कोशिश की जाएगी.