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राजस्थान में नवीकरणीय ऊर्जा संकट गहराया, ट्रांसमिशन देरी से 50% से अधिक बिजली कटौती
राजस्थान की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता देश में सबसे तेजी से बढ़ने वाली मानी जाती रही है, लेकिन वर्तमान ट्रांसमिशन अवरोध इस विकास को गंभीर रूप से बाधित कर रहे हैं.
रितु राणा 4 months ago
राजस्थान में अपर्याप्त ट्रांसमिशन क्षमता के कारण नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन पर गंभीर असर पड़ा है. राज्य में कई सौर और पवन परियोजनाएँ पूरी क्षमता से चलने के बावजूद बिजली ग्रिड में सप्लाई नहीं कर पा रही हैं, जिससे कंपनियाँ बड़े पैमाने पर उत्पादन घटाने को मजबूर हो गई हैं. इसकी जानकारी सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी (CEA) द्वारा जारी आंकड़ों से मिली है.
8–12 GW प्रोजेक्ट अटके, ट्रांसमिशन नेटवर्क 18–24 महीने लेट
उद्योग के अनुसार लगभग 8–12 GW नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएँ ट्रांसमिशन लाइनों के अधूरे होने के कारण ग्रिड से जुड़ नहीं पा रही हैं. खेतड़ी–नरेला 765 kV लाइन जो नवंबर 2023 में तैयार होनी थी अब 2025 के अंत तक भी पूरी होने की संभावना नहीं है. भाड़ला II–सीकर II और फतेहगढ़ III–ब्यावर ट्रांसमिशन लाइनों में भी एक वर्ष से अधिक की देरी बनी हुई है. भूमि अधिग्रहण और राइट-ऑफ-वे की समस्याओं के चलते डेवलपर्स का कहना है कि वास्तविक कमिशनिंग जून 2026 तक खिंच सकती है.
कटौती 8.5% से बढ़कर 50%+, कंपनियों पर भारी आर्थिक दवाब
मार्च 2025 में कटौती 8.5% थी जो अगस्त तक बढ़कर 51% से ऊपर पहुँच गई. अक्टूबर में भी यह 50% से अधिक बनी रही. कई डेवलपर्स बताते हैं कि लगातार कटौती से राजस्व में भारी गिरावट आई है. कर्ज चुकाने में दिक्कत बढ़ी है और नई परियोजनाओं पर निवेश रोकना पड़ा है.
पावर मौजूद है पर निकालने का रास्ता नहीं
ब्लूपाइन एनर्जी के सीनियर वीपी राहुल मिश्रा के अनुसार, “राजस्थान की सबसे बड़ी चुनौती पावर इवैक्यूएशन की है. प्लांट तैयार हैं, क्षमता मौजूद है लेकिन ग्रिड इतना पावर समाहित और ट्रांसमिट नहीं कर पा रहा. हाई-वोल्टेज कॉरिडोर 15–24 महीने लेट हैं, इसी कारण कटौती तेजी से बढ़ रही है.” उन्होंने कहा कि आने वाले 1–2 साल तक स्थिति कठिन रह सकती है जब तक प्रमुख ट्रांसमिशन लाइनें चालू नहीं होतीं. कुछ डेवलपर्स BESS यानी बैटरी स्टोरेज को विकल्प मान रहे हैं, लेकिन यह समाधान सीमित है और लागत भी अधिक है.
राष्ट्रीय लक्ष्य पर खतरा
राजस्थान भारत के 2030 तक 500 GW नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य में प्रमुख भूमिका निभाता है. लेकिन मौजूदा संकट से इस प्रगति पर ब्रेक लग सकता है. डेवलपर्स ने CERC से मुआवजा, अस्थायी इवैक्यूएशन व्यवस्था और ग्रिड में थर्मल यूनिटों के तकनीकी न्यूनतम से ऊपर चलने की समीक्षा की मांग की है.
समय पर दखल नहीं हुआ तो सेक्टर की रफ्तार घट जाएगी
विशेषज्ञ कहते हैं कि तत्काल नियामकीय हस्तक्षेप जरूरी है. वे साफ मुआवजा तंत्र, नवीकरणीय ऊर्जा के अनिवार्य परिचालन नियमों का कड़ाई से पालन और अस्थायी ट्रांसमिशन समाधान की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो राजस्थान का नवीकरणीय ऊर्जा विकास धीमा पड़ सकता है और भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन की गति पर भी असर पड़ सकता है.
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