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₹22,006 करोड़ के कर्ज के बीच सुभाष चंद्रा की NCLT प्रक्रिया पर आपत्ति, NCLAT में उठाए 5-सदस्यीय बेंच पर सवाल

जी ग्रुप (Zee Group) के संस्थापक की ओर से कहा गया- ₹6.5 करोड़ के रीपेमेंट प्लान को लेकर पिछले 15 दिनों से ‘मीडिया ट्रायल’, जबकि अभी तक कोई अंतिम आदेश नहीं

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 months ago

जी समूह (ZEE Group) के संस्थापक सुभाष चंद्रा ने अपने खिलाफ चल रही दिवाला कार्यवाही में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं. बुधवार को
राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) में हुई सुनवाई के दौरान चंद्रा की ओर से पेश वकील सस्मित पात्रा ने खास तौर पर एनसीएलटी की पांच सदस्यीय पीठ के गठन और उसके अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए.

चंद्रा के वकील ने कहा कि करीब ₹22,006 करोड़ के स्वीकृत लेनदार दावों के मुकाबले प्रस्तावित ₹6.5 करोड़ के भुगतान प्रस्ताव को लेकर पिछले 15 दिनों से उनके मुवक्किल को देशभर में बदनाम किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि मामले की अत्यधिक सार्वजनिक चर्चा ने कानूनी विवाद को ‘मीडिया ट्रायल’ में बदल दिया है और इससे चंद्र की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है.

‘अभी तक कोई अंतिम आदेश नहीं’

एनसीएलएटी में सस्मित पात्रा ने कहा कि इस मामले में फिलहाल कोई अंतिम आदेश मौजूद नहीं है, लेकिन पिछले कई दिनों से सुभाष चंद्रा की सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुंचाया जा रहा है. यह मामला यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (यूके), केनरा बैंक और एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस की ओर से दायर अपीलों से जुड़ा है. इन ऋणदाताओं ने 25 अगस्त को एनसीएलटी की ओर से भुगतान योजना को लेकर दिए गए मत और उससे जुड़ी प्रक्रिया को चुनौती दी है.

केंद्र सरकार के वरिष्ठ विधि अधिकारी तुषार मेहता ने ‘मीडिया ट्रायल’ वाली दलील पर आपत्ति जताते हुए कहा कि एनसीएलएटी की कार्यवाही का इस्तेमाल मीडिया में प्रकाशित होने वाले बयानों के लिए नहीं किया जा सकता. एनसीएलएटी ने इस टिप्पणी पर कोई आदेश पारित नहीं किया और कहा कि चंद्रा अपनी शिकायत एनसीएलटी के सामने उठा सकते हैं, जहां मूल दिवाला कार्यवाही लंबित है.

पांच सदस्यीय एनसीएलटी पीठ के गठन पर सवाल

सुनवाई के दौरान सबसे अहम मुद्दों में से एक एनसीएलटी की पांच सदस्यीय पीठ के गठन और उसके अधिकारों का रहा. इस पीठ ने भुगतान योजना पर नए सिरे से सुनवाई शुरू की है.

पात्रा ने कंपनी अधिनियम की धारा 419(5) का हवाला देते हुए कहा कि इस प्रावधान के तहत सदस्यों के बीच मतभेद होने की स्थिति में सीमित तरीके से मामले को दूसरे सदस्य या सदस्यों के सामने रखा जा सकता है. उनके मुताबिक, यह प्रावधान एनसीएलटी को पांच सदस्यीय पीठ गठित करने का अधिकार नहीं देता. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि पांच सदस्यीय पीठ ने एनसीएलटी के न्यायिक सदस्य निलेश शर्मा की 25 अगस्त की राय पर रोक किस अधिकार के तहत लगाई. हालांकि, एनसीएलएटी ने कहा कि ऋणदाताओं की ओर से दायर मौजूदा अपीलों में पांच सदस्यीय पीठ के गठन की वैधता को सीधे चुनौती नहीं दी गई है. न्यायाधिकरण ने कहा कि अगर चंद्रा इस पीठ के गठन या उसके कामकाज से असंतुष्ट हैं, तो वह 1 सितंबर के आदेश को अलग से चुनौती दे सकते हैं.

‘एनसीएलटी सदस्यों की राय पूरी तरह अलग नहीं’

चंद्रा के वकील ने ऋणदाताओं की उस दलील को भी चुनौती दी कि भुगतान प्रस्ताव पर विचार करने वाले तीन एनसीएलटी सदस्यों की राय पूरी तरह अलग थी. पात्रा के मुताबिक, न्यायिक सदस्य अशोक कुमार भारद्वाज और निलेश शर्मा इस बुनियादी सवाल पर काफी हद तक सहमत थे कि चंद्र दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता की धारा 79 के तहत भुगतान योजना के लिए पात्र हैं.

दोनों के बीच मुख्य मतभेद इस बात को लेकर था कि भुगतान योजना उन लेनदारों पर कैसे लागू होगी, जिन्होंने इसका समर्थन नहीं किया है. भारद्वाज का मत था कि योजना को उन लेनदारों पर लागू किया जाए, जिन्होंने इसका समर्थन किया है, जबकि असहमति जताने वाले ऋणदाताओं को दूसरे वसूली उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी जाए. वहीं, शर्मा का मानना था कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता की धारा 115 के तहत भुगतान योजना सभी लेनदारों पर बाध्यकारी होगी, जिसमें असहमति जताने वाले ऋणदाता भी शामिल हैं.

चंद्रा के वकील ने कहा कि धारा 79 के तहत पात्रता के सवाल पर दोनों सदस्य मूल रूप से एक ही राय रखते थे. इसलिए पूरे मामले को दोबारा शुरू से सुनने की जरूरत नहीं है.

ऋणदाताओं ने अपील वापस लेने का फैसला बदला

सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने शुरुआत में ऋणदाताओं की अपील वापस लेने और भविष्य में जरूरत पड़ने पर उसे फिर से उठाने की अनुमति मांगी. उनका तर्क था कि पांच सदस्यीय एनसीएलटी पीठ पहले ही शर्मा की राय पर रोक लगा चुकी है और मामले की नए सिरे से सुनवाई कर रही है. ऐसे में फिलहाल एनसीएलएटी में अपील पर सुनवाई जरूरी नहीं हो सकती.

हालांकि, चंद्रा के वकील ने इसका विरोध किया. उन्होंने कहा कि शर्मा की राय कभी एनसीएलटी के अंतिम आदेश में तब्दील ही नहीं हुई. इसलिए ऋणदाताओं की अपील की मौजूदा स्थिति पर भी सवाल उठता है.

बाद में मेहता ने अपील वापस लेने की अर्जी पर जोर नहीं दिया और मामले को लंबित रखने का अनुरोध किया. एनसीएलएटी ने इसे स्वीकार करते हुए अगली सुनवाई 7 अक्टूबर के लिए तय कर दी.

₹6.5 करोड़ बनाम ₹22,006 करोड़ का विवाद

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि ₹6.5 करोड़ के भुगतान प्रस्ताव को करीब ₹22,006 करोड़ के स्वीकृत लेनदार दावों के संदर्भ में कैसे देखा जाए. चंद्रा की कानूनी टीम का कहना है कि मामले को सिर्फ ‘₹22,000 करोड़ के दावे के मुकाबले ₹6.5 करोड़ का भुगतान’ के तौर पर पेश करना सही नहीं है. उसके मुताबिक, भुगतान योजना को मंजूरी देने वाला अभी कोई अंतिम और लागू करने योग्य एनसीएलटी आदेश मौजूद नहीं है और अलग-अलग एनसीएलटी सदस्यों की राय की कानूनी स्थिति अभी स्पष्ट नहीं हुई है. दूसरी ओर, ऋणदाताओं का जोर भुगतान प्रस्ताव से जुड़ी एनसीएलटी की प्रक्रिया, उसके प्रभाव और असहमति जताने वाले लेनदारों के अधिकारों पर है.

एनसीएलएटी की ओर से ऋणदाताओं की अपीलों को लंबित रखने का मतलब है कि यह कानूनी चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है. अब एनसीएलटी की पांच सदस्यीय पीठ भुगतान योजना पर आगे सुनवाई करेगी. मामले में अगली अहम सुनवाई 7 अक्टूबर को होगी.


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