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भारत के सेवा क्षेत्र में अब 30% रोजगार, लेकिन वैश्विक औसत से अब भी पीछे: नीति आयोग

नीति आयोग की नई रिपोर्ट में सेवाओं में रोजगार वृद्धि के साथ-साथ धीले ढांचेगत बदलाव, शहरी–ग्रामीण और लैंगिक अंतराल व कम-मूल्य रोजगार की चुनौतियों पर चेतावनी दी गई है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 10 months ago

भारत के सेवा क्षेत्र में अब देश की कुल कार्यबल का लगभग 30% हिस्सा कार्यरत है, जो वर्ष 2011–12 के 26.9% से बढ़ा है. मंगलवार को जारी नीति आयोग की नई रिपोर्ट के अनुसार, पिछले छह वर्षों में लगभग 4 करोड़ नई नौकरियां जुड़ी हैं, लेकिन इसके बावजूद यह हिस्सा वैश्विक औसत 50% से काफी नीचे है. यह संकेत देता है कि भारत में आर्थिक ढांचे का परिवर्तन (Structural Transition) अभी धीमी गति से हो रहा है.

रिपोर्ट का शीर्षक है ‘भारत का सेवा क्षेत्र: रोजगार प्रवृत्तियों और राज्यों की गतिशीलता से मिली अंतर्दृष्टियाँ’. इसमें कहा गया है कि सेवा क्षेत्र भारत की राष्ट्रीय आय में आधे से अधिक का योगदान देता है, लेकिन कुल नौकरियों का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही इसी क्षेत्र से आता है. अधिकांश नौकरियां अनौपचारिक और कम वेतन वाली हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत की “सेवाओं पर आधारित विकास रणनीति” में उत्पादन तो बढ़ा है, पर उचित मात्रा में गुणवत्तापूर्ण रोजगार नहीं बना.

शहरी–ग्रामीण और लैंगिक अंतराल गहराया

रिपोर्ट में सेवा क्षेत्र में भारी क्षेत्रीय असमानता उजागर की गई है. शहरी क्षेत्रों में जहां 60% से अधिक कर्मचारी सेवाओं में कार्यरत हैं, वहीं ग्रामीण भारत में यह आंकड़ा 20% से भी कम है. लैंगिक असमानता भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. ग्रामीण महिलाओं में केवल 10.5% महिलाएं ही सेवाओं में कार्यरत हैं, जबकि शहरी महिलाओं का यह अनुपात 60% है. इसके अलावा, ग्रामीण महिलाओं का रोजगार प्रायः कम-मूल्य या अस्थायी कार्यों तक सीमित है.

रिपोर्ट यह भी इंगित करती है कि शिक्षा स्तर में वृद्धि और रोजगार की गुणवत्ता के बीच असंगति बढ़ रही है. इसलिए नीति आयोग ने कहा है कि स्किलिंग प्रोग्राम्स को बदलते क्षेत्रीय और तकनीकी जरूरतों के अनुरूप बनाना जरूरी है.

राज्य स्तर पर असमान विकास

रिपोर्ट के अनुसार, बड़े राज्यों में रिटेल ट्रेड और ट्रांसपोर्ट सेक्टर में सबसे अधिक रोजगार हैं, लेकिन इन क्षेत्रों की उत्पादकता कम है. इसके विपरीत, आधुनिक सेवाएं जैसे आईटी, फाइनेंस और प्रोफेशनल सर्विसेज महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में तेजी से बढ़ रही हैं. हालांकि, इन उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्रों में रोजगार सृजन सीमित है.

दूसरी ओर, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे पिछड़े राज्य पारंपरिक और कम-मूल्य सेवाओं पर निर्भर हैं, जिससे आय और अवसरों की खाई और चौड़ी हो रही है.

चार-स्तरीय नीतिगत रोडमैप

नीति आयोग ने इन असमानताओं को दूर करने के लिए चार प्रमुख सिफारिशें दी हैं.

1. गिग, स्व-रोजगार और MSME कर्मियों के लिए औपचारिकता और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना.

2. महिलाओं और ग्रामीण युवाओं के लिए लक्षित स्किलिंग व डिजिटल एक्सेस प्रदान करना.

3. ग्रीन इकॉनमी और नई तकनीक आधारित कौशल में निवेश बढ़ाना.

4. टियर-II और टियर-III शहरों में सेवा हब विकसित कर संतुलित क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देना.

यह अध्ययन NSS (2011–12) और PLFS (2023–24) के दीर्घकालिक आंकड़ों पर आधारित है, और यह पहली बार राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर सेवा क्षेत्र में रोजगार की विस्तृत तस्वीर पेश करता है.

GVA में सेवा क्षेत्र का योगदान 55% तक पहुंचा

एक अन्य रिपोर्ट, ‘भारत का सेवा क्षेत्र: GVA प्रवृत्तियों और राज्यों की गतिशीलता से मिली अंतर्दृष्टियाँ’, में बताया गया है कि सेवाओं का सकल मूल्य वर्धन (GVA) में योगदान 2024–25 में बढ़कर 55% हो गया है, जो 2013–14 में 51% था.

हालांकि राज्यों के बीच आर्थिक असमानताएं अभी भी बनी हुई हैं, लेकिन कुछ कमजोर राज्य अब सुधार के संकेत दिखा रहे हैं. यह संकेत देता है कि भारत में एक “अधिक समावेशी सेवा-प्रधान परिवर्तन” की दिशा में प्रगति हो रही है.

रिपोर्ट में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक्स, वित्त, नवाचार और स्किलिंग में निवेश बढ़ाने की सिफारिश की गई है, साथ ही राज्य-विशिष्ट सेवा रणनीतियाँ और संस्थागत क्षमता निर्माण को मजबूत करने पर बल दिया गया है.

 


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