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पब्लिक सेक्टर बैंकों के मर्जर का नहीं कोई प्लान, सरकार ने अफवाहों पर लगाया विराम

केंद्र सरकार की पब्लिक सेक्टर बैंकों को मर्ज करने का कोई योजना नहीं है. एक सरकारी अधिकारी ने यह जानकारी दी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 2 years ago

काफी लंबे समय से पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSB) के मर्जर और प्राइवेटाइजेशन को लेकर खबरें चल रही हैं. अब इन अफवाहों पर सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने प्रतिक्रिया दी है, उन्होंने कहा कि वह लोकसभा चुनाव के दौरान बैंकों के मर्जर या प्राइवेटाइजेशन पर टिप्पणी नहीं कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि आम चुनाव चल रहे हैं, ऐसे मुद्दों पर टिप्पणी करना उचित नहीं है. बता दें कि देश में लोकसभा चुनाव चल रहा है. इस चुनाव के चार चरण की वोटिंग हो चुकी है लेकिन फाइनल रिजल्ट 4 जून को आने वाला है.

बैंकों के मर्जर की कोई योजना नहीं

केंद्र सरकार की पब्लिक सेक्टर बैंकों को मर्ज करने का कोई योजना नहीं है. वरिष्ठ अधिकारी ने इसके साथ जानकारी देते हुए बताया कि पब्लिक सेक्टर बैंकों को मर्ज करने की कोई योजना नहीं है. हमें ऐसी किसी भी तरह की बातचीत की जानकारी नहीं है. भारत में फिलहाल 12 सरकारी बैंक हैं. सरकार ने साल 2020 में PSU बैंकों का मर्जर कर उनकी संख्या को कम किया था. उस समय कुल 10 सरकारी बैंकों को मर्जर के जरिये 4 बैंक में समेट दिया गया था.

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पहले भी कई बैंकों का हो चुका है मर्जर

सार्वजनिक बैंकों के मर्जर की प्रक्रिया के तहत Punjab National Bank में Oriental Bank of Commerce और United Bank का विलय किया गया था. Canara Bank में Syndicate Bank को मर्ज किया गया था. इसके अलावा, Union Bank of India ने Andhra Bank और Corporation Bank का विलय किया था, जबकि इंडिया बैंक का विलय Allahabad Bank के साथ हुआ था. इससे पहले Vijaya Bank और Dena Bank का एक अप्रैल, 2019 को Bank of Baroda में विलय किया गया था.

सरकार ने अफवाहों पर लगाया विराम

दिसंबर 2023 में इस बात को लेकर अटकलें लगाई जा रही थी कि यूनियन बैंक और यूको बैंक का मर्जर हो सकता है. इसके अलावा, बैंक ऑफ इंडिया और बैंक ऑफ महाराष्ट्र के विलय भी अटकलें थीं. बाद में वित्त मंत्रालय ने साफ किया था कि जिन दस्तावेजों के आधार पर इसकी बात की जा रही है, वह अधीनस्थ कानून से जुड़ी संसदीय कमेटी का मामला है और इसका बैंक मर्जर की पॉलिसी से कोई संबंध नहीं है. वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी कहना था कि चर्चा अधीनस्थ कानून पर संसदीय समिति की एक नियमित प्रक्रिया का हिस्सा है और यह मर्जर के मुद्दे से जुड़ा नहीं है. 
 


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