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माधबी पुरी बुच की 'जेन स्ट्रीट विवाद' पर खोखली सफाई

पूर्व सेबी चेयरपर्सन अपने विवादास्पद कार्यकाल की छाया से निकलकर एक ऐसा प्रेस बयान लेकर सामने आई हैं, जो इतना चमकदार है कि उसे दर्पण की तरह इस्तेमाल किया जा सके.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 11 months ago

पलक शाह

एक ऐसे प्रेस बयान में जो आत्मविश्वास से ओतप्रोत और आक्रोश से लिपटा हुआ था, पूर्व सेबी चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच ने अपने कार्यकाल की कहानी दोबारा लिखने की कोशिश की. उन्होंने दावा किया कि उनका कार्यकाल सतर्कता का गढ़ था, जिसने अप्रैल 2024 में ही जेन स्ट्रीट की चालबाजियों को सूंघ लिया था. एक अनुभवी कलाकार की गंभीरता और सावधानी से चुनी गई समय-रेखाओं के साथ, और 105-पन्नों के एक अंतरिम आदेश को जीत के झंडे की तरह लहराते हुए, बुच ने जोर देकर कहा कि सेबी “मामले से अवगत” थी, काफी पहले  अमेरिका स्थित क्वांट ट्रेडिंग दिग्गज जेन स्ट्रीट पर 3 जुलाई 2025 को प्रतिबंध लगाने से पहले ही.

लेकिन उनके ये दावे, जिनमें मीडिया पर “झूठा नैरेटिव” फैलाने का आरोप भी शामिल था, एक सरल लेकिन तीखे सवाल के सामने बिखर जाते हैं: यदि सेबी इतनी सक्रिय थी, तो 15 महीने तक एक पक्षीय अंतरिम आदेश जारी करने में इतनी देर क्यों हुई? क्यों खुदरा निवेशकों को अरबों का नुकसान उठाना पड़ा, जबकि जेन स्ट्रीट ने कथित रूप से ₹36,502 करोड़ siphon कर लिए? इसका जवाब एक ऐसी नियामक नौटंकी को उजागर करता है, जिसे देखकर सेबी के सबसे बड़े समर्थक भी शर्मिंदा हो सकते हैं.

मार्च 2022 से फरवरी 2025 तक का बुच का कार्यकाल सुधारों के स्वर्ण युग के रूप में बेचा गया था, जिसमें एआई आधारित निगरानी और भारत के खुदरा निवेशकों के लिए अटूट सुरक्षा का वादा किया गया था. फिर भी जेन स्ट्रीट कांड इंडेक्स मैनिपुलेशन की एक मास्टरक्लास, जिससे फर्म ने कथित रूप से $5 अरब से अधिक की कमाई की. उनके कार्यकाल की विफलताओं का एक विराट स्मारक बनकर खड़ा है. सेबी का 3 जुलाई को जारी किया गया आदेश, जो अब नए चेयरपर्सन तुहिन कांत पांडे के नेतृत्व में आया, जेन स्ट्रीट को प्रतिबंधित करता है और ₹4,843 करोड़ की “गैरकानूनी कमाई” को फ्रीज करता है.

लेकिन यह कोई नियामक दूरदर्शिता की जीत नहीं थी. यह तो बस एक डैमेज कंट्रोल था, जिसे सेबी की किसी हाई-टेक प्रणाली ने नहीं, बल्कि 2024 में अमेरिका की एक अदालत में हुए कोर्टरूम ड्रामा ने प्रेरित किया, जहाँ जेन स्ट्रीट के अपने वकीलों ने भारत में हुए अरबों डॉलर के लाभ का पर्दाफाश कर दिया. यदि मैनहट्टन कोर्ट ने जेन स्ट्रीट की ‘गंदगी’ सार्वजनिक न की होती, तो क्या सेबी आज भी “मामले से अवगत” होने का दिखावा कर रही होती, उंगलियाँ घुमाते हुए, जबकि खुदरा निवेशक अपनी पूंजी गवाँते रहते?

बुच की सफाई की परतें खोलना
वह दावा करती हैं कि SEBI ने अप्रैल 2024 में अपनी जांच शुरू की थी, जिसमें Jane Street के जटिल ट्रेडिंग पैटर्न को समझने के लिए एक “मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम” गठित की गई थी. पॉलिसी सर्कुलर जारी किए गए, फरवरी 2025 में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के माध्यम से एक सीज़-एंड-डेसिस्ट पत्र भेजा गया, फिर भी Jane Street ने कथित रूप से मई 2025 तक अपनी “सुबह पंप, दोप

हर डंप” रणनीति बेरोकटोक जारी रखी. यदि SEBI वास्तव में इतनी गंभीरता से “मामले से अवगत” थी, तो एक इंटरिम एक्स-पार्टी ऑर्डर जारी करने में 15 महीने क्यों लगे जबकि यह एक आपातकालीन उपाय है, जिसे बिना देरी के बाजार की सुरक्षा के लिए लागू किया जाता है? एक्स-पार्टी ऑर्डर SEBI की नियामक राम पुरी (चाकू) है, जिसे निवेशकों को शोषणकारी गतिविधियों से तुरंत बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए. न्यायपालिका ने SEBI को बार-बार कम आवश्यक मामलों में ऐसे आदेशों के दुरुपयोग के लिए फटकार लगाई है, फिर जब Jane Street जैसा विशालकाय कथित रूप से भारतीय बाजारों में हेरफेर कर रहा था और खुदरा निवेशकों की संपत्ति को खत्म कर रहा था, तब SEBI की राम पुरी चुपचाप म्यान में ही क्यों रही? क्यों?

बुच की सफाई तब और भी अधिक कमजोर लगने लगती है जब Jane Street के प्रभुत्व और इस घोटाले के पैमाने पर नजर डाली जाती है. Jane Street के ट्रेड्स (जिन्हें SEBI के अपने आदेश में एक्सपायरी-डे की कीमतों में हेरफेर की एक सुनियोजित योजना के रूप में वर्णित किया गया है) ने प्रमुख दिनों में भारत के डेरिवेटिव बाजार में चौंका देने वाला 28 प्रतिशत हिस्सा घेर लिया. एक ऐसा नियामक जो अत्याधुनिक निगरानी प्रणालियों का दावा करता है, उसके लिए लगभग एक-तिहाई बाजार पर एकल इकाई का कब्जा न देख पाना न केवल चूक है, बल्कि यह एक आपदा है. SEBI की प्रणाली ₹10 अरब से अधिक की स्थिति को फ़्लैग करने के लिए डिज़ाइन की गई है, फिर भी Jane Street का यह दबदबा या तो पकड़ा नहीं गया, या और भी बुरा  नजरअंदाज कर दिया गया. चीन में, 5 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी होने पर तत्काल जांच शुरू हो जाती है, और 15 प्रतिशत टैक्स के भुगतान तक फंड रेपट्रियेशन पर रोक लग जाती है. भारत में, Jane Street कथित रूप से अरबों रुपये “व्यावसायिक आय” के नाम पर, डबल टैक्सेशन अवॉयडेंस एग्रीमेंट्स के तहत, टैक्स-मुक्त ले जाती रही. क्या बुच के कार्यकाल में SEBI ने कभी प्रवर्तन निदेशालय या सरकार को इस बड़े पैमाने पर हो रहे पूंजी प्रवाह की सूचना दी? यह खामोशी बहुत कुछ कहती है.

SEBI का अधिकार NSE को सौंपना और बुच की भूमिका पर उठते सवाल
SEBI का यह निर्णय और भी ज्यादा चौंकाने वाला है कि उसने अपना अधिकार NSE को आउटसोर्स कर दिया. यदि बाजार में हेरफेर जैसे मामलों पर SEBI का एकमात्र अधिकार है, तो फिर बुच के कार्यकाल में फरवरी 2025 में Jane Street को चेतावनी पत्र जारी करने का निर्देश सीधे SEBI की ओर से देने के बजाय NSE के माध्यम से क्यों दिया गया? केतन पारेख घोटाले के बाद गठित संयुक्त संसदीय समिति ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया था कि कीमतों में हेरफेर की निगरानी SEBI द्वारा की जाए, न कि स्टॉक एक्सचेंजों द्वारा. NSE को जिम्मेदारी सौंप कर क्या SEBI जवाबदेही से बचना चाह रही थी, एक ऐसी कमजोर सफाई तैयार कर रही थी जो अदालत में तकनीकी आधार पर धराशायी हो सकती थी? या यह जानबूझकर किया गया विलंब था, जिससे Jane Street को अपने मुनाफे को भारत से बाहर ले जाने के लिए पर्याप्त समय मिल सके? बुच का यह दावा कि SEBI “गंभीरता से जटिल संरचनाओं की जांच कर रही थी,” इस सवाल का उत्तर नहीं देता.

बुच का दावा है कि SEBI की जांच फरवरी 2025 तक पूरी हो चुकी थी, जब वे अब भी पद पर थीं. तो फिर कार्रवाई जुलाई तक क्यों टाली गई? इन अतिरिक्त महीनों ने Jane Street को अपनी कमाई को भारत से बाहर ले जाने के लिए एक सुनहरा अवसर दे दिया, जिससे भारत के खजाने को भारी नुकसान हुआ. SEBI के अपने अध्ययन, जो बुच के कार्यकाल में किए गए थे, दिखाते हैं कि डेरिवेटिव्स में 90-91 प्रतिशत खुदरा निवेशकों ने पैसे गंवाए, और वित्त वर्ष 2024-25 में ये घाटा ₹1.05 लाख करोड़ तक पहुंच गया. यदि SEBI इन हारने वालों की पहचान कर सकी, तो वह विजेताओं को कैसे नहीं देख सकी जैसे कि Jane Street, जिसने कथित रूप से हेरफेर के जरिये अरबों की कमाई की? क्या SEBI आंख मूंदे बैठी थी, या फिर वह इस नुकसान को होते हुए देखती रही? Jane Street घोटाला पहले के को-लोकेशन स्कैम की तरह ही दूसरा बड़ा मामला है, जिसने SEBI की पुरानी कमजोरियों को उजागर किया है.

और जुलाई 2017 की उस चर्चित फाइल नोटिंग का क्या हुआ, जिसमें कथित तौर पर SEBI की सर्विलांस डिपार्टमेंट को इनसाइडर ट्रेडिंग और फ्रंट रनिंग को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया गया था, कीमतों में हेरफेर के मुकाबले? वह निर्देश किसने तैयार किया था, और क्यों एक प्रणालीगत खतरे कीमतों में हेरफेर को पीछे धकेल दिया गया?

बुच का प्रेस बयान भटकाव की एक मिसाल है, लेकिन यह उनके कार्यकाल के घावों को नहीं मिटा सकता. Jane Street घोटाला सिर्फ एक नाकामी नहीं है, यह भारत के 10 करोड़ खुदरा निवेशकों के साथ किया गया विश्वासघात है, जिन्होंने SEBI पर अपने धन की रक्षा का भरोसा किया था. तुहिन कांत पांडे द्वारा Jane Street के खिलाफ की गई त्वरित कार्रवाई एक आशा की किरण जरूर देती है, लेकिन बुच के बिखरे हुए कार्यकाल के घाव अभी भी गहरे हैं. उनकी विरासत, जो कभी सुधारवादी शान में लिपटी थी, अब बर्बादी के कगार पर है, एक चेतावनी भरी कहानी उस नियामक की, जिसने चांद का वादा किया और वैश्विक दिग्गजों द्वारा लूटे गए बाजार को सौंप दिया. सरकार को SEBI की निष्क्रियता की जांच अवश्य करनी चाहिए. अनदेखी चेतावनियों से लेकर अरबों की बिन रोक-टोक देश से बाहर निकासी तक. इससे कम कुछ भी उन खुदरा निवेशकों का अपमान होगा, जो उस हाई-टेक भ्रम का खामियाजा भुगत रहे हैं, जिसे SEBI कहा जाता है एक ऐसा संस्थान, जिसकी मुंबई में दो मुख्यालय इमारतें हैं, जिनकी कीमत ₹2,000 से ₹4,000 करोड़ के बीच है, और जो शायद लैंगली (CIA मुख्यालय) को भी शर्मिंदा कर दें.


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