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किर्लोस्कर प्रकटीकरण विवाद: स्वतंत्र निदेशक सवालों के घेरे में

डॉ. के.एम. अब्राहम और विनेश कुमार जैरथ की सेबी पृष्ठभूमि के बावजूद, KOEL में पारदर्शिता की बजाय कानूनी रणनीति को दी गई प्राथमिकता ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है.

बिजनेस वर्ल्ड ब्यूरो 11 months ago

पलक शाह

सेबी ने 2023 में लिस्टिंग दायित्व और प्रकटीकरण आवश्यकताएं (LODR) के तहत नियम 30A को लागू कर कॉर्पोरेट क्षेत्र में भूचाल ला दिया था. इसका उद्देश्य प्रमोटर परिवारों के गुप्त समझौतों से पर्दा हटाना था. इस पारदर्शिता को मजबूती देने के लिए धारा 5A जोड़ी गई, जो उन सभी समझौतों या दस्तावेजों का प्रकटीकरण अनिवार्य बनाती है, जिनका सूचीबद्ध कंपनियों के नियंत्रण या प्रबंधन पर प्रभाव पड़ता है, भले ही वे कंपनियां उन समझौतों की पक्षकार न हों.

भारत की बड़ी कंपनियों ने तुरंत अनुपालन किया, लेकिन अतुल और राहुल किर्लोस्कर के बीच चल रहा टकराव और उससे जुड़ी कंपनियों जैसे कि किर्लोस्कर ऑयल इंजन लिमिटेड (KOEL) ने इस मुद्दे को गवर्नेंस संकट और कानूनी लड़ाई में बदल दिया है. इसमें स्वतंत्र निदेशकों की अहम लेकिन विफल भूमिका उजागर हो रही है. सेबी के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी डॉ. के.एम. अब्राहम और विनेश कुमार जैरथ KOEL के बोर्ड में होने के बावजूद कंपनी को पारदर्शिता की दिशा में तेजी से बढ़ाने में नाकाम रहे हैं. यह निवेशकों के हितों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है.

स्वतंत्र निदेशक: संरक्षक या चौकीदार?

स्वतंत्र निदेशक निवेशकों की सुरक्षा की रीढ़ होते हैं. सेबी की 2021 की स्टूअर्डशिप कोड और LODR गाइडलाइंस के तहत उन्हें अल्पसंख्यक शेयरधारकों के हितों की रक्षा करनी होती है. KOEL जैसी प्रमोटर-प्रेरित कंपनियों में, उनका रोल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, खासकर नियम 30A के तहत.

डॉ. के.एम. अब्राहम (सेबी Whole-Time Member, 2010–2013) जिन्होंने कड़े प्रवर्तन नियम बनाए थे, खासतौर पर प्रकटीकरण के मामलों में, और विनेश कुमार जैरथ, (सेबी बोर्ड सदस्य, 2004–2007) जिन्होंने सिक्योरिटी रिफॉर्म्स में भूमिका निभाई, दोनों का बोर्ड में होना गवर्नेंस का स्वर्ण मानक माना जा रहा था.

फिर भी, KOEL का 2009 किर्लोस्कर फैमिली सेटलमेंट डीड (DFS) को प्रकटीत करने में लगातार देरी करना और बोर्ड द्वारा उसमें सहमति देना, यह सवाल उठाता है कि ये वरिष्ठ निदेशक पारदर्शिता की लड़ाई क्यों नहीं लड़ पाए? ये मामला स्पष्ट करता है: कितनी भी बड़ी पृष्ठभूमि हो, यदि स्वतंत्र निदेशक प्रमोटरों के प्रभाव से मुक्त होकर कार्य नहीं करते, तो वे निवेशकों के हितों की रक्षा नहीं कर सकते.

कॉर्पोरेट पारदर्शिता का मानक, पर एक कोना धुंधला

भारत की बड़ी कंपनियों ने नियम 30A का पालन करते हुए पारदर्शिता का उदाहरण प्रस्तुत किया:

- TVS ग्रुप: पुनर्गठन के दौरान पारिवारिक समझौते सार्वजनिक किए

- DCM लिमिटेड: पुराने पारिवारिक समझौते रिपोर्ट किए

- Hikal Ltd.: प्रमोटर समझौतों को समय पर उजागर किया

- Adani Wilmar Ltd.: संयुक्त उद्यम समझौते सार्वजनिक किए

इन उदाहरणों ने सेबी के उद्देश्य को मजबूत किया: प्रमोटर समझौते भी सार्वजनिक जांच के दायरे में होने चाहिए. लेकिन KOEL और उसकी सहयोगी कंपनियां किर्लोस्कर इंडस्ट्रीज, किर्लोस्कर फेरस, किर्लोस्कर पनमैटिक और जी.जी. डांडेकर अभी भी DFS प्रकटीकरण में देरी के जाल में उलझी हैं.

देरी की रणनीति: किर्लोस्कर की किताब

2009 का DFS, जिसमें व्यापार विभाजन और नॉन-कम्पीट क्लॉज शामिल हैं, सिर्फ एक पारिवारिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक गवर्नेंस बम है. संजय किर्लोस्कर के नेतृत्व वाली किर्लोस्कर ब्रदर्स लिमिटेड (KBL) ने इसे अप्रैल 2016 में BSE और NSE को रिपोर्ट कर दिया था. पर KOEL और अन्य सहयोगी कंपनियों ने इससे बचते हुए 18 से अधिक फोरमों में रणनीतिक लड़ाई छेड़ दी, जिससे SEBI के दिसंबर 2024 के निर्देश के बाद भी 10 महीने तक प्रकटीकरण नहीं हुआ.

- कोर्ट और मध्यस्थता संघर्ष (2017–2024): KOEL की 2017 में La-Gajjar Machineries की खरीद ने DFS की नॉन-कम्पीट क्लॉज का उल्लंघन किया, जिससे 2018 में केस और 2024 में सुप्रीम कोर्ट तक विवाद पहुँचा.

- SEBI और SAT संघर्ष (2024–2025): SEBI ने 30 दिसंबर 2024 को DFS प्रकटीकरण की मांग की. KOEL ने 3 जनवरी 2025 को SAT में अपील कर दी, जिसे SAT ने अप्रैल 2025 तक टाल दिया.

- बॉम्बे हाईकोर्ट चाल (2025): जून 2025 में पांच किर्लोस्कर कंपनियों ने 30A की वैधता को हाई कोर्ट में चुनौती दी. SEBI के हलफनामे के बाद, 26 सितंबर को याचिका वापस ली गई. KOEL ने दावा किया कि DFS “कोई लागू करने योग्य प्रतिबंध” नहीं लगाता.

यह बहु-स्तरीय प्रक्रिया एक सीधी प्रकटीकरण मांग को धोखे की दौड़ में बदल चुकी है. इस दौरान स्वतंत्र निदेशक कहां थे?

सेबी की चूक: विनियामक कमजोरी?

SEBI ने अप्रैल 2024 को सुप्रीम कोर्ट में DFS के “प्रकटीकरण” को आवश्यक कहा था. दिसंबर 2024 में DFS को “Material” कहा गया. लेकिन सितंबर 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट में दिया हलफनामा, जिसमें "डिस्क्लेमर" की अनुमति दी गई, KOEL के लिए एक कानूनी छेद बन गया. KOEL ने इसका लाभ उठाते हुए DFS की प्रासंगिकता नकार दी. यह SEBI की नीति में गिरावट है. स्वतंत्र निदेशकों को ऐसे समय पर पूरे प्रकटीकरण के लिए जोर देना चाहिए था, न कि आंशिक और झूठे प्रकटीकरण को स्वीकार करना.

छिपे हुए दांव: DFS की अहमियत

DFS में कई विस्फोटक क्लॉज हैं, जैसे कि 2009 में ₹250 करोड़ मूल्य के टॉयोटा जॉइंट वेंचर्स का विक्रम किर्लोस्कर और उनके नॉमिनी को ट्रांसफर यह संबंधित पार्टी लेनदेन के नियमों का उल्लंघन हो सकता है. KOEL द्वारा 2017 में La-Gajjar के अधिग्रहण ने DFS की नॉन-कम्पीट क्लॉज को तोड़ा. इन देरी से, बोर्ड ऐसे गवर्नेंस उल्लंघनों को छिपा रहा है, जिसे निवेशकों को जानने का अधिकार है.

निगरानी का संकट: प्रहरी कहां हैं?

डॉ. अब्राहम और जैरथ की सेबी पृष्ठभूमि ने KOEL में पारदर्शिता की उम्मीदें जगाईं थीं. लेकिन उनका बोर्ड में होना अब सिर्फ कानूनी चालों से जुड़ा दिखता है, न कि पारदर्शिता से. सेबी के दिशानिर्देशों की आत्मा कहती है कि स्वतंत्र निदेशक सख्त प्रहरी हों, न कि मौन सहयोगी. लेकिन वर्तमान स्थिति बताती है कि वे शायद मैनेजमेंट के साथ ही खड़े हैं.

यह केवल KOEL की नहीं, बल्कि पूरे भारतीय बाजार के लिए चेतावनी है, स्वतंत्र निदेशक अगर पारदर्शिता के प्रहरी नहीं बनेंगे, तो गवर्नेंस की नींव ही डगमगाएगी.

बाजार की चिंता: क्या पारदर्शिता बचेगी?

किर्लोस्कर ड्रामा भारतीय कॉर्पोरेट गवर्नेंस की एक हाई-वोल्टेज परीक्षा बन चुका है. जहां अन्य कंपनियों ने नियम 30A को अपनाया, KOEL की बोर्ड समर्थित कानूनी रणनीति ने SEBI की साख और निवेशक विश्वास दोनों को चोट पहुंचाई है. SEBI अध्यक्ष तूहीन कांता पांडे ने भले ही कहा कि विदेशी निवेशकों को भारत में निवेश की चिंता नहीं है, लेकिन ऐसे अपारदर्शी नियम और विनियामक अस्थिरता उनकी चिंता बढ़ा सकते हैं.

जैसे-जैसे SAT में सुनवाई नजदीक आ रही है, स्वतंत्र निदेशकों पर निवेशकों का भरोसा टिक गया है. अब जवाबदेही की मांग है: कोई भी कंपनी पारदर्शिता से बच नहीं सकती, जब अल्पसंख्यक शेयरधारकों के अधिकार दांव पर हों. भारत के बाजारों को चाहिए निर्भीक निगरानी, ताकि गवर्नेंस की लौ देरी और भटकाव में बुझ न जाए.


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